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Episode · Suno Kahani

Nimantran - Premchand - Suno Kahani - निमंत्रण - प्रेमचंद - सुनो कहानी

17 May 2026 · 40 min

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Episode notes

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Transcript

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नमस्कार सुनो कहानी श्रृंखला के अन्तर्गत प्रस्तुत है कहानी निमंत्रण, जिसके लेखक हैं मुंशी प्रेमचंद जी। पंडित मोटे राम शास्त्री ने अंदर जाकर अपने विशाल उधर पर हाथ फेरते हुए यह पद पंचम स्वर में गाया। अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाताराम सोनू ने प्रफुल्लित होकर पूछा, कोई मीठी ताज़ी खबर है? क्या शास्त्री जी ने पैतरे बदल कर कहा मार लिया, आज ऐसा ताक कर मारा कि चारों खाने चित्र। सारे घर का न्योता सारे घर का वह बढ़बढ़ कर हाथ मारूंगा कि देखने

वाले दंग रह जाएंगे उधर महाराज अभी से अधीर हो रहे हैं। सोना कहीं पहले की भांति अब भी धोखा न हो पक्का पौढ़ा कर लिया है ना? मोटे राम ने मूंछें ऐंठते हुए कहा। ऐसा आशा गोंद मुँह से ना निकालो। बड़े जप तप के बाद यह शुभ दिन आया है। जो तैयारियां करनी हो कर लो सोना वह तो करूँगी ही क्या?

इतना भी नहीं जानती जन्म भर घास थोड़े ही खोती रही हूँ मगर है घर भर का ना मोटे राम अब और कैसे कहूं? पूरे घर भर का है। इसका अर्थ समझ में ना आया हो तो मुझसे पूछो विद्वानों की बात समझना सबका काम नहीं। मगर उनकी बात सभी समझ ले तो उनकी विद्वता का महत्त्व ही क्या रहे बताओ क्या समझी? मैं इस समय बहुत ही सरल भाषा में बोल रहा हूँ, मगर तुम नहीं समझ सकी। बताओ विद्वता किसे कहते हैं, महत्त्व ही का अर्थ बताओ घर भर का निमंत्रण देना क्या दिल्लगी है? हाँ ऐसे अवसर पर विद्वान लोग

राजनीति से काम लेते हैं और उसका वही आशय निकालते हैं जो अपने अनुकूल हो। मुरादापुर की रानी साहेब। सात ब्राह्मणों को इच्छापूर्ण भोजन कराना चाहते हैं। कौनकौन महाशय मेरे साथ जाएंगे? यह निर्णय करना मेरा काम है। अलगू राम शास्त्री, बेनी राम शास्त्री छैदी राम शास्त्री, भवानी राम शास्त्री, हेकू राम शास्त्री, मोटे राम शास्त्री आदि जब इतने आदमी अपने ही घर में हों। तब बाहर कौन ब्राह्मणों को खोजने जाए? सोना और सातवाँ कौन है?

मोटे राम बुद्धि उदड़ाओ सोना एक पत्तल घर लेते आना मोटे राम फिर वही बात कही जिसमें बदनामी हो छी छी पत्तल घर लाऊँ। उस पत्तल में वह स्वाद कहाँ जो जजमान के घर पर बैठकर भोजन करने में है? सुनो सातवें महाशय हैं पंडित सोनाराम शास्त्री सोना चलो दिल्लगी करते हो भला कैसे जाऊंगी मोटे राम ऐसे ही कठिन अवसरों पर तो विद्या की आवश्यकता पड़ती है। विद्वान आदमी अवसर को अपना सेवक बना लेता है, मूर्ख अपने भाग्य को रोता है। सोना देवी और सोनाराम शास्त्री

में क्या अंतर है? जानती हो केवल परिधान का परिधान कार्थ समझती हो परिधान पहनावा को कहते हैं इसी साड़ी को मेरी तरह बांध लो। मेरी मिरजई पहन लो, ऊपर से चादर ओढ़ लो, पगड़ी मैं बांध दूंगा फिर कौन पहचान सकता है?

सोना ने हंसकर कहा मुझे तो लाज लगेंगी, मोटे राम तुम्हें करना ही क्या है? बातें तो हम करेंगे। सोना ने मन ही मन आने वाले पदार्थों का आनंद लेकर कहा बड़ा मज़ा होगा। मोटे राम बस अब विलंब न करो, तैयारी करो चलो सोना कितनी फंकी बना लूँ मोटे राम यह मैं नहीं जानता, बस यही आदर्श सामने रखो कि अधिक से अधिक लाभ हो। सहसा सोना देवी को एक बात याद आ गई। बोली अच्छा इन भिक्षुओं का क्या करूँ?

मोटे राम ने त्योरी चढ़ाकर कहा, इन्हें उठाकर रख देना और क्या करोगी? सोना हाँ जी क्यों नहीं उतारकर रख क्यों ना दूंगी मोटे राम तो क्या तुम्हारे बिछुएं पहने ही से मैं जी रहा हूँ जीता हूँ? पौष्टिक पदार्थों के सेवन से तुम्हारे बिछुओं के पुण्य से नहीं जीता। सोना नहीं भाई मैं बिछुवे न उतारूंगी मोटे राम ने सोचकर कहा अच्छा कहने चलो कोई हानि नहीं गोवर्धनधारी यह बाधा भी हर लेंगे। बस पांव में बहुत से कपड़े लपेट लेना, मैं कह दूंगा इन पंडित जी

को फील पाम हो गया है। क्यों कैसी सूझी? पंडिताइन ने पति देव को प्रशंसा सूचक नेत्रों से देखकर कहा, जन्म भर पड़ा नहीं है। संध्या समय पंडित जी ने पांचों पुत्रों को बुलाया और उपदेश देने लगे। पुत्रों कोई काम करने के पहले खूब सोच समझ लेना चाहिए कि कैसा क्या होगा? मान लो रानी साहेब ने। तुम लोगों का पता ठिकाना पूछना आरंभ किया तो तुम लोग क्या उत्तर दोगे? यह तो महान मूर्खता होगी कि तुम सब मेरा नाम लो सोचो कितने कलंक और लज्जा की बात होगी कि मुझ जैसा

विद्वान केवल भोजन के लिए इतना बड़ा कुछ चक्र रचे, इसलिए तुम सब थोड़ी देर के लिए भूल जाओ कि मेरे पुत्र हो। कोई मेरा नाम न बतलाए, संसार में नामों की कमी नहीं, कोई अच्छा सा नाम चुनकर बता देना। पिता का नाम बदल देने से कोई गाली नहीं लगती, यह कोई अपराध नहीं है। अलगू आप ही बता दीजिए, मोटे राम अच्छी बात है, बहुत अच्छी बात है, हाँ, इतने महत्त्व का काम मुझे स्वयं करना चाहिए। अच्छा सुनो। अलगू राम के पिता का नाम है पंडित केशव पांडेय खूब याद कर लो बेनी

राम के पिता का नाम है पंडित मंगलू ओझा। खूब याद रखना छेदी राम के पिता हैं पंडित दमणी तिवारी, भूलना नहीं भवानी, तुम गंगू पाण्डेय बतलाना खूब याद कर लो अब रहे फेंकू राम। तुम बेटा बतलाना सेतुराम पाठक होगा सब हो गया सबका नामकरण अच्छा अब मैं परीक्षा लूँगा, होशियार रहना बोलो अलगू तुम्हारे पिता का क्या नाम है?

अलगू पंडित केशव पांडे बेनीराम तुम बताओ दमिणी तिवारी छेदीराम ये तो मेरे पिता का नाम है। बेनी राम मैं तो भूल गया, मोटे राम भूल गए पंडित के पुत्र होकर तुम एक नाम भी याद नहीं कर सकते। बड़े दुख की बात है, मुझे पांचों नाम याद हैं तुम्हें एक भी नाम याद नहीं सुनो, तुम्हारे पिता का नाम है पंडित मंगलू ओझा। पंडित जी लड़कों की परीक्षा ले ही रहे थे कि उनके पास मित्र पंडित चिंतामणि ने द्वार पर आवाज दी। पंडित मोटे राम ऐसे घबराए कि सिर पैर की सुधी ना रही, लड़कों को भगाना ही चाहते थे कि पंडित

चिंतामणि अंदर चले आए। दोनों सज्जनों में बचपन से गाढ़ी मैत्री थी। दोनों बहुधा साथ साथ भोजन करने जाया करते थे और यदि पंडित मोटे राम अव्वल रहते तो पंडित चिंतामणि के द्वितीय पद में कोई बाधक न हो सकता था। पर आज मोटे राम जी अपने मित्र को साथ नहीं ले जाना चाहते थे। उनको साथ ले जाना अपने घर वालों में से किसी एक को छोड़ देना था। और इतना महान आत्म त्याग करने के लिए वे तैयार ना थे। चिंतामणि ने यह समारोह देखा तो प्रसन्न होकर बोले क्यों भाई

अकेले ही अकेले मालूम होता है, आज कहीं गहरा हाथ मारा है। मोटे राम ने मुँह लटकाकर कहा कैसी बातें करते हो मित्र? ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि मुझे कोई अवसर मिला हो। और मैंने तुम्हें सूचना ना दी हो कदाचित कुछ समय ही बदल गया या किसी ग्रह का अफेयर है? कोई झूठ को भी नहीं बुलाता। पंडित चिंतामणि ने अविश्वास के भाव से कहा कोई ना कोई बात तो मित्र अवश्य है, नहीं तो ये बालक क्यों जमा है?

मोटे राम तुम्हारी इन्हीं बातों पर मुझे क्रोध आता है। लड़कों की परीक्षा ले रहा हूँ ब्राह्मण के लड़के हैं चार अक्सर पढ़े बिना इनको कौन पूछेगा? चिंतामणि को अब भी विश्वास न आया। उन्होंने सोचा लड़कों से ही इस बात का पता लग सकता है। फेकू राम सबसे छोटा था, उसी से पूछा क्या पढ़ रहे हो?

बेटा हमें भी सुनाओ। मोटे राम ने फेकू राम को बोलने का अवसर न दिया। डरे कि यह तो सारा भंडा फोड़ देगा। बोले अभी यह क्या पड़ेगा? दिन भर खेलता है ठेकूराम इतना बड़ा अपराध अपने नन्हे से सिर पर क्यों लेता? बाल सुलभ गर्व से बोला हमको तो याद है पंडित सेतुराम पाठक हम याद भी कर लें, तिस पर भी कहते हैं, हरदम खेलता है। यह कहते हुए उसने रोना शुरू कर दिया। चिंतामणि ने बालक को गले लगा लिया और बोले नहीं बेटा तुमने अपना पार्ट सुना दिया है तुम खूब पड़ते

हो ये सेतुराम पाठक कौन है? बेटा मोटे राम ने बिगड़ कर कहा तुम भी लड़कों की बातों में आते हो, सुन लिया होगा किसी का नाम फेंकू से बोले जा बाहर खेल। चिंतामणि अपने मित्र की घबराहट देखकर समझ गए कि कोई न कोई रहस्य अवश्य है। बहुत दिमाग लड़ाने पर भी सेतुराम पाठक का हश है। उनकी समझ में न आया अपने परम मित्र की इस कुटिलता पर मन में दुःखित होकर बोले, अच्छा आप पाठ पढ़ाइये और परीक्षा लीजिये, मैं जाता हूँ तुम इतने स्वार्थी हो। इसका मुझे गुमान तक न था।

आज तुम्हारी मित्रता की परीक्षा हो गई। पंडित चिंतामणि बाहर चले गए। मोटे राम के पास उन्हें मनाने के लिए समय न था। फिर परीक्षा लेने लगे। सोना ने कहा मनालो मनालो रूठे जाते हैं फिर परीक्षा लेना मोटे राम जब कोई काम पड़ेगा मना लूँगा। निमंत्रण की सूचना पाते ही इनका सारा रोज़ शांत हो जाएगा। हाँ भवानी, तुम्हारे पिता का क्या नाम है? बोलो भवानी गंगू पांडे मोटे राम और तुम्हारे पिता का नाम फेकू फेकू राम बता तो दिया, उस पर कहते हैं पढ़ता नहीं, मोटे राम हमें भी बता दो।

फेकू राम सेतुराम पाठक तो है मोटे राम बहुत ठीक, हमारा लड़का बड़ा राजा है, आज तुम्हें अपने साथ बिठाएंगे और सबसे अच्छा माल तुम ही को खिलाएंगे। सोना हमें भी कोई नाम बता दो, मोटे राम ने रसिकता से मुस्कुराकर कहा, तुम्हारा नाम है पंडित मोहन स्वरूप शुक्ल। सोना देवी ने ले जाकर सिर झुका लिया सोना देवी तो लड़कों को कपड़े पहनाने लगी उधर, फेंकू आनंद की उमंग में घर से बाहर निकला। पंडित चिंतामणि रूठ कर तो चले थे पर कौतूहल वर्ष अभी तक द्वार पर दुबके खड़े थे।

इन बातों की भनक इतनी देर में उनके कानों में पड़ी। इससे यह तो ज्ञात हो गया कि कहीं निमंत्रण है पर कहाँ है, कौन कौन लोग निमंत्रित हैं, यह ज्ञात न हुआ था। इतने में फेंकू बाहर निकला तो उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और बोले कहाँ नेवता है बेटा? अपनी जान में तो उन्होंने बहुत धीरे से पूछा था पर न जाने कैसे पंडित मोटे राम के कान में भनक पड़ गई। तुरंत बाहर निकल आए। देखा तो चिंतामणि जी फेंकू को गोद में लिए कुछ पूछ रहे हैं। लपक कर लड़के का हाथ पकड़ लिया और चाहा कि उसे अपने मित्र की गोद से

छीन लें, मगर चिंतामणि जी को अभी अपने प्रश्न का उत्तर न मिला था। अतः वे लड़के का हाथ छुड़ाकर उसे लिए हुए अपने घर की ओर भागे। मोटे राम भी यह कहते हुए उनके पीछे दौड़े उसे क्यों लिए जाते हो? धूतकही का दुष्ट चिंतामणि मैं कह देता हूँ इसका नतीजा अच्छा न होगा, फिर कभी किसी निमंत्रण में न ले जाऊंगा। भला चाहते हो तो उसे उतार दो मगर चिंतामणि ने इतना सुनी। उनकी देह अभी संभाल के बाहर न हुई थी, दौड़ सकते थे। मगर मोटे राम जी को एक एक पग आगे बढ़ना दुष्कर्म हो रहा था, भैंसे की भांति हाफते थे और नाना प्रकार

के विशेषज्ञों का प्रयोग करते दूर की चाल से चले जाते थे और जद्दिपि प्रतिक्षण अंतर बढ़ता जाता था और पीछा न छोड़ते थे। अच्छी गुडदौड़ थी। नगर के दो महात्मा दौड़ते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानो दो गैंडे चिड़ियाघर से भाग आये हों। सैकड़ों आदमी तमाशा देखने लगे, कितने ही बालक उनके पीछे तालियां बजाते हुए दौड़ें। कदाचित यह दौड़ पंडित चिंतामणि के घर पर ही समाप्त होती, पर पंडित मोटे राम धोती के ढीले हो जाने के कारण। उलझकर गिर पड़े। चितामणि ने पीछे फिर कर यह दृश्य देखा तो रुक गए और फेकू राम से

पूछा क्यों बेटा कहानी होता है? फेकू राम बता दें तो हमें मिठाई दोगे ना? चिंतामणि हाँ दूंगा बताओ फेकू राम रानी के यहाँ चिंतामणि कहाँ की रानी? हेकुरम यह मैं नहीं जानता, कोई बड़ी रानी है। नगर में कई बड़ी बड़ी रानियों थीं। पंडित जी ने सोचा सभी रानियों के द्वार पर चक्कर लगाऊंगा। जहाँ भोज होगा, वहाँ कुछ भीड़भाड़ होगी ही पता चल जाएगा। यह निश्चय करके वे लौट पड़े। सहानुभूति प्रकट करने में अब कोई बाधा ना थी। मोटे राम जीके पास आए तो देखा कि

वे पड़े कराह रहे हैं। उठने का नाम नहीं लेते, घबराकर पूछा गिर कैसे पड़े मित्र? यहाँ कहीं गड्ढा भी तो नहीं है? मोटे राम तुमसे क्या मतलब? तुम लड़के को ले जाओ, जो कुछ पूछना चाहो पूछो चिंतामणि। मैं यह कपट व्यवहार नहीं करता दिल्लगी की थी तुम बुरा मान गए ले उठ तो बैठ राम का नाम लेके मैं सच कहता हूँ मैंने कुछ नहीं पूछा मोटे राम चल झूठा जनेऊ हाथ में लेकर कहता हूँ मोटे राम तुम्हारी शपथ का विश्वास नहीं चिंता मणि तुम मुझे इतना दूर समझते हो? मोटे राम इससे कहीं अधिक तुम गंगा

में डूब कर शपथ खाओ तो भी मुझे विश्वास न आए। चिंतामणि दूसरा यह बात कहता तो मुँह उखाड़ लेता मोटे राम तो फिर आ जाओ चिंतामणि पहले पंडिताइन से पूछ आओ, मोटे राम यह भसमख व्यंग्य न सह सके? चट उठ बैठे और पंडित चिंतामणि का हाथ पकड़ लिया। दोनों मित्रों में मल्लयुद्ध होने लगा। दोनों हनुमान जी की स्तुति कर रहे थे और इतने ज़ोर ज़ोर से गरज गरज कर मानो सी दहाड़ रहे हों, बस ऐसा जान पड़ता था मानो दोपी पे आपस में टकरा रहे हों। मोटेरा महाबली विक्रम, बजरंगी चिंतामणि, भूत पिशाच निकट नहीं

आवे मोटे राम जय जय जय हनुमान गोसाईं चिंतामणि प्रभु रखिये लाज हमारी मोटे राम बिगड़ कर बोले ये हनुमान चालीसा में नहीं है चिंतामणि ये हमने स्वयं रचा है क्या तुम्हारी तरह की ये रतन विद्या है? जितना कहो उतना रच दें मोटे राम अबे हम रचने पर आ जाएं तो 1 दिन में 1,00,000 स्तुतियां रच डालें। किंतु इतना अवकाश किसे है? दोनों महात्मा अलग खड़े होकर अपने अपने रचना कौशल की डींगें मार रहे थे। मल्ल युद्ध शास्त्रार्थ का रूप धारण करने लगा जो विद्वानों के

लिए उचित है। इतने में किसी ने चिंतामणि के घर जाकर कह दिया कि पंडित मोटेराम और चिंतामणि जी में बड़ी लड़ाई हो रही है। चिंतामणि जी तीन महिलाओं के स्वामी थे। कुलीन ब्राह्मण थे पूरे 20 बीसवें। उस पर विद्वान भी उच्च कोटि के दूर दूर तक यजमानी थे। ऐसे पुरुषों को सब अधिकार हैं। कन्या के साथ साथ जब प्रचुर दक्षिणा भी मिलती हो तब कैसे इनकार किया जाए? इन तीनों महिलाओं का सारे मोहल्ले में आतंक छाया हुआ था। पंडित जी ने इनके नाम बहुत ही रसीले रखे थे, बड़ी स्त्री को अमर्तती, मंझिल को गुलाबजामुन और

छोटी को मोहन भोग कहते थे। पर मोहल्ला वालों के लिए तीनों महिलाएं। त्राय ताप से कम न थी, घर में नित्य आंसुओं की नदी बहती रहती खून की नदी तो पंडित जी ने भी कभी नहीं बहाई। अधिक से अधिक शब्दों की ही नदी बहाई थी पर मजाल न थी कि बाहर का आदमी किसी को कुछ कह जाए। संकट के समय तीनों एक हो जाती थी। यह पंडित जीके नीती चतुर्य का सुफल था। यूँ ही खबर मिली कि पंडित चिंतामणि पर संकट पड़ा हुआ है। तीनों स्त्रीदोष की भाँति कुपित होकर घर से निकली और उनमें जो अन्य दोनों जैसी मोटी नहीं थी,

सबसे पहले समरभूमि में जा पहुंची। पंडित मोटे रामजी ने उसे आते देखा तो समझ गए कि अब कुशल नहीं, अपना हाथ छुड़ाकर भक टूट भागे। पीछे फिर कर भी ना देखा चिंतामणि जी ने बहुत ललकारा पर मोटे राम के कदम ना रुके। चिंतामणि अजी भाग्य क्यों ठहरो कुछ मज़ा तो चखते जाओ मोटे राम मैं हार गया भाई हार गया चिंतामणि अभी कोई दक्षिणा तो लेते जाओ। मोटे राम ने भागते हुए कहा दया करो भाई दया करो। आठ बजते बजते पंडित मोटे राम ने स्नान और पूजा करके कहा अब विलंब नहीं करना चाहिए, फंकी तैयार है

ना सूना, फंकी लिए तो कब से बैठी हूँ। तुम्हें तो जैसे किसी बात की सुधि ही नहीं रहती। रात को कौन देखता है कि कितनी देर तक पूजा करते हो? मैं तुमसे एक नहीं 1000 बार कह चुका कि मेरे कामों में मत बोला करो, तुम नहीं समझ सकती कि मैंने इतना विलंब क्यों किया?

तुम्हें ईश्वर ने इतनी बुद्धि ही नहीं दी, जल्दी जाने से अपमान होता है, जजमान समझता है, लोभी है, भूखड़ है इसलिए चतुर लोग विलंब किया करते हैं। जिसमें जजमान समझे कि पंडित जी को इसकी सुधी ही नहीं है। भूल गए होंगे, बुलवाने को आदमी भेजे इस प्रकार जाने में जो मान महत्त्व है वह भूखों की तरह जाने में क्या कभी हो सकता है? मैं बुलवाने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, कोई ना कोई आता ही होगा। लाओ थोड़ी फंकी बालकों को खिला दी है ना? सोना उन्हें तो मैंने सांझी को

खिला दी थी। मोटे राम कोई सोया तो नहीं सोना आज भला कौन सोयेगा? सब भूख भूख चिल्ला रहे थे तो मैंने एक पैसे का चबेना मंगवा दिया। सब के सब ऊपर बैठे खा रहे हैं, सुनते नहीं हो, मारपीट हो रही है। मोटे राम ने दाँत पीसकर कहा, जी चाहता है तुम्हारी गर्दन पकड़कर ऐंठ तू भला इस बेला चबेना मंगाने का क्या काम था?

चबेना खा लेंगे तो वहाँ क्या तुम्हारा सिर खायेंगे, छी छी, ज़रा भी बुद्धि नहीं। सोना ने अपराध स्वीकार करते हुए कहा, हाँ, भूल तो हुई पर सब के सब इतना कोलाहल मचाए हुए थे। कि सुना नहीं जाता था मोटे राम रोते ही थे ना रोने देती, रोने से उनका पेट न भरता बल्कि और भूख खुल जाती। सहसा एक आदमी ने बाहर से आवाज दी, पंडित जी महारानी जी बुला रही हैं और लोगों को लेकर जल्दी चलो। पंडित जी ने पत्नी की ओर गर्व से देखकर कहा देखा? इसे निमंत्रण कहते हैं। अब तैयारी करनी चाहिए। बाहर आकर पंडित जी ने उस आदमी से

कहा, तुम एक क्षण और न आते तो मैं कथा सुनाने चला गया होता। मुझे बिल्कुल याद ना थी। चलो हम बहुत शीघ्र आते हैं न बजते बजते पंडित मोटे राम बाल गोपाल सहित रानी साहब के द्वार पर पहुंचे। रानी बड़ी विशालकाय एवं तेजस्विनी महिला थीं। इस समय वे कार चौबीदार तकिया लगाये तख्त पर बैठी हुई थीं। दो आदमी हाथ बांधे पीछे खड़े थे, बिजली का पंखा चल रहा था। पंडित जी को देखते ही रानी ने तख्त से उठकर चरण स्पर्श किया और इस बालक मंडल को देखकर मुस्कुराती

हुई बोली। इन बच्चों को आप कहाँ से पकड़ लाए? मोटे राम करता क्या सारा नगर छान मारा, किसी पंडित ने आना स्वीकार न किया कोई किसी के यहाँ निमंत्रित है कोई किसी के यहाँ तब तो मैं बहुत चकराया। अंत में मैंने उनसे कहा, अच्छा आप नहीं चलते तो हरी इच्छा, लेकिन ऐसा कीजिए कि मुझे लज्जित ना होना पड़े। तब जबरदस्ती प्रत्येक के घर से जो बालक मिला उसे पकड़ लाना पड़ा। क्यों फेकूराम तुम्हारे पिताजी का क्या नाम है?

फेकूराम ने गर्व से कहा पंडित सेतुराम पाठक रानी बालक तो बड़ा होनहार है और बालकों को भी उत्कंठ हो रही थी कि हमारी भी परीक्षा ली जाये, लेकिन जब पंडित जी ने उनसे कोई प्रश्न न किया। और उधर रानी ने फेकू राम की प्रशंसा कर दी तब तो वे अधीर हो उठे। भवानी बोला मेरे पिता का नाम है पंडित गंगू पांडेय। छेदी बोला मेरे पिता का नाम है दमड़ी तिवारी बेनीराम ने कहा मेरे पिता का नाम है पंडित मंगरू ओझा। अलगू राम समझदार था, चुपचाप खड़ा रहा। रानी ने उससे पूछा, तुम्हारे पिता का क्या नाम है जी?

अलगू राम को इस वक्त पिता का निर्दिष्ट नाम याद न आया, ना यही सूझा कि कोई और नाम ले ले हत बुद्धि सा खड़ा रहा पंडित मोटे राम ने जब उसकी और दात पीसकर देखा तब रहा। साहा हवास भी गायब हो गया। ठेकू राम ने कहा हम बता दें भैया भूल गए। रानी ने आश्चर्य से पूछा क्या अपने पिता का नाम भूल गया? यह तो विचित्र बात देखी। मोटे राम ने अलगू के पास जाकर कहा कैसे है?

अलगू राम बोल उठा केशव पांडेय रानी तो अब तक क्यों चुप था? मोटे राम? कुछ ऊँचा सुनता है सरकार रानी मैंने सामान तो बहुत सा मंगवाया है, सब खराब होगा लड़के क्या खाएंगे मोटे राम सरकार इन्हें बालक न समझे। इनमें जो सबसे छोटा है। यह दो पत्तल खाकर उठेगा। जब सामने पतले पड़ गई और भंडारी चांदी के थैलों में। एक से एक उत्तम पदार्थ ला लाकर परसने लगा तब पंडित मोटे राम जी की आँखें खुल गईं। उन्हें आए दिन निमंत्रण मिलते रहते थे पर ऐसे अनुपम पदार्थ कभी सामने ना आए थे।

घी की ऐसी सौंधी सुगंध उन्हें कभी ना मिली थी। प्रत्येक वस्तु से केवड़े और गुलाब की लपटें उड़ रही थीं। घी टपक रहा था। पंडित जी ने सोचा ऐसे पदार्थों से कभी पेट भर सकता है, मनों खा जाऊं फिर भी और खाने को जी चाहे देवतागण इनसे उत्तम और कौन से पदार्थ खाते होंगे, इनसे उत्तम पदार्थों की तो कल्पना भी नहीं हो सकती। पंडित जी को इस वक्त अपने परम मित्र पंडित चिंतामणि की याद आयी। अगर वे होते तो रंग जम जाता। उनके बिना रंग फीका रहेगा। यह दूसरा कौन है? जिसे लाग डांट करूँ लड़के दोदो,

पत्तलों में छह भूल जाएंगे, सोना कुछ साथ देगी मगर कब तक चिंतामणि के बिना रंग न घटेगा वे मुझे ललकारेंगे मैं उन्हें ललकारूंगा इस उमंग में पत्तलों की कौन गिनती? हमारी देखादे की लड़के भी डट जाएंगे। ओह बड़ी भूल हो गयी यह ख्याल मुझे पहले न आया रानी साहब से कहूं, बुरा तो न मान जाएंगी, उह, जो कुछ हो, एक बार ज़ोर तो लगाना ही चाहिए। तुरंत खड़े होकर रानी साहब से बोले सरकार आज्ञा हो तो कुछ कहूं, रानी कहिये महाराज। क्या किसी वस्तु की कमी है? मोटे राम नहीं, सरकार किसी बात के

नहीं। ऐसे उत्तम पदार्थ तो मैंने कभी देखे भी न थे। सारे नगर में आपकी कीर्ति फैल जाएगी। मेरे एक परम मित्र पंडित चिंतामणि जी हैं। आज्ञा हो तो उन्हें भी बुला लूँ। बड़े विद्वान कर्मनिष्ठ ब्राह्मण हैं। उनके जोड़ का इस नगर में दूसरा नहीं है। मैं उन्हें निमंत्रण देना भूल गया। अभी सुधी रानी, आपकी इच्छा हो तो बुला लीजिए, मगर आने जाने में देर होगी और भोजन परोस दिया गया है। मोटे राम मैं अभी आता हूँ, सरकार दौड़ता हुआ जाऊंगा। रानी मेरी मोटर ले लीजिए।

जब पंडित जी चलने को तैयार हुए, तब सोना ने कहा, तुम्हें आज क्या हो गया है जी, उसे क्यों बुला रहे हो? मोटे राम कोई साथ देने वाला भी तो मोटे राम कोई साथ देने वाला भी तो चाहिए? सोना मैं क्या तुमसे दब जाती?

पंडित जी ने मुस्कुराकर कहा, तुम जानती नहीं? घर की बात और है, दंगल की बात और है। पुराना खिलाड़ी मैदान में जाकर जितना नाम करेगा उतना नया पट्टा नहीं कर सकता। वहाँ बल का काम नहीं, साहस का काम है, बस यहाँ भी वही हाल समझो, झंडे गाड़ दूंगा, समझ लेना सोना, कहीं लड़के सो जाए तो मोटे राम। और मुँह खुल जाएगी जगह तो मैं लूँगा सोना देख लेना, आज वह तुम्हें पछाड़ देगा। उसके पेट में तो शनिचर है, मोटे राम बुद्धि की सर्वत्र प्रधानता रहती है। यह ना समझो की भोजन करने की कोई

विद्या ही नहीं। इसका भी एक शास्त्र है जिसे मथुरा के शनिचरानंद महाराज ने रचा है। चतुर आदमी थोड़ी सी जगह में गृहस्थी का सब समान रख लेता है। अनाड़ी बहुत सी जगह में भी यही सोचता है कि कौन वस्तु कहाँ रखूं? गवार आदमी पहले से ही हबक हबक कर खाने लगता है और चट एक लोटा पानी पीकर अफर जाता है। चतुर आदमी बड़ी सावधानी से खाता है। उसको कार नीचे उतारने के लिए पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती। देर तक भोजन करते रहने से वह सुपाच्य भी हो जाता है। चिंतामणि मेरे सामने क्या ठहरेगा? चिंतामणि जी अपने आंगन में उदास

बैठे हुए थे। जीस प्राणी को वे अपना परम हितैषी समझते थे। जिसके लिए वे अपने प्राण तक देने को तैयार रहते थे। उसी ने आज उनके साथ बेवफाई की बेवफाई ही नहीं की। उन्हें उठाकर दे मारा। पंडित मोटे राम के घर से तो कुछ जाता ना था। अगर वे चिंतामणि जी को साथ ले जाते तो क्या रानी साहब उन्हें दुतकार देती? स्वार्थ के आगे कौन किसको पूजता है? मूल्य पदार्थों की कल्पना करके चिंतामणि के मुँह से लाड़ टपकी पड़ती थी। अब सामने पत्थर आ गई होगी। अब थालों में इमर्थियां लिए

भंडारी जी आए होंगे। ओहो कितनी सुंदर कोमल कुरकुरी, रसीली इमर्तियां होंगी अब बेसन के लड्डू आए होंगे ओहो कितने सुडौल मेवों से भरे हुए? घी से तरा तर लड्डू होंगे मुँह में रखते ही घुल जाते होंगे जी भी न डुलानी पड़ती होगी आह अब मोहन भोग आया होगा हारे दुर्भाग्य मैं यहाँ पड़ा सड़ रहा हूँ और वहाँ यह बहार बड़े निर्दई हो मोटे राम तुमसे इस निष्ठुरता की आशा ना थी इमरती देवी बोली। तुम इतना दिन छोटा क्यों करते हो?

पित्र पक्ष तो आ ही रहा है ऐसे ऐसे ना जाने कितने आएँगे चिंतामणि आज किसी अभागे का मुँह देखकर उठा था लाओ तो पत्रा बेकू कैसा मुहूर्त है अब नहीं रह जाता सारा नगर छान डालूंगा, कहीं तो पता चलेगा, नासिका तो दाहिनी चल रही है। एक एक मोटर की आवाज आई। उसके प्रकार से पंडित जी का सारा घर जगमगा उठा। वे खिड़की से झांकने लगे तो मोटे राम को मोटर से उतरते देखा। एक लंबी सांस लेकर चारपाई पर गिर पड़े। मन ने कहा कि दुष्ट भोजन करके अब यहाँ मुझसे बखान करने आया है। इमरती देवी ने पूछा कौन है दाढ़ी

जार? इतनी रात को जगावत है, मोटे राम हम हैं, हम गाली न दो इमरती अरे दूरमुंह झोंसे तै कौन हैं? कहते हैं हम हैं, हम हैं, कौन जाने तै कौन हैं मोटे राम अरे हमारी बोली नहीं पहचानती हो, खूब पहचान लो, हम हैं तुम्हारे देवर। ए दूर तोरे मुँह में कहाँ लागे तोर लहास उठे हमार देवर बना था दाढ़ी जार मोटे राम अरे हम हैं मोटे राम शास्त्री क्या इतना भी नहीं पहचानती? चिंतामणि घर में है, इमरती ने किवाड़ खोल दिया और तिरस्कार बाहर से बोली, अरे तुम थे तो नाम क्यों

नहीं बताते थे? जब इतनी गालियां खाली तो बोल निकला क्या है? क्या मोटे राम कुछ नहीं, चिंतामणि जी को शुभ संवाद देने आया हूँ, रानी साहब ने उन्हें याद किया है। इमरती भोजन के बाद बुलाकर क्या करेंगी मोटे राम अभी भोजन नहीं हुआ है। मैंने जब इनकी विद्या कर्मनिष्ठा सद्विचार की प्रशंसा की। तब मुग्ध हो गई। मुझसे कहा कि उन्हें मोटर पर लाओ क्या सो गए?

चिंतामणि चारपाई पर पड़े पड़े सुन रहे थे। जी मैं आता था, चलकर मोटे राम के चरणों पर गिर पड़ूं। उनके विषय में अब तक जीतने कुत्सित विचार उठे थे। सब लुप्त हो गए, गलानी का आभी भाव हुआ, रोने लगे। अरे भाई, आते हो या सोते ही रहोगे?

यह कहते हुए मोटेराम उनके सामने जाकर खड़े हो गए। चिंतामणि तब क्यूँ ना ले गए जब इतनी दुर्दशा कर लिए? तब आए अभी तक पीठ में दर्द हो रहा है मोटेराम? अजी, वह तर माल खिलाऊंगी कि सारा दर्द वर्द भाग जाएगा। तुम्हारे यजमानों को भी ऐसे पदार्थ मयस्त्र न हुए होंगे। आज तुम्हें बद कर पछाडूंगा चिंता मणि तुम बेचारे मुझे क्या पछाड़ोगे सारे शहर में तो ऐसा कोई माइका लाल दिखाई नहीं देता। हमें शनिचर का इश्क है, मोटे राम अजी, यहाँ बरसों तपस्या की है,

भंडारे का भंडारा साफ कर दे और इच्छा ज्यों की तो बनी रहे बस यही समझ लो कि भोजन करके हम खड़े नहीं रह सकते। चलना तो दूसरी बात है। गाड़ी पर लद कराते हैं चिंतामणि तो यह कौन बड़ी बात है? यहाँ तो टीकटी पर उठाकर लाये जाते हैं। ऐसी ऐसी डकारे लेते हैं कि जान पड़ता है बमगोला छूट रहा है। एक बार खुफिया विभाग ने बमगोले के संदेह में घर की तलाशी तक ली। मोटे राम झूठ बोलते हो, कोई इस तरह नहीं डकार सकता चिंतामणि अच्छा तो आकर सुन लेना डर कर भाग न जाओ तो सही। एक क्षण में दोनों मित्र मोटर पर

बैठे और मोटर चली। रास्ते में पंडित चिंतामणि को शृंका हुई कि कहीं ऐसा न हो कि मैं पंडित मोटे राम का पिछला भू समझा जाऊं और मेरा यथेष्ठ सम्मान न हो। उधर पंडित मोटे राम को भी भय हुआ कि कहीं यह महाशय मेरे प्रतिद्वंद्वी न बन जाए और रानी साहिबा पर अपना रंग जमा ले। दोनों अपने अपने मंसूबे बांधने लगे। जियो ही मोटा रानी के भवन में पहुंची। दोनों महाशय उतरे। अब मोटे राम चाहते थे कि पहले मैं रानी के पास पहुँच जाऊं और कह दूं कि पंडित को ले आया और चिंता होने

चाहते थे कि पहले मैं रानी के पास पहुंचू और अपना रंग जमा दूं। दोनों कदम बढ़ाने लगे। चिंतामणि हल्के होने के कारण ज़रा आगे बढ़ गए तो पंडित मोटे राम दौड़ने लगे। चिंतामणि भी दौड़ पड़े, घुड़दौड़ सी होने लगी। मालूम होता था कि दो गैंडे भागे जा रहे हैं। अंत में मोटे राम ने हाफते हुए कहा, राज्यसभा में दौड़ते हुए जाना उचित नहीं। चिंतामणि तो तुम धीरे धीरे आओ ना। दौड़ने को कौन कहता है? मोटेरा ज़रा रुक जाओ मेरे पैर में काँटा गढ़ गया है चिंतामणि तो निकाल लो तब तक मैं चलता हूँ

मोटेरा मैं ना कहता तो रानी तुम्हें पूछती भी ना। मोटेरा ने बहुत बहाने किए पर चिंतामणि ने एक न सुना। भवन में पहुंचे रानी साहिबा। बैठी कुछ लिख रही थी और रह रह कर द्वार की ओर ताक लेती थी कि सहसा पंडित चिंतामणि उनके सामने आ खड़े हुए और यूं स्तुति करने लगे हे हे यशोदे तू बाल केशव मुरारनामा रानी क्या मतलब अपना मतलब कहो। चिंतामणि सरकार को आशीर्वाद देता हूँ। सरकार ने इस दास चिंतामणि को निमंत्रित करके कितना अनुग्रहित किया है?

उसका बखान शेष नाग भी अपनी सहस्त्र जीववा द्वारा भी नहीं कर सकते। रानी तुम्हारा ही नाम चिंतामणि है, वे कहाँ गए? पंडित मोटे राम शास्त्री चिंतामणि पीछे आ रहा है, सरकार मेरे बराबर आ सकता है भला मेरा तो शिष्य है रानी अच्छा तो वे आपके शिष्य हैं चिंतामणि मैं अपने मुँह से अपनी बड़ाई नहीं करना चाहता। सरकार विद्वानों को नम्र होना चाहिए, पर जो यथार्थ है वह तो संसार जानता है। सरकार मैं किसी से वादविवाद नहीं करता, ये मेरा अनुशीलन नहीं। मेरे शिष्य भी बहुधा मेरे गुरु बन जाते हैं पर मैं किसी से कुछ नहीं

कहता। जो सकते हैं वह सभी जानते हैं। इतने में पंडित मोटे राम भी गिरते पड़ते हांसते हुए आ पहुंचे और यह देखकर कि पंडित चिंतामणि पाद्रता और सभ्यता की मूर्ति बने खड़े हैं, वे देवोपम शांति के साथ खड़े हो गए। रानी पंडित चिंतामणि बड़े साधु प्रकृति और विद्वान हैं। आप उनके शिष्य हैं, फिर भी वे आपको अपना शिष्य नहीं कहते हैं। मोटे राम सरकार मैं इनका दासानुदास हूँ। चिंतामणि जगतारणी मैं इनका चरणलज हूँ मोटे राम रिपुदल सम्हारिणी मैं इनके द्वार का कुकर हूँ रानी आप दोनों सज्जन पूज्य हैं, एक से

एक बड़े हुए, चलिए भोजन कीजिए सोना रानी बैठी पंडित मोटे राम की राह देख रही थी। पति की इस मित्र भक्ति पर उन्हें बड़ा क्रोध आ रहा था। बड़े लड़कों के विषय में तो कोई चिंता ना थी लेकिन छोटे बच्चों के सो जाने का भय था। उन्हें किस्से कहानियों सुना सुना कर बहला रही थीं कि भंडारी ने आकर कहा महाराज चलो दोनों पंडित जी आसन पर बैठ गए। फिर क्या था? बच्चे कूदकूद कर भोजनशाला में जा पहुंचे। देखा तो दोनों पंडित दो वीरों की भांति आमने सामने डटे बैठे हैं। दोनों अपनाअपना पुरुषार्थ दिखाने

के लिए अधीर हो रहे थे। चिंतामणि भंडारी जी तुम परोसने में बड़ा विलंब करते हो, क्या भीतर जाकर सोने लगते हो भंडारी? छुपाई मारे बैठे रहो जौन कुछ होई सब आई जाई, घबराए का नहीं होत तुम्हारे सिवाय और कोई जीवैया नहीं बैठा है मोटे राम भैया भोजन करने के पहले कुछ देर सुगंध का स्वाद तो लो चिंतामणि अजी सुगंध गया चूल्हे में सुगंध देवता लोग लेते हैं, अपने लोग तो भोजन करते हैं। मोटे राम अच्छा बताओ पहले किस चीज़ पर हाथ फेरोगे चिंतामणि मैं जाता हूँ भीतर से सब चीजें एक साथ

लिए आता हूँ मोटे राम धीरज धारो भैया सब पदार्थों को आ जाने दो, ठाकुर जी का भोग तो लग जाए चिंतामणि तो बैठे क्यों हो तब तक भोग ही लगाओ? एक बाधा तो मिटे नहीं तो लाओ मैं चटपट भोग लगा दूँ, व्यर्थ देर करोगे, इतनी में रानी आ गई। चिंतामणि सावधान हो गए। रामायण की चौपाइयों का पाठ करने लगे रहा। 1 दिन अवध अधारा, समूझत मन दुख भायऊ अपहरा कौशलेश दशरथ के जाए। हम पित्त वचन मान बन आये, उलटी पलटी, लंका कभी जारी कूद पड़ा तब सिंधु मझारी जेही पर जाकर सत्य

स्नेह हूँ, सोते ही मिलना कछु संदेह हूँ। जामवंत के वचन सुहाय। सुनी हनुमान हृदय अतिभाई पंडित मोटे राम ने देखा कि चिंतामणि का रंग जमता जाता है तो वे भी अपनी विद्वता प्रकट करने को व्याकुल हो गए। बहुत दिमाग लड़ाया, पर कोई श्लोक, कोई मंत्र, कोई कविता याद नहीं आई। तब उन्होंने सीधे सीधे राम नाम का पाठ आरंभ कर दिया। राम भज राम भज राम भज रे मन राम भज राम, भज राम भज रे मन। उन्होंने इतने ऊंचे स्वर से जाप करना शुरू किया कि चिंतामणि को भी अपना स्वर ऊंचा करना पड़ा।

मोटे राम और ज़ोर से गरजने लगे। इतने में भंडारी ने कहा। महाराज अब भोग लगाये। यह सुनकर उस प्रतिस्पर्धा का अंत हुआ, भोग की तैयारी हुई, बाल वृद्ध सजग हो गया, किसी ने घंटा लिया, किसी ने घड़ियाल, किसी ने श्रम, किसी ने करताल और चिंतामणि ने आरती उठा ली। मोटे राम मन में ऐंठ कर रह गए। रानी के समीप जाने का यह अवसर उनके हाथ से निकल गया। पर यह किसे मालूम था कि विधि वाम उधर कुछ और ही कुटल क्रीड़ा कर रहा है? आरती समाप्त हो गई थी। भोजन शुरू होने को ही था कि एक कुत्ता ना जाने किधर से आ निकला

पंडित चिंतामणि के हाथ से लड्डू। थाल में गिर पड़ा। पंडित मोटे राम अचखचाकर रह गए, सर्वनाश चिंतामणि ने मोटे राम के इशारे में कहा अब क्या कहते हो मित्र कोई उपाय निकालो यहाँ तो कमर टूट गई मोटे राम ने लंबी सांस खींचकर कहा अब क्या हो सकता है?

यह ससुर आया किधर से? रानी पास ही में खड़ी थी। उन्होंने कहा, अरे कुत्ता किधर से आ गया? यह रोज़ बंधा रहता था। आज कैसे छूट गया? अब तो रसोई भ्रष्ट हो गई। चिंतामणि सरकार आचार्यों ने इस विषय में मोटे राम कोई हर्ज नहीं है। सरकार कोई हर्ज नहीं है। सोना भाग्य फूट गया, जो हत जो हत आंधी रात बीत गई तब ई विपदा फाट पड़ी चिंता मणि सरकार स्वान के मुख में अमृत मोटे राम तो अब मोटे राम तो अब आज्ञा हो तो चलें रानी हाँ और क्या मुझे बड़ा दुःख है कि इस कुत्ते ने आज इतना बड़ा अनर्थ

कर डाला। तुम बड़े गुस्सा हो गए टॉमी भंडारी ये पत्थर उठाकर मेहता को दे दे चिंतामणि सोना से छाती फट ही जाती है सोना को बालकों पर दया आई बेचारे इतनी देर देवोपम धैर्य के साथ बैठे थे, बस चलता तो कुत्तों का गला घोंट देती। बोली लड़कन का तो दोष नहीं परत है। इन्हें काहे नहीं खवाए देत को चिंता?

मणि मोटे राम महादुष्ट हैं, इसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है सोना ऐसे तो बड़े विद्वान बने रहे, अब काहे नहीं बोलत बनत मन में दही जम गया जीबें नहीं खुलत हैं। सत्य कहता हूँ रानी को चकमा दे देता उस दुष्ट के मारे सब खेल बिगड़ गया सारी अभिलाषाएं मन में रह गई ऐसे पदार्थ अब कहाँ मिल सकते हैं?

सोना सारी मन्नू से निकल गई। घर ही में गरजे कैसे रहे? रानी ने भंडारी को बुलाकर कहा इन छोटे छोटे तीन बच्चों को खिला दो, ये बिचारे क्यों भूखों मरे? क्यों फेकूराम मिठाई खाओगे फेकूराम इसीलिए तो आए हैं रानी कितनी मिठाई खाओगे फेकूराम बहुत सी हाथों से बताकर जितनी रानी अच्छी बात है, जितनी खाओगे उतनी मिलेंगे, पर जो बात मैं कहूं वह बतानी पड़ेगी। बतलाओगे ना? फेकू राम हाँ बताऊँगा, पूछिए रानी झूठ बोले तो एक मिठाई न मिलेंगे, समझ गए फेकू राम मत दीजिएगा, मैं

झूठ बोलेंगे ही नहीं रानी अपने पिता का नाम बताओ मोटे राम बालकों को हरदम सब बातें स्मरण नहीं रहती। उसने तो आते ही आते सब बता दिया था। रानी मैं फिर पूछती हूँ इसमें आपकी क्या हानि है?

चिंतामणि नाम पूछने में कोई हर्ज नहीं। मोटे राम तुम चुप रहो चिंतामणि नहीं तो ठीक ना होगा मेरे एक क्रोध को अभी तुम नहीं जानते, दबा बैठूंगा तो रोते भागोगे रानी। आप तो व्यर्थ इतना क्रोध कर रहे हैं बोलो फे कुरान चुपके हो फिर मिठाई नाम पाओगे चिंतामणि महारानी की इतनी दया दृष्टि तुम्हारे ऊपर है बता दो बेटा मोटे राम चिंतामणि जी मैं देख रहा हूँ तुम्हारे अधीन आए हैं, वह नहीं बताता तुम्हारा साजा आए वहाँ से बड़े खैरखवा बनके। सोना अरे हाँ लरकन का ईसा पवारा

से कहा मतलब तुम का धर्म परे मिठाई, देव ना धर्म परे, ना देव ई का कि बाप का नाम बताओ तब मिठाई देव फेकू राम ने धीरे से कोई नाम लिया? इस पर पंडित जी ने उसे इतनी ज़ोर से डांटा कि उसकी आंधी बात मुँह में ही रह गई रानी क्यों डांटते हो, उसे बोलने क्यों नहीं देते? बोलो बेटा मोटे राम आप हमें अपने द्वार पर बुलाकर हमारा अपमान कर रही हैं?

चिंतामणि इसमें अपमान की तो कोई बात नहीं है भाई। मोटे राम अब हम इस द्वार पर कभी न आएँगे, यह सत्पुरुषों का अपमान किया जाता है। अलगू कहिए तो मैं चिंतामणि को एक पटखन दूँ, मोटे राम नहीं बेटा दुष्टों को परमात्मा स्वयं दंड देता है। चलो यहाँ से चलें, अब भूल कर यहाँ न आएँगे। खिलना न पिलाना द्वार पर बुलाकर ब्राह्मणों का अपमान करना तभी तो देश में आग लगी हुई है चिंतामणि मोटे राम महारानी के सामने तुम्हें इतनी कटु बातें नहीं कहनी चाहिए मोटे राम बस चुप ही रहना, नहीं तो सारा क्रोध तुम्हारे ही

सिर जाएगा। माता पिता का पता नहीं। ब्राह्मण बनने चले हैं, तुम्हें कौन कहता है ब्राह्मण चिंतामणि जो कुछ मन चाहे कह लो चंद्रमा पर थूकने से थूक अपने ही मुँह पर पड़ता है। जब तुम धर्म का एक लक्षण नहीं जानते तब तुमसे क्या बातें करूँ? ब्राह्मण को धैर्य रखना चाहिए, मोटे राम पेट के गुलाम हो। ठाकुर सुहाती कर रहे हो कि एक आध पद कल मिल जाए। यहाँ मर्यादा का पालन करते हैं। चिंतामणि कह तो दिया भाई कि तुम बड़े मैं छोटा अब मैं और क्या कहूं तुम सत्य कहते होगे मैं ब्राह्मण नहीं, शुद्र हूँ रानी

ऐसा न कहिए, चिंतामणि जी ने इसका बदला न लिया तो कहना। यह कहते हुए पंडित मोटे राम बालक वृद्ध के साथ बाहर चले आए और भाग्य को कोसते हुए घर को चले बार बार पछता रहे थे कि दुष्ट चिंतामणि को क्यों गुलाल आया? सोना ने कहा, भंडा फूटट फूटट बच गया फेकुआ नाय बता देता सोना। भंडा फूटत फूटत बच गया। फेकुआ नाय बताय देता काहे रे अपने बाप के नाय बताय देते और क्या वे तो सच सच पूछती थी, मोटे राम चिंतामणि ने रंग जमा लिया, अब आनंद से भोजन करेगा। सोना तुम्हार एको विद्याकामना आई।

ऊ बाजी मार ले ही गया मोटे राम मैं तो समझता हूँ रानी ने जानबूझकर कुत्ते को बुला लिया सोना मैं तो ओकरा मुँह देखक ताड़ गई कि हमका पहचान गई इधर तो ये लोग पछताते जाते थे। उधर चिंतामणि की पांचों ऊँगली घी में थी। आसन मारे भोजन कर रहे थे। रानी अपने हाथों से मिठाइयां परोस रही थीं, वार्तालाप भी होता जाता था। रानी बड़ा धुर था। मैं बालकों को देखते ही समझ गई अपनी स्त्री को भेष बदलकर लाते उसे लज्जा न आई, चिंतामणि मुझे कोस रहे होंगे रानी। मुझसे उड़ने चला था, मैंने भी कहा

था बच्चा तुमको ऐसी ही शिक्षा दूंगी कि उम्र भर याद करोगे, टॉमी को बुला लिया। चिंतामणि सरकार की बुद्धि धन्य है तो ये तो थी कहानी मुझे आशा है आपने आनंद लिया होगा। इसे लाइक करें दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें। और सबस्क्राइब करना बिल्कुल न भूलें। तो मिलते हैं अगली रोचक कहानी में धन्यवाद।

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Suno Kahani

Suno Kahani · Stories · Hindi

कहानियाँ हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान होती हैं। आइए सुनें ऐसी मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कहानियाँ, जो हमारे व्यक्तित्व को निखारें।

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