Episode notes
Dhurandhars of India: The Untold Stories of India’s Greatest Spies 🇮🇳 What does it take to live a life in the shadows… where your name, identity, and even existence can never be revealed? In this gripping episode of India Unveiled , we dive deep into the secret world of Indian intelligence , uncovering the stories of the real-life Dhurandhars — the masterminds who operated behind enemy lines to protect the nation. From covert missions to silent sacrifices, discover how India’s top intelligence agencies like RAW (Research and Analysis Wing) and IB (Intelligence Bureau) have shaped the…
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1947 के पारटिशन के बाद से इंडिया और पाकिस्तान के बीच का रिश्ता सिर्फ वार्स और डिप्लोमेसी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक साइलेंट वॉर भी चलता रहा, जो अंधेरे में लड़ा जाता है। इन्टेलिजेन्स एजेंसीज जैसे रिसर्च एनालिसिस विंग, रॉ। एंड इंटर सर्विसेज इंडिजेंस आईएसआई इस गुप्त संघर्ष में एक बहुत बड़ा रोल निभाया है। ये एपिसोड उन लोगों के उनक ही कहानियों को सामने लाता है जो एनिमी लाइन्स के पीछे काम करते रहे। अक्सर बिना किसी पहचान, सुरक्षा
या सम्मान के कुछ लोग हीरोज़ थे। कुछ सिर्फ हालात का शिकार क्नॉइस और कुछ आज भी एक रास बने हुए हैं। लेजेंड्री ऑपरेटिव जैसे रविंद्र कौशिक से लेकर कंरोशियल फिगर्स जैसे कुलभूषणजाद हब तक हम ऐसी कहानियों सामने लाएंगे जो देशभक्ति और ट्रेजडी के बीच के रेखा को धुंधला कर देती है। एक स्पाई को क्या डिफैन करता है?
क्या वो देश के प्रति वफादारी है? क्नॉइस। ये सब कुछ खोना, अपनी पहचान तक एक ऐसे कॉज के लिए जो शायद कभी उन्हें पहचान जैसे जैसे हम रियल लाइफ केसेस, लीगल बैटल्स और इंसानी कहानियों के सफर पर पड़ेंगे। एक बात साफ होती है स्पिन एज की दुनिया में सच कभी सीधा नहीं होता। तो चलिए शुरू करते हैं। इंडिया और पाकिस्तान के बीच का रिश्ता 1947 के पार्टिशन के तुरंत बाद से ही टेंशन और डिस्ट्रस्ट से भरा हुआ है। पार्टिशन के दौरान हुए वायलेंट माइग्रेशन ने दोनों देशों के बीच
गहरी नफरत और शक का माहौल बना दिया, जिसका असर आज तक देखने को मिलता है। 1947 के बाद 1948, 1948 का कश्मीर कॉन्फ्लिक्ट, फिर 1965 की ओर और 1971 की वॉर ने इस राइवल्री को और इंटेंस बना दिया। इन सब कॉन्फ्लिक्ट्स के बीच एक और साइलेंट बैटलफील्ड डेवलप हुआ, जिसे हम एसपीओ नेच कहते हैं जहाँ बिना यूनिफॉर्म के लोग देश के लिए काम करते हैं। इसी दौरान इन्टेलिजेन्स एजेंसीज जैसे रिसर्च एंड एनालिसिस विंग, जो 1968 में एस्टाब्लिश हुई और इंटर सर्विसेज इन्टेलिजेन्स ने
अपने कवर्ड ऑपरेशन्स को एक्सपैंड किया। रॉक का फॉर्मेशन खास तौर पर 1962 के सिनो वॉर और 1965 के। इंडो पाकिस्तान वॉर के बाद हुआ था, जिससे इंडिया को एक स्ट्रांग एक्सटर्नल इंटेलिजेंस सिस्टम की जरूरत महसूस हुई। दोनों तरफ से स्पाइस को बॉर्डर के बाहर भेजा जाता था जहाँ उनका काम होता था मिलिट्री मूवमेंट्स ट्रैक करना, सेंसिटिव डाक्यूमेंट्स कलेक्ट करना और कभी कभी लोकल नेटवर्क्स बिल्ड करना। ये मिशन्स एक्स्ट्रीमली रिस्की होते थे। क्योंकि अगर पकड़े गए तो उन्हें अपने देश की तरफ से ऑफिसियल
रिकग्निशन या प्रोटेक्शन मिलना मुश्किल होता था। रिपोर्ट्स के मुताबिक हर साल कई लोग के चार्जेज में अरेस्ट किये जाते रहे है। इंडिया ने भी 2013 से 16 के बीच लगभग 50 से ज्यादा सस्पेक्टेड पाकिस्तानी स्पाइस को अरेस्ट किया था। जो ये दिखाता है कि ये गेम सिर्फ एक तरफ से नहीं बल्कि दोनों तरफ से चल रहा है। पाकिस्तान में एनिमे एजेंट्स और इन जैसे कानून के तहत कई इंडियन नेशनल्स को ट्रायल फेस करना पड़ा जहाँ उन्हें डेथ सेन्टेंस तक सुनाया गया। वहीं इंडिया में भी ऑफिसियल
सीक्रेट्स अक्ट के तहत पाकिस्तानी एजेंट्स पर कार्रवाई की जाती है। कई बार ऐसे केसेस में सामने आए जहाँ आम सिविलियंस जैसे फिशरमैन या बॉर्डर विलेजेज़ गलती से बॉर्डर क्रॉस कर गए और उन्हें स्पाई होने के शक में गिरफ्तार कर लिया गया। ये लोग सालों तक जेल में रहे। बिना किसी स्ट्रांग एविडन्स के इस एस पी नेज वॉर का सबसे ट्रेजिक पहलू ये है की ये सिर्फ इन्टेलिजेन्स या मिलिट्री तक सीमित नहीं है। बल्कि इंसानी ज़िन्दगी को डीपली इफेक्ट करता है।
फैमिलीज़ को पता नहीं होता की उनका अपना ज़िंदा है या नहीं। कई लोग देकेद्स् तक प्रिज़ेंस में रहते है और जब वापस आते है तो दुनिया उन्हें भूल चुकी होती है। कभी कभी डिप्लोमैटिक लेवल पर प्रिज़नर एक्स्चेंज भी होते है। जैसे 2008 में एक रेयर मोमेंट देखने को मिला जब पाकिस्तान ने। एक इंडियन प्रिज़नर को रिलीज़ किया और इंडिया ने भी एक पाकिस्तानी सिटीजन की बॉडी वापस की। ये बहुत देर होता है लेकिन ये दिखाते है की इवन के बीच भी इंसानियत के कुछ पल बजे रहते है।
ये हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट हमें ये समझता है की एस पी ओह ने सिर्फ एक सीक्रेट ऑपरेशन नहीं बल्कि एक ऑनगोइंग शैडो वॉर है। जहाँ हर पकड़े गए इंसान के पीछे एक कहानी होती है, एक सैक्रिफ़ाइस होता है और अक्सर एक ऐसी सच्चाई होती है जो कभी पूरी तरह सामने नहीं आती। 1965 1965 के जंग के बाद इंडिया और पाकिस्तान के बीच टेंशन अपने पीक पर था और इसी दौरान एस पी ओह ने एज अक्टिविटीज भी काफी तेज़ी से बढ़ गई थी। इस पीरियड में दो इंडियन नेशनल्स मदन लाल और कृष्णा, जो पाकिस्तान
अथॉरिटीज ने पकड़ लिया। उन पर आरोप था कि वो स्पाइंग अक्टिविटीज में इन्वॉल्व थे और सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन करेक्ट कर रहे थे। पाकिस्तान ने इन दोनों को एनिमी एजेंट्स आर्डिनेंस के तहत चार्ज किया। ये एक ऐसा कानून था जो खास तौर पर वॉर टाइम और नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट्स को डील करने के लिए यूज़ किया जाता था। इस लॉ के अंडर अक्यूज़्ड को एनिमे एजेंट माना जाता है और उनके अगेंस्ट स्ट्रिक्ट लीगल अक्शॅन लिया जा सकता था। मदन लाल और कृष्ण का केस उन अर्ली एग्जाम्पल में से।
एक था जहाँ इंडियन पाकिस्तान बैटलफील्ड तक सीमित नहीं रही, बल्कि इन्टेलिजेन्स और कवर्ट ऑपरेशन तक एक्सटेंड हो चुकी थी। उनकी गिरफ्तारी ने ये दिखाया की दोनों देश अक्टिवली एक दूसरे के खिलाफ़ इन्फॉर्मेशन कैदर कर रहे थे और स्पाइस को एक स्ट्रैटेजिक वेपन के रूप में यूज़ किया जा रहा था। इस केस का एक इम्पोर्टेन्ट पहलू ये भी था की ऐसे लोगों के लिए लीगल प्रोसेसर काफी टफ होता था। उन्हें अक्सर लिमिटेड अक्सेस मिलता था लीगल हेल्प का और उनके ऐडेंटिटी और मिशन दोनों सीक्रेसी
में रखे जाते थे। ये कहानी सिर्फ दो इंडिविजुअल्स की नहीं थी, बल्कि एक नयी फेस की शुरुआत थी जहाँ एस पी ऑन एज। इंडिया पाकिस्तान कॉन्फ्लिक्ट का एक परमानेंट हिस्सा बन गया। 1965 के बाद आफ्टर 1965 ये पैटर्न और स्ट्रांग होता गया, जहाँ हर कॉन्फ्लिक्ट के बाद स्पाई अरेस्ट और इन्टेलिजेन्स ऑपरेशन्स में और ज्यादा इन्क्रीज़ देखने को मिला। बदनारा और कृष्ण का केस हमें ये समझाता है की एस पी ओह ने हेच की दुनिया में पहचान और सच दोनों अक्सर सिस्टम के अंदर ही खो जाते है और बाहर सिर्फ आरोप और
खामोशियाँ दिखाई देती है। इस केस में एक पैटर्न सामने आने लगा, जहाँ एस पी ओह ने सिर्फ एक आइसोलेटेड इंसिडेंट नहीं, बल्कि एक कंटिन्युवस स्ट्रेटेजी बन चुका था। 1965 के बाद पाकिस्तान ने बोरर एरियाज पर सर्वेलेंस और इन्टेलिजेन्स मॉनीटरिंग को और भी स्ट्रांग कर दिया, जिससे इनफ्रेडरेशन और स्पाइंग को रोकने की कोशिश की गई। इसी तरह इंडिया ने भी अपने इन्टेलिजेन्स नेटवर्क को एक्सपैंड किया और कवर्ट ऑपरेशन्स को और स्ट्रक्चर बनाया। इस केस में ये भी हैलैट किया कि स्पाई बनने का मतलब सिर्फ
इन्फॉर्मेशन कलेक्ट करना ही नहीं होता, बल्कि एक ऐसी ज़िन्दगी जीनी होती है जहाँ हर पल पकड़े जाने का खतरा होता है और अगर पकड़े गए तो अपनी पहचान तक डिनै करनी पड़ सकती है। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक ऐसे अक्यूस्ड स्पाइस को इंटेरोगेशन के दौरान। इंटेंस क्वेश्चनिंग और प्रेशर का सामना करना पड़ता था, जहा उनसे सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन निकलने की कोशिश की जाती थी। ये प्रोसेसर अक्सर हार्ष कंडीशन्स में होता था, जिससे उनके मेन्टल और फिजिकल हेल्त पर गहरा असर
पड़ता था। इस केस ने गवर्नमेंट्स को भी ये सिखाया। की एस पी ओह ने सिर्फ मिलिट्री स्ट्रेंथ का एक्सटेन्षन नहीं बल्कि साइकोलॉजिकल वारफेयर का भी एक हिस्सा है जहाँ इन्फॉर्मेशन एक वेपन बन जाती है। इस पीरियड के बाद दोनों देशों ने अपने एजेंट्स को ज्यादा ट्रेनिंग देना शुरू किया। उन्हें फॉल्स आइडेंटिटीज़ क्रियेट करना सिखाया गया और लॉन्ग टर्म अंडर कवर ऑपरेशन्स के लिए प्रेपेर किया गया। क्नॉइस ये वही फाउंडेशन थी जहाँ से आगे चलकर कॉम्प्लेक्स मिशन्स जैसे डीप कवर इन्फिल्ट्रेशन डेवलप
हुए। जैसे की अभी की मूवी धुरंधर में सबसे इम्पोर्टेन्ट बात ये है की ऐसे केसेस में सच कभी पूरी तरह सामने नहीं आता। ऑफिसियल रिकॉर्ड्स लिमिटेड होते है और जो कहानी बाहर आती है। वो अक्सर इन्कम्प्लीट होती है। मदन लाल और कृष्णा की कहानी एक शुरुआत थी एक ऐसे सिलसिले की जो आज तक चल रहा है। जहाँ हर नई जेनरेशन के साथ नए स्पाइस, नए मिशन्स और नए राज़ जुड़ते जा रहे हैं। कश्मीर सिंह की कहानी इंडिया और पाकिस्तान के बीच?
एस पी ओह ने एज हिस्टरी के सबसे लम्बी और एमोशनल कहानियों में से एक है। 1973 में कश्मीर सिंह को पाकिस्तान अथॉरिटीज ने अरेस्ट किया था। ऑफिसियल तौर पर ये कहा गया कि वो स्मग्लिंग के केस में पकड़े गए थे लेकिन बाद में उन पर एस पी ओह ने एज का चार्जेज लगा दिया गया। उन्हें एक इंडियन स्पाई के रूप में प्रेसेंट किया गया। जो सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन कलेक्ट कर रहा था। ट्रायल के बाद उन्हें डेथ सेन्टेन्स सुनाया गया और उन्हें पाकिस्तान की जेल में डाल दिया गया, जहाँ उन्होंने लगभग 35 साल
बिता दिए। ये एक एक्स्ट्रा आर्डिनरी ड्यूरेशॅन है जो किसे भी एसपी और एज केस में बहुत रेयर माना जाता है। 19 सेवेंटीज़ ऑर एयठीन के दौरान उनका केस लार्जली अननोन रहा। उनका नाम पब्लिक डोमेन में ज्यादा डिस्कॅस नहीं हुआ और उनकी फैम्ली इंडिया में उनके बारे में लिमिटेड इन्फॉर्मेशन के साथ जीते रहे एस पी ऑन एज वर्ल्ड का एक हार्श रियालिटी है जहाँ एजेंट्स को अक्सर ऑफिशियली डिनै कर दिया जाता है। 19 नाइन्टीज़ के दौरान भी कश्मीर सिंह जेल में ही रहे जब इंडिया पाकिस्तान के रिलेशन्स में यु
पीएस एंड डाउन्स आते रहे थे जैसे 19199 का कारगिल वॉर, जिसमें टेंशन और भी बढ़ गई थी। इस पीरियड में प्रिज़नर्स के लिए कंडीशन्स और भी डिफिकल्ट हो जाती थी। 2000 के शुरू होने के बाद डिप्लोमैटिक लेवल पर थोड़ी ठहराव देखने को मिली और कुछ ह्यूमेनिटेरियन जेस्चर्स की बात होने लगी। कश्मीर सिंह का केस धीरे धीरे अटेंशन में आया और उनकी मर्सी प्लीज़ पर डिस्कॅशन शुरू हुआ। फाइनली 2008 में 2008 में एक अनएक्सपेक्टेड टर्न आया जब पाकिस्तान के प्रेसिडेंट परवेज मुशर्रफ़ ने।
उन्हें पालन कर दिया। ये डिस्कॅशन एक ह्यूमेनिटेरियन जेस्चर के रूप में देखा गया क्योंकि वो ऑलरेडी 35 साल जेल में बिता चूके थे। 35 इयर्स मार्च 2008 के आस पास उनकी रिलीज़ प्रोसेसर इनिशिएट हुई और उन्हें वाजा बॉर्डर के थ्रू इंडिया वापस भेजा गया। ये मोमेंट हैली एमोशनल था जहाँ एक आदमी जो तीन दशकों से ज्यादा समय जेल में रहा वह अपने देश लौट रहा था। इंडिया लौटने के बाद कश्मीर सिंह ने एक शॉकिंग बात एक्सेप्ट की की वो अक्चवली रिसर्च एंड एनालिसिस
विंग के लिए काम करते थे। ये अडमिशन उनकी। कहानी को और भी सिग्निफिकेंट बना दिया क्योंकि ये उन रेयर केसेस में से एक था जहाँ एक फार्मर स्पाई ने ओपेंली अपनी ऐडेंटिटी एक्सेप्ट की। उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने पाकिस्तान में मल्टीप्ल मिशन्स कंप्लीट किए थे, लेकिन जब वो पकड़े गए थे तो उन्हें ऑफिसियल सपोर्ट नहीं मिला। ये एस पी यु ने एज की दुनिया एक पेइनफूल सच बताती है जहाँ एजेंट्स अपनी ज़िन्दगी रिस्क पर रखते है लेकिन पकड़े जाने पर उन्हें अक्सर
अकेला छोड़ दिया जाता है और इसका सलूशन भी बहुत मुश्किल है क्योंकि अगर वो पीछे आएँगे तो सारी इन्फॉर्मेशन और सारी चीज़ें जो इतनी मेहनत के बाद मिली है वो सारी वेस्ट हो जाएँगी उनकी ज़िन्दगी का ये सफर। 1973 से 2008 तक एक कंप्लीट टाइमलाइन क्रियेट करता है, जहाँ एक इंसान ने अपनी जिंदगी के सबसे कीमती साल जेल के अंदर बिता दी है। सिर्फ एक ऐसे मिशन के लिए जो कभी ऑफिशियली एग्ज़िस्ट भी नहीं करता था। रविंद्र कौशिक जिसे दुनिया ब्लैक टाइगर के नाम से जानती है। इंडिया पाकिस्तान ने हिस्टरी का
एक सबसे डेरिंग और रिमार्केबल चॅप्टर है। रविंद्र कौशिक का जन्म 11 अप्रैल 1952 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। बचपन से ही वो एक टेलेन्टेड स्टूडेंट और थिएटर आर्टिस्ट थे। उनकी अक्टिंग स्किल्स ने ही उनकी ज़िन्दगी का रास्ता बदल दिया। 1973 के आसपास उन्हें रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के ऑफिसर्स ने नोटिस किया और उन्हें सीक्रेटली रीक्रूट किया गया। 1973 सर 1975 के बीच उन्हें दिल्ली में इंटेंसिव ट्रेनिंग दी गई, जिसमें उन्हें उर्दू लैंगुएज,
इस्लामिक कल्चर और पाकिस्तान के सोशल एनवायरनमेंट के बारे में डीटेल में सिखाया गया। 1975 में उन्हें एक नई ऐडेंटिटी दी गई। नबी अहमद, शकीर इस ऐडेंटिटी के साथ उन्हें पाकिस्तान भेजा गया जहाँ उन्होंने अपनी पुरानी जिंदगी को पूरी तरह छोड़ दिया। ये एक पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न था। 1975 से 1978 के बीच उन्होंने पाकिस्तान में अपनी ऐडेंटिटी एस्टब्लिश की। उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से एल एल बी की डिग्री हासिल की और ग्रैजुअली पाकिस्तान के सिस्टम
में घुल मिल गए। 1979 में उन्होंने पाकिस्तान आर्मी जॉइन की और अपनी इंटेलिजेंस और डिसिप्लिन के बेसिस पर धीरे धीरे रैंक बढ़ाते गए। कुछ सालों में ही वो मेजर के रैंक तक पहुँच गए थे, जो एक एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी अचीवमेंट थी। एक डीप कवर एजेंट के लिए। 1979 से 83 के बीच उनका सबसे सक्सेसफुल फेस माना जाता है। इस दौरान उन्होंने इंडिया को क्रिटिकल मिलिट्री इन्टेलिजेन्स प्रोवाइड की जिसमें ट्रूप मूवमेंट्स और स्ट्रेटेजिक प्लेन्स जैसे इनपुट्स शामिल थे, उनकी
इन्फॉर्मेशन इतनी वैल्युएबल थी कि उन्हें इंडिया में ब्लैक टाइगर का कोड नेम दिया गया। 1983 में उनका मिशन एक डेंजरस टर्न लेता है। जब इंडिया ने एक और कॅाटाक्ट एजेंट इनायत मसीह को पाकिस्तान भेजा तो वो पकड़े गए। इंटेरोगेशन के दौरान उसने रविंद्र कौशिक का नाम रिवील कर दिया, जिससे उनकी ऐडेंटिटी एक्सपोज़ हो गई। 1983 के एंड तक कौशिक को पाकिस्तान अथॉरिटीज ने अरेस्ट कर लिया। उन पर एस पी ओह एज के चार्जेज लगाए गए और उनका ट्रायल मिलिट्री कोर्ट में चला।
1985 के आसपास उन्हें डेथ सेंटेंस सुनाया गया, लेकिन बाद में इसे लाइफ इम्प्रिज़न्मेन्ट में कॉनवर्ट कर दिया गया। उन्हें सियालकोट और फिर मुल्तान जैसी। जेल्स में रखा गया, जहाँ उन्होंने लगभग 16 साल का समय काटा। 19 एटीस ऑर नाइनटीज़ के दौरान उन्होंने कई बार इंडिया को लेटर्स लिखे, जिसमें उन्होंने अपनी कंडीशन और नेगलेक्ट के बारे में बताया। उनका एक फेमस लाइन था की अगर मैं अमेरिकन होता तो 3 दिन में वापस आ जाता। ये उनके फ्रस्ट्रेशन को क्लियरली दिखाता है।
21 नवंबर 2001 को मुल्तान सेंट्रल जेल में उनकी डेथ हो गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक उनकी डेथ ट्यूबरकुलोसिस और हार्ट रिलेटेड कॉम्प्लिकेशन्स की वजह से हुई। उनकी डेथ एक साइलेंट एंड थी। एक ऐसे एजेंट के लिए जिसे कभी ऑफिशियली रेकॉग्नाइज़ किया ही नहीं गया। इंडिया को उनको ऑफिशियली कभी एक्सेप्ट नहीं करना। ये इंटेलिजेंस वर्ल्ड का एक रूल है की आगे की इन्फॉर्मेशन बचाई जा सके। सरबजीत सिंह की कहानी इंडिया और पाकिस्तान के बीच सबसे कंट्रोवर्शियल और इमोशनली चार्ज्ड केसेस में से एक है, जहाँ सच और
नैरेटिव दोनों अलग अलग डायरेक्शंस में चलते नजर आते हैं। 1919 में पाकिस्तान में लाहौर और फैसलाबाद जैसे शहरों में बोम्ब ब्लास्ट्स हुए, जिसमें कई लोगों की जान गई और कई लोग घायल हुए। पाकिस्तान अथॉरिटीज ने इन्हें टैक्स के लिए सरबजीत सिंह को जिम्मेदार ठहराया और उन्हें अरेस्ट कर लिया गया। उन पर आरोप लगाया गया कि वो एक इंडियन स्पाई है, जो कवर्ड ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान में घुसकर ऐसे अटैक्स को एग्ज़िक्यटिव कर रहे थे। ट्रायल के बाद उन्हें डेथ सेंटेंस
सुना दिया गया और उन्हें लाहौर के कोट लखपत जेल में। शिफ्ट कर दिया गया। दूसरी तरफ इंडिया का नैरेटिव बिलकुल अलग था। इंडिया ने बार बार ये कहा कि सरबजीत सिंह एक आम किसान थे जो पंजाब के बॉर्डर के पास रहते थे और गलती से शराब के नशे में बॉर्डर क्रॉस कर गए थे। उनके परिवार ने भी यही क्लेम किया कि वो किसी भी एस पी नहीं जेट टेर्रोरिस्ट अक्टिविटी में इन्वॉल्व नहीं थे। 19191 से लेकर 2000 तक सरबजीत सिंह का केस इंडिया में धीरे धीरे पब्लिक अटेंशन में आने लगा। उनकी बहन दलबीर कौर ने उनकी
रिलीज़ के लिए लगातार कैंपेन चलाए। इंडिया में शैलियों, प्रोटेस्ट्स और पीटिशन्स फाइल की गई, जिसमें उनकी सजा को रीकंसिडर करने की डिमॅंड की गई। क्नॉइस। 19 नाइनटीज़ और अर्ली 2000 के दौरान उनकी मर्सी पीटिशन्स पाकिस्तान के अथॉरिटीज के पास भेजी गई, लेकिन हर बार उनके एग्ज़िक्यूशन को पोस्टपोन किया गया पर कैंसिल नहीं किया गया। ये अनसर्टेनिटी उनके केस का एक मेजर पार्ट बन गई, जहाँ हर कुछ सालों में उनकी फांसी की डेट अनाउंस होती थी और फिर लास्ट मोमेंट पर स्टे मिल जाता था।
इस दौरान सरबजीत सिंह ने अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा डेथ रो पर गुज़ारा, जहाँ हर दिन उनके लिए एक साइकोलॉजिकल स्ट्रगल था। डेथ रो का मतलब सिर्फ फिजिकल इम्प्रेसिवेन्ट नहीं बल्कि हर दिन मौत का इंतजार करना होता है। उनका केस धीरे धीरे एक डिप्लोमैटिक इश्यू बन गया। जहाँ इंडिया और पाकिस्तान के बीच स्टेटमेंट्स और काउंटर स्टेटमेंट्स आते जाते रहे। ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन ने भी इस केस पर क्न्सर्न रैसे किया और फेर ट्रायल और ह्यूमेनिटेरियन एप्रोच की बात की।
सरबजीत सिंह की कहानी का ये पहला हिस्सा हमें ये दिखाता है की एस पी ओह ने एज और टेररिज्म के एक्यूसेशन्स के बीच एक इंसान की ज़िन्दगी कैसे पोलिटिकल और डिप्लोमैटिक नैरेटिव का हिस्सा बन जाती है। जहाँ सच अक्सर डिबेट का सब्जेक्ट बना रह जाता है। ये सिर्फ एक केस नहीं बल्कि एक ऐसा सवाल है जो आज भी खड़ा है कि क्या सरबजीत सिंह सच में एक स्माइ थे या एक गलती से बॉर्डर पार करने वाले आम इंसान?
इस सवाल का अब तक पूरा जवाब नहीं मिल पाया है। 2010 के बाद सरबजीत सिंह का केस और ज्यादा इंटरनेशनल अटेंशन लेने लगा था। इंडिया में उनकी रिलीज़ के लिए प्रेशर बढ़ने लगा और उनकी पीटिशन्स पर फिर से डिस्कॅशंस शुरू हो गए। 2012 में एक कॅन्फ़्यूज़न भी क्रियेट हुआ, जब पाकिस्तान में गलती से। अनाउंसमेंट हो गयी की सरबजीत सिंह को रिलीज़ किया जाएगा। लेकिन बाद में क्लैरिफी किया गया की रिलीज़ किसी और प्रिज़नर सुरजीत सिंह का था। इस इंसिडेंट ने उनके परिवार और
सपोर्टर्स के लिए एमोशनल फीडबैक क्रियेट किया। इस दौरान सरबजीत सिंह कोट लखपत जेल में ही थे, जहाँ वो लगभग 23 साल से ज्यादा समय बिता चूके थे। डेथ रोपर इतना लम्बा समय गुजारना अपने आप में एक एक्स्ट्रीम, मेन्टल और फिजिकल चैलेंज होता है। अप्रैल 2013 में उनकी कहानी ने एक लिया जब उन पर जेल के अंदर ही फेलो इनमेट्स ने हमला कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें आयरन रॉड्स और ब्रिक्स से मारा गया, जिससे उन्हें सीवियर हेड इंजरीज हुई। उन्हें तुरंत लाहौर के हॉस्पिटल
में अडमिट किया गया, जहाँ वो कुमा में चले गए थे और उनकी कंडीशन क्रिटिकल थी। इंडिया से डॉक्टर्स की टीम भेजने की बात हुई थी लेकिन उनकी हेल्त लगातार हो रही थी। सेकंड में 2013 को सरबजीत सिंह की डेथ हो गई। उनकी डेथ नहीं इंडिया में वाइडस्प्रेड आउटरेज क्रियेट किया। लोग सड़कों पर उतर आए प्रोटेस्ट्स के लिए और इस इंसिडेंट को एक ह्यूमेनिटेरियन फेल्यूर के रूप में देखा गया है। इंडिया ने ये डिमॅंड की की उनकी डेथ की। प्रॉपर इन्वेस्टिगेशन हो और रेस्पोंसिबल लोगों के खिलाफ़
अक्शॅन लिया जाए। पाकिस्तान ने भी एन्क्वारी का अशुअरॅन्स दिया, लेकिन कंट्रोवर्सी कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उनके बॉडी को इंडिया वापस भेजा गया। जहाँ उनका फाइनल राइट्स फुल स्टेट ऑनर्स के साथ किया गया। ये एक सिम्बोलिक जेस्चर था जो उन्हें एक विक्टिम और नेशनल फिगर के रूप में रेकग्नैज करता था। सरबजीत सिंह की कहानी का एंड सिर्फ एक इंसान की मौत नहीं बल्कि एक ऐसा मोमेंट था जहा पॉलिटिक्स और ह्यूमेनिटी। एक दूसरे से टकराते नजर आये। आज भी उनका केस एक अनरिज़ोल्व
डिबेट बना हुआ है। कुछ लोग उन्हें एक मानते है जब की कुछ उन्हें एक बेकसूर इंसान के रूप में देखते है, जो सिर्फ गलत जगह गलत वक्त पर था उनकी कहानी याद दिलाती है की। इंडिया पाकिस्तान के बीच चलने वाली इस शैडो वॉर का सबसे बड़ा बोझ अक्सर उन लोगों पर पड़ता है जिनके पास अपनी कहानी बताने का मौका भी नहीं होता। कुलभूषण जाधव का केस मॉडर्न इंडिया पाकिस्तान हिस्टरी का सबसे है प्रोफाइल और इंटरनेशनल्ली डिबेट केसेस में से एक है। मार्च 2016 में।
पाकिस्तान ने अनाउंस किया कि उन्होंने बलोचिस्तान से एक इंडियन नेशनल को अरेस्ट किया है, जिसका नाम कुलभूषण जाधव बताया गया। पाकिस्तान के मुताबिक वह एक सर्विंग ऑफिसर थे। इंडियन नेवी के जो कवर्ड ऑपरेशन्स के लिए पाकिस्तान में घुसे हुए थे। पाकिस्तान ने ये क्लेम किया कि जाधव रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के लिए काम कर रहे हैं और उन्हें बलोचिस्तान और कराची में एस पी ओह नीज और सैबोटाज अक्टिविटीज में इन्वॉल्व होने का क्लेम है। उनके अकॉर्डिंग जाधव का कोड नेम
हुसैन मुबारक पटेल था और वो ईरान के थ्रू पाकिस्तान एंटर हुए थे। शॉर्टली पाकिस्तान ने एक वीडियो रिलीज़ की जिसमें जाधव को एक कॅन्फ़्यूज़न देते हुए दिखाया गया क्नॉइस इस वीडियो में उन्होंने अलेजिड्ली एक्सेप्ट किया की वो इंडिया के लिए इन्टेलिजेन्स ऑपरेशन्स चला रहे थे। ये वीडियो इंटरनेशनल लेवल पर काफी कॉन्ट्रोवर्शियल हो गयी क्योंकि इंडिया ने तुरंत इस कंफ्यूज़न को फोर्स्ड ऑर फॅब्रिकेटेड बताया था। इंडिया का वर्शन बिलकुल अर्थ
इंडिया ने कहा की कुलभूषण जाधव एक रिटायर नेवल ऑफिसर है। जो बिज़नेस अक्टिविटीज के लिए ईरान में रह रहे थे और उन्हें वहाँ से किडनैप करके पाकिस्तान ले जाया गया। इंडिया ने ये भी कहा कि उनका पाकिस्तान की टेरिटरी में होना ही डाउटफुल है। अप्रैल 2016 से 2017 तक जाधव का केस रैपिड्ली एस्कैलेट हुआ। पाकिस्तान ने उनपर मिलिट्री कोर्ट में ट्रायल चलाया, जो एक क्लोज्ड प्रोसेसर था। जहाँ डीटेल्स पब्लिक डोमेन में लिमिटेड रखी गई। इंडिया ने बार बार डिमॅंड की की उन्हें कॅस्यूलर अक्सेस दिया जाए।
लेकिन पाकिस्तान ने इनीशियली इस रिक्वेस्ट को डिनै कर दिया, जो बाद में एक मेजर लीगल और डिप्लोमैटिक इश्यू बन गया। कुलभूषण जाधव का केस सिर्फ एक इंडीविजुअल एस पी यु एक इलीगेशन नहीं रहा, बल्कि ये इंडिया और पाकिस्तान के बीच एक मेजर डिप्लोमैटिक कॉन्फ्रंटेशन बन गया, जहाँ दोनों देश अपने अपने नैरेटिव को स्ट्रोंगली डिफेंड कर रहे थे। कुलभूषण जाधव का केस 2017 में एक नया और ग्लोबल टर्न लेता है जब इंडिया ने इस मैटर को सीधा इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस के सामने उठाया।
अप्रैल 2017 में पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट ने कुलभूषण जाधव को डेथ सेन्टेन्स सुना दिया। ये डिसीजन तुरंत ही इंडिया के लिए एक मेजर डिप्लोमैटिक इमरजेंसी बन गया। इंडिया ने किया कि पाकिस्तान ने वियना कन्वेंशन ऑन कौँसेलर रिलेशन्स का वाइलेशन किया है क्योंकि जाधव को क्नॉइस। अक्सेस नहीं दिया गया था जो किसी भी फॉरिन नेशनल का बेसिक लीगल राइट होता है। एयठत में 2017 को इंडिया ने ऑफिशियली आई सी जी में अपील फाइल की और रिक्वेस्ट की की जाधव की
एग्ज़िक्यूशन को रोक दिया जाए। ये एक रेयर स्टेप था जहाँ एक एस पीएन एच केस इंटरनेशनल लीगल प्लेटफार्म तक पहुँच गया। एयठीन्त में 2017 को आई सी जे ने एक इंटरिम ऑर्डर पास किया, जिसमें पाकिस्तान को डायरेक्ट किया गया कि जाधव के एक्सेक्यूशन को स्टे किया जाए। जब तक फाइनल जजमेंट नहीं आता, ये डिसीजन इंडिया के लिए एक मेजर रिलीफ था। कोर्ट प्रोसीडिंग्स के दौरान इंडिया ने ये पोज़ीशन ली कि जाधव को फेयर ट्रायल नहीं मिला और उनका कंसेशन फोर्स्ड था।
पाकिस्तान ने अपनी साइड से डिफेंड किया की जादव एक्सपाइरी थे और उनका ट्रायल लीगल प्रोसेसर के अंदर ही हुआ था। 2017 से 2019 तक ये केस आई। सी जे में चलता रहा जहाँ दोनों देशों ने डिटेल्ड आर्गुमेंट्स और एविडन्स प्रेसेंट की। ये एक है स्टेटस लीगल बैटल थे, जिसे पूरी दुनिया क्लोज़ली फॉलो कर रही थी। सेवेंटींथ जुलाई 2019 को आई सी जे ने अपना फाइनल जजमेंट दिया। कोर्ट ने ये कहा कि पाकिस्तान ने वीना कन्वेंशन का वयोलेशन किया है और इंडिया को कन्सेलर अक्सेस डिनै
करना गलत था। कोर्ट ने पाकिस्तान को ये भी ऑर्डर दिया कि जाधव के केस का इफेक्टिव रिव्यु और रीकन्सिडरेशन किया जाए। क्नॉइस लेकिन ने ये भी क्लैरिफी किया कि वो पाकिस्तान के डोमेस्टिक कन्विक्शन को डाइरेक्टली कैंसिल नहीं कर सकता। इसलिए फाइनल डिसीजन पाकिस्तान के लीगल सिस्टम पर ही डिपेंड करता है। ये जजमेंट एक बैलेंस डिसीजन माना गया, जहाँ इंडिया को लीगल विक्ट्री मिली, लेकिन केस का फाइनल आउटकम अभी भी ओपेन रहा। कुलभूषण जाधव का केस अब एक सिंपल से बढ़कर एक इंटरनेशनल लीगल
प्रेसिडेंट बन चुका था जहाँ कॅस्यूलर राइट्स और फेयर ट्रायल जैसे इश्यूस ग्लोबल डिस्कॅशन का हिस्सा बन गए थे। 2019 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस के जजमेंट के बाद कुलभूषण जाधव का केस एक नए और कॉम्प्लेक्स फेस में एंटर करता है। जहाँ एग्ज़िक्यूशन का इमीडियेट थ्रेट तो रुक गया, लेकिन लीगल और डिप्लोमैटिक स्ट्रगल अभी भी जारी रहा। सितम्बर 2019 में पाकिस्तान ने इंडिया का कोन्सेलोर अक्सेस अलाउ किया। ये एक सिग्निफिकेंट स्टेप था लेकिन इंडिया ने ये क्न्सर्न रैसे किया की मीटिंग हेविली मॉनिटर्ड
थी और जाधव को फ्रीली बात करने का मौका नहीं मिला। इस वजह से इंडिया ने इसे इन्कम्प्लीट कंप्लाइयेन्स माना। इसके बाद पाकिस्तान ने इंटरनेशनल कोर्ट के ऑर्डर को इम्प्लिमेंट करने के लिए एक स्पेशल ऑडिएंस इंट्रोड्यूस किया जिससे जाधव को अपनी कन्विक्शन के अगेंस्ट रिव्यु फाइल करने का ऑप्शन दिया गया। ये प्रोसेसर इस्लामाबाद है। कोर्ट के अंडर इनिशिएट हुआ। 2020 में लीगल प्रोसीडिंग्स शुरू हुई। लेकिन इंडिया ने इस प्रोसेसर पर भी सवाल उठाया।
इंडिया का कहना था की जाधव को इंडिपेंडेन्ट लीगल काउन्सिल चूस करने की पूरी फ्रीडम नहीं दी गई और उनके राइट्स अदुकटली प्रोटेक्ट नहीं हो रहा है। इस दौरान इंडिया ने मल्टीप्ल डिप्लोमैटिक चैनल्स के थ्रू पाकिस्तान पर प्रेशर बनाये की। उन्हें अनरेस्ट्रिक्टेड काउन्सिल अक्सेस दिया जाए और फेर ट्रायल के लिए इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स फॉलो किये जाए। 2021 के बाद भी ये केस स्लो पे इस पर आगे बढ़ता रहा। यादव पाकिस्तान के कस्टडी में रहे और उनका लीगल स्टेटस रिव्यु ऑर
रेकोंसिडेरतिओन् के स्टेज पर ही अटका रहा। ये डिले खुद एक मेजर क्न्सर्न बन गया, क्योंकि जस्टिस सिस्टम में प्रोलोंग्ड अनसर्टेनिटी एक साइकोलॉजिकल बर्डन क्रियेट करती है। इंटरनेशनल लेवल पर भी ये केस एक इम्पोर्टेन्ट रिफरेन्स पॉइंट बन गया जहाँ विएना कन्वेंशन और काउन्सिलर रिलेशन्स के इम्प्लिमेंटेशन पर डिस्कॅशंस होने लगे। ये केस दिखाता है कि कैसे एक इंडीविजुअल का इश्यू ग्लोबल लीगल फ्रेमवर्क को इन्फ्लुयेन्स कर सकता है। इंडिया और पाकिस्तान के रिलेशन्स
में ये केस एक कॉन्स्टेंट रिमाइंडर बन चुका है। की एस पीएन एज सिर्फ कवर्ट ऑपरेशन्स तक सीमित नहीं बल्कि डिप्लोमेसी और इंटरनेशनल लॉ का भी एक क्रूशियल हिस्सा है। क्नॉइस कुलभूषण जाधव की कहानी का सबसे यूनिक एस्पेक्ट ये है की ये अभी भी एक लाइव केस है जिसका फाइनल आउटकम अनसर्टेन है। हर कुछ महीनों में इससे रिलेटेड अपडेट्स आते है, लेकिन कोई डेफिनिटिव क्लोजर अभी तक सामने नहीं आया। ये कहानी हमें ये समझती है की मॉडर्न एस पीएन एज सिर्फ सीक्रेट
मशीन्स ऑर अंडर कवर ऑर आइडेंटिटीज़ तक लिमिटेड नहीं है। बल्कि कोर्टरूम बैटल्स, डिप्लोमैटिक नेगोशिएशन्स और ग्लोबल अटेंशन का भी एक पार्ट बन चुका है। आज भी एक सवाल वहीं खड़ा है। क्या कुलभूषण जाधव को कभी पूरा जस्टिस मिलेगा? या फिर ये केस भी हिस्टरी के उन अधूरे चॅप्टरस में शामिल हो जाएगा जहाँ सच और सियासत के बीच की रेखा कभी क्लियर नहीं हुआ? 2017 में कुलभूषण जाधव का केस एक हिस्टोरिक इंटरनेशनल लीगल टर्निंग प्वाइंट पर पहुँच गया, जब इंडिया
ने इस मैटर को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के सामने उठाया। में 2017 में आईसीजे ने एक इमीडिएट इंटरवेंशन किया और पाकिस्तान को ऑर्डर दिया कि जाधव के एक्सेक्यूशन को तुरंत रोका जाए। ये एक प्रोविशनल मेजर था। जो तब तक लागू रहेगा जब तक कोर्ट पूरे केस को डीटेल में सुनकर फाइनल जजमेंट नहीं दे देता। आई सी जे ने अपनी ऑर्डर में ये क्लियरली कहा कि पाकिस्तान को सभी जरूरी कदम उठाने होंगे ताकि जाधव की एग्ज़िक्यूशन ना हो। जब तक उनका अपील प्रोसेसर कंप्लीट
नहीं हो जाता ये फ्रेस टेक ऑल मेजर्स। काफी सिग्निफिकेंट था क्योंकि इसने पाकिस्तान पर एक क्लियर लीगल ऑब्लिगेशन डाल दिया। ये डिसीजन इंडिया के लिए एक मेजर डिप्लोमैटिक और लीगल रिलीफ था क्योंकि इससे ज्यादा की लाइफ को इमीडियेट डेंजर से बचाया गया और केस को एक फेयर हियरिंग का मौका मिला। पाकिस्तान ने भी के इस ऑर्डर को कम्प्लाइ किया और एग्ज़िक्यूशन को होल्ड पर रख दिया। लेकिन साथ ही अपना डांस मेंटेन रखा कि ज्यादा विक्स पाई है और उनका ट्रायल लीगल था। गोपाल दास की कहानी एस पीएन एज की
दुनिया का एक ऐसा चॅप्टर है जो साक्रिफ़ाइज़ के साथ साथ नेग्लेट की रियलिटी को भी सामने लाता है। 1984 के आसपास गोपाल दास को पाकिस्तान में रेस्ट किया गया क्नॉइस। उन पर स्प नेच के चार्जेज लगाये गए और उन्हें एक इंडियन स्पाई के रूप में ट्रीट किया गया। ये वही दौर था जब कवर्ड ऑपरेशन्स ऐक्टिविटी चल रहे थे और स्पाइस को सेंसिटिव मिशन्स के लिए बॉर्डर पर भेजा जा रहा था। उन्हें पाकिस्तान की जेल में डाल दिया गया, जहाँ से उन्होंने लगभग 27 साल गुजारे।
एक पूरी ज़िन्दगी का बहुत बड़ा हिस्सा था। जो उन्होंने प्रेसेंट के अंदर बिता दिया बिना किसी सर्टेनिटी के की कब या कैसे उनकी रिलीज़ हो गई। इन सालों के दौरान उनका केस पब्लिक डोमेन में ज्यादा हैलैट नहीं हुआ क्योंकि उनकी फैम्ली इंडिया में उनके बारे में लिमिटेड इन्फॉर्मेशन के साथ जीती रही और उनकी ज़िन्दगी धीरे धीरे दुनिया की नजरों से गायब हो गई। अप्रैल 2011 में एक अनएक्सपेक्टेड डेवलपमेंट हुआ जब पाकिस्तान के प्रेसिडेंशिएल ऑर्डर के थ्रू गोपाल दास को रिलीज़ किया गया।
ये ह्यूमेनिटेरियन डिसीजन माना गया। जहाँ एक लॉन्ग टर्म प्रिज़नर को फाइनली आज़ादी दी गई। उन्हें वाघा बॉर्डर के थ्रू इंडिया वापस भेजा गया जहाँ उनकी वापसी एक एमोशनल मूवमेंट थी। लेकिन साथ ही एक बिटर रियालिटी भी सामने आई। इंडिया लौटने के बाद गोपाल दास ने ओपेंली एक्सेप्ट किया की वो रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के लिए काम करते थे। उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें के लिए पाकिस्तान भेजा गया था और वो अपना मिशन परफॉर्म कर रहे थे जब उन्हें पकड़ा गया। लेकिन उनकी कहानी का सबसे पेइनफूल
हिस्सा ये था कि उन्होंने ये भी कहा था कि। उनकी कैप्टिविटी के दौरान उन्हें इंडियन अथॉरिटीज की तरफ से ज्यादा सपोर्ट नहीं मिला। उन्होंने अपनी फ्रस्ट्रेशन एक्सप्रेस की और कहा कि उनकी स्ट्रगल लार्जली इग्नोर की गई। ये स्टेटमेंट सिस्टम के हार्ष ट्रुथ को दिखाता है। मेहबूब इलाही शमशी की कहानी। एस पीएन एज की दुनिया का एक सबसे डार्क और पैनफुल चॅप्टर है, जहाँ इंसानी सफरिंग अपने एक्स्ट्रीम लेवल पर नजर आती है। 1977 में महबूब इलाही को
पाकिस्तान के फील्ड इन्टेलिजेन्स यूनिट ने अरेस्ट किया। उन पर एस पीएन एज के सीरियस चार्जेज लगाए गए और उन्हें एक इंडियन स्पाई के रूप में ट्रीट किया गया। ये वो दौर था। जब इंडिया और पाकिस्तान के बीच कवर्ड ऑपरेशन्स अपने पीक पर थे, उनकी अरेस्ट के बाद उन्होंने इंटेंस इंटेरिगेशन का सामना किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन पर सिफार टॉर्चर किया गया, जिससे उनसे इन्फॉर्मेशन निकालने की कोशिश की गई। ये टॉर्चर सिर्फ फिजिकल नहीं बल्कि साइकोलॉजिकल भी था। जहाँ एक इंसान को मेंटली ब्रेक
करने की कोशिश की जाती है। 1977 से लेकर 19196 तक उन्होंने लगभग 20 साल पाकिस्तान के जेल में अपनी ज़िन्दगी बिताई। ये ड्यूरेशॅन सिर्फ इम्प्रेशनमेन्ट नहीं बल्कि एक कंटिन्युवस स्ट्रगल था का जहाँ हर दिन एक नई चैलेंज लेकर आता था। इंसानों के दौरान उनकी कंडीशन बहुत क्रिटिकल हो गई थी। लॉन्ग टर्म टॉर्चर और हार्ष प्रेसेंट कंडीशन्स ने उनकी हेल्त पर गहरा असर डाला था लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के लिए स्ट्रगल जारी रखा। उनका केस बाहर दुनिया के लिए
लार्जली अननोन रहा। ये एस पीएन एज के दुनिया का एक हार्ष रियलिटी है जहाँ लोग बिना रिकग्निशन के भी सालों तक सफर करते है। और उनकी कहानियों कभी हेडलाइन तक पहुंचती नहीं। 19196 में फाइनली पाकिस्तान अथॉरिटीज ने उन्हें इंडिया वापस भेजने का डिसीजन लिया। महबूब इलाही की कहानी हमें ये दिखाती है कि एस पी ओह सिर्फ इन्टेलिजेन्स और स्ट्रेटेजी की बात नहीं है बल्कि एक ऐसी दुनिया है जहाँ इंसानी लिमिट्स टेस्ट होती है, जहाँ पेइन और साइलेंस दोनों एक साथ एग्ज़िस्ट करते है। विनोद सोनी इनकी कहानी की दुनिया
का एक ऐसा पहलू दिखाती है जहाँ एक आम इंसान एक एक्सट्रॉर्डिनरी और डेंजरस रास्ते पर चल पड़ता है। 1977 में विनोद सोनी जो पहले एक टैक्सी ड्राइवर थे, उन्हें रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के लिए रिक्रूट किया गया। उनकी ज़िन्दगी एक दम सरपद थी जहाँ एक नॉर्मल सिविलियंस से वो एक कवर्ड एजेंट बन गए। उन्हें एक मिशन के लिए पाकिस्तान भेजा गया, जहाँ उनका काम था सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन गैदर करना और कवर्ड ऑपरेशन्स में असिस्ट करना। लेकिन ये मिशन शुरू होने के कुछ
ही समय बाद उनके लिए एक नाइट मेयर बन गया। 1977 में ही उन्हें पाकिस्तान अथॉरिटीज ने पकड़ लिया। उनपर एस पी ओह ने इसके चार्जेज लगाये गए और उन्हें जेल में डाल दिया गया। ये अरेस्ट एम के ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट बन गया जहाँ उन्हें एक अननोन और हार्ष रियलिटी का सामना करना पड़ा। उन्होंने पाकिस्तान की जेल्स में लगभग 11 साल गुजारे। 1977 से लेकर 19808 तक। ये पीरियड उनके लिए सिर्फ नहीं बल्कि एक सर्वाइवल जर्नी थी, जहाँ उन्हें हर्ष कंडीशन्स ऑर अनसर्टेनिटी के साथ जीना पड़ा।
इंसानों के दौरान उनका केस बाहर आया। दुनिया के सामने बट ये ज्यादा विज़िबल नहीं था। उनकी फैम्ली इंडिया में उनके इंतजार में रही और उनकी कहानी धीरे धीरे एक साइलेंट स्ट्रगल बन गई। 19808 में फाइनली उन्हें रिलीज़ किया गया और इंडिया वापस भेजा गया। ये मोमेंट उनके लिए फ्रीडम का था, लेकिन साथ ही एक ऐसी ज़िन्दगी का एंड भी था जो कभी नॉर्मल नहीं हो पाई। बाद में विनोद सोनी ने अपने एक्सपीरियंस से शेयर किए जहाँ उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें
रिक्रूट किया गया और कैसे उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के इम्पोर्टेन्ट सा प्रिज़्म में गुजारे। उनकी कहानी ने एसपी ने सिस्टम के एक और पहलू को सामने लाया। जहाँ आम लोग भी इस शैडो और का हिस्सा बन जाते है। विनोद सोनी की ये स्टोरी दिखाती है कि स्पाई बनना सिर्फ ट्रेंड ऑफिसर्स का काम नहीं होता। कभी कभी एक आर्डिनरी इंसान भी सरकमस्टैंसेस की वजह से इस डेंजरस दुनिया का पार्ट बन जाता है। अब सुनते है रामप्रकाश जीके बारे में इनकी कहानी एस पीएन हेच की
दुनिया का एक गहरा और एमोशनल चॅप्टर है जहाँ हमें दिखता है कि कैसे एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी एक ही डिसीजन या एक मिशन की वजह से बदल देता है। 19198 में रामप्रकाश जी को पाकिस्तान के सियालकोट रीज़न में अथॉरिटीज ने किया क्नॉइस। ये एरिया इंडिया पाकिस्तान बौडा के काफी करीब है जहाँ पर सर्वेलेंस और सिक्योरिटी हमेशा है रहती है। उन पर एस पी ओह ने इसके चार्जेज लगाए गए और उन्हें एक इंडियन एजेंट के रूप में ट्रीट किया गया। उनकी गिरफ्तारी के वक्त इंडिया और
पाकिस्तान के बीच रिलेशन्स बहुत थे। नुक्लेअर टेस्ट्स के बाद दोनों देशों के बीच टेंशन बहुत बढ़ चुका था और फिर क्नॉइस 19199 का कागज़ हुआ। इस सिचुएशन को और इंटेंस बना देता है। ऐसे एनवायरनमेंट में किसी भी सस्पेक्टेड स्पाई के लिए सिचुएशन और भी टफ हो जाती है। रामप्रकाश को लाहौर के कोट लखपत जेल में रखा गया था, जो एक है सिक्योरिटी प्रिसन है जहाँ पर पोलिटिकल और एस पीएन एज केसेस के प्रिज़नर्स को भी रखा जाता है। यहाँ उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के अगले 10 साल गुजारे।
19 एयठ से 2008 तक ये दौर उनके लिए सिर्फ इम्प्रिज़मेंट नहीं था, बल्कि एक कंटिन्युवस, मेन्टल और फिजिकल स्ट्रगल भी था जो हर दिन एक रूटीन की जगह और एक अनसर्टिनिटी के साथ गुजरता था। यहाँ फ्यूचर का कोई क्लियरेंस मिल ही नहीं सकता। उनकी फैम्ली इंडिया में उनका इंतजार करती रही, लेकिन उनके बारे में ज्यादा इन्फॉर्मेशन अवेलेबल नहीं थी। केसेस का एक कामन ऑर पेइनफूल पैटर्न है जहाँ फैमिलीज़ को भी क्लैरिटी नहीं मिलती उनका अपना किस कंडीशन में है।
उस जेल की कंडीशन्स भी काफी हार्ष मानी जाती है जहाँ ओवरक्राउडिंग लिमिटेड रीसोर्सेस ऑर स्ट्रिक्ट डिसिप्लिन प्रिसनर्स के लिए टफ एनवायरनमेंट क्रियेट करते है। रामप्रकाश जी ने इन सब चैलेंजेस के बीच अपनी ज़िन्दगी के सबसे इम्पोर्टेन्ट साल गुजारे। इस दौरान उनका केस किसी बड़े डिप्लोमैटिक हाईलाइट का हिस्सा नहीं बना जो उनके लिए और भी डिफिकल्ट था। क्योंकि जब केसेस इंटरनेशनल अटेंशन में आते हैं, तब उनके रेसोलुशन के चान्सेस थोड़े बढ़ जाते हैं।
लेकिन उनका केस लार्जली साइलेंस में ही चलता रहा। 2008 में फाइनली एक मेजर टर्निंग पॉइंट आया जब पाकिस्तान ने उन्हें रिलीज़ करने का डिसीजन लिया। ये डिसीजन शायद डिप्लोमैटिक जेस्चर्स और ह्यूमेनिटेरियन कंसिडरेशन्स का पार्ट होता पर उन्हें वाघा बॉर्डर के थ्रू इंडिया वापस भी जा गया। उनकी वापसी एक बहुत ही सिम्बोलिक मूवमेंट थी जहाँ एक आदमी जो 10 साल तक अक्टिविटी में रहता है। वो अपनी मिट्टी पर लौट रहा था। लेकिन साथ ही ये भी एक रियलिटी थी की उनकी ज़िन्दगी के 10 साल वापस
तो नहीं आ सकते थे। इंडिया लौटने के बाद उनकी कहानी धीरे धीरे सामने आई और शायद इसीलिए राम प्रकाश जी जैसे लोग एस पी दुनिया का साइलेंट सर्वाइवर्स है जो हेडलाइन्स में नहीं आते। लेकिन जिनके एक्सपीरियंसेस। असली सच रिफ्लेक्ट करते है। इंडिया पाकिस्तान के बीच एस पीएन हेच केसेस का?
एक इम्पोर्टेन्ट पहलू उनका लीगल आउटकम है, जहाँ कोर्ट्स ऑर लीगल सिस्टम एक डिसाइसिव रोल पे करते हैं। पाकिस्तान में रिजिड इंडियन स्पाइस के केसेस को अक्सर स्ट्रिक्ट लीगल फ्रेमवर्क के अंदर हैंडल किया गया है जहाँ उनपर एस पीएन हेच के सीरियस चार्जेज लगाए जाते हैं। और उनका ट्रायल कोर्ट्स या मिलिट्री कोर्ट्स में कंडक्ट होता है। कई केसेस में कोर्ट्स ने अक्यूस्ड को गिल्टी पाया और उन्हें सेवेरे पनिशमेंट्स दी गई, जिसमें लाइफ इम्प्रिज़न्त् और डेथ सेंटेन्सेस भी शामिल है।
और टॉर्चर उसका जो एग्ज़ैम्पल आपने सोच और देखा ही होगा। ये दिखता है की पाकिस्तान एस पी यु एड्स को एक मेजर नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट के रूप में देखता है। एस ए ट्रायल अक्सर क्लोज़ नेचर के होते है जहाँ डीटेल्स पब्लिक डोमेन में लिमिटेड होती है। इस वजह से बाहर के लोगों के लिए पूरा सच समझना मुश्किल हो जाता है और नैरेटिव दोनों तरफ अलग अलग रहते है। इन केसेस में लीगल प्रोसेसर भी काफी कॉम्प्लेक्स होता है। क्योंकि ये सिर्फ क्रिमिनल मैटर
नहीं बल्कि नेशनल सिक्योरिटी से जुड़ा है, जहाँ एविडन्स क्लासिफाइड होते है और प्रोसीडिंग्स कॉन्फ़ीड़ेन्शीयल रखी जाती है, लेकिन कभी कभी स्ट्रिक्ट सिस्टम के बीच ह्यूमेनिटेरियन डिसीजंस भी सामने आता है। एक नोटेबल एग्ज़ैम्पल है। कश्मीर सिंह का केस 2008 में पाकिस्तान के प्रेसिडेंट परवेज़ मुशर्रफ़ ने कश्मीर सिंह की मर्सी प्री एक्सेप्ट की। उन्होंने लगभग 35 साल प्रिज़न में बिदा दिए थे और डेथ रो पर थे। प्रेसिडेंट मुशर्रफ़ ने उनके
सेन्टेन्स को कम्यूट कर दिया और उन्हें रिलीज़ करने का डिसीजन लिया। ये एक रेयर ह्यूमेनिटेरियन जेस्चर माना गया है जो एस पी ओह ने जैसा सेंसिटिव विषयों के बीच एक इंसानियत की झलक दिखाता है। ये सिर्फ एक इंडीविजुअल केस नहीं था, बल्कि एक सिम्बोलिक मोमेंट भी था जहाँ एक लॉन्ग टर्म प्रिज़नर को फाइनली फ्रीडम मिली। इसके बावजूद पैटर्न यही है कि पाकिस्तान के लीगल सिस्टम ने एस पीएन हेच केसेस में स्ट्रिक्ट स्टेंस मेंटेन किया है जहाँ नेशनल सिक्योरिटी को सबसे ऊपर रखा जाता
है या हमें ये भी समझाता है कि। इस दुनिया में लीगल आउटकम सिर्फ लॉ का रिसाल्ट नहीं होते, बल्कि पॉलिटिक्स डिप्लोमेसी और सिक्योरिटी कंसर्न्स का भी एक बहुत ही कॉम्प्लेक्स रिफ्लेक्शन होते हैं। इंडिया और पाकिस्तान के बीच इन केसेस का सबसे क्रूशियल पहलू उनका लीगल आउटकम है, जहाँ कोर्ट्स फाइनल डिसीजन का रोल प्ले करते हैं। 2013 से 16 के बीच इंडिया ने ऑफिशियली रिपोर्ट किया की यहाँ डजन्स ऑफ़ इलजेट पाकिस्तानी स्पाइस को किया गया है और 2016 तक
ये नंबर लगभग 5353 पहुँच गए थे। इन नंबर्स से भी हम समझ सकते है की ये अक्टिविटी ऑनगोइंग है, जो सिर्फ हिस्टरी का पार्ट नहीं, बल्कि आज भी क्नॉइस। प्रेसेंट है। इन अरेस्ट में लगभग अलग अलग तरह के केसेस शामिल थे। कुछ लोग डाइरेक्टली इन्टेलिजेन्स एजेंसीज से लिंक्ड थे, जबकि कुछ लोग ऐसे थे जो लोकल कॉंटॅक्ट्स या इन्फॉर्मर्स के रूप में काम कर रहे थे। ये नेटवर्क एक लाएरेड स्ट्रक्चर होता है जहाँ हर लेवल पर अलग अलग रोल्स होते है। कई केसेस में कीस लोग सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन कलेक्ट करते हुए
पकड़े जाते है। जस्ट ए मिलिट्री मूव एंड सिक्योरिटी डीटेल्स या स्ट्रेटेजिक लोकेशन से रिलेटेड डेटा ये इन्फॉर्मेशन नेशनल सिक्योरिटी के लिए एक्स्ट्रीमली क्रिटिकल होती है, इसलिए ऐसे केसेस को सीरियस थ्रेट के रूप में ट्रीट किया जाता है। इंडिया में ही नहीं हर देश में इंडिया में ऐसे केसेस कोफिशियंट सीक्रेट्स अक्ट के अंदर हैंडल किया जाता है। जहाँ पर स्ट्रिक्ट लीगल अक्शॅन लिया जा सकता है और उन्हें सजा जो सुनाई जाती है वो भी लॉन्ग टर्म
ही होती है या अरेस्ट तो ये भी दिखाते हैं कि ट्रैन ऑफिसर्स तक लिमिटेड नहीं है, बल्कि इसमें आम लोग भी इन्वॉल्व हो सकते हैं। ये पैसे प्रेशर या आइडियोलॉजी के चक्कर से इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं। बॉर्डर एरियाज में ऑब्वियस्ली ये प्रैक्टिसेज़ कामन है जहाँ क्रॉस बॉर्डर मूवमेंट हो और लोकल कनेक्षन्स का यूज़ करके इन्फॉर्मेशन एक्स्चेंज की जाती है। ये एक साइलेंट सिस्टम है, जो अक्सर सरफेस पर नजर नहीं आता, लेकिन अंदर ही अंदर काफी अक्टिव
रहता है। क्या पता आज भी किसी सिक्योरिटी क्न्सर्न की वजह से ये अक्टिव हो? और लोग ऐसा करते भी है। कुछ न्यूस आती भी है की किसी एक देश से लोकल कनेक्शन के जरिए कोई दूसरे देश में एंटर हो गया। इस पीरियड के अरेस्ट ने ये हैलैट किया की इंडिया भी अक्टीव्ली अपने काउंटर इन्टेलिजेन्स ऑपरेशन को स्ट्रांग बना रहा है और किसी भी सस्पेक्टेड एसपी ऑन एज अक्टिविटी पर। स्ट्रिक्ट अक्शॅन ले रहा है। इंडियन मीडिया सालों से एस पी ओह नेट स्टोरीज़ को फिल्म्स ऑर वेब
सीरीज के थ्रू प्रेसेंट किया है जहाँ स्पाइस को कभी हीरोज़ के रूप में दिखाया जाता है और कभी ट्रेजिक फिगर्स के रूप में जो अपनी पहचान तक खोदे थे। ये पोर्ट्रियल अक्सर रियल इवेंट्स से इन्सपायर्ड होते है। जैसे डीप कवर एजेंट्स की कहानियों, जिन्होंने सालों तक दूसरे देश में रहकर इन्फॉर्मेशन गैदर की। ये कहानियों ऑडिएंस को एक थ्रेडिंग एक्सपीरियंस देती है लेकिन साथ ही एक एमोशनल कनेक्शन भी क्रियेट कर दिया। अभी रिसेंटली धुरंधर भी से ट्रेंड
का एक एग्ज़ैम्पल है जो डीप का की स्टोरी से इंस्पायर्ड है और ऐसे एजेंट्स की कहानी को सिनेमैटिक फॉर्म में दिखाती है। बात करें अगर धुरंधर की तो काफी हद तक ये फ़िल्म रविंद्र कौशिक जीके रियल लाइफ ऑपरेशन से इनसपायर्ड लगती है जिन्होंने अपनी ऐडेंटिटी चेंज करके सालों तक एनिमीटरी में काम किया है। लेकिन सिनेमा और रियलिटी के बीच एक बड़ा डिफरेंस होता है, जहाँ फिल्म्स में मिशन्स को ग्लैमरस और हीरोइन दिखाया जाता है। वहीं रियल लाइफ में ये कहानियों ज्यादा पैनफुल और अनसर्टन होती
हैं। रियल स्पाइस अक्सर रिकग्निशन के बिना काम करते हैं और पकड़े जाने पर उन्हें इयर्स तक प्रिज़न में रहना पड़ता है। जहाँ उनकी कहानी हेडलाइन्स हो गया। आसपास के लोगों तक भी नहीं पहुंचती। मीडिया का रोल यहाँ एक डबल एज स्वर्ड जैसा दिखता है जहाँ एक तरफ। अवेयरनेस क्रियेट होती है, तो दूसरी तरफ ये कभी कभी रियालिटी को सिम्प्लिफाइ या ट्रॉमेटाइज भी कर देती है। फिर भी ये अनडेनायरेबल है की मीडिया ने एस पी ओह ने एज को एक कल्चरल नैरेटिव का हिस्सा बना दिया है, जहाँ लोग सिर्फ और
स्टोरीज़ नहीं बल्कि उन लोगों की पर्सनल जर्नीज़ को भी समझ पाते है जो लोग इस शैलो वर्ल्ड का पार्ट बनते है। इस एपिसोड में हमने रविंद्र कौशिक जैसे लेजेंडरी स्पाइस की कहानी सुनी, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी एक मिशन के लिए डेडिकेट कर दी और हमने सरबजीत सिंह जैसे कंट्रोवर्शियल केसेस भी देखे जहाँ सच आज तक डिबेट का सब्जेक्ट बना हुआ है। कुछ लोग वापस लौट आए जैसे कश्मीर सिंह और सुरजीत सिंह। लेकिन कई लोग ऐसे भी है जो। कभी घर नहीं लौट पाए और उनकी
कहानियों, सिर्फ फाइल्स और रिकॉर्ड्स सब सीमित रह गयी। ये कहानियों हमें एक कामन थीम दिखाती है। सैक्रिफ़ाइस की एक ऐसा सैक्रिफ़ाइस जो सिर्फ फिजिकल नहीं बल्कि एमोशनल साइकोलॉजिकल और मेन्टल भी होता है। एक इंसान अपने ऐडेंटिटी तक छोड़ देता है। इस दुनिया में हीरोज़ अक्सर नाम के बिना होते है। उन्हें मेडल से रिकग्निशन नहीं मिलता। उनकी कहानी हेडलाइन्स नहीं बनती लेकिन उनका इम्पैक्ट उतना ही रियल होता है जितना किसी बैटलफील्ड पर लड़ने वाले।
इस जर्नी के दौरान एक बात बार बार सामने आई की सच कभी सिंपल नहीं होता। हर केस के दो पहलू होते है एक जो दिखाया जाता है और एक जो हमेशा छुपा रहता है। और शायद इसलिए एस पीएन एच की दुनिया इतनी मिस्टीरियस है क्योंकि यहाँ हर कहानी के बीच एक साइलेंस होता है एक ऐसा साइलेंस जो सब कुछ कह कर भी कुछ नहीं कहता। ये सिर्फ एक एपिसोड नहीं था बल्कि एक एटेम्पट था उन कहानियों को समझने का जो अक्सर हिस्टरी के मार्जिन्स पर लिखी जाती है और अब। जब ये सफर अपने एंड के करीब है तो एक सवाल फिर से सामने आता है कि
क्या हम कभी इन कहानियों का पूरा सच जान पाएंगे या फिर ये कहानियों हमेशा अंधेरे में ही छुपे रहेंगे? जैसे हम इस कहानी के एंड पर पहुंचते हैं। एक बात बिल्कुल क्लियर हो जाती है कि एस पीएन एच की दुनिया में कोई भी चीज़ पूरी तरह ब्लैक या व्हाइट नहीं होती। सब कुछ के लिए होता है। इंडिया और पाकिस्तान के बीच चलने वाला ये साइलेंट कॉन्फ्लिक्ट शायद कभी खत्म ना हो क्योंकि ये सिर्फ टेरिटरी या पॉलिटिक्स का इश्यू नहीं बल्कि ट्रस्ट और परसेप्शन का भी सवाल है।
हरसपाई की कहानी एक अलग रियलिटी दिखाती है। कोई हीरो के रूप में याद रखा जाता है, कोई विक्टिम बन जाता है क्नॉइस और कोई बस एक नाम बन कर रह जाता है जैसे वक्त के साथ लोग भूल भी जाते है ऐसे कुलभूषण जाधव ये केस हमें ये दिखाते हैं कि मॉडर्न दुनिया में एसपी सिर्फ सीक्रेट मिशन्स तक सीमित नहीं बल्कि इंटरनेशनल कोर्ट्स डिप्लोमेसी और ग्लोबल अटेंशन का हिस्सा भी बन चुका है। वहीं गोपाल दास जी और राम प्रकाश जी जैसे लोग हमें ये याद दिलाते हैं कि कहानियों ऐसी भी होती है
जो हेडलाइन्स तक नहीं पहुँचती लेकिन उनका पेइन उतना ही रियल होता है। ये एपिसोड उन सब लोगों के नाम जिन्होंने इस शैडो वॉर में अपनी जिंदगी का एक हिस्सा या पूरी जिंदगी दे दी, चाहे उन्हें पहचान मिली या ना मिले। और शायद इसीलिए ये स्टोरीज़ हमें अट्रैक्ट करती है क्योंकि ये सिर्फ स्पाइस की कहानी नहीं बल्कि इंसानियत की कहानी भी है जहाँ फियर ड्यूटी सैक्रिफ़ाइस ऑर होप सब एक साथ एग्ज़िस्ट करते है सो या आई होप यू लाइक थिस एपिसोड थिस इस राकेश सोनी साइनिंग ऑफ फ्रम
इंडिया अनवेल्ड अगर आपको ये सफर पसंद आया हो तो इस कहानी को शेयर कीजिए क्योंकि कुछ सच ऐसे होते हैं जो जीतने ज्यादा लोगों तक पहुंचे उतना ही पावरफुल होता है। तब तक के लिए याद रखिए हरसाय के बीच एक कहानी होती है और हर कहानी के पीछे एक सच जो शत कभी पूरी तरह सामने नहीं आता। ए गुड केयर ऑफ हेल्थ आई एलएल सी यू सून टिल देन कीप लिसनिंग टू इंडिया अनवेल्ड।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
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India Unveiled
What if the most fascinating stories of India are the ones we've never been told? Welcome to India Unveiled, where history meets mystery, forgotten tales come alive, and the secrets of our past unfold through immersive storytelling.
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