Season 1, Episode 20 · Bharat Unscripted
20. Mahabharat : The Oath that Changed History !
24 May 2026 · 14 min
Episode notes
What if one selfless sacrifice could destroy an entire dynasty? This is the story of Devavrat — the prince who would one day become Bhishma. A story that begins with: Ganga drowning her own children, King Shantanu falling in love twice, and a son sacrificing: his throne, his marriage, his children, and his entire future… for his father. But that one terrible vow would eventually lead to: Dhritarashtra, Pandu, the Kauravas, the Pandavas, and the Mahabharata war itself. Who were the cursed Vasus? Why did Ganga drown her 7 sons? How did Dev-vrat become Bhishma? And did one sacrifice unknowingly…
Transcript
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भारत अनस्क्रिप्टेड में आप सब का स्वागत है। हम सब ने कभी ना कभी किसी अपनी के लिए कुछ ना कुछ सैक्रिफ़ाइस किया है, कभी कुछ छोटा, कभी कुछ बड़ा और वह त्याग करते वक्त हमें लगता है कि हमारा सेलफ्लेसनेस सब कुछ ठीक कर देगा, किसी को खुशी देगा और शायद सब की जिंदगी आसान हो जाएगी। पर क्या हो अगर ये त्याग सिर्फ एक इंसान के लिए कुछ पल का सुकून और खुशी लाये और इस एक सैक्रिफ़ाइस से इतनी तबाही हो कि एक के बाद एक वंश मिट जाए, इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध हो और पूरी धरती लाल हो
जाए? आज की कहानी संसार के सबसे बड़े युद्ध के ऊगम स्नान की। वो स्टार्टिंग पॉइंट हमारी पिछली कहानी में हम मिले थे राजा दुष्यंत और भारत से उसी भारत के वंश में आगे चलकर आये राजा हस्ती जिन्होंने बसाया हस्तिनापुर यही हस्तिनापुर बना भारतवर्ष की सेंट्रल कैपिटल फॉर जनरेशन्स टु कम और फिर आये महाराज गुरु। जिनके नाम पर इस वंश का नाम पड़ा, गौरव पीढ़ियां बढ़ती गई, साम्राज्य बढ़ता गया और फिर इसी वंश में जन्म हुआ। राजा शांतनु का। शांतनु अपने वंश के बाकी राजाओं की तरह ही एक महान और शक्तिशाली
राजा थे। उनके राज़ में भारतवर्ष की ख्याति और भी आगे बढ़ी। और जैसे दुष्यंत 1 दिन अचानक शकुंतला से मिले थे, वैसे ही शांतनु को भी 1 दिन दिखी। गंगा गंगा इतनी रेडिएंट और सुंदर थी कि उसे देखकर वो पृथ्वी से है, ये सोचना कठिन था। संतनु उसे देखकर इतने प्रभावित और आकर्षित हो गए कि विवाह का प्रस्ताव रखे। और जैसे शकुंतला ने विवाह की कंडीशन रखी थी, वैसे ही गंगा ने भी रखी पर कंडीशन उसके पुत्र को राजा बनाने की नहीं थी। कुछ अलग थी। गंगा की कंडीशन थी कि शांतनु उसे
कभी कुछ करने से न रोके और कभी उससे कोई सवाल न पूछे। अगर उसे रोका गया या क्वेश्चन किया गया तो वो चली जाएगी। संतनु ने कंडीशन स्वीकार की और उन दोनों का जल्द ही विवाह हुआ दी हैप्पिली एवर आफ्टर वास् सून ब्रोकन इन दी मोस्ट ट्रेजिक वे। इसके बाद जो घटा। वो हमारी कल्पना से बाहर है। शांतनु और गंगा को पुत्र हुआ और इससे पहले कि राजकुमार के जन्म की खुशी हो, गंगा ने अपने नन्हे से बेटे को नदी में बहा दिया। शांतनु बस देखते रह गए। ना वो इसका कारण समझ पाए, ना पूछ
पाए ना ही गंगा को रोक पाए। जो शर्त मानकर उन्होंने विवाह किया था। शायद उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वही शर्त उन्हें 1 दिन इतना हेल्पलेस बना देगी। कुछ दिन बीते। वो फिर पिता बने। शायद इस बार उन्हें लगा हो कि वो अपने पुत्र को अपने सामने बड़ा होता देख पाएंगे। 1 दिन उसे अपना राज़ सौंपेंगे और फिर वही हुआ। गंगा ने उस पुत्र को भी नदी में बहा दिया। शांतनु फिर एक बार बस देखते रह गया। अनफारचुनेटली ये बेबसी राजा शांतनु के जीवन में आखिरी बार नहीं आई थी।
गंगा ने एक एक करके अपने सात पुत्र नदी में बहा दिए। शांतनु सातों बार बस देखते रह गए और आठवीं बार। ये सब फिर -1 आखिरी बार शांतनु और गंगा को आठवा पुत्र हुआ। पर इस बार संतनु ने गंगा को रोका। उसे उस पुत्र को नदी में बहाने नहीं दिया और। पूछा कि वो इन नन्हे बच्चों को नदी में क्यों बहा रही है? पर इस क्वेश्चन में दिया हुआ वचन और विवाह की कंडीशन टूटी। गंगा ने उनके पुत्र को नदी में नहीं बहाया, पर वह उसे लेकर चली गई। कहाँ ये कोई नहीं जानता? इस बार राजा शांतनु ने अपने पुत्र
के साथ अपनी पत्नी भी खो दी। एक तरफ सात पुत्रों की मृत्यु का दुःख और दूसरी तरफ उस आठवें पुत्र के होते हुए भी दूरी समय बीतता गया। हस्तिनापुर चलता रहा, राज्य बढ़ता रहा। और कहीं दूर वह आठवां पुत्र पढ़ रहा था पर न गंगा कोई सामान्य स्त्री थी, न वह बच्चा, कोई साधारण लड़का। वह अलग अलग आश्रमों में भारतवर्ष के महान ऋषियों और योद्धाओं से शिक्षा प्राप्त कर रहा था। उसे वेदों और धर्म की शिक्षा दे रहे थे साक्षात ऋषि वशिष्ठ अस्त्र शस्त्र युद्ध नीती उसने सीखी विष्णु के छटे और चिरंजीवी अवतार
भगवान परशुराम से। धीरे धीरे शांतनु और गंगा का यह बेटा भारतवर्ष का सबसे शक्तिशाली युद्ध कुशल ज्ञानी युवराज बन चुका था। गंगा ने इस बेटी का नाम रखा था देवव्रत और जो नाम हमें पता है वो इसे मिला, उसके वही त्याग से जिससे हमारा इतिहास बदल गया। पर वो इतिहास बदलने से पहले जरूरी था। देवव्रत का अपने पिता से मिलना। 1 दिन राजा शांतनु गंगा नदी के किनारे टहल रहे थे जब उनकी नजर गयी एक युवा योद्धा पर जिसने अपने बाणों से गंगा नदी का प्रवाह रोक
रखा था। शांतनु आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने उस युवा को ध्यान से देखा वो कौन है? ये शांतनु जानने की कोशिश शुरू कर पाते। तब तक उनके सामने आई उनकी पत्नी गंगा। इतने वर्षों बाद जब शांतनु और गंगा फिर से एक दूसरे के सामने आए। तो उन दोनों के बीच क्या बात हुई यह हमें नहीं पता। पर गंगा ने संतनों को यह जरूर बताया कि नदी का प्रभार रोकने वाला उन्हीं का बेटा है। देवव्रत गंगा ने यह भी बताया कि देवव्रत एक असामान्य लड़का है जो युद्ध शास्त्र, राजनीति सब में कुशल है।
और अब बड़ी जिम्मेदारियों के लिए तैयार है। राजा को अपना पुत्र सौंप कर गंगा हमेशा के लिए चली गई। गंगा मिलते ही जाने का दुख संतनों को जरूर होगा पर अपने पुत्र के मिलने की खुशी भी थी। संतनु देवव्रत को हस्तिनापुर ले आए। इस इतने ऐतिहासिक वंश को अपना राजकुमार मिला। देवव्रत ने आते ही सबक मन जीत लिया। उसका ज्ञान, उसका आचरण देखकर सब लोग उसका आदर करने लगे। शांतनु अब शायद सुकून में थे, उन्हें सिर्फ अपना युवराज ही नहीं मिला था। उन्हें मिला था अपना पुत्र। उन्होंने अपनी प्रजा को बड़े गर्व
से बताया कि देवव्रत उनका अगला राजा हो। धीरे धीरे इतने वर्षों की ये दूरी पिता और पुत्र के बीच एक गहरे रिश्ते में बदल गई और इन दोनों के जीवन में कुछ और घटना बचा था। 1 दिन राजा शांतनु फिर किसी नदी के किनारे टहल रहे थे। जब उनकी नजर पड़ी एक नाव चलाती हुई सत्यवती पर जैसे वर्षों पहले गंगा को देख कर हुआ था वैसे ही फिर एक बार शांतनु का मन आकर्षित हो गया। पर इस बार संतो ने विवाह की बात सीधे सत्यवती से नहीं की इनस्टेड उन्होंने सत्यवती के पिता से
मुलाकात की। सत्यवती के पिता थे दाशराज वो संतनु के विवाह के प्रस्ताव को लेकर खुश बहुत हुए। पर ये कंडीशन्स का सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ था। सत्यवती के पिता ने भी एक कंडीशन रखी। उन्होंने कहा कि देवव्रत ऑलरेडी अगला राजा घोषित हो चुका है। ऐसे में सत्यवती का पुत्र सिर्फ एक राजा का भाई बन के रह जाएगा। अगर शंतनु सत्यवती के बेटे को राजा बनाने के लिए तैयार है तो वो अपने पुत्री के विवाह के लिए तैयार है। जो गलती शंतनु एक बार कर चूके थे, उन्होंने दोबारा नहीं।
उन्होंने किसी कंडीशन को स्वीकार नहीं किया। इतने साल बाद मिले पुत्र से वो बहुत प्यार करते थे। देवव्रत में वो सारे गुण थे जो हस्तिनापुर के राजा में होनी चाहिए। उनका अब उत्तराधिकारी बदलना सही नहीं होता। वो निराश होकर हस्तिनापुर वापस पहुंचे। और किसी को कुछ नहीं बताया और उनकी निराशा, उदासीनता सब लोग देख पा रहे थे। थोड़ी छानबीन करने पर देव व्रत को अपने पिता के दुख का कारण समझ आया और अपने पिता के सुख के लिए वो खुद पहुंचा दासराज के पास।
अपने पिता के लिए सत्यवती का हाथ मांगा। दाशराज ने अपनी कंडीशन फिर रखी और यहाँ से शुरू हुआ देवव्रत का त्याग उसने दाशराज की तरफ देखा और कहा अगर समस्या सिर्फ राजगद्दी की है। तो आज से हस्तिनापुर के सिंहासन पर उनका कोई अधिकार नहीं। सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा हो पर यह सुनकर दासराज नहीं माने। उन्होंने कहा, राजकुमार आप नहीं पर आपके पुत्र 1 दिन राजगद्दी मांग सकते हैं, अब क्या? सत्यवती एक युवराज को अपने पिता की इच्छा के लिए तरसता देख रही थी और कुछ नहीं बोली।
देवव्रत ने शायद एक लंबी सांस ली और कहा कि मैं सबके सामने प्रति क्या करता हूँ? कि जीवन भर विवाह नहीं करूँगा। जीवन भर ब्रह्मचारी रहूँ हस्तिनापुर की राजगद्दी पर सिर्फ सत्यवती के पुत्र का ही अधिकार होगा। मैं आजन में इस राज्य की सेवा करूँगा पर अधिकार कभी नहीं मांगूंगा। उस युवा देवव्रत की प्रतिज्ञा भीषण थी, सबको कुछ पल असह्य करने वाली थी, उसने सिर्फ राजगद्दी नहीं त्यागी थी। उसने अपना वंश, अपना जीवन साथी सब कुछ त्याग दिया था और अब दाशराज मान चूके थे।
अब मांगने के लिए कुछ बचा भी नहीं था। देवव्रत सत्यवती के साथ हस्तिनापुर पहुंचा। शांतनु को सत्यवती को देखने के सुख से ज्यादा अपने बेटे के त्याग का दुख था पर वह त्याग अब हो चुका था। शांतनु उसे बदल नहीं पाते। इस त्याग के बदले उन्होंने अपने बेटे को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। अंतनु सत्यवती का विवाह हुआ। इस भीषण प्रतिज्ञा लेने वाले देवरत का नाम प्रसिद्ध हुआ। एस। भीष्म। और ये है महाभारत युद्ध के कॉनफ्लिक्ट का ऊगम स्थान शांतनूवर सत्यवती को दो पुत्र हुए
चित्रांगन और विचित्रवीरय चित्रांगन। जब युवा थे तभी एक युद्ध में मारे गए और फिर राज्य की जिम्मेदारी आई विचित्रवीर्य पर भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए। हस्तिनापुर की राजगद्दी और पूर्ववंश की रक्षा का पूरा भार अपने कंधों पर ले लिया। विचित्रवीर्य के विवाह के लिए भीष्म अकेले ही काशी तक जाकर कई राजाओं से लड़कर दो राज़ कन्या ले आए। पर विवाह के कुछ ही दिनों बाद विचित्रवीर्य का निधन हो गया। जो राजगद्दी देवव्रत ने त्यागी थी, वो अब पूरी तरह खाली थी। पूर्ववंश का सबसे योग्य पुरुष
सबसे शक्तिशाली योद्धा, सबसे उचित उत्तराधिकारी खुद अपनी ही प्रतिज्ञा से बंधा हुआ था। सत्यवती अपने आपको अपने पिता को दोषी मानती रही। कई बार भीष्म को बनाती रही कि वो अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दे, विवाह करें। वंश आगे बढ़ाये पर भीष्म नहीं माने। आखिरकार हार मान कर सत्यवती ने अपने उस बेटी की मदद मांगी जो राजा संतनों का पुत्र नहीं था। भेदव्यास। और फिर वेद व्यास के बच्चे बने। इस राजगद्दी के उत्तराधिकारी धृतराष्ट्र, पंडू और विदुर जिनके बच्चे हुए दुर्योधन और बाकी 100
कौरव पंडू के बच्चे युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम यानी पाण्डव। जिनके बीच हुआ महाभारत का युद्ध इसी महाभारत युद्ध ने वंश मिटा दिए। इतना रक्त संहार हुआ कि कुरुक्षेत्र की धरती लाल हो गई। भीष में इस युद्ध के योद्धा थे और आखिरी गौरव नहोश। जयादि पुरु दुष्यंत भारत पुरु का यह वंश भीष्म पर आकर थम गया। वो जो भीष्म के साथ भाई गंगा ने नदी में बहा दिए थे वह श्रापित वसु थे और गंगा उन्हें इस जीवन के दुख से मुक्ति दे रही थी। वो एक माँ थी। कठोर कैसे बनती? पराठवें वसु का भाग्य अलग था।
उसे जीना था एक पूरा जीवन कर्तव्य का, त्याग का और शायद दुःख का। शायद इसलिए देव व्रत को भीष्म बनना पड़ा और शायद महाभारत हमें यही सीखाता है। ये कर्तव्य और त्याग भी हमेशा सुख तक नहीं ले जाते। अगली कहानी में जल्द मिलते।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
Podcast
Bharat Unscripted
Parijit Khokle · History · Hindi
Every civilization leaves behind stories. The ones that endure aren't remembered because they're old—they're remembered because they reveal something timeless about being human. Bharat Unscripted explores the lives, choices, and defining moments that shaped India's civilization—not simply to understand the past, but to better understand ourselves. A new story, once every two weeks.
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