Season 1, Episode 1 · India Unveiled
Biryani and it's origin in India | Food History
19 Sep 2025 · 15 min
Season 1, Episode 1 · India Unveiled
19 Sep 2025 · 15 min
Link for FRIDO AEROMESH CHAIR: https://myfrido.com/products/frido-aeromesh-ergo-chair coupon code:RAKESHSONI Embark on a delicious journey into the history of Biryani — one of India’s most iconic dishes. In this episode of India Unveiled , we uncover the story of how biryani traveled through centuries, from the royal kitchens of the Mughals to the bustling streets of Hyderabad, Lucknow, Kolkata, and beyond. Discover how this fragrant blend of rice, spices, and meat (or vegetables) became a cultural symbol, deeply rooted in the history of food in India. Along the way, we explore fascinating…
आपसे एक सवाल है अगर मैं कहूं कि हमारी बिलविड बिरयानी असल में हिंदुस्तान की डिश है ही नहीं? कहते तो यह भी है कि यह बिरयानी मुगल दरबार से आया था। यह उनका कंफर्ट फूड था। अब मुगलों की कहानी में ऐश्व आराम, अच्छा खाना। कभी सोने और हीरो से जड़ा मयूर सिंह खासन और कभी दरबारों में परोसी जाने वाली बिरयानी, आराम और शान दोनों साथ चलते थे। आज भी हमारे लिए आराम जरूरी है। बस उसका रूप बदल गया। अब न सोने का तख्त नरेश में कत्ते क्नॉइस। मेरा आराम आता है मेरे फ्रीडो ऐरोम एर्गोनोमिक चेयर और नेक पिलो से इसके मेष मुझे ठंडा रखती है। पॉश्चर सपोर्ट मुझे कंटो रिकॉर्डिंग में स्टडी रखती है। तो चलिए इसी आराम और कंफर्ट फुड की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज की कहानी सुनते हैं बिरियानी की इतिहास की। हाँ जी बिलकुल जो खाना आज शादियों की जान है हर सेलेब्रेशन का सुपरस्टार है। उसका जन्म हुआ था पोरशिया में सोचिये ज़रा एक गरमा गर्म हांडी खुली और उसमें से निकल रही है मसालों की खुशबू, दम में पका गोश्त सैफरन वाले चावल। आज हम इसे बिरयानी कहते लेकिन पर्सियन लोग इसे कहते थे बिरयान बिरयान जिसका मतलब है फ्राइड बिफोर कुकिंग। वहाँ के बावर्ची चावल को पहले थोड़ा फ्राई करते थे। क्नॉइस। और फिर गोश्त के साथ दम लगाते थे और जब ये स्टाइल हिंदुस्तान आया
तो यहाँ के खानसामा हैरान हो गए क्योंकि हमारे पास पहले से पुलाव था, खिचड़ी थी लेकिन टेकनिक ने हिंदुस्तानी मसालों के साथ मिलकर एक नया जादू रचा। हिस्टोरिकल रिकॉर्ड्स भी इसकी गवाही देते हैं। अबुल फज़ल की लिखी हुई ऐने अकबरी जो अकबर के दरबार का एनसाइग्लोपीडिया था उसमें लिखा है कि मुगल किट्चेंस में राइस और मीट के नए नए एक्सपेरिमेंट्स होते थे। मतलब इमेजिन कीजिए एक तरफ पर्सियन बिरयानी का फ्राइस्टाइल, दूसरी तरफ हिंदुस्तानी स्पाइसेस और रिसाल्ट। एक रॉयल इन्वेंशन बिरयानी और ये सिर्फ दरबार तक सीमित नहीं था। सोल्जर्स के लिए भी बिरयानी एक बूंद थी, एक हांडी में मिलता था कंप्लीट मील चावल भी, गोश्त भी और टेस्ट भी दम लगाओ और पूरी फौज खिलादो। इसीलिए बिरयानी एक साथ लक्ज़री भी और प्रैक्टिकल भी थी। और धीरे धीरे ये शाही डिश बन गई हिंदुस्तान की जान। लेकिन असल सीक्रेट तो यही है। बिना पोर्शन शुरुआत के बिरयानी आज जो है शायद कभी ना होती से शुरू हुई बिरयानी की कहानी। जब हिंदुस्तान आई तो उसने अपना असली रंग मुघल दरबारों में दिखाया। जहाँ पर्शिया ने बिरयानी को एक शेप दिया था वही मुगल्स ने उसे एक रॉयल अंदाज बख्शा। अकबर के किट्चेंस की बात करें तो ये सिर्फ एक रसोई नहीं थी बल्कि एक रिसर्च लैब थी। वहाँ चेफ्स नए नए एक्सपेरिमेंट्स करते थे।
कभी चावल और गोश्त की नई लेयरिंग कभी मसालों के अलग कॉंबिनेशन्स इसी दौर में पुलाव और बिरयानी के बीच की लाइन धुंधली हो गई। पुलाव सिंपल था लेकिन बिरयानी थोड़ा ऊपर जहांगीर और शाहजहाँ के दौर में बिरयानी और भी वॉल्व हुई। यही से आया फेमस दम पुख्त स्टाइल हांड़ी को सील करके धीमी आंच पर पकाना इससे ना सिर्फ टेस्ट इंटेंस होता था। बल्कि खुशबू भी हांडी खुलने तक बंद रहती थी। एक और खास बात थी मुग़ल किटचेंस की उनका फ्लेवर के साथ रोमांस, केवड़ा, सैफरन, गुलाबजल, ये सब सिर्फ टेस्ट के लिए नहीं, एक रॉयल एक्सपीरियंस के लिए यूज़ होते थे। बिरयानी सिर्फ खाना नहीं थी। एक निशानी थी मुगल शान की। लेकिन मुगल किट्चेंस का असर सिर्फ दरबार तक सीमित नहीं रहा। सोल्जर्स के लिए भी बिरयानी एक प्रैक्टिकल खाना बन गई। एक हांडी में पूरा मील ये एक ऐसा पॉइंट था जिसने बिरयानी को सिर्फ लक्ज़री नहीं बल्कि यूटिलिटी भी बनाया था और यहीं से बिरयानी ने अपना अगला सफर शुरू किया। जब ये शाही हांडी हिंदुस्तान के अलग अलग कोने तक पहुंची, हर जगह बिरयानी ने अपना नया रंग लिया। हैदराबादी लखनवी मालाबारी कोलकाता हर एक ने बिरयानी को अपने तरीके से अपनाया लेकिन ये कहानी हम अगले हिस्सों में खोलेंगे। हर शहर की अपनी बिरियानी। मुगल्स ने बिरयानी को हिंदुस्तान
तक लाया लेकिन असली मैजिक तब हुआ जब ये अलग अलग शहरों में बस गई। सबसे पहले बात करें हैदराबाद की निजामों का। शहर और उनकी हैदराबादी बिरयानी वैसे ही मशहूर है। यहाँ दम स्टाइल को परफेक्शन तक ले जाया गया। हर ग्रीन ऑफ़ राइस अलग और मटन या चिकन इतना सॉफ्ट की बस छूने से ही टूट जाए। इसमें आपको तेज मसाले भी मिलते है और वो असली नवाबी टच भी फिर आते है। लखनऊ की गलियों में यहाँ बिरयानी का फ्लेवर हैदराबाद से बिलकुल अलग है। लखनवी या अवधि बिरयानी ज्यादा सटल है। मसाले, हलके फ्लेवर सोफिस्टिकेटेड और एक लेयर केयरफुल्ली रखी हुई से खाते ही लगता है। जैसे एक शायर की शायरी जुबान पर पिघल रही हो। साउथ में थोड़ा और नीचे चलेंगे तो मिलेंगे मलाबारी बिरयानी केरला से यहाँ बिरयानी में आता है कोस्टल मैजिक नारियल करी लीव्स और थोड़ा स्पाईसी किक। ये बिरयानी टेस्ट में एकदम रिफ्रेशिंग लगती है जैसे समंदर की ठंडी हवा और फिर कोलकाता। ब्रिटिश राज़ के दौर में जब वाजिद अली शेख को एक्साइल करके कलकत्ता भेजा गया तो उन्होंने लखनवी बिरयानी का अपना वर्जन बनवाया, लेकिन शॉर्टेज ऑफ़ मीट की वजह से यहाँ आलू भी बिरयानी में आ गया। और देखो आज वो कोलकाता बिरयानी का सिग्नेचर बन गया तो एक चीज़ क्लियर है बिरयानी एक ही डिश नहीं एक सफर है। हर रीजीयन ने अपना प्यार और अपनी ऐडेंटिटी डाल दी इसमें और इसी वजह
से आज भी जब भी कोई बेस्ट बिरयानी की डिबेट शुरू करता है तो वो खत्म ही नहीं होती। एक ज़माना था जब बिरियानी सिर्फ शहंशाहों और नवाबों की दावों में बनती थी, लेकिन धीरे धीरे ये रॉयल खाना उतर आया। सड़कों पर रेलवे कैंटीन तक और छोटी छोटी ढाबों तक और वहीं से शुरू हुआ असली प्यार आम आदमी और बिरयानी का रिश्ता सोचो। हैदराबाद के क्राउडेड गलियां, यहाँ लखनऊ के चौक एक तरफ बड़े होटेल्स की दमदार बिरयानी और दूसरी तरफ छोटी सी हांडी में धुआं निकलती बिरयानी का प्लेट दोनों का अपना अलग मज़ा है। रेलवे जॉर्नीज़ में भी बिरयानी की खुशबू अलग ही नोस्टैल्जिया देती है। ट्रैन के विंडो के बाहर चेंजिंग व्यूस और बॉक्स में गरमा गर्म बिरयानी वो मूवमेंट ही कुछ और होता है। आज तो हर शहर अपना बेस्ट क्लेम करता है। हैदराबाद ही सबसे बढ़िया है नहीं भाई लखनऊ ही असली है। अरे कोलकाता आलू के बिना बिरयानी होती है क्या?
ऐसी चर्चाएं हर फूड के ग्रुप में मिल जाती है और पॉप कल्चर ने इसे? और आइकॉनिक बना दिया है। बॉलीवुड के गाने हो या कॉमेडी, स्केच्स हो या फिर यूट्यूब के फुड ब्लॉग्स, बिरयानी अब सिर्फ एक डिश नहीं है, एक पॉप स्टार बन चुकी है, बिरयानी वार्स भी चलती रहती है। ऑनलाइन जहाँ लोग अपने शहर की बिरयानी के लिए लड़ने तक को तैयार हो जाते है। सो एक लाइन में बोले तो। बिरयानी का सफर ताज के महलों से लेकर स्ट्रीट स्टाल्स तक आया है और वहीं से ये एक अश्लील लेजेंड बना है। क्योंकि जब तक आम लोगों के दिल में जगह ना बने तब तक असली पॉपुलैरिटी आती ही नहीं। अब जब बिरयानी आम लोगों तक आ ही गई तो सवाल ये उठता है क्या है उस डिश का असली मैजिक? सिर्फ चावल और गोश्त तो हर जगह मिलता है पर बिरयानी बन जाए तो दिल जीत लेती है। इसका जवाब छुपा है उसके राज़ में सबसे पहला राज़ मसाले ज़फरान का रंग और खुशबू, केवड़ा का एक हल्का सा छोंक इलायची और लौंग की गर्मी। ये सब मिलकर वो नशा बनाते हैं जो सिर्फ बिरयानी में ही मिलता है। कहते हैं कि असली बिरयानी वो है जो खुशबू से पहले आँखों और फिर दिल को जीत ले। फिर आता है एक दम पुख्त, एक सील हांड़ी धीमी आंच और अंदर एक दुनिया, हर चावल, खदाना, गोश्त और मसालों। कि खुशबू सोख कर अपना कैरेक्टर बनाता है और जब हांडी खुलती है तो लगता है जैसे खुशबू का एक तूफान
निकलकर सबको अपना दीवाना बना रहा हो और राइस हाँ। बासमती राइस उसके लंबे दाने और फ्रेग्रेंस बिना बिरयानी का इमेजिन करना मुश्किल है। इसलिए तो मुग़ल किचन से लेकर आज के फाइव स्टार होटेल्स तक बासमती ही बिरयानी का क्राउन बना रहा है। दुबई के फाइव स्टार से लेकर लंडन के इंडियन रेस्टोरेंट्स तक आपको बिरयानी का नाम गोल्डन लेटर्स में लिखा मिलेगा। न्यूयॉर्क के फुड ट्रक्स में भी बिरयानी सर्वे होती है और। गल्फ कंट्रीज़ तो लिटरल्ली बिरयानी कैपिटल बन चुकी है। यहाँ हर दूसरे कार्नर पर एक हैदराबादी बिरयानी हॉउस मिल जाता है। और सबसे इंटरेस्टिंग बात जैसे जैसे ये ग्लोबल हुई नए नए फ्यूज़न वश़र्न्स भी निकले। पनीर बिरयानी, सोया बिरयानी, वेज बिरयानी तो चलो ठीक है लेकिन चॉकलेट बिरयानी। पास्ता बिरयानी और सुशी बिरयानी तक बना दी गई। अब ये अलग बात है कि कुछ लोग ये सुनकर अपना सर पकड़ ले। इंडिया में स्विगी और ज़ोमैटो के रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिरयानी हर साल सबसे ज्यादा ऑर्डर की जाने वाली डिश है। हर फेस्टिवल हर पार्टी। हर सेलेब्रेशन में एक पेड़ बिरयानी होना मांडेटोरी जैसा लगता है और जो सबसे खूबसूरत बात है बिरयानी सिर्फ एक खाना नहीं है, एक एमोशन बन गई है। दोस्तों के साथ रात 12:00 बजे का प्लान हो या घर पे शादी की दावत या फिर हॉस्टल के हंगर पैंक्स
बिरयानी, हर मूड हर सेट्टिंग को परफेक्ट बना देती है। बिरयानी के एक अन्य कहानी यह भी है कि मध्य एशिया के खानाबदोश लोग ज्यादातर चावल, मांस और डेयरी उत्पादों पर ही निर्भर थे। ऐसे में स्थानीय मसालों के साथ तैयार किए जाने वाले स्वादिष्ट व्यंजन की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार व्यापारी अथवा यात्री सिल्क रोड से गुजरे तो इस लज़ीज़ भोजन को। अपने साथ भारतीय महाद्वीप में ले आए। वहीं बिरयानी रेस्त्रां नामक एक फेमस आउटलेट के मालिक विश्वनाथ शिनोय के मुताबिक उत्तर भारत में बिरयानी मुगलों के द्वारा ज्यादा प्रख्यात हुई जबकि दक्षिण भारत के कालीकट में बिरयानी अरब व्यापारियों द्वारा लाई गई थी। बिरयानी का मुगल इतिहास बिरयानी का मुगल इतिहास से जुड़ा एक किस्सा ये है कि बादशाह शाहजहाँ की प्रिय पत्नी मुमताज़ महल 1 दिन मुगल सेना के छावनी में पहुंची तो उन्हें ज्यादातर मुगल सैनिक कमजोर दिखाई दे रहे थे। ऐसे में मुमताज़ महल ने शाही बावर्ची को आदेश दिया कि सैनिकों को एक ऐसा आहार दिया जाए जो पौष्टिक हो। मुमताज़ महल ने चावल और मांस के समिश्रण से बना एक स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करने को कहा जिससे सैनिकों को भरपूर पोषण मिल सके। इसके बाद मुगल रसोई ने केसर, मीट, घी, चावल और सुकंधित मसालों को मिलाकर एक लज़ीज़ व्यंजन तैयार किया, जिसे बिरयानी के नाम से
जाना जाता है। क्नॉइस। हालांकि कुछ भोजन इतिहासकार यह भी तर्क देते हैं कि मुगल बादशाह बाबर के भारत आगमन से पूर्व ही बिरयानी एक व्यंजन के रूप में लोकप्रिय हो चुकी थी। प्रख्यात मुगल कृति एने अकबरी के लेखक अबुल फज़ल के मुताबिक बिरयानी शब्द भारत में पहले से ही प्रचलित था क्योंकि उसे पुलाव और बिरयानी में। कोई विशेष अंतर नहीं नजर आता है। बिरयानी का अवध से भी एक खास कनेक्शन है। नवाब असफदुल्ला से जुड़ी हुई है। अवध के तीसरे नवाब सुझाव दौल के बाद नवाब बने असफदुल्ला को लखनऊ का मुख्य वास्तुशिल्पी कहा जाता है। हमामबाड़ा से लेकर कैसरबारा इलाका नवाब असफदुल्ला के ही दिन है। साल 1784 में भयंकर अकाल पड़ा। ऐसे में नवाब असफदुल्ला ने धर्मार्थ कार्य के तहत काम के बदले भोजन नामक एक कार्यक्रम की शुरुआत की। दरअसल, नवाब असफदुल्ला बड़ा इमामबाड़ा बनवाना चाहते थे। इस निर्माण कार्य के दौरान। बड़े पैमाने पर श्रमिकों को लाया गया। इन श्रमिकों को भोजन कराने के लिए अवध के शाही रसोईयों ने बड़े बर्तनों में चावल, मांस, सब्जियां तथा सुगंधित मसालों को धीमी आंच पर पकाया। ये व्यंजन श्रमिकों को बहुत पसंद आया। 1 दिन ये व्यंजन जब धीमी आंच पर पकाया जा रहा था। तब इसकी सुगंध ने नवाब असफुद्दौला का भी मन मोह लिया और उन्होंने इसे अपनी शाही रसोई में भी बनाने
का आदेश दिया। तब से बिरयानी पूरे अवध ही नहीं समस्त उत्तरी भारत में प्रसारित हो गई। अब बात करते हैं सिंधी बिरयानी की। पाकिस्तान का सिंध प्रांत सिंधियों का घर माना जाता है। क्नॉइस सिंधी बिरयानी अपने मसालेदार स्वाद के लिए फेमस है। सिंधी बिरयानी को मटन या चिकन, दही, हल्दी, धनिया, लाल मिर्च पाउडर तथा गर्म मसालों को मैरिनेट कर तैयार किया जाता है। सिंधी बिरयानी में आलू बुखारे का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिसके स्वाद को तीखा बनाती है। सिंधी बिरयानी में मांस को बारीक कटे प्याज और टमाटर के साथ तब तक पकाया जाता है जब तक ये नरम और रसदार ना हो जाए। इसके बाद बासमती चावल को तेज पत्ता, लौंग, इलायची और स्टार एनेस जैसे साबुत मसालों के गुलदस्ते के साथ उबाला जाता है, जिससे इसमें खुशबू आती है। आखिर में प्रत्येक परत पर तले हुए प्याज, तादापुदीना और धनिया के पत्ते डाले जाते हैं और फिर इसे सील करके धीमी आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक ये सभी स्वाद एक साथ में मिल जाए। परंपरागत बिरयानी को मिट्टी के बर्तन में कोयले पर पकाया जाता था। हालांकि। बदलते समय के साथ इसे पकाने की तकनीक भी बदलती आई है। तो ये था बिरयानी का सफर पोर्श के मिट्टी से उठा मुगल दस्त रूखानो पर चमका इंडिया के हर शहर में अपना रंग दिखाया और अब दुनिया भर
का दिल जीत रहा है और ये सफर अभी भी चल रहा है क्योंकि बिरयानी के लिए एक ही रूल है। वन्स यू टेस्ट इट देर इस नो गोइंग बेक आई होप यू लाइक थिस एपिसोड एंड इफ यू लाइक्ड इट डोन्ट फर्गेट टु फॉलो इंडिया एनवील ऑन व्हिचेवर प्लैटफॉर्म यू अरे लिस्टिंग इट टु भारत को और अच्छे से जानना है तो एपिसोड लिस्ट एक्सप्लोर कीजिए, बहुत जानकारी मिलेंगे थिस एपिसोड वास् प्रेसेंटेड टु यू ब्य फ्रीडो। एक्सप्लोर कीजिए, फ्रीडो और अपना सिंहासन को चूस कीजिए क्योंकि भारत में कंफर्ट हमेशा से किंग रहा है, चाहे वो खाने की बात हो या रहन सहन की फ्रीडो देता है आपको लक्ज़री कंफर्ट बिलकुल किसी राजशाही तौर तरीके जैसा। डिस्क्रिप्षन में लिंक है चेक कीजिए और आप भी अपना सिंहासन मंगाइए तो मैं मिलता हूँ आपसे अगले एपिसोड में तब तक टेक गुड गिव ऑफ़ युअर हेल्त थिस इस राकेश साइनिंग ऑफ फ्रम इंडिया ऑन फील्ड।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
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