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Episode notes

In this powerful episode of India Unveiled , journey into the sacred walls of the Brihadishwara Temple , one of India’s most iconic and mysterious temples. Built over 1,000 years ago by the visionary Raja Raja Chola I , this UNESCO World Heritage site holds secrets that defy time and science. ✨ Why does the temple cast no shadow at noon? ✨ How was its 80-ton capstone lifted without modern machinery? ✨ What ancient knowledge is hidden in its architecture and energy? Discover the answers and much more in this immersive audio experience. ✍️ Written by : Shriti Roy 🎙️ Hosted & Narrated by :…

Transcript

Read the transcript · about 4,400 words, follows along as you listen

हैलो एंड वेलकम बेक टु इंडिया अनवेल्ड और आज हम एक ऐसी खोज में निकलेंगे जो सिर्फ एक मंदिर नहीं, एक राजा के सपने की मिसाल है। हम बात करेंगे वृहदीश्वर टेम्पल की जो तंजावुर। तमिलनाडु में स्थित है। तो चलिए शुरू करते है तंजावुर का नाम सुनते ही सबसे पहले याद आता है एक ऐसा मंदिर जो सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है बल्कि एक राजा के सपने की मिसाल है। ये कहानी शुरू होती है राजाराज चोला से। एक सम्राट जिसका राज्य समुद्र से भी आगे तक फैला हुआ था। राजाराज ने जीत तो कई मैदानों में हासिल की थी लेकिन उसके मन में एक आस्था थी कि उसके राज्य में एक ऐसा मंदिर बने जो सदियों तक सिर्फ पूजा का स्थल ना हो। बल्कि कला और समृद्धि का प्रतीक भी हो। कहते हैं एक रात महल में बैठकर राजा राज़ ने अपने मंत्री और सिपाहियों को बुलाया। उसने सिर्फ इतना कहा, मुझे एक ऐसा मंदिर चाहिए जिसका शिखर आकाश से बात करे। बस इसी वाक्य ने इतिहास को एक नए मोड़ पर ला दिया। उस समय के लोग समझ भी नहीं पाए कि ये सपना कितना बड़ा है। आसपास कोई पहाड़ नहीं ग्रेनाइट्स दूर दूर से लाए गए हजारों मजदूर हाथियों, औरतों के लाइन रात दिन पत्थर तराशे जाते हैं और धीरे धीरे एक सपना पत्थर बनकर खड़ा होने लगा। कुछ लोग कहते हैं राजा राजा ने स्वयं नए शिल्पकारों को तैयार किया। उन्हें बताया कि कैसे हर अक्षर,

हर मूर्ति में भक्ति छुपी होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ये मंदिर सिर्फ दीवार नहीं, इसमें आत्मा बसनी चाहिए। और इसी सोच ने वृहदीश्वर को दूसरे मंदिरों से अलग बना दिया। इस मंदिर का एक एक पत्थर सिर्फ भवन नहीं था। वो चोल साम्राज्य के हिम्मत, कल्पना और समर्पण का निशान बन गया। जब पहली बार इसके शिखर पर कलश रखने की बात आई तो सब ने कहा ये संभव नहीं है पर राजा राज़ के लिए संभव और असंभव में फर्क नहीं था। उनके लिए सपने को पूरा करना ही धर्म था। आज भी जब लोग वृहदीश्वर के प्रांगण में कदम रखते हैं तो सोचते हैं एक सम्राट ने सपना देखा और उसने पूरे समय को उस सपने में बांध दिया और इसी सपने से जन्म लिया वृहदीेश्वर मंदिर ने। आगे जाके दीवारें शिखर और कलश अपनी कहानी खोलेंगे। पत्थर और परंपरा शिल्पकाल का समय राजा राज़ का सपना धीरे धीरे पत्थरों में ढल रहा था पर ये आसान नहीं था। कहते हैं तंजावुर के आसपास इतने बड़े पत्थर नहीं मिलते थे। क्नॉइस। जीतने वृहदीश्वर मंदिर को चाहिए थे। फिर भी राजा राज़ ने कभी भी किसी को मना नहीं किया। पत्थर लाने के लिए पहाड़ों पर खुदाई हुई, रथ बनाए गए, हाथी और घोड़े जोड़े गए। कई मास तक ग्रेनाइट्स खींच खींच कर ले गए। किसी ने अंदाजा भी नहीं लगाया था कि आगे काम कितना मुश्किल होने वाला है। उस समय के स्थापितियों और

शिल्पकारों का ज्ञान भी अलग ही था। ना उनके पास कंपस था, ना मशीन, बस मन माप और कल्पना कहते हैं स्थापति कुंजर मल्लन राज़, राज़ पेरुंथचन का नाम आज भी लोग याद करते हैं। वही कलाकार थे जिन्होंने पत्थरों को इस तरह बांधा की सदियों बाद भी वृहदी ईश्वर सिर्फ खड़ा नहीं संपूर्ण दिखता है। उस समय शिल्पकला सिर्फ दीवार बनाना नहीं था। हर पत्थर, हर जोड़ हर मूर्ति में कुछ कहानी छुपी रहती थी। मंदिर की दीवारों पर चित्रकारी हुई। देवताओं के रूप, योद्धा, नृत्य, कवच और शास्त्र सब पत्थर में उतारे गए। कहते हैं कुछ दीवारों पर राजा राज़ चोला स्वयं भी अपने परिवार के साथ चित्रित हैं। एक राजा जो भगवान के सामने भी अपने आप को समर्पित करता था। इस मंदिर में एक और चमत्कार था। इसका विमान यानी शिखर 216 फिट ऊंचा आज भी वृहदेश्वर मंदिर का शिखर दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में सबसे ऊंचा माना जाता है। जब ये बनाया जा रहा था, लोग सोचते थे ये कितना भारी पत्थर है, कैसे संभालेगा ने?

ऐसा जुगाड़ किया कि हर पत्थर दूसरे पर ऐसे बैठा गया जैसे कोई शतरंज की बड़ी मोहर हो। आज तक वृहदी ईश्वर का शिखर झुकता नहीं हिलता नहीं और सबसे बड़े रहस्य में से एक उस शिखर का कलश कहते है। उसका वजन लगभग 80 टन है। आज के ज़माने में भी सोचना मुश्किल है की बिना क्रेन के इतना भारी पत्थर कैसे चढ़ा होगा? लोक कथाओं में कहा जाता है की एक छे किलोमीटर लम्बी मिट्टी की रैम्प बनाई गई थी और हाथियों से खींचकर कलश को चढ़ाया गया था। अगर एक और तरीके से देखा जाये तो कहते है की मंदिर के चारों ओर एक गोलनुमा रैंप बनाया गया था, जिससे घूम घूमकर घूम घूमकर वो कलश ऊपर पहुंचाया गया था। कितनी सच, कितनी कथा कोई नहीं जानता। इस मंदिर की एक और विशेष बात है इसकी दीवार और छतों की संरचना। कहते हैं बृजेश्वर मंदिर की परछाई दोपहर में भी जमीन पर पूरा नहीं करता। क्या ये वस्तु कला थी या कोई रहस्य? ये सवाल आज भी लोगों को तंजावुर खींच लाता है। उस समय स्थापती शिल्पकार बस पत्थर नहीं तराशते थे। उस समय तराशते थे दीवारों पर लिखे। शिलालेखों में मंदिर का खर्च काम करने वाले लोगों के नाम उनके वश लिखे है। कोई छोटा नहीं, कोई बड़ा नहीं। हर शिल्पकार का नाम पत्थर पर कमर है, इसलिए वृहदीश्वर मंदिर सिर्फ राजा, राज़ नहीं हर उस इंसान का है, जिन्होंने सपने में अपना पसीना दिया।

आज जब कोई प्रियधीश्वर मंदिर की दीवारों को छूता है तो वो सिर्फ पत्थर नहीं छूता, वो छूता है एक समय को एक परंपरा को और उन हाथों को जो सदियों पहले इस सपने को जीवित कर गए पर कहानियों भी पूरी नहीं हुई। हर दीवार के बाद एक और रहस्य छुपा है। गर्भगृह का गौरव शिव का महालिंगम वृहदेशवर मंदिर की दीवारों से गुजरते हुए जब कोई व्यक्ति पहली बार गर्भगृह की दहलीज पर कदम रखता है, ना तो हवा का भाव ही बदल जाता है। बाहर का शोर, घंटे की धुन और धूप अग्रवती के सुगंध। सब कुछ मिलके एक ऐसा माहौल बना देते हैं जहाँ मन अपने आप झुक जाता है। ये गढ़पुरी ब्रेवधेश्वर मंदिर का हृदय है और इस हृदय में विराजमान है महाशिव एक ऐसे रूप में जो पूरे भारत में कहीं नहीं कहते हैं। ये लिंगम लगभग 29 फिट ऊंचा है। क्नॉइस?

एक ही ग्रेनाइट पत्थर से तराशा गया। इस प्राचीन लिंगन को देखकर मन में बस एक ही विचार आता है किस भक्ति और धैर्य से किसी ने इस पत्थर में भगवान को जागृत किया होगा? मंदिर के अंदर गर्भ गृह में प्रकाश बहुत कम रहता है। पतली सी दिया की रौशनी शिवलिंग पर पड़ती है तो। उसका चमकता काला रंग और भी गहरा लगता है। कहीं से कोई वीना की धुन सुनाई देते हैं और शिव भक्त सर झुकाए खड़े रहते हैं। चुपचाप बिना कोई शब्द कहे बस अनुभव करते हुए राजा राज़ चोला ने ये लिंगम सिर्फ भक्ति से नहीं अपने राज़ के गौरव से बनाया था। क्नॉइस इस प्राचीन लिंगम में राजा राज़ ने स्वयं को समर्पित किया। कहना गलत नहीं होगा कि इस लिंगम में राजा राज़ का सपना, उनका साम्राज्य और उनकी आस्था सब कुछ बस गई गर्भगृह में कदम रखते हैं। एक आनंद भी है और एक संकोच भी लगता है जैसे ये जगह कहीं और की नहीं, किसी और समय की है। क्नॉइस पत्थर की ठंडी दीवारें, मंदिर के भीतरी भाग में गूंजता मंत्रोच्चारण और दिया की लचकती लौ सब कुछ मिलकर एक समय में बांध लेता है। ये लिंगम केवल पत्थर नहीं है। ये एक प्रमाण है कि सदियों पहले भी मनुष्य ने भगवान को पत्थर में जीवित कर दिया था। क्नॉइस। और ये भी एक प्रमाण है कि जब भक्ति और कल्पना जुड़ जाए तो कुछ भी असंभव नहीं रहता। के बाहर खड़े लोग कभी कभी सिंघम

की परिक्रमा करते हुए दीवारों को देखेंगे। कहीं देवियां, कहीं घणों की मूर्तियां, कहीं शिव के डमरू की आकृति, हर चीज़ में एक कहानी, एक संकल्प। आज भी जब पंडित प्राचीन श्लोक का उच्चारण करते हैं तो लगता है जैसे वृहदीश्वर का हर पत्थर ध्यान में समा गया हो और जब लोग मंदिर के बाहर जाते हैं तो हर किसी के मन में एक ही बात होती है। अगर किसी ने महादेव को कभी धरती पर सबसे गहरा महसूस किया है तो वो यही है। प्रियधीश्वरा के गर्भ में शिखर और कलश बाहर का रहस्य मंदिर की सीमा से बाहर निकल जाने वाला तो शिखर कितने ही लोगों के लिए आज भी एक अद्भुत चमत्कार है। कोई कहता है यह सिर्फ पत्थर नहीं। ये राधारा के सपने का उड़ान है, जो धरती से उठकर आकाश को छु आया। जब इस मंदिर की नींव रखी गई थी तब लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ये इतना ऊंचा होगा। उस समय के स्थापति हर शाम मशालों की रौशनी में बैठक लगाते, मिट्टी पर रेखाएं खींचते, हाथ से पत्थर के टुकड़े घूमाते। किस पत्थर का भार कहाँ लगेगा, किस हिस्से का जोड़ कहाँ बांधना है, ये सब बस आँखों और मन से तय होता सबसे ऊपर विराजमान हुआ वो कलश जो अपने आप में एक रहस्य है। बुजुर्ग कहते हैं कि कलश को ऊपर तक ले जाने के लिए एक लम्बी मिट्टी की रैम्प बनाई गई थी जो खेतों, घरों, गांवों को क्नॉइस। पार करती हुई चली गई।

हाथी, मनुष्य और रथ मिलकर इस मिट्टी के सड़क पर दिन रात कलश को खींच के ले गए। कोई रास्ते में गीत गाता था, कोई मंत्रोच्चारण करता था। ये सपना केवल राजा राज़ का नहीं था, पूरे तंजावुर का था और जब वो भारी कलश अंतिम पत्थर पर बैठा तब स्थापतियों ने पूरा मंदिर घंटी और शंख ध्वनि से गूंजा उठा। कहते हैं पहली बारिश की बूंदें जब कलश पर पड़ती थी तब लोग हाथ जोड़कर कहते हैं ये शिव का वरदान है जो आकाश से बरस रहा है। इस शिखर का सबसे अनोखा खेल इसका। छाया है। दोपहर की तेज धूप में भी इसका साया कभी पूरा धरती पर नहीं पड़ता। लोग इससे ईश्वर की माया कहते हैं। प्रकाश में भी रहस्य अंधेरे में प्रकाश इस कलश को देखकर हर भक्त के मन में असंख्य प्रश्न उठते हैं। कैसे बना, किसने बनाया, किसने इतनी बुद्धि दी?

पर जवाब किसी के पास पूरा नहीं होता और शायद इसी में मंदिर की खूबसूरती है। कुछ रहस्य कभी पूरे समझे नहीं जाते, शायद बस महसूस किए जाते हैं। हो सकता है आगे चलकर हमें इस मंदिर के बारे में और पता चले तो सारी बातें समझ आएँगे। राजा राज़ ने इस शिखर में अपना नाम नहीं पर इस पत्थर के ऊपर बैठा वो कलश हर युग को याद दिलाता है कि किसी भी सम्राट की सबसे बड़ी विरासत उसके सपने और उसके आस्था की होती है। आज भी रात को जब चांदनी इस कलश पर बिखरती है तो दूर से लगता है जैसे कोई दिव्य ज्योति आकाश में चकमाकर रही हो। उस रौशनी में सबके सपने, सब की मनोकामनाएं सब कुछ उस शिखर से जुड़ जाता है और जब लोग प्रांगण से निकलते हैं तब वो बस पत्थरों का मंदिर नहीं देखे जाते। वो एक युग एक समय एक अद्भुत कल्पना को छू कर जाते हैं। नृत्य की दीवारें। चित्रों में कथा मंदिर के बाहर ही गोपुरम से अंदर प्रवेश करते हैं। जब कोई भक्त पहली बार दीवारों पर नजर डालता है तो समझ में आता है कि वृहदीश्वर सिर्फ पत्थरों का जोड़ नहीं। ये चित्रकारी और नृत्य की जीवित पुस्तक है। कहते हैं जब राधा राज़ चोला ने इस मंदिर का आकार सोचा था, तब उसने सिर्फ भगवान को पत्थर में स्थापित नहीं किया। उसने कला को दीवार पर उतार दिया। राजमहल से लेकर प्रांगण तक चित्रकारों और शिल्पकारों की

संख्या हजारों में थी। दिन भर हाथ में रंग, मिट्टी और कपड़े किसी के हाथ में, सूत्र किसी के हाथ में। दीवारों पर कहीं शिव तांडव करते नजर आते हैं। बालों में गंगाधर गले में वसु की और चरणों में ढोलक के धुन पर नृत्य कहीं नाईकया वीणा और मृदंग की ताल पर नाचते मिलते हैं। उनके आभूषण, लहराते वस्त्र और मुख्य मुद्रा आज भी जीवित लगती है। एक कथा है कि एक बार। राजा राज़ ने स्वयं दीवारों पर चलकर देखा हर चित्र को आंख भर के देखा। उन्होंने कहा, ये दीवारें बंजर नहीं रहेंगी। इनमे मेरी सभ्यता के रंग बसेंगे और तब से लेकर आज तक ये रंग कभी फीके नहीं पड़े क्नॉइस। प्राचीन कलाकारों ने प्राकृतिक रंगों से दीवारें सजाईं, हल्दी, गेरू, इंडिगो, जड़ी बूटी और मिट्टी सब कुछ धरती से ही लिया और भगवान को लौटा दिया। इसलिए जब सूरज की रौशनी इन चित्रों पर पड़ती है तो लगता है जैसे रंग खुद में प्रकाश चुराकर चमक रहे हों। क्नॉइस। कुछ चित्रों में महायुद्ध की गाथा है सैनिक घोड़े पर धनुष और तलवार की चमक और जीत का उत्सव। कहीं भक्त दीप जला रहे हैं तो कहीं राजा प्रजा को अनुदान दे रहा है। हर चित्र में समय की एक कहानी है एक युग का जीवंत दस्तावेज क्नॉइस। वृयाधीश्वर की दीवारें नृत्य करने लगती हैं, जब मंदिर में शंख और वीणा की धुन गूंजती है। कहते हैं रात में जब सब सो जाते

हैं तब भी इन चित्रों की आकृतियां इस स्थल में नृत्य करती रहती हैं। कोई देख नहीं सकता पर महसूस सब कर सकते हैं। इन चित्रों के बीच एक लोककथा और भी है क्नॉइस। कुछ लोग कहते हैं कि एक दीवार के कोने में एक छोटा बिंदु छुपा है जिसे राजा राज़ ने स्वयं अपनी ऊँगली से बनाया था। आशीर्वाद के रूप में कौन जाने सच्चा कल्पना पर ये कहानी मंदिर को और जीवित बनाती है। आज भी जब कोई भक्त इन चित्रों को देखता है तो वो सिर्फ तस्वीर नहीं देखता। वो सोचता है कितने हाथ इस दीवार से जुड़े थे?

कितने सपने, कितना समय, कितनी श्रद्धा गुप्त सुरंगे पत्थर के नीचे का गहरा रहस्य ब्रेवदेश्वर मंदिर जितना विशाल ऊपर से है उतना ही गहरा ये नीचे भी छुपा है। कहते हैं इस महालय के नीचे, छुपी है कुछ ऐसी सुरंगे। जिनके रास्ते आज भी पूरे नहीं जाने जा सके। लोक कथाएं कहती है, राजाराज चोला ने इस मंदिर को केवल भगवान का निवास नहीं बनाया। उन्होंने इसे एक सुरक्षित महल भी बनाया। कई लोग मानते हैं कि इसके नीचे कुछ सुरंगे तंजावुर के राजमहल तक जाते हैं। कुछ दूसरे गांवों और जंगलों तक भी। ये सुरंगे इतनी गहरी और अँधेरी थी कि उनमे प्रवेश करना आज भी साहस का काम है। प्राचीन काल में ये सुरंगे कई कामों में आती थी। जब युद्ध का समय होता तो राजा और परिवार इन गुफाओं से सुरक्षित रास्ता तय करते। कुछ लोग कहते हैं कि मंदिर में अर्पित किए गए भोज और खजाना भी। इन गुफाओं में सुरक्षित रखे जाते थे ताकि लूट और आक्रमण से बचे रहे। इतिहास में कुछ व्याख्याकारों ने लिखा है कि इन सुरंगों में कभी कभी गोपनीय बैठकें भी होती थीं। ये अँधेरा पत्थर और घंटी की मधुर आवाज़ में बैठक की गोपनीयता और गहरी हो जाती थी। कुछ वृद्ध कहते हैं कि जब तक राजा राज़ का साम्राज्य था तब तक इन सुरंगों में दीपक जलाकर सैनिकों ने पहरा दिया। बाद में समय के साथ इन रास्तों पर मिट्टी अंधेरा और समय की धूल जमती

चली गई। आज भी कभी कभी किसी भक्त को किसी प्राचीन दीवार के कोने में एक छोटी दरार दिखती है। ये जैसे कहती है। इसके पार भी एक संसार है और अब वहाँ सिर्फ रहस्य बचा है। कुछ विद्वान इन गुफाओं को देखकर सोचते हैं, क्या इनमें कोई छुपा खजाना अब भी है या कोई लिखित दस्तावेज, कोई राज़ की पत्रिका जो कभी बाहर नहीं आई? इन सवालों का जवाब किसी के पास पूरा नहीं है। पर इस अंधेरे में ही तो इस मंदिर का रहस्य जीवित है। एक प्राचीन किस्सा और है। कुछ लोग कहते हैं कि जब मंदिर में किसी अन्य राज्य से आक्रमण होता तो स्थपित और पुजारी मिलकर इस सुरंग में प्रतिमाओं को स्थापित करके बचाते हैं। ये सुरंगे किसी समय जीवित रखवाली थी। और आज भी जब कभी रात में मंदिर के अंदर से हवा गुजर जाती है तो लगता है जैसे कोई सुरंग अपनी कहानी फिर से सुना रही हो और इसी गहराई में इसी पत्थर के नीचे राजा राज़ का सपना अभी गुप्त है। हर पत्थर में, हर दीवार में और हर उस रहस्य में जो अब भी किसी को पूरा समझ नहीं आया। नंदी महाराज भक्ति और बल का प्रतीक मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते हैं। जो सबसे पहला दृश्य भक्तों को मन को अद्भुत करता है वो है नंदी महाराज पत्थर के बने वो विशाल बैग जिनका देखना ही मन में श्रद्धा की नदी बहा देता है। कहते हैं जब वृहदीश्वर मंदिर का

आधार बना तो सबसे पहले स्थापना हुई थी। इसी नंदी की शिव के सबसे विश्वसनीय गण के रूप में इस नंदी की विशेषता बस उसका आकार नहीं है, बल्कि में बस्ती उस युग की कला और भक्ति का संगम है। इनका बनाव एक ही पत्थर से हुआ। और वो पत्थर तंजावुर के बाहर से खींच कर लाया गया था। हाथियों, रथों और हजारों मज़दूरों की मेहनत से इस महा नंदी को उनके स्थान तक लाया गया। कुछ लोग कहते हैं कि जब नंदी की आंख और मुख की मुद्रा बन रही थी क्नॉइस तब राजा राज़ स्वयं स्थपतियों के पास खड़े रहते हैं। हर रेखा को आँखों से नापते नंदी की आँखों में देखो तो लगता है जैसे वो सदाशिव को देखते हो, उनके बड़े बड़े सींग, साफ गला, गहरा चौड़ा शरीर सब कुछ समय के साथ कभी ढीला नहीं पड़ता। बारिश, गर्मी आंधी सब कुछ सह कर भी नंदी वैसे के वैसे ही विराजमान है। स्थिर रव्या एक प्राचीन कथा कहती है कि वृहदीश्वर मंदिर में प्रवेश करते वक्त जो भक्त पहले नंदी की पूजा करता है, उसकी प्रार्थना बिना रुकावट शिव तक पहुँच जाती है। इसलिए प्रांगण में लोग पहले नंदी के चरणों में पुष्प चढ़ाकर फिर गर्भगृह में जाते हैं। लोग कहते हैं नंदी के कान सदा खुले हैं। प्रार्थना को सुनने और शिव तक पहुंचाने के लिए राजा राज़ के समय हर पूर्णिमा को नंदी के सामने वीणा और मृदंग के साथ भजन होते थे।

रात के समय दीपक की रौशनी में नंदी का मुख और भी जीवित लगता। लोग मानते हैं कि अगर किसी का मन सच्चा हो तो नंदी स्वयं मुस्कुराते भी थे। आज भी जब मंदिर में उत्सव होता है, ढोल नगाड़े बजते हैं, शंख गूंजता है और भक्त पुष्प बरसाते हैं, तब लगता है जैसे पत्थर का ये बैल भी उस भक्ति में जीवित उठता है। यही तो है नंदी महाराज की महिमा बल और भक्ति का संगम। स्थिरता और आस्था का एक रूप इस महानंदी की प्रतिमा के साथ ही वृहदी ईश्वर का प्रांगण अपना पूरा समर्पण प्रदर्शित करता है और हर भक्त को याद दिलाता है कि शिव तक पहुंचने का मार्ग। श्रद्धा और विश्वास से ही गुजरता है राजनीति और राज्य समृद्धि राजा राज़ का सपना जब हम वृहदेश्वर मंदिर को देखते हैं तो पहले मन में भक्ति जागती है। पर अगर उस समय की इतिहास की परत हटाएं तो इस पत्थर में एक सम्राट का राजनीतिक स्वप्न भी छुपा है। राजा राज़ चोल जिसे दक्षिण का चक्रवर्ती कहा जाता है, उस समय के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली राजा थे। उस समय में तंजावुर केवल एक राजधानी नहीं बल्कि कला, विद्या और समृद्धि का आदर्श स्थल बना। इस को बनवाने के पीछे सिर्फ भक्ति नहीं थी। इसमें था एक राज्य को सदियों तक अमर बनाए रखने का विचार। कहते हैं। राजा राज़ को पता था कि समय सब कुछ खा जाता है न सैन्य सदैव रहेगा क्नॉइस।

न धन दौलत पर एक मंदिर जो अखंड रहे वो समय को जीत सकता है। इसलिए उन्होंने इस मंदिर को अपने साम्राज्य के शान और गठबंधन का प्रतीक बनाया। इस मंदिर में हर स्तंभ, हर चित्र और हर पत्थर पर उस समय की राजनीति लिखी गई है। क्नॉइस। राजगुरुओं और मंत्रियों के द्वारा पूरी व्यवस्था बनाई गई थी कि ये केवल एक भगवान का ग्रह नहीं बल्कि एक राज्य का मौन घोषणा पत्र मंदिर की दीवारों पर लिखित अभिलेख राजा राज़ के विजयों का वर्णन करते हैं। किन देशों को जीता, कितने सेनापति गए, कितना धन प्रजा को दिया?

सब कुछ यही पत्थरों पर अमर हो गया। एक कथा है कि जब कोई अन्य राजा या दूध तंजा बुलाता तो सबसे पहले इस वृहदीश्वर का दर्शन करता वो देखता। इस विशाल विमान को महानंदी को प्रांगण में गूंजा थी घंटी और अनंत दीपक को और वो समझ जाता ये सम्राट केवल तलवार से नहीं। भक्ति और कला से भी अपना नाम अमर कर गया। मंदिर के अंदर से लेकर बाहर तक इसमें कई भाग है। भोजशाला नाट्य मंडप राजगुरु की बैठक और प्रजा के लिए भोजन और जल का व्यवस्था। इससे राजा ने अपने लोगों में एक भेद और बंधन बनाए रखा। राजा की समृद्धि और भक्ति एक साथ बाहर दिखती थी। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि प्रीति ईश्वर एक जीवित राज़ मुद्रा था। इससे राजा राज़ के बाद आने वाले राजाओं को भी राजनीति और प्रजा को बांधे रखने की शक्ति मिलती रहे। आज जब हम इसे देखते हैं तो सिर्फ पूजा नहीं देखते। हम देखते हैं एक सम्राट की दृष्टि जिसमे भक्ति और राजनीति एक साथ बनी गई थी पर इस स्वप्न में एक भोज और एक रहस्य भी छुपा था। इस महामंदिर की भोज शाला जहाँ हजारों भक्तों और सैनिकों का पेट भरा करता था और जिसकी रसोई का धुआं सदियों तक तंजाबुर की हवा में। खुला रहा महाभोज और प्रसाद अन्नदान की परंपरा वृद्धेश्वर मंदिर को देखने वाले अक्सर उसके शिखर कलश और नंदी पर ही रुक जाते है। पर इस पत्थर के प्रांगण में एक और अनोखा स्थल छुपा है।

महाभोज शाला जहाँ सदियों तक भक्तों के लिए अन्नदान होता रहा। इस मंदिर में एक विशाल रसोई और भोजशाला भी बनी थी। दिन भर तंजावुर के गांवों से अनाज, दूध, फल और सब्जियां यहाँ इकट्ठा होती थी। मंदिर के रसोई में हजारों भक्तों के लिए भोजन बनता। कढ़ाई में उबलता दूध, चूल्हों पर बनती दाल और दीपक की में जलता घी लोक कथाएँ कहती है कि हर त्यौहार उत्सव या विशेष पूजा के समय इस भोजशाला में इतना भोजन बनता कि गांव गांव से भक्त आकर पेट भर खाते और भगवान को धन्यवाद देते। राजगुरु और पुरोहित के निर्देश पर भोजन की व्यवस्था इतनी सही होती कि ना कोई भक्त भूखा जाता और ना कोई अन्न व्यर्थ होता। अन्नदान को राजा राज़ ने अपने राज्य की मर्यादा और दया का प्रतीक माना। उस समय के अभिलेख में लिखा है कि राजा ने अन्नदान के लिए अलग भूमि और धन भी लिखित रूप से मंदिर को दिया था। ताकि युग बीत जाए पर रसोई बंद ना हो। एक किस्सा प्राचीन लोगों में अब भी सुना जाता है एक समय राजा राज़ ने स्वयं भोजशाला में प्रवेश किया था। उन्होंने देखा कि एक वृद्ध औरत अपनी थाली लेकर पीछे बैठी है। भोजन के लिए इंतजार करती हुई राजा ने तुरंत अपने हाथ से उसके पात्र में भोजन भरोसा कहते हैं। क्नॉइस राजा के लिए विनय और सेवा भगवान ने भी देखा और मंदिर को सदैव समृद्ध बनाए रखा। महाभोज के समय घंटी और शंख बजते

लोग कीर्तन करते और एक दूसरे को परोसकर भक्ति में सम्मिलित होते। यहाँ कोई छोटा बड़ा नहीं सब एक साथ ही बैठते और साथ में भोजन ग्रहण करते। प्रियधीश्वर का महाभोज केवल अन्न का दान नहीं था। ये सम्मान प्रेम और समानता का प्रतीक था। आज भी कई भक्त मंदिर में जाकर प्रसाद लेते हैं और कहते हैं यहाँ के प्रसाद का स्वाद बस पेट नहीं आत्मा तक भरता है और इसी भोजशाला की महिमा के साथ जुड़ा है एक और राज़। कि भोज के बाद बचा भोजन गरीबों और गांव के जनों में बांट दिया जाता था। कोई भूखा नहीं सोता था। यही था राजा राज़ का सत्य स्वप्न अंतिम अध्याय अमर विरासत प्रियधीश्वर मंदिर को देखते हुए अगर कोई आंख बंद करें। तो वो बस पत्थरों का ढेर नहीं देख पाता। वो महसूस करता है कि एक सम्राट का सपना, एक समय की धड़कन और एक भक्ति का प्रकाश जो सदियों से अब तक जलता आ रहा है। राजा राज़ चोला का नाम शायद कल कागजों में किसी इतिहास की रेखा बन जाए। पर इस मंदिर के पत्थर में। वो सदा अमर रहेगा। उन्होंने जो शिखर बनवाया वो सिर्फ उचाई नहीं थी। वो मनुष्य के विश्वास की सीमा थी, उन्होंने कलश चड़वाया वो केवल तांबा या पत्थर का टुकड़ा नहीं था, वो शिव से मिलने का सपना था, उन्होंने जो दीवारें सजाई वो केवल चित्रों से नहीं बनी। वो नृत्य, गीत और लोक जीवन की गाथा बनी।

मंदिर के प्रांगण में बैठे नंदी महाराज सदा दृष्टि बनाए रखते हैं। जैसे वो याद दिलाते हो कि आस्था और बल एक साथ चलते हैं मंदिर के गुप्त सुरंगे, जिनके रास्ते आज भी अंधेरे में छुपे हैं। वो कहती हैं कि कुछ रहस्य समय कभी नहीं खोलता। उनमें ही असलियत जीवित रहती है। महाभोज की भोजशाला जहाँ अन्नदान की परंपरा हर भूखे को त्याग और प्रेम का स्वाद देती थी वो आज भी भक्ति और सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण है। ये मंदिर सिर्फ पूजा का स्थल नहीं ये समाज को एक सूत्र में बांधने का स्तंभ है। आज जब तंजावर की गलियां सूनी पड़ जाती है, तब भी वृहदी ईश्वर की घंटी गूंज उठती है। बताती है कि राजा राज़ का सपना नाम मिट्टी में गया नहवा में ये सपना पत्थर में, हवा में, रंगों में, सुरंगों में हर उस भक्त के मन में बसा है जो इस मंदिर के द्वार पर श्रद्धा से हाथ जोड़ता है। क्नॉइस। और जब रात को चाँद इस मंदिर पर चमकता है तो वो पत्थर भी रौशनी से जगमगाकर खिल जाते हैं। मंदिर के शिखर पर बैठा कलश चांदनी में नहाकर राजा राज़ की विरासत को सितारों तक ले जाता है। कोई कहीं भी हो पर जब वो वृहदीश्वर के बारे में सोचता है क्नॉइस? तो उसके मन में एक आवाज गूंजती है, श्रद्धा कभी नहीं मरता। सपने कभी मिट्टी में नहीं मिलते। इसी के साथ वृहदी ईश्वर की कहानी यही रुकती नहीं तो हर नई पीढ़ी

में हर नए भक्त में हर नए सपने में फिर से जीवित होती है और जब तक क्नॉइस। कोई एक दीपक भी इस मंदिर में जलता है। राजा राज़ का सपना और उनकी विरासत नहीं बज सकती तो ये था वृहद ईश्वर मंदिर के बारे में एक राजा का सपना, एक राजा की विरासत और। करोड़ों की भक्ति आई होप आपको ये एपिसोड पसंद आया होगा अगर आप ऐसे ही इंटरेस्टिंग स्टोरीज़ फ़ैक्ट्स हिस्टोरिकल फिगर्स के बारे में जानना चाहते है तो एक्सप्लोर कीजिये? एपिसोड सेक्शन ऑफ़ इंडिया अनवेल्ड मैं आपसे जल्दी मिलूंगा। अगले एपिसोड में टिल देन टेक गुड क्यू ऑफ योर हेल्थ दिस आईएस राकेश साइनिंग ऑफ फ्रॉम इंडिया अनवेल्ड थैंक यू फ़ोर लिसनिंग।

Transcript supplied by the publisher with the episode.

India Unveiled

by Rakesh Soni · Hindi · History

What if the most fascinating stories of India are the ones we've never been told? Welcome to India Unveiled, where history meets mystery, forgotten tales come alive, and the secrets of our past unfold through immersive storytelling.

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  1. S1 · E1 · 19 Sep 2025 · 15 min

    Biryani and it's origin in India | Food History

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  2. 17 Aug 2025 · 24 min

    The Untold Story of Ganesh Pooja: Lokmanya Tilak’s Weapon Against the British

    In this episode of India Unveiled , host Rakesh Soni takes you back to the revolutionary era of Lokmanya Bal Gangadhar Tilak and the birth of the Ganesh Pooja Movement . Discover how a simple religious festival turned into a powerful tool of India’s freedom struggle , uniting people against British rule. From hidden gatherings to fiery speeches, Tilak’s vision transformed Ganesh Chaturthi into a symbol of nationalism, unity, and cultural pride . This story is not just about devotion—it’s about how faith became a force for freedom. ✨ Listen now and uncover the lesser-known side of India’s…

  3. 18 Jul 2025 · 23 min

    The Story Of Kohinoor

    The Dark Truth of Kohinoor Diamond | History, Mystery & British Empire The Kohinoor diamond is not just a gem — it’s a symbol of India’s stolen heritage , a tale of power, politics, betrayal , and colonial greed . But what is the real story of Kohinoor? Was it cursed , or was it a victim of imperial conquest ? 🎙️ In this powerful episode of India Unveiled , host Rakesh Soni uncovers: The origin of Kohinoor in India Its journey through Mughals, Persians, Sikhs , and the British Empire Why it's seen as a cursed diamond The ongoing India vs UK Kohinoor ownership debate If you're interested in…

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  5. S1 · 9 Jun 2025 · 25 min

    What Happened to Subhash Chandra Bose?

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  6. S1 · E80 · 7 Jun 2025 · 19 min

    Raman Raghav real story | India Unveiled

    In this spine-chilling episode of India Unveiled , we uncover the dark and disturbing story of Raman Raghav , one of India's most feared serial killers. Active during the 1960s in Mumbai, his brutal and random killings with a blunt object left the city gripped in terror. Who was the man behind the murders? What led him down this path of violence? And how did the police finally catch him? Join host Rakesh Soni as he narrates the harrowing tale of a killer who walked among the shadows, and the investigation that brought him to light. Through detailed storytelling, sound design, and…

  7. 6 Oct 2026 · 14 min

    NEEM KAROLI BABA STORY | HANUMAN ANSH

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  8. 18 Sep 2026 · 40 min

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    RAJASTHAN: The Story Before the Rajputs | Part 1 Before the forts. Before the Rajputs. Before Maharana Pratap, the Mughals and the legendary battles… What was Rajasthan actually like thousands of years ago? In Part 1 of this 3-part series on the History of Rajasthan , we travel deep into the ancient past of the land we now call Rajasthan — from prehistoric settlements and the Indus Valley Civilization to ancient kingdoms, trade routes, cultures and the early societies that shaped this region. Rajasthan is often remembered for its magnificent forts, Rajput warriors and royal dynasties. But…

  9. 1 Sep 2026 · 20 min

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    VARANASI — a city that feels older than history itself. But how old is Kashi really? Who founded Varanasi? Why is this city considered one of the holiest places in the world? And how did it survive centuries of kingdoms, invasions, empires and changing India? In this episode, we travel through the fascinating history of Varanasi , from the ancient story of Kashi and its connection with Lord Shiva , to the rise of one of India's most important cultural and spiritual centres. We explore the Ghats of Varanasi, the Ganga, Sarnath, ancient Kashi, Buddhist history, Hindu traditions, Mughal-era…

  10. 28 Aug 2026 · 54 min

    Mumbai or Bombay? Indian History

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