Episode notes
In his 2018 masterpiece, How to Change Your Mind: What the New Science of Psychedelics Teaches Us About Consciousness, Dying, Addiction, Depression, and Transcendence, Michael Pollan performs a remarkable feat of cultural alchemy. He takes a subject long relegated to the fringes of "hippie" counterculture and places it firmly within the realm of rigorous science, clinical medicine, and profound philosophical inquiry. The book is structured as a "mental travelogue," blending meticulous historical research with cutting-edge neuroscience and Pollan’s own transformative experiences as a…
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हाउ टु चेंज युअर माइंड हमारा दिमाग अक्सर एक बर्फ़ के गोले जैसा होता है। एक स्नो ग्लोब जैसे इसमें पुराने दुखों की धूल जमकर बैठ जाती है। हम रोज़ वही पुरानी पगडंडी पर चलते रहते हैं जिसे डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क कहते हैं। ये किताब एक नया दरवाजा खोलने की कहानी है। हम बात करेंगे एल एस डी और सिलो साइबन की। ये चीजें दिमाग की जमी धूल झाड़ने में मदद करती हैं। इनसे हमारी दिमाग की नसें यानी न्यूरोस साइंस फिर से नया संगीत बजाती हैं। हमारा पुराना घमंड, हमारा पुराना
ईगो ही हमारा दिमाग का पिंजरा है। यह पिंजरा यह केज टूटते ही। हमें सब कुछ एक जैसा दिखने लगता है। हमें महसूस होता है कि हम और नेचर एक ही है। इससे पुरानी डिप्रेशन यानी उदासी और बुरी लत यानी एडिक्शन भी खत्म हो सकती है। यह सफर हमें जीने का एक नया नजरिया देता है। इन दवाओं। एलएसडी, सिलोसाइबिन और कुछ और जो हम बात करेंगे, इनको आजमाना खतरनाक हो सकता है। भारत में इन पर पूरी तरह पाबंदी है। ये इल्लीगल है। ये बातें सिर्फ आपकी जानकारी के लिए दी जा रही हैं एजुकेशनल पर्पस
के लिए। हैए इस बुक को अब समझने की कोशिश करते हैं। बींसवीं सदी के बीच में दो अनोखी चीजें सामने आईं। ये दवाइयाँ ये मोलेचूल बिल्कुल एटम बम जैसा धमाका थी। इनसे हमारी दुनिया और सोचने का तरीका बदल गया। लाखों लोगों ने इन्हें अपने दिमाग तक पहुंचाया। इन चीजों ने दुनिया में नई ताकत भर दी। अब सब कुछ पहले जैसा नहीं रहने वाला था। पहली चीज़ का नाम एलएसडी है। इसे हल्बर्ट हॉफमैन ने 1938 में गलती से बनाया। चखने के बाद उन्हें बहुत ताकतवर एहसास हुआ।
ये एहसास डरावना और जादुई दोनों थे। दूसरी चीज़ एक छोटा सा भूरा मशरूम है जिसे सिलोसाइबीन कहते हैं। हजारों सालों से लोग इसे भगवान का मांस कहते थे। वैसे गहरा सुकून यानी। ट्रांससेंडेंस पाने के लिए इस्तेमाल करते थे। स्पेन के पादरियों ने इसे लोगों से छुपा दिया। 1955 में एक बैंक वाले ने इसे फिर खोजा, तब दुनिया को होश यानी कॉन्शसनेस का नया मतलब मिला। इन चीजों ने हमें दिमाग की न्यूरोसाइंस समझना सिखाया। 1950 में डॉक्टरों ने इसे चमत्कारी दवा माना।
इससे डिप्रेशन और शराब की लत का इलाज शुरू हुआ। फिर 1960 के नौजवानों ने इसे अपना लिया। पर जल्द ही लोग इन दवाओं से डरने लगे। सरकार ने इन पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी। अब 1919 के बाद वैज्ञानिक इसे फिर आजमा रहे हैं। वे देख रहे हैं कि यह डिप्रेशन कैसे मिटाती है यह दवा दिमाग का पिंजरा यानी ईगो। इसको थोड़े समय के। लिए खोल देती है। हमारा पुराना घमंड हमारा ईगो शांत हो जाता है। हमें नेचर के साथ एक होने का एहसास होता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि यह बर्फ़
के गोले को हिलाने जैसा है। हमारी पुरानी और दुख देने वाली आदतें साफ हो जाती हैं। दिमाग की पुरानी पगडंडी यानी डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क बदल जाती है। हमें जीने का नया नजरिया मिलता है। कैंसर के मरीजों को जब यह दवा यानी सिलोसाइबन दी गई तो जादू हुआ। उनका मौत का डर बिल्कुल गायब हो गया। उन्हें लगा कि प्यार ही सबसे बड़ी चीज़ है। उन्हें एक अंदरूनी एक। स्पिरिचुअल ताकत महसूस हुई। अब हम समझ रहे हैं कि दिमाग के अंदर एक और दरवाजा है। हमें बस उसे खोलने की हिम्मत
चाहिए। मुझे कभी यकीन नहीं था कि मुझे कोई स्पिरिचुअल एहसास होगा। मुझे इन बातों पर हमेशा शक रहता था। पर 2006 की एक खबर ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। लोगों ने ऐसी दुनिया देखी जहाँ दुनिया के कायदे नहीं चलते उन्हें वहाँ ट्रांससेंडेंस मिला। उन्हें लगा कि वह सब सवस्थ है। मैं हमेशा से विज्ञान की बातों पर यकीन करता था। मेरे लिए सिर्फ मैटर ही सच था। पर क्या एक दवा से सोच बदल सकती है?
क्या इससे मौत का डर कम हो सकता है? मुझे लगा जैसे मेरे दिमाग में एक नया दरवाज़ा है, मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। इंसान हमेशा से अपना होश यानी कन्सीसनेस बदलना चाहता है। दुनिया भर में लोग इसके लिए प्लांट्स इस्तेमाल करते हैं, बूटियां इस्तेमाल करते हैं। ये बूटियां हमें स्पिरिचुअल पीस देती हैं। ये हमारे दिमाग के घाव भरने का काम करती हैं। इनसे हमें नई दुनिया के सपने दिखते हैं। लोग इन दवाओं से इन साइक्डेलिक्स से बहुत डरते हैं पर ये उतनी
जानलेवा नहीं है। इनसे मरना लगभग नामुमकिन है। इनकी लत यानी एडिक्शन भी नहीं लगती। हाँ, कभी कभी बैड ट्रिप यानी बुरा तजुर्बा डरा सकता है पर सही माहौल में सब ठीक रहता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि यह बर्फ़ के गोले को हिलाने जैसा है। हमारी पुरानी आदतें हमें एक ही ढर्रे पर चलाती हैं। हम आज में जीना भूल जाते हैं। हमारा दिमाग बस आने वाले कल की चिंता करता है। यह दवा दिमाग की जमी धूल झाड़ देती है। हमारा पुराना घमंड, हमारा ईगो हमारे दिमाग का पिंजरा है।
यह पिंजरा हमें दूसरों से अलग रखता है, पर ये दवाइयां इस पिंजरे को खोल देती हैं। हमें सब कुछ एक जैसा दिखने लगता है। हमें नेचर से जुड़ाव महसूस होता है। दिमाग में एक बंद दरवाजा है एलएसडी और सिलोसाइबीन उस दरवाजे की चाबी है। बड़े लोगों ने भी इन अलग रास्तों की बात की है। इन डिफरेंट फॉर्म्स ऑफ़ कन्सीसनेस की हमें बस अपनी आँखें खोलकर देखना है। अब हम इस नई दुनिया को समझने के लिए तैयार हैं। 2006 वह साल था जब दिमागी दुनिया की जमी हुई बर्फ़ पिघलने लगी। उस साल तीन ऐसी बातें हुईं जिनसे
सब कुछ बदल गया। स्विट्जरलैंड, अमेरिका और बाल्टीमोर में कुछ नया शुरू हो रहा था। पहली बड़ी बात स्विट्जरलैंड में हुई। वहाँ अल्बर्ट हॉफमैन का सौवां जन्मदिन मनाया जा रहा था। हॉफमैन वही वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1943 में एलएसडी दवा खोजी थी। वे 100 साल की उम्र में भी बहुत तंदरुस्त थे। हॉफमन ने अपनी पुरानी कहानी फिर से सुनाई। 1938 में वे एक जंगली घास की फफूंद पर काम कर रहे थे। इरगट पे?
उन्होंने एक नया नुस्खा बनाया जिसे एल एस डी 25 दवा नाम दिया। शुरू में यह कुछ खास नहीं लगी तो इसे अलमारी में रख दिया। 5 साल बाद 1943 में उन्हें अचानक एक एहसास हुआ। उन्हें लगा कि इस दवा को फिर से देखना चाहिए। जब वे इसे दोबारा बना रहे थे तो थोड़ी सी दवा उनकी खाल के जरिए अंदर चली गई। उन्हें अजीब समय अहसोस होने लगा। वे घर गए और आँखें बंद करके लेट गए। उन्हें शानदार रंग और। फॉर्म्स दिखने लगी। यह दुनिया का पहला ट्रिप था। कुछ दिन बाद उन्होंने खुद पर एक
एक्स्पेरमेन्ट किया। एक प्रयोग उन्होंने बहुत मामूली सी दवा पानी में पी ली। उन्हें लगा कि वे पागल हो रहे हैं। वे सैकल चलाकर घर पहुंचे। आज भी लोग इसे साइकिल दिवस यानी बाइसाइकल डे कहते हैं। उस समय उन्हें बहुत डर लगा। उनका दिमाग का पिंजरा उनका ईगो पूरी तरह टूट चुका था, लेकिन अगले दिन उन्हें एक अनोखी चमक महसूस हुई। एक आफ्टर ग्लो उन्हें लगाया जैसे दुनिया अभी अभी नई बनी हो। दूसरी बड़ी बात अमेरिका की सबसे बड़ी अदालत में हुई अदालत ने एक छोटे से धार्मिक ग्रुप को एक खास
चाय इस्तेमाल करने की इजाजत दी। आयोवास्का की इस चाय में खास चीज़ यानी डीएम टी होती है। अदालत ने कहा कि धर्म की आजादी के लिए यह जरूरी है। इससे इन दवाओं के लिए एक नया रास्ता खुला। तीसरी और सबसे बड़ी बात वैज्ञानिक रोलैंड ग्रिफिथ्स की रिपोर्ट थी। उन्होंने साबित किया कि मशरूम वाली दवा यानी सिलोसाइबीन से गहरा सुकून यानी ट्रांससेंडेंस मिल सकता है। उन्होंने कई लोगों पर ये एक्स्पेरमेन्ट किया। इन लोगों ने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे जरूरी एक्सपीरियंस था। उन्होंने दिखाया कि यह दवा सिर्फ
नशा नहीं है। यह बर्फ़ के गोले को हिलाने जैसा काम करती है। इससे हमारे दिमाग की जमी हुई धूल साफ हो जाती है। दिमाग की पुरानी पगडंडी बदल जाती है। इससे इंसान को जीने का नया नजरिया मिलता है। यह पुरानी डिप्रेशन और डर का इलाज करने का एक नया रास्ता है। रोल एंड ग्रिफिस एक बहुत संजीदा वैज्ञानिक थे। वे लंबे और दुबले पतले थे। उनके बाल सफेद और बहुत घने थे। वे अपनी बातों को बहुत सलीके से कहते थे। वे पहले सिर्फ बाहर के बर्ताव यानी बिहेव्यरिज्म को सच मानते थे।
वे पढ़ते थे कि हमें नशे की लत क्यों लगती है? उन्होंने चाय, कॉफी की लत यानी कैफीन विथड्रावल पर बहुत काम किया। वे अपने काम में सबसे माहिर माने जाते थे। फिर 19194 में उनकी जिंदगी बदल गई। उन्होंने योग और मेडिटेशन करना शुरू किया। उन्हें मेडिटेशन में एक अनोखा एहसास हुआ। एक अविकनिंग उन्हें लगा कि दुनिया बस, हड्डी, मांस का ढांचा नहीं है। उन्हें कुछ बहुत गहरा और स्पिरिचुअल महसूस हुआ। उन्हें लगा कि न्यूरो साइंस दिमाग की नसे सब कुछ नहीं बताती।
होश और समझ यानी कोन्सेस्नेस एक बहुत बड़ा रहस्य है। वे इस पहेली को विज्ञान से सुलझाना चाहते थे। फिर उनकी मुलाकात बाब जैसी से हुई। बाब जैसी एक कंप्यूटर इंजीनियर थे। वे बहुत चुपचाप रहकर काम करते थे। उन्होंने एक बार एल एस डी ली। उस समय उनका दिमाग का पीछा पूरी तरह टूट गया। उन्हें पूरी दुनिया का जन्म होता हुआ दिखा। उन्हें लगा कि वे इस पूरी कुदरत का हिस्सा हैं। उन्हें एक नॉन डुअल एक्सपीरियंस मिला। एक गहरा सुकून। उन्हें समझ आया कि प्यार ही सबसे
बड़ा सच है। उन्होंने ठान लिया कि वे इस दवा को फिर से दुनिया के सामने लाएंगे। रिक डॉब्लिन भी उनके एक खास साथी थे। रिक के चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान रहती है। वे सालों से सरकार को मनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि ये दवाइयां सबको। नया नजरिया न्यू पर्सपेक्टिव दें। बॉब जसी ने जब पहली बार सफर किया तो उनकी ज़िन्दगी बदल गई। वे सैन फ्रांसिस्को में नाच गाने वाली महफिलों में जाने लगे। वहाँ उन्हें लगा कि हम सब एक हैं। उन्होंने मेडिटेशन सीखा।
उन्हें लगा कि कंप्यूटर बनाने से ज्यादा जरूरी इंसानी रूह को समझना है। उन्होंने अपनी पुरानी नौकरी छोड़ दी। उन्होंने एक खास संस्था बनाई सी एस पी। उनका मकसद था कि आम लोग भी सेक्रेड एक्सपीरियंस पा सकें। इस। इस स्पिरिचुअल सुकून को उन्होंने पुरानी फाइलें से धूल झाड़ी। उन्हें पता चला कि पुराने वक्त में हजारों लोगों पर एक्स्पेरमेन्ट हुए थे। इनसे शराब की लत और डिप्रेशन का इलाज होता था। वह आप चाहते थे कि ये दवाइयां सिर्फ बीमारों के लिए ना हो। वे चाहते थे कि अच्छे खासे लोग
भी। अपने सोच बेहतर कर सके। उन्होंने पुराने गुड फ्राइडे वाले एक्सपेरिमेंट्स को पढ़ा। उसमें कुछ स्टूडेंट्स को सिलोसायबीन दी गई थी। उन्हें ऐसा लगा जैसे वे सीधे भगवान से मिल रहे हो। कैलिफोर्निया में एक जगह है इस। यहाँ पुरानी जानकारीयों को संभालकर रखा गया था। यहाँ स्टेंसिलोव ग्रोफ जैसे एक्सपर्ट थे। वे मानते थे कि दवाइयां दिमाग को समझने का सबसे बड़ा औजार है। बॉब जैसी ने 19196 में वहाँ एक बड़ी बैठक बुलाई। वहाँ उन्होंने बॉब शूटर को
बुलाया। शूटर सरकार के बड़े अधिकारी रह चूके थे। शूटर ने सलाह दी कि एलएसडी को छोड़कर सिलोसाइबिन पर काम करें। सिलोसाइबिन का नाम उतना खराब नहीं था। सूस्टर ने ही बॉब जेसी को रोलन्ड ग्रिफिथ से मिलवाया। वैज्ञानिक की टीम में एक खास कमी थी। उन्हें एक बहुत माहिर एक्स्पर्ट की जरूरत थी। बिल रिचर्ड्स वह माहिर उस्ताद थे। उन्होंने 1977 में आखिरी बार यह दवा दी थी। उसके बाद वे बस सही वक्त का इंतजार करते रहे। बिल बहुत ही खुशमिजाज़ इंसान हैं। वे पुराने और नए दौर के बीच एक
पुल की तरह हैं। वे कहते हैं कि ये दवाइयां हजारों साल पुरानी हैं। कई बार इन्हें लोगों से छुपाया गया, पर मशरूम अब भी उगता है। अंत में सच सामने आना ही था। बिल्ड 1963 में पहली बार सिलोसाइमन ली। उन्हें लगा जैसे उनके अंदर का दिमाग का पिंजरा खुल गया है। उन्हें हर तरफ बस प्यार और शांति दिखे, इसे ट्रांससेंडेंस कहते हैं। इस एहसास को बयां करना बहुत मुश्किल है। बिल कहते हैं कि यह ऐसा है जैसे कोई गुफा में रहने वाला आदमी अचानक शहर पहुँच जाए।
उसे सब कुछ बड़ा और चमकदार लगता है, पर उसके पास बताने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। बिल ने मेरीलैंड के एक अस्पताल में बहुत काम किया। वहाँ उन्होंने शराब की लत और डिप्रेशन का इलाज किया। 1960 के दौर में लोग इस काम को फ्यूचर मानते थे। वे हजारों डॉक्टरों को यह सब सीखाना चाहते थे, पर फिर राजनीति ने सब खराब कर दिया। राष्ट्रपति निक्सन ने इसे खतरनाक कह दिया। सरकार ने न्यूरोसाइंस वाले इस रिसर्च को बंद कर दिया। सारा ज्ञान फाइलें में दबा दिया गया।
फिर 19198 में बिल को एक फ़ोन आया। रोलन्ड और बॉब इस काम को फिर शुरू करना चाहते थे। 22 साल बाद फिर से रिसर्च शुरू हुई। यह दिमाग का नया जन्म जैसा था। बिल अब तक 100 से ज्यादा लोगों को यह सफर या जर्नी करा चूके हैं। अजलेफ का कमरा किसी घर जैसा लगता है। वहाँ स्पिरिचुअल आर्टिफैक्ट और बुद्ध की मूरत है। जब कोई वहाँ रोता है तो वो दुख के आंसू नहीं होते। वो उस गहरे सुकून उस सेक्रेडनेस के आंसू होते हैं जिसे हम सब ढूंढ रहे हैं। 19199 की बात है अखबारों में एक अनोखा।
अड्वर्टाइज़्मन्ट छपा लिखा था। क्या आप इस स्पिरिचुअल लाइफ की तलाश में हैं? यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक ने फिर से प्लांट्स पर काम शुरू किया। बिल और मेरी ने 22 साल बाद पहली बार किसी को यह दवा दी। हजारों लोग आए, पढ़े लिखे लोग साधु और बीमार भी। सब देखना चाहते थे कि होश यानी कॉन्सेस्नेस की गहराई क्या है? वैज्ञानिक ने सबको बहुत ध्यान से तैयार किया। सफर शुरू होने से पहले 8 घंटे तक बातचीत हुई। इसे उड़ान के यानी फ्लाइट इंस्ट्रक्शंस कहा गया। गाइड कहते थे बस।
बहाव पर भरोसा रखो, ट्रस्ट दी ट्रेजेक्टरी भरोसा रखो, खुद को छोड़ दो और खुले रहो। अगर सामने कोई बंद दरवाजा दिखे तो उसे खोल दो। अगर मौत का डर लगे तो घबराओ मत, बस मर जाओ। ये सब एक गहरे सुकून की तैयारी थी एक मिस्टिकल एक्सपीरियंस की। ब्रायन नाम के एक आदमी ने अपना सफर बताया, उसे लगा उसका शरीर पिघल रहा है। सिर्फ उसके जबड़े का एक हिस्सा बचा था। वह डरा नहीं बल्कि उसे सब कुछ जादुई लगने लगा। उसने अपनी जिंदगी के पुराने रिश्तों को बर्फ़ की तरह देखा।
उसे समझ आया कि हर इंसान ने उसे कुछ सिखाया है। एमी को लगा उसे स्टेज पर फांसी दी जा रही है। उसे बहुत ज्यादा गलती का अहसास हो रहा था। गिल्ट का? पर जैसे ही उसने अपने गाइड को यह बात बताई, डर भाग गया। उसे लगा वह एक परिंदे पर बैठकर दुनिया की सैर कर रही है। उसे नेचर और लोगों के साथ एक गहरा जुड़ाव महसूस हुआ। रिचर्ड ने एक बहुत बड़ी बात सीखी। उसे लगा उसका पुराना घमंड पिघल रहा है। हमारा घमंड ही असल में हमारे दिमाग का पिंजरा है। जब ये पिंजरा टूटता है तो हमें होश की नई समझ मिलती है।
रिचर्ड को लगा जैसे वह ऊपर वाले की गोद में हो। उसे बस एक ही सच नजर आया कि प्यार ही सबसे बड़ी ताकत है। मैंने उन लोगों से बात की जिन्होंने यह दबा ली थी। मेरे मन में बहुत से सवाल थे, क्या उनके सपने और एहसासच थे?
ये दिमाग की फ़िल्म में ये? इंट्रा साइकिक मूवीज़ कहाँ से आती है? क्या ये अंदर से आती है या कहीं बाहर से? रोलैंड ग्रिफिस भी पहले बहुत हैरान थे पर उन्होंने देखा कि इसमें कुछ गहरा मतलब छिपा है। ये सिर्फ मामूली नशे का असर नहीं है। उनका होश पूरी तरह बदल गया था। कुछ डॉक्टर इसे बस दिमाग की खराबी कहते हैं। डिलीरियम पर जिन्हें यह एहसास हुआ वे इसे सबसे बड़ा सच मानते हैं। यह दवा दिमाग का पिंजरा खोल देती है। दिमाग की पुरानी आदतें और जमी धूल
साफ हो जाती हैं। रोलेंडब मौत को एक बड़ी पहेली मानते हैं। शायद मौत खत्म होना नहीं एक नई शुरुआत हो। वे अब विज्ञान और स्पिरिचुअलिटी को साथ ला रहे हैं। रोलन्ड को अब मौत से डर नहीं लगता हस्टन स्मिथ ने इसे नेचर से दोबारा जुड़ना कहा। यह सुनकर रोलन्ड के चेहरे पर एक प्यारी मुस्कान आ गई। वैज्ञानिक रोलैंड ग्रिफिथ से मेरी मुलाकात खत्म हो रही थी। वे अपनी मेस से उठे और जेब से एक सिक्का निकाला। उन्होंने मुझसे एक सवाल पूछा, क्या आप जानते हैं कि आप होश में
हैं? मैंने हाँ कहा और उन्होंने मुझे वो सिक्का दे दिया उस पर। स्लोसाइबिन क्यूबेंसिस बनी हुई थी। सिक्के पर लिखा था एक्सपेरिमेंट यह असल जानकारी है। यह सिक्का एक मशरूम की याद दिलाता है। अवैज्ञानिक लैब में बनी दवा सिंथेटिक स्लोसाइबिन इस्तेमाल करते हैं। पर्सन में यह चीज़ नेचर से एक मशरूम से आती है। मेक्सिको के लोग इसे हजारों सालों से इस्तेमाल कर रहे थे। वे इसे भगवान का मानस मानते थे। हॉस्पिटल के साफ कमरों में हम यह बात भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि यह एक जंगली
फफूंद है, एक फंगस है। मशरूम ये चेमिकल्स क्यों बनाते हैं? ये चेमिकल्स हमारे सरोटोनिंग जैसे होते हैं। ये हमारे दिमाग के अंदर तक पहुँच जाते हैं। क्या ये मशरूम खुद को बचाने के लिए ऐसा करते हैं? शायद वे हमारा होश हमारा कान्शस्नस बदलना चाहते हैं। कुछ लोग इसे सिर्फ हैलूसिनेशन मानते हैं। दिमाग का धोखा पर कई लोगों को इससे गहरा सुकून मिलता है। उन्हें एग्ज़िस्टन्स यानी होने का एहसास समझ आता है। वे दिमाग के पिंजरे से बाहर निकल जाते हैं। इस बारे में पॉल एस्टामेट सबसे
ज्यादा मानते हैं। वे वाशिंगटन के एक मशरूम गाइड हैं। माइकोलॉजिस्ट वे सिर पर मशरूम से बनी एक टोपी पहनते हैं। उनका कहना है कि मशरूम नेचर का संदेश लेकर आते हैं। वे मानते हैं कि मशरूम दुनिया की हर मुश्किल सुलझा सकते हैं। मशरूम जमीन को साफ कर सकते हैं। वे तेल की गंदगी खाकर उसे खाना बना देते हैं। वे कैंसर का इलाज करने में मदद कर सकते हैं। वे मधुमक्खियों की बीमारियां ठीक कर सकते हैं। मशरूम की जड़ें जमीन के नीचे एक जाल बिछाती हैं। यह अर्थ नेचुरल इंटरनेट यह कुदरत के इंटरनेट जैसा है।
इसे जंगल के सारे पेड़ आपस में बात करते हैं। यह जाल पूरे जंगल को एक साथ जोड़कर रखता है। स्टामर्ड्स मानते हैं कि मशरूम हमारा दिमाग बदल सकते हैं। पॉल स्टामर्ड से मिलकर मेरी आँखें खुल गई। वे वाशिंगटन में रहते हैं और मशरूम के गाइड हैं। एक्स्पर्ट। उन्हें श्रोम्स जैसा हल्का शब्द बिल्कुल पसंद नहीं है। वैसे दिमाग की दवा की तरह देखते हैं। ये सिलोसाइबिन अजीब जगहों पर उगती है। जहाँ बाढ़ है या पेड़ कटे वहाँ ये मिल जाते हैं। ये इंसानों की बस्तियों के पास
रहना पसंद करते हैं। यहाँ तक कि ये पुलिस स्टेशन के बाहर भी उगाते हैं। इन छोटे भूरे मशरूम को पहचानना बहुत कठिन है। कुछ मशरूम्स इतने जहरीले होते हैं कि जान ले सकते हैं। पॉल ने मुझे एक पक्का नियम सिखाया। अगर मसलने पर मशरूम नीला पड़ जाए तो समझो इसमें दवा है। पॉल का घर बहुत बड़ा और लकड़ी का बना है। उन्होंने एक ऐसी बूटी खोजी कॉर्डिसिप्स जो चींटियों को मारती है, उसी खोज के पैसे से उन्होंने यह घर बनाया। उनके घर में मशरूम वाली पुरानी
मूर्तियां रखी हैं। वे मानती हैं कि बंदरों ने ये मशरूम खाये। थे। उसी से बंदरों का दिमाग तेज हुआ और वे इंसान बने। इसे नशे वाले बंदर का सिद्धांत यानी स्टोन्ड ऐप थ्योरी कहते हैं। इस बात ने मेरे दिमाग की पुरानी पगडंडी यानी डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क को हिला दिया। पॉल ने मुझे अपनी एक पुरानी कहानी सुनाई। वे बचपन में एक बहुत। हकलाते थे। एक स्टटर थे और बहुत डरते थे। 1 दिन उन्होंने मशरूम की बहुत भारी खुराक ली। वे जंगल में एक ऊंचे ओक के पेड़ पर चढ़ गए तभी जोरदार बारिश और
बिजली कड़कने लगी। पॉल डर के मारे पेड़ से चिपके रहे। उन्होंने अपने दिमाग में बार बार चिल्लाकर कहा। हकलाना बंद करो, यह उनके दिमाग के जमे धूल झाड़ने जैसा था। अगले दिन जब वे पेड़ से उतरे, जादू हो गया। उनका हकलाना पूरी तरह से गायब हो चुका था। उन्होंने पहली बार एक लड़की से बिना डरे बात की। यह उनके दिमाग का नया जन्म था। पॉलिएस्टामर्स बहुत कम उम्र में मशरूम के गाइड बन गए। 1978 में उन्होंने अपनी पहली किताब लिखी। उन्होंने बताया कि इंसान और मशरूम पुराने साथी हैं।
पॉल ने वाशिंगटन के एक कॉलेज में इसकी गहराई से पढ़ाई की। उनके साथ कुछ और दोस्त भी इस खोज में जुट गए। इन दोस्तों ने मशरूम की नई नई किस्में खोजी। उस समय लोग सीलोसाइबीन के बारे में कम जानते थे। पॉल ने देखा कि लोग खेतों में मशरूम ढूंढ़ते थे, वे झुक कर चलते थे, जिसे मशरूम वाली चाल यानी सीलोसाइबीन कहा गया। पॉल ने मशरूम पर बड़े बड़े कार्यक्रम शुरू किए। 19199 में एक बहुत बड़ी सभा हुई। वहाँ बड़े बड़े वैज्ञानिक एक रंगीन बस में आए। वहाँ लोगों ने रूहानी प्लांट्स
यानी एथनोजन पर बात की। कुछ लोग मशरूम और भालू के कपड़े पहनकर नाच रहे थे। ये सब बहुत ही जादुई और अनोखा था। पॉल के पास 1957 की एक पुरानी मैगज़ीन भी थी। 1957 में एक बड़े बैंक वाले ने सबको चौंका दिया। उनका नाम था आर गार्डन वौसन। उन्होंने एक मैगज़ीन में अपनी कहानी लिखी। वहीं से जादुई मशरूम नाम मशहूर हुआ। वासन ने बताया कि वे मेक्सिको के पहाड़ों में गए थे। वहाँ उन्होंने पहली बार यह बूटी यह सिलो साइबन चखी थी। वासन की पत्नी को मशरूम से बहुत
प्यार था, पर वासन शुरू में मशरूम से बहुत डरते थे। वैसे गंदी और खतरनाक चीज़ मानते थे। फिर उन्होंने सोचा कि कुछ लोग मशरूम से क्यों डरते हैं? शायद पुराने जमाने में लोग मशरूम की पूजा करते थे। वे इसकी तलाश में मेक्सिको पहुँच गए। वहाँ उन्हें एक बूढ़ी गाइड कुरैंडेरा मिली। उनका नाम मारिया सबीना था। सबीना ने उन्हें मशरूम का सेक्रीमेंट एक स्पिरिचुअल तोहफा दिया। वासन को वहाँ बहुत ही सुंदर नजारे दिखे। उन्हें लगा जैसे वे सच को देख रहे हैं।
स्पेन के हमलावर इस पुरानी रस्म इस एनशिएंट रिचुअल को मिटाना चाहते थे। चर्च को लगता था कि यह शैतान का काम है। वे इन मशरूम वाले मूर्तियों को तोड़ देते थे पर स्थानीय लोग इसे भगवान का मांस कहते थे। चर्च चाहता था कि लोग सिर्फ उनकी बात माने। वे ऊपर नीचे का फर्क यानी हाइरार्की बनाए रखना चाहते थे, पर मशरूम तो सीधे। होश यानी कान्शस्नस का दरवाजा खोल देता था। इसे खाने के बाद किसी बिचौलिए की जरूरत नहीं थी। किसी मिडिलमैन की यह इंसान को सीधे नेचर से जोड़ देता था। यह दिमाग का पिंजरा तोड़कर आजादी
देता था। इसलिए बड़े बड़े संस्थान इस बूटी को इस। सिल्वोसाइबन से डरते थे। वे नहीं चाहते थे कि इंसान इतना आजाद महसूस करे। 1955 की एक रात गॉडन वासन ने पहली बार वो पवित्र मशरुम चखा। उसने मारिया सबीना नाम की एक बूढ़ी गाइड को मनाया। सबीना अपने गांव में लोगों को हीलिंग करती थी, रूहानी इलाज करती थी। रात के अंधेरे में एक छोटे से कमरे में वह ट्रिप व सफर शुरू हुआ। वासन ने मशरूम को छोटे बच्चे कहा, स्वाद बहुत खराब था, मगर असर बहुत जादुई। वसन को अपनी आँखों के सामने
शानदार रंग और महल दिखने लगे। उसे लगा जैसे उसकी आँखों से पर्दा हट गया हो। वह दुनिया को साफ देख पा रहा था। उसे लगा जैसे वह ऊपर वाले की गोद में हो। यह उसके दिमाग का पिंजरा खुलने जैसा था। उसे यकीन हो गया कि भगवान का ख्याल शायद। इन्हीं मशरूमों से आया होगा। मगर मारिया सबीना के लिए यह कोई तमाशा नहीं था। उसके लिए यह मशरूम सिर्फ बीमारों को ठीक करने का जरिया थे। जब वासन की कहानी अखबारों में छपी तो दुनिया भर से लोग वहाँ पहुंचने लगे। इससे गांव की शांति छीन गई। क्नॉइस सबीना का घर जला दिया गया
और उसे जेल हुई। उसे बहुत दुख था कि बाहर वालों ने पवित्र बच्चों की ताकत खराब कर दी। अगली सुबह मेरी मुलाकात पॉल एस्टेमेट से हुई। उनके पास पत्थर की पुरानी मूर्तियां थीं। ये हजारों साल पुरानी है। पॉल मानती हैं कि मशरूम ने ही इंसान को इंसान बनाया। एक मशहूर ख्याल है जो पुराने जमाने के बंदरों ने ये मशरूम खाये थे। इससे उनके दिमाग की पुरानी धूल झाड़ दी। उनके सोचने का तरीका बदला और वे इंसान बन गए। पॉल और मैं जंगल में मशरूम ढूँढने निकले।
दिसंबर की ठंड थी। और जगह बहुत सुन सा काफी ढूंढने के बाद हमें अजी यानी सिलोसाइबी एसुरिकेन्स नाम का मशरूम मिला। पॉल ने कहा, इसे थोड़ा मसलों जैसे ही मैंने उसे छुआ वह नीला पड़ गया। यह नीला रंग ही उस दवा उस सिलोसिन की असली पहचान है। पौल ने मुझे चेतावनी दी कि ये मशरूम बहुत तेज होते हैं। इन्हें खाने के बाद कुछ लोग हिल डुल भी नहीं पाते, टेंपररी पैरालायसिस हो जाता है। यह दिमाग के पिंजरे को पूरी तरह तोड़ देता है। हमें बस इस बदलाव के लिए इस चेंज के लिए तैयार रहना चाहिए।
हम सब इसी नेचर का हिस्सा हैं। यही दिमाग का नया जन्म है। आखिर ये मशरूम ऐसी दवा क्यों बनाते हैं? क्या ये हमें कुछ खास बताना चाहते हैं? पॉलिस्टामर्स के गाइड माइकल ब्यूग ने इसका जवाब दिया। आमतौर पर पौधे खुद को बचाने के लिए जहर बनाते हैं। पर मशरूम अपनी दवा उस हिस्से में रखते हैं जिसे जानवर खाते हैं। शायद जानवरों को इसका नशा पसंद आता है। वे इसे खाते हैं और इसके बीज दूर दूर तक फैला देते हैं। हल्की खुराक में जानवरों को और भी चौकन्ना बना देती है।
इससे उनकी शिकार करने की ताकत बढ़ जाती है। एक किताबी वैज्ञानिक का कहना है कि यह बदलाव यह डी पैटरनिंग की चाबी है। जब दुनिया में कोई बड़ी मुसीबत आती है तो पुराने रास्ते काम नहीं आते तब कुछ लोगों को नया नजरिया नया पर्सपेक्टिव चाहिए होता है। मशरूम हमारे दिमाग की जमे धूल झाड़ने में मदद करते हैं। पॉलिस्टमैट मानते हैं कि मशरूम में अपनी समझ होती है अपनी इंटेलिजेंस। वे हमें नेचर का संदेश देने वाले डाकिया जैसे हैं। वे चाहते हैं कि हम इस धरती का ख्याल रखें।
इंसान और मशरूम एक ही धागे से जुड़े हैं एक ही मॉलीक्यूलर मैट्रिक्स से। हम सब इसी नेचर का हिस्सा हैं। मशरूम की दवाई इस पिंजरे को खोलकर हमें आजाद कर देती है। तब हमें समझ आता है कि हम सब एक हैं। पुराने जमाने के वैज्ञानिक नेचर को दोस्त मानते थे। वे उसे सिर्फ मशीनों से नहीं, अपनी स्पिरिट से देखते थे। वे पौधों और मशरूम की नजरों से दुनिया को समझते थे। आज का विज्ञान नेचर को सिर्फ एक चीज़ एक ऑब्जेक्ट मानता है, पर हमें फिर से उस पुराने और गहरे जुड़ाव की जरूरत है।
शहर की मक्खियां भी मशरूम खाकर अपनी बिमारी ठीक करती हैं। नेचर में हर तरफ। ऐसी जादुई कहानियों छिपी हैं। हमें बस थोड़ा रुक कर उन्हें सुनने की जरूरत है। कई महीने बाद मैंने और जूडिथ ने वे मशरूम खाये, हमने उनकी चाय बना कर पी। शुरू में जूडिथ को घबराहट होने लगी, उसे लगा उसका दिमाग शरीर से अलग हो रहा है। वह घर जाकर सुरक्षित महसूस करना चाहती थी। मैं बगीचे में बैठ गया, वहाँ की आवाजें अचानक बहुत तेज हो गई। चिड़ियों की चहचहाहट किसी बड़े संगीत जैसी थी।
मैंने आँखें बंद की तो जादुई नजारे दिखे। फ्रैक्टल मुझे लगा जैसे मैं यह सब संभालना सीख रहा हूँ, मैं अपने पुराने लिखने वाले कमरे में गया, वह खिड़की के बाहर हरी पत्तियाँ चमक रही थी, मुझे लगा वे पत्तियाँ मुझे देख रही हैं उनमें एक अंदरूनी एक स्पिरिचुअल जान में असोस हुई। पहली बार मैंने पौधों से सीधा बात की। वहाँ दो बड़े और पुराने पेड़ खड़े थे। मुझे लगा वे मेरे माँ बाप हैं। मुझे उनकी बहुत याद आई। मेरा दिल सबके लिए प्यार से भर गया। उस समय दिमाग का पिंजरा पूरी तरह खुल गया था।
मुझे लगा कि मैं और नेचर एक ही है। मेरे दिमाग की पुरानी और जमी हुई धूल शायद साफ हो गई। मुझे जीने का एक नया नजरिया मिल गया। ये कोई जादू या चमत्कार नहीं था, बस दुनिया को देखने का एक नया रास्ता था। हमारा पुराना घमंड कुछ देर के लिए शांत हो गया था, अब मुझे होने का एहसास एग्ज़िस्टन्स समझ आने लगा था अब मैं अपनी जिंदगी को फिर से शुरू करने के लिए तैयार था। मेरा होश मेरा कान्शस्नस अब पहले जैसा नहीं रहा मैंने अपनी। इस स्पिरिट के दरवाजे फिर से खोल दिए थे।
1960 के दशक में पुलिस तिमोथी लेरी के पीछे पड़ गई। उसे जेल की सजा सुनाई गई। लेरी ने एक जानकार दोस्त मार्शल मैक्लफॉन से सलाह मांगी। उन दिनों लोग एल एस डी के नाम से बहुत डरते थे। लेरी नौजवानों से कहते थे कि पुरानी बातें छोड़ो और दिमाग की नई खिड़की खोलो। सरकार और घरवाले इस बात से बहुत घबराए हुए थे। मैकलोड ने कहा कि अदालत की बातें छोड़ो, अपनी चमक दिखाओ, जब भी फोटो खींचें तो मुस्कुराओ। डरो मत बहादुर बनो लेरी ने यह बात गांठ बांध ली। वह जहाँ भी गया अदालत हो या जेल
हमेशा उसके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान रहती थी। अमेरिका में लेरी का नाम ही सब कुछ बन गया प्रसलियत कुछ और थी लेरी से बहुत पहले भी लोग इन दवाओं पर काम कर रहे थे। लेरी ने बस अपनी कहानी को इतना बड़ा बना दिया कि बाकी सब छुप गया। लेरी से पहले भी बहुत से गाइड और डॉक्टर थे। वे चुपचाप अपना काम कर रहे थे और लोगों को ठीक कर रहे थे। लेरी के हंगामे ने इन सब की मेहनत पर पानी फेर दिया। 1919 के दशक में स्टीफन रॉस जैसे डॉक्टरों ने इस पुरानी तिजोरी को फिर से खोला।
उन्हें पता चला कि 1950 के दौर में हजारों लोगों पर एक्स्पेरमेन्ट हुए थे। एलएसडी को तब जादुई दवा माना जाता था, पर जब लेरी का हंगामा बढ़ा। तो डॉक्टरों ने इस बारे में बात करना ही बंद कर दिया। स्कूलों में यह सब पढ़ाना बंद हो गया। शुरू में डॉक्टरों को लगा कि यह दवा पागलपन जैसी होती है। पर अल्बर्ट हॉफमन ने जब 1943 में इसे चखा तो उन्हें कुछ गहरा एहसास हुआ। उन्हें लगा कि यह पागलपन नहीं बल्कि दिमाग की नई समझ है। ये दवाइयां वैसे ही असर करती हैं जैसे आप सोचते हैं अगर आप को
बताया जाए कि ट्रांससेंडेंस मिलेगा तो वैसा ही होता है। एलडेस हक्ज़ल की किताब ने सबको यही सिखाया। उन्होंने दिखाया कि कैसे ये दवाइयां दिमाग का पिंजरा खोल देती हैं। हमारा पुराना घमंड शांत हो जाता है। वैज्ञानिक के लिए ये एक बड़ी पहेली थी। यह दवा विज्ञान से ज्यादा स्पिरिचुअल पीस की तरफ काम करती थी। शुरू में इन दवाओं को साइकेडेलिक नहीं कहते थे। डॉक्टर इसका नाम रखने में बहुत उलझे हुए थे। क्नॉइस 1950 में से पागलपन की नकल यानी साइकोटोमीमैटिक कहा गया।
उन दिनों डॉक्टरों को लगता था ये दवा पागल कर देती है। हम फ्रीआसमंद एक बड़े गाइड थे, बड़े जानकार थे। उन्होंने खुद एल एस डी खाकर देखी। वे देखना चाहते थे की पागल आदमी को क्या महसूस होता है। उन्हें लगा की न्यूरो साइंस ही सब तय करती है। पर जल्दी ही उन्हें कुछ और ही समझ आया। उन्होंने शराबियों का इलाज करना शुरू किया। उन्हें लगा की दवा से शराबी डरकर शराब छोड़ देंगे। पर दवा ने उन्हें डराने के बजाए गहरा सुकून दिया। लोगों को लगा कि वे पूरी दुनिया
के साथ ही एक हैं। एलएसवी धावा ने इस पिंजरे की सलाखें पिघला दीं। शराब छोड़ने वाली सभा के मालिक बिल भी इसे मानते थे। उन्हें खुद एक जड़ी बूटी से नया रास्ता मिला था। वे चाहते थे कि बाकी शराबी भी यह दवा आजमाएं। पर उनकी सभा के बाकी लोग इस बात पर राजी नहीं हुए। उन्हें लगा कि दवा लेना गलत बात है, लेकिन सच यही है कि इससे होश इससे चोन्सेअस्नेस बदल जाता है। सिडनी कोहीन भी पहले इस दवा को पागलपन मानते थे, पर 1955 में जब उन्होंने खुद इसे चखा तो वे दंग रह गए।
उन्हें पागलपन नहीं बल्कि ये गहरी शांति महसूस हुई। उन्हें लगा जैसे उन्हें सच्चाई मिल गई हो। उन्होंने इसे होश की एक अनोखी हालत कहा। पुराना पागलपन वाला रास्ता अब धीरे धीरे बंद हो रहा था। गाइड ने देखा कि लोग इस दवा से डर नहीं रहे। इसके बजाय उन्हें अपनी स्पिरिचुअल ताकत मिल रही थी। वैज्ञानिक ने अब दो रास्ते अपनाए टू मॉडल्स पहला रास्ता था दिमाग की परतें धीरे धीरे खोलना। इस तरीके में दवा की बहुत कम खुराक दी जाती थी। इससे दिमाग का पिंजरा थोड़ा ढीला
पड़ जाता था। लोग अपने गाइड से खुलकर दिल की बात कह पाते थे। वे अपने बचपन के उन जख्मों को याद कर पाते थे। वे उन यादों को फिर से जी कर अपना इलाज करते थे। लॉस एंजिल्स के बड़े गाइड भी यही तरीका अपना रहे थे। वे कलाकारों और पढ़े लिखे लोगों को यह दवा यानी एलएसडी देते थे। मशहूर हीरो कैरी ग्रांट ने भी यह दवा ली। उन्होंने कहा कि उनका पुराना घमंड खत्म हो गया है। ग्रैंड को लगा कि उनका नया जन्म हुआ है। कैरी ग्रांट की यह बात सुनकर दुनिया भर में शोर मच गया। लोग अब डॉक्टरों के पास इस दवा के
लिए आने लगे। पर सिडनी को यह जादू टोना या मैजिक पसंद नहीं आया। उन्हें लगा कि लोग इसे बस मज़े के लिए ले रहे हैं। वे चाहते थे कि विज्ञान और रूहानी सुकून साथ चले। उधर, कनाडा के कुछ गाइड ने एक अलग रास्ता चुना। वे एल्डस हक्जले नाम के लेखक के साथ थे। वे लोग दवा की बड़ी खुराक देने में यकीन रखते थे। वे चाहते थे कि इंसान को एक ही बार में गहरा एहसास हो। हक्जले ने इसे होश यानी कान्शस्नस का खोलना कहा। 1956 में उन्होंने इस दवा को साइक्डेलिक नाम दिया। इसका मतलब था दिमाग का आईना
माइंड। मैनिफेस्टिंग वे चाहते थे कि यह दवा सबको एक नया नजरिया दे। इस काम में अल हबार्ड ने सबकी बहुत मदद की। अल हबार्ड एक बहुत ही रहस्यमयी और जादुई इंसान थे। वे कमरे में फूल, तस्वीरें और संगीत लेकर आए। वे चाहते थे की मरीज को घर जैसा सुकून महसूस हो। इसे हब्बार्ड का कमरा कहा जाने लगा। आज भी दुनिया के बड़े उस्ताद बड़े गाइड उन्हीं के तरीके अपनाते हैं। अल्हब्बार्ड बहुत ही अनोखे और जादूई इंसान थे। उनके बारे में आज भी बहुत कुछ रहस्य है। वे बचपन में बहुत गरीब थे।
पर बिजली के सामान बनाने में एक्स्पर्ट थे। वे कभी जासूस बनते तो कभी रईस बन जाते। 1951 में उन्हें जंगल में एक फरिश्ता दिखा एक एंजेल। उसने कहा कि दुनिया में कुछ बहुत बड़ा होने वाला है। फिर उन्हें एल एस डी मिली। इसे चकर उन्हें होने का एहसास समझ आया? उन्हें लगा जैसे वे खुद का जन्म देख रहे हों। हबार्ड चाहते थे कि दुनिया के सबसे बड़े लोग यह दबा लें। उनका मानना था कि अगर बड़े अफसर और अमीर लोग सुधर जाएं तो दुनिया बदल जाएगी। उन्होंने हजारों लोगों को यह सफर यह जर्नी कराया।
इलाज के लिए उन्होंने बाढ़ का कमरा बनाया। वहाँ वे हॉस्पिटल जैसी ठंडक नहीं बल्कि घर जैसा सुकून रखते थे। वे कमरे में फूल, सुंदर तस्वीरें और प्यारा सा म्यूसिक रखते थे। वे जानते थे कि दिमाग के पिंजरे को कैसे खोलना है। वे मरीज को फूल देकर कहते इसे प्यार करो। जैसे ही इंसान का पुराना घमंड पिघलता, उसे सब कुछ सुंदर दिखने लगता। हबार्ड ने मशहूर लेखक एल्डर्स हकजले को भी यह रास्ता दिखाया। हकजले को लगा कि प्यार ही सबसे बड़ी सच्चाई है। हबार्ड को लगने लगा कि विज्ञान से
भी बड़ा स्पिरिचुअल पीस है ये। रूहानी सुकून है। अबड ने जासूसों यानी सीआइए के साथ भी काम किया, पर उन्हें जासूसों का तरीका पसंद नहीं आया। वे इस दवा को हथियार नहीं बल्कि लाज मानते थे। उन्होंने अपनी सारी दौलत इस होश इस कन्सेस्स् की समझ को फैलाने में लगा दी। सिलिकन वैली इस कहानी का एक बड़ा हिस्सा है। यहाँ अल हबार्ड ने बदलाव के बीज बोए थे। आज भी कंप्यूटर की दुनिया के लोग एलएसडी का इस्तेमाल करते हैं। वे इसे बहुत छोटी मात्रा माइक्रो डोसिन्ग् में लेते हैं।
ये उनके लिए एक दिमाग की घुटी एक मेन्टल टोनिक जैसा है। स्टीव जॉब्स कहते थे कि एल एस डी उनके जीवन का सबसे बड़ा एक्सपीरियंस था। उन्होंने बिल गेट्स का मजाक भी उड़ाया था। उनका मानना था कि दवा लेने से सोच बड़ी होती है। हबार्ड की वजह से ही कंप्यूटर की दुनिया में इतना बड़ा धमाका। हुआ। मारन स्टोलारोव। इस कहानी के एक और बड़े खिलाड़ी थे। वे मशीनों और डेटा को रिकॉर्ड करने के एक्स्पर्ट थे। 1956 में उन्होंने पहली बार एलएसडी ली। उन्हें लगा कि उनका दिमाग का
पिंजरा टूट गया है। उन्हें दुनिया का जन्म और अपना खुद का जन्म दिखा। उन्हें लगा कि हम सब एक हैं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी काम में लगा दी। वे अपनी कंपनी को दिमाग की सफाई वाला केंद्र बनाना चाहते थे। कलहबार्ड वहाँ लोगों को सफर कराते थे। वे चाहते थे कि लोग अपना पुराना घमंड छोड़ दे पर ये काम बीच में ही रुक गया। कुछ लोगों को हबार्ड की धार्मिक तस्वीरें पसंद नहीं आई, पर इंजीनियरों के सोचने का तरीका अब बदल चुका था। 1961 में मारन ने अपनी नौकरी छोड़
दी। उन्होंने दिमाग के समझ याने कॉन्सेस्नेस पर रिसर्च शुरू की। वे देखना चाहते थे कि क्या एल एस डी से? नए इन्वेंशन हो सकते हैं। कंप्यूटर बनाने वाले कई बड़े वैज्ञानिक ने यह दवा ली। वे ऐसी पहेलियां सुलझा पाए जो पहले नामुमकिन थी। यह दिमाग की जमी धूल झाड़ने जैसा था। स्टुअर्ट ब्रैंड भी इसी सोच से जुड़ गए। उन्होंने। होल अर्थ कैटलॉग नाम की मशहूर किताब लिखी। 1 दिन वे अपनी छत पर बैठकर सफर यानी एलएसडी का ट्रिप कर रहे थे। उन्हें लगा कि धरती एक छोटा सा
गोलघर है। हमें उसे संभालकर रखने की जरूरत है। उन्होंने धरती की पहली फोटो के लिए आंदोलन किया। इसी सोच से कंप्यूटर की नई दुनिया यानी साइबर स्पेस पैदा हुई। दिमाग का नया जनम ही असल में आज की तकनीक की बुनियाद है। हम सब एक दूसरे से जुड़े हैं, बस हमें वह पिंजरा खोलने की जरूरत है। टिमोथी लेरी एक बहुत बड़े जानकार आदमी थे। 1960 के दौर में वे हमेशा मुस्कुराते हुए दिखते थे, उन्हें एक बड़े दोस्त ने सलाह दी थी अपनी मुस्कान मत छोड़ना, चाहे वे जेल
जाए या दालक उनके चेहरे पर हमेशा नूर रहता था। वे चाहते थे कि लोग उन्हें एलएसडी बिछने वाले खुशमिजाज इंसान की तरह देखें। लोग समझते हैं कि लेरी ने ही सब शुरू किया पर सच तो ये है कि उनसे पहले भी बहुत से एक्सपर्ट्स बूटी पर काम कर रहे थे। लेरी को लगने लगा कि स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बातें बस एक खेल है। एक गेम वे कुछ ऐसा ढूंढ रहे थे जिससे इंसान का पूरा जीवन बदल जाए। 1960 की एक गर्मी की दोपहर थी। ग्लेरी मेक्सिको में एक तालाब के किनारे बैठे थे।
वहाँ उन्होंने पहली बार मशरूम वाली दवा यानी सिलोसाइबीन बूटी चखी। सिर्फ चार घंटों में उन्होंने वह सब सीख लिया जो उन्होंने सालों की पढ़ाई में नहीं सीखा था। उनका होश। पूरी तरह जाग गया था। वे चिल्लाकर कहने लगे जाग जाओ, आप सब भगवान हो लेडी हार्वर्ड में थे वहाँ उन्होंने अपने साथी रिचर्ड कलपट के साथ मिलकर एक बड़ा काम शुरू किया। वे सफेद कोट पहनकर लैब में काम नहीं करते थे। वे लोगों को घरों में बुलाते थे। मोमबत्तियां जलाते थे और प्यारा संगीत बजाते थे।
ये सब किसी महफिल जैसा लगता था। वहाँ के बाकी गाइड लेरी से नाराज होने लगे। उन्हें लगा की लेरी एक पंथ एक कल्ट बना रहे हैं। जो लोग लेरी के साथ दवा नहीं लेते थे, उन्हें पिछड़ा हुआ स्क्वायर समझा जाने लगा। लेडी कहते थे कि यह दवा बर्फ़ के गोले को हिलाने जैसी है। हमारा दिमाग पुरानी यादों और दुखों की वजह से जम जाता है। यह दवा उस जमी हुई धूल को झाड़ देती है। हमारा पुराना घमंड ही हमारे दिमाग का पिंजरा है। यह पिंजरा हमें दूसरों से और कुदरत से अलग रखता है।
लेरी चाहते थे कि हर नौजवान इस पिंजरे को तोड़ दे। वे कहते थे, अपने दिमाग की चाबी अपने हाथ में लो। हार्वर्ड के बड़े अफसरों ने लेरी को नौकरी से निकाल दिया, पर लेरी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने विज्ञान का रास्ता छोड़कर क्रांति का रास्ता चुन लिया। वे चिल्लाकर दुनिया से पूछने लगे, आपके दिमाग पर किसका हक है?
उन्होंने इस बूटी को लैब से निकालकर गली मोहल्लों तक पहुंचा दिया। यही से दिमाग के नए जन्म की एक बड़ी कहानी शुरू हुई। त्रिमोथीलेरी ने 1960 के दौर में बहुत शोर मचाया। बाकी वैज्ञानिक से बहुत घबरा गए थे। लेरी चाहती थी कि हर कोई दिमाग का नया जन्म ले पर वे बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे थे। एलिस हक्जले जैसे बड़े लेखक भी उनसे परेशान थे। उन्हें लगा कि लेरी अपनी समझ खो रहे हैं। वैज्ञानिक ने लेरी को बहुत समझाया, पर वे रुके नहीं। वे चाहते थे कि लाखों लोग एल एस डी ले।
उनका मानना था कि इससे पूरी दुनिया सुधर जाएगी। पर अल हबार्ड जैसे लोग उनसे बहुत नाराज थे। हबार्ड को लगा की लेरी सब कुछ खराब कर देंगे। हबार्ड के लिए यह दवा एक पवित्र बूटी थी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने लेरी को नौकरी से निकाल दिया। एक छात्र ने उनकी पोल खोल दी। लेरी का साथ देने वाले रिचर्ड भी निकाल दिए गए। रिचर्ड बाद में भारत आए और रामदास बने। वे स्पिरिचुअल रास्ते पर चल। पड़े। लेरी के पीछे पुलिस और सरकार पड़ गई। उन्हें जेल हुई पर वे वहाँ से भाग
निकले। वे सालों तक दुनिया भर में छुपते रहे पर लेरी के चेहरे से मुस्कान कभी नहीं गई। वे हमेशा खुश रहते थे और बहादुरी दिखाते थे। किन किसी नाम के लेखक ने भी बहुत हंगामा किया? वे एक रंगीन बस में हजारों लोगों को दवा पिलाते थे। हैरानी की बात है कि यह सब? जासूसों यानी सीआइए की वजह से शुरू हुआ सीआइए इस दवा को एक हथियार बनाना चाहते थे। पर यह दवा लोगों को प्यार और शांति सिखाने लगी। बड़े बड़े डॉक्टरों और सरकार को जल्द ही डर लगने लगा। उन्हें लगा कि यह दवा तो किसी पुराने जादूगर के खेल जैसी है।
किसी शेमिनिज्म जैसी वे न्यूरोसिएंस की बातें करते थे पर यहाँ तो सीधे स्पिरिचुअलिटी बातें हो रही थी। पुराने स्पोर्ट्स घबरा गए क्योंकि उन्हें लगा कि उनके हाथ से लगाम छूट रही है। 1960 के दौर में एलएसडी बाजारों और गलियों में पहुँच गई। कुछ लोगों को बैटरी हुआ और वे अस्पताल पहुँच गए तभी पूरे देश में एक हड़कंप मच गया। अखबारों में डरावनी खबरें छपने लगी की यह दवा दिमाग खराब कर देती है। वैज्ञानिक ने कहा कि इससे बच्चों में खराबी आती है जो की झूठ था। पर सच तो यह था कि सरकार को इस
बदलाव से इस चेंज से डर था। यह दवा दिमाग का पिंजरा खोल देती थी। जो नौजवानों ने यह दवा ली उनका पुराना घमंड टूट गया। वे अब जंग लड़ने और बड़ी कंपनियों में काम करने से मना करने लगे। उन्हें पूरी दुनिया से प्यार और जुड़ाव महसूस होने लगा। बाप और बेटे के बीच एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी हो गई। नौजवान एक ऐसी दुनिया देख रहे थे जिसे उनके माँ बाप नहीं समझ सकते थे। सरकार ने डर के मारे इन दवाओं को गैरकानूनी घोषित कर दिया। दिमाग की जमी धूल झाड़ने का यह काम पूरी तरह रोक दिया गया।
ऐसा लगा जैसे किसी ने उड़ते हुए परिंदे के पंख काट दिए हो। उस समय दुनिया इस बड़े बदलाव के लिए तैयार नहीं थी। फिर भी लेडी जैसे लोगों ने एक पूरी पीढ़ी की आँखों से पर्दा हटा दिया था। 1966 के आखिरी दिनों में सब कुछ बिखर गया। एलएसडी बनाने वाली कंपनी घबरा गई थी। उसने यह दवा डॉक्टरों को देना बंद कर दिया। 70 के करीब रिसर्च प्रोग्राम बंद हो गए। सबको लगने लगा कि यह काम बहुत खतरनाक है। अदालत में इस बूटी पर बड़ी बहस हुई। लेरी और कोहेन ने अपनी बात मजबूती
से रखी। एक बड़े नेता रॉबर्ट कन्नेडी भी उनके साथ थे। उन्होंने कहा कि यह दवा समाज के लिए अच्छी है पर सरकार ने किसी की एक न सुनी। अक्टूबर में 60 वैज्ञानिक को काम रोकने का हुक्म मिला। जेम्स फडमेन को वह दिन आज भी याद है। वे चार लोगों को सफर करवा रहे थे। तभी सरकार की चिट्ठी उनके हाथ में आई। लिखा था काम अभी के अभी बंद कर दो सब कुछ छुपकर और चोरी छिपे होने लगा। अंडरग्राउंड दिमाग की जमी धूल साफ करने पर पाबंदी लग गई। 1979 में पुराने गाइड फिर से एक साथ मिले।
लेरी कोहेनोर अल्लाहबार्ड एक सोफे पर थे। वे सब अब बूढ़े हो चूके थे, उनकी मेहनत बेकार गई थी। वे पूछ रहे थे इस सब का आखिर क्या मतलब निकला? कोहेन ने कहा, हमने लाखों लोगों का होश या निकोन्सेस्नेस बदला। लेरी अब भी अपनी जादुई मुस्कान बिखेर रहे थे। वे बोले गलतियाँ हुईं पर हमने नया रास्ता दिखाया। कल थोड़े चिड़े हुए थे, वे लेरी से खुश नहीं थे, पर सबको पता था कि दिमाग का पिंजरा खुल चुका था। लेरी ने वह पिंजरा तोड़ने की हिम्मत दिखाई थी। हबार्ड ने कहा कि ये काम चोरी
छिपे ही सही पर चलना चाहिए। हमें दुनिया के बड़े नेताओं को यह दवा पिलानी चाहिए। लेरी मुस्कराए और हबार्ड का शुक्रिया अदा किया। उन्हें पता था कि यह दिमाग का नया जन्म जरूर होगा। आज नहीं तो कल दुनिया सच को जरूर पहचानेगी मैंने सोचा था कि मैं किसी बड़े अस्पताल की रिसर्च में हिस्सा लूँगा। वहाँ डॉक्टर और नर्स पास होते हैं तो डर कम लगता है पर बड़े गाइड ने यह तंदुरुस्त लोगों को लेना बंद कर दिया। अब मुझे चोरी छिपे काम करने वाले किसी। गाइड को ढूंढना था।
क्या मैं अपना मैएंड किसी अनजान के हाथों में सौंप सकता था? ये बड़ा जोखिम था पर मेरा मन सच जानने को बेताब था। मेरा दिमाग पुरानी आदतों के बर्फ़ के गोले जैसा था। मुझे उस जमी हुई धूल को बस एक बार झाड़ना था। मैंने सुना था कि ये दवा दिमाग का पिंजरा खोल देती है। पिंजरा टूटते ही दुनिया का नया नजरिया मिलता है। कई लोगों को होने का एहसास और ट्रांससेंडस मिला पर कुछ लोग अपने पुराने कड़वी यादों में भी डूब गए। मैं अपने रूह की गहराई में उतरने से बहुत डरता था।
मुझे लगा कि मेरे शान चेहरे के पीछे कोई पागलपन तो नहीं, ये चोरी छिपे काम करने वाले लोग कोई मुजरिम नहीं है। वे तो थेरेपिस्ट हैं, जो लोगों का इलाज करते हैं, वे अपनी आज़ादी और नौकरी खतरे में डालकर ये काम करते हैं। लियो जे ऐफ़ इस। इस स्पिरिचुअल काम के सबसे बड़े गायक थे। उन्होंने हजारों लोगों को दिमाग का नया जन्म लेने में मदद की। वह कहते थे कि गाइड को हमेशा मरीज का हाथ थामना चाहिए। उन्होंने सफर के लिए कुछ पक्के कायदे और नियम बनाए थे। कुछ प्रोटोकोल्स इसमें संगीत और।
फूलों का इस्तेमाल बहुत जरूरी माना गया। ये दवाइयां बहुत ताकतवर हैं इसलिए इन्हें सलीके से लेना चाहिए। सही उस्ताद और नियम ही हमें सुरक्षित रख सकते हैं। यही बदलाव हमें खुद से और दुनिया से जोड़ता है। मैंने कई गाइड से बात की। पहले वाले गाइड कुछ ठीक नहीं लगे। मन में सफर को लेकर बहुत डर था। आंद्रेई एक बूढ़े जानकार डॉक्टर थे, उनके दफ्तर में बुद्ध की मूरत थी, वहाँ मारिया सबीना की तस्वीर भी थी। वे इसे होश की गहरी समझ कहते थे। उन्होंने मुझे गले लगाया। आंद्रेई बहुत ही बेपरवाह इंसान
लगे। वे बोले खुद को पूरी तरह छोड़ दो सरेंडर मुझे पागल होने और मौत का डर था। आंद्रेई ने कहा, मौत बस एक एक्सपीरियंस है। उन्होंने एक बहुत ही डरावनी बात कही। कहा मरने वालों को बस दफना देना चाहिए। ये सुनकर मेरी हिम्मत जवाब दे गई, दूसरे गाइड तो और भी जीव निकले। वे गले की माला से खाना चुनते थे। मैंने सोचा ये मेरे गाइड नहीं हो सकते। मैं अभी बहुत घबराया हुआ था। मेरी उम्र अब 60 साल की थी, मेरा दिल कभी कभी बहुत तेज धड़कता था। मुझे लगा जैसे न्यूरोसाइंस कमजोर है, मैंने अपने दिल के डॉक्टर से
सलाह ली। उन्होंने एमडी एम में दवा लेने से मना किया, कहा इससे दिल पर बुरा असर पड़ेगा। बाकी दवा या बूट यानी एसडी या सिलोसाइबीन उन्होंने ठीक बताई। अब मुझे बस सही। गाइड का इंतजार था जो मेरा हाथ थाम कर रास्ता दिखा सके। मैंने अपना पहला गाइड चुन लिया था। उनका नाम फ्रिज था, वह ऊंचे पहाड़ों में अकेला रहता था। वहाँ ना फ़ोन था, ना बिजली थी। वह खुद अपनी सब्जियां उगाता था। वह एक पुराने नाज़ी सिपाही का बेटा था। फ्रिज एक बहुत ही भला आदमी था।
उन्होंने मेरा हाथ थामकर गले लगाया। उनका बचपन बहुत ही कड़वा बीता था। उनके पिता बहुत ज्यादा शराब पीते थे। फ्रिज ने जवान होते ही बगावत कर दी। वह जेल गए और बहुत किताबें पढ़ीं। कॉलेज में उन्होंने एल एस डी ली। उन्होंने कहा कि यह दवाओं की है। इससे उनके अंदर का सारा गुस्सा बह गया। वह भारत के आश्रमों में भी रहे। उन्होंने वहाँ बहुत सी स्पिरिचुअल बातें सीखी। उन्होंने देखा कि दुनिया में सभी एक ही हैं। वह इसे होश समझने का ओजार मानते हैं। वे अब चोरी छिपे लोगों का इलाज
करते हैं। हमारा सफर तीन दिनों का होने वाला था। वह मेरे लिए एक सुरक्षित जगह बनाएंगे। वह दवा को पहले खुद चक कर देखते हैं। उन्होंने कहा कि वह मेरा हाथ नहीं छोड़ेंगे, हम साथ बैठकर बीती बातें साफ करेंगे। फ्रिज के साथ वह पहली दोपहर बहुत कमाल की थी। मैंने सीखा कि सिर्फ सांस लेने से होश बदल सकता है ने कहा ज़ोर से और तेजी से सांस लो। कुछ ही देर में मेरा शरीर अपने आप चलने लगा। मुझे लगा मैं एक तेज काले घोड़े पर सवार हूँ। मैं जंगल के रास्तों पर बहुत तेजी
से भाग रहा था। मुझे अपने शरीर की ताकत का पहली बार एहसास हुआ। शाम को अचानक मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। ऐसा लगा जैसे सीने के अंदर कोई चिड़िया फंस गई हो। मैं बहुत डर गया था कि कहीं जान न चली जाए पर रात होते होते सब शांत हो गया। मैंने तय किया कि मैं पीछे नहीं हटूंगा। अगली सुबह मैंने एल एस डी की एक छोटी डोस ली। मैंने अपनी जेब से एक पत्ता और पत्थर निकाला। गाइड ने कहा, अगर कोई डरावनी चीज़ दिखे तो भागना मत, उसका सामना करना और पूछना की वह क्या सीखाना चाहती है।
मैंने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली और संगीत सुनने लगा। संगीत ने मेरे दिमाग में पुरानी यादों के घर बना दिए। मुझे अपनी पत्नी और बेटे के साथ बिताए साल दिखे। मुझे लगा कि मैं जमीन के नीचे जड़ों का हिस्सा हूँ। यह कुदरत के इंटरनेट जैसा था। मुझे अपने पिता के लिए बहुत हमदर्दी महसूस हुई। सबसे बड़ी बात जो मुझे समझ आई वह थी प्यार, प्यार ही सब कुछ है। यह बात सुनने में बहुत साधारण लगती है, पर उस समय यह दुनिया का सबसे बड़ा सच था। उस दिन मेरे दिमाग का पिंजरा पूरी तरह नहीं टूटा था, पर वह बहुत
ज्यादा ढीला जरूर पड़ गया था। मुझे अब चीजें पहले से ज्यादा साफ दिखने लगी थी। एक नया नजरिया मेरे पास था। मैं अब अपनों के साथ ज्यादा खुश और शांत महसूस कर रहा था। ये सफर खत्म हुआ पर इसने मुझे और गहरा जाने की हिम्मत दी। मेरी दूसरी यात्रा एक सजी हुई मेज़ के पास हुई। वहाँ मेरी गाइड मेरी बैठी हुई थी। उन्होंने पुरानी नेचुरल रस्मों के साथ प्रार्थना की। मेज़ पर हीरो जैसे पत्थर और फूल रखे थे। वहाँ एक बड़ी मशरूम वाली बूटी बूटी रखी थी। मैंने उसे चॉकलेट के साथ धीरे
धीरे खा लिया। उसका स्वाद मिट्टी जैसा और बहुत सूखा था। जल्द ही मैंने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली। संगीत बजते ही मैं एक नई दुनिया में था। वह जगह किसी कंप्यूटर के खेल जैसी थी एक कंप्यूटर गेम जैसी। वहाँ काले रंग की अजीब और ऊंची इमारतें थीं। मुझे वहाँ बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। मैं बाहर नेचर की गोद में जाना चाहता था। मेरा मन थोड़ा घबराया, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने खुद को इस सफर के हवाले कर दिया। यह किसी तेज रफ्तार झूले पर बैठने
जैसा था। सफर के बीच में मैं हाथ पैर धोने लगा। वहाँ पानी की धार हीरों की तरह चमक रही थी। रौशनी के छोटे छोटे टुकड़े फ्रैक्टल्स हर तरफ नाच रहे थे। मैरी ने मुझे बूस्टर की एक और खुराक दी। उस समय मेरी मुझे एक पुरानी गाइड जैसी दिखी। वह मेक्सिको की मारिया सबीना बन चुकी थी। उनके हाथ और चेहरा बहुत पुराने और अनुभवी थे। मैंने चुपचाप उनके हाथ से वह बूटी ले ली। मैंने अपने दिमाग पर एक छोटा एक्स्पेरमेन्ट किया। हमारा दिमाग पुरानी आदतों से सच
का अंदाजा लगाता है। इसे दिमाग की जमी हुई धूल कह सकते हैं। हम अक्सर वही देखते हैं जो हम पहले से जानते हैं पर यह दवा हमारे दिमाग का पिंजरा खोलती है और मैं दुनिया को नए नज़रिए से देख रहा था। मैंने फिर से आँखों पर पट्टी बांध ली। दवा का सर्वा बहुत तेज था। मेरा दिमाग का पिंजरा पूरी तरह टूट गया। मैं अब कागज के टुकड़ों जैसा बिखर गया। हवा मुझे उड़ाकर दूर ले जा रही थी, पर मुझे इस बात से कोई दुख नहीं था। मेरा होश अब शरीर से बाहर था। मैं बस एक खुली और शांत समझ था।
एक अवेयरनेस। यह गहरा सुकून यह ट्रांससेंडेंस जैसा एहसास था। मैंने देखा कि मैं अब मैं नहीं रहा। मैं दुनिया पर पुते हुए रंग जैसा बन गया। मेरा पुराना घमंड पूरी तरह गायब था। सफर के दौरान मैं शीशे के सामने गया। वहाँ मुझे अपनी खोपड़ी साफ दिखाई दी। फिर वो चेहरा मेरे दादाजी जैसा बन गया। मुझे उनकी बहुत याद आई और मैं रोया। मैंने उन सब लोगों को याद किया जो गुजर चूके थे। मेरा दिल पूरी तरह खुल चुका था, मेरी ने बाजे वाला संगीत बजाया। मैं खुद, वह संगीत और वह बाजा बन
गया। मैं उस सवाज के साथ पूरी दुनिया में बहने लगा। संगीत ने मुझे मौत से हाथ मिलाना सिखाया। मुझे लगा कि मौत से डरने की जरूरत नहीं। सब कुछ एक बड़ी कुदरत एक नेचर का हिस्सा है। मुझे समझ आया कि हम सब एक दूसरे से जुड़े हैं। प्यार ही सबसे बड़ा और जरूरी मतलब है। अगले दिन मैरी ने मेरा हाथ थाम कर बातें की। मेरा पुराना घमंड अब भी शान था। मुझे लगा जैसे मेरा दिमाग का नया जन्म हुआ है। आगे मैंने और भी एक्स्पेरमेन्ट ट्राई किए। यह मेंढक की कहानी है। इसमें फाइव एम यु डीएम टी दवा का
इस्तेमाल होता है। यह मेंढक का जहर है पर कमाल की मेडिसिन है। मेरोसियो नाम की एक जानकार औरत से मिला। वह मेक्सिको के रेगिस्तान में मेंढक पकड़ती है व इनके जहर को सुखाकर। मेडिसिन बनाती है। इसे पीना आसान है पर असर बहुत तेज है। आप बस एक सांस लेंगे और सब कुछ गायब हो जाएगा। यह दिमाग का पिंजरा एक दम से तोड़ देता है। मेरी एक सहेली ओलिविया ने इसे चखा था। ओलिविया ने कहा कि यह सफर पहाड़ की चोटी जैसा है। उसे लगा कि वह खुद एक चमकता सितारा बन गई है। उसे गहरा सुकून और कुदरत की
सच्चाई दिखी। उसे समझ आया कि हर चीज़ प्यार से बनी है। मैंने भी यह अनोखा एक्सपीरियंस करने का फैसला किया। मेरा दिल अब सच जानने के लिए तैयार था। हम सब इस बड़ी कुदरत का एक छोटा हिस्सा है मेढक वाली बूटी यानी फाइव एम यु डीएम टी लेने से पहले वाली रात में सो नहीं सका। मेरे मन में बहुत डर था क्या मैं पागल हो जाऊंगा? पर मैंने सोचा कि बस आधे घंटे की ही तो बात है। सुबह जब सूरज निकला तो मैं तैयार था। क्रोसियों ने पाइप में वो बूटी, वो फाइव एमयू डीएमटी क्रिस्टल डाली उसमें आग जलाई और मैंने एक
गहरी सांस ली। बस उसके बाद मैं कहाँ गया मुझे कुछ याद नहीं। मेरा पुराना घमंड बारूद की तरह फट गया। मेरा दिमाग का पिंजरा छोटे छोटे टुकड़ों में बिखर गया, मैं अब मैं नहीं रहा, मेरा सारा होने का अहसास मिट चुका था, पर मेरा होश अब भी जाग रहा था। मुझे लगा मैं किसी रॉकेट के बाहर छिपका हुआ हूँ। हवा का शोर बहुत तेज और डरावना था। ऐसा लगा जैसे दुनिया का जन्म उल्टा हो रहा हो। वहाँ न वक्त था, न कोई जगह बस एक भयानक और जोरदार शोर था। फिर अचानक सब कुछ फिर से जुड़ने लगा।
मुझे अपना शरीर धीरे धीरे वापस मिला। ऐसा लगा जैसे मेरे दिमाग का नया जन्म हुआ है। मैंने अपने बेटे आईजे को महसूस किया। मेरा दिल पूरी दुनिया के लिए प्यार से भर गया। मुझे समझ आया कि बस होने में ही सुख है। हम हमेशा कुछ ना कुछ करने में लगे रहते हैं। हमें बस चुपचाप बैठना और ठहरना सीखना चाहिए। हमारा पुराना घमंड हमारा ईगो एक पहरेदार जैसा है। वह हमें कुदरत को साफ देखने नहीं देता। वो हमें सिर्फ अपने बारे में सोचने पर मजबूर करता है, पर जब ये
दिमाग का पिंजरा खुलता है तो सब सच दिखता है। अब मुझे मौत से डर नहीं लगता। मुझे समझ आ गया है कि हम सब एक हैं। इन्टरकनेक्टेडनेस हम सब इस बड़े नेचर का एक छोटा सा हिस्सा। है। यही इस सफर का सबसे बड़ा मतलब था। आखिर उन दवाओं के साथ मेरे दिमाग में क्या हुआ? एलएसडी और स्टिलोसाइबीन अनोखी हैं। इनकी बनावट हमारे दिमाग की एक। सेरोटोनिनिक केमिकल जैसी है। यह केमिकल दिमाग को संदेश पहुंचाने का काम करता है। दिमाग में कुछ खास ताले फाइव एसटी टू ए रिसेप्टर्स होते हैं। ये दवाइयां उन तालों की चाभी बन
जाती है। एलएसडी तो असली केमिकल से भी मजबूत है। यह ताले में जाकर मजबूती से चिपक जाती है। पर सिर्फ ताला खोलना ही सब कुछ नहीं है। सवाल यह है कि हमारा होश हमारा कान्शस्नस कैसे बदलता है? न्यूरो साइंस अब यह समझने लगी है होश का मतलब है खुद के होने का। एहसास यानी एग्ज़िस्टन्स। लंदन की एक लैब में बहुत बड़ा काम हो रहा है। रॉबिन नाम के एक जवान गाइड यहाँ शोध कर रहे हैं। डेविड नॉट और अमांडा उनकी मदद कर रहे हैं। अमांडा मानती हैं कि एलएसडी दिमाग की घुट्टी जैसी है।
डेविड नॉट को सच बोलने की वजह से नौकरी से निकाल दिया गया था। उन्होंने कहा था कि यह दवा शराब से कम खतरनाक है। रॉबिन ये समझना चाहते थे कि हमारे अंदर क्या चल रहा है? उन्होंने लोगों को सिलोसाइबीन देकर उनके दिमाग को देखा। सबको लगा कि दवा से दिमाग बहुत तेज चलने लगेगा। पर हुआ इसका एक दम उल्टा दिमाग का एक खास हिस्सा एक दम शांत हो गया। इस हिस्से को दिमाग की पुरानी पगडंडी कहते हैं यानी डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क। यही हमारे दिमाग का बड़ा शहर,
कैपिटल सिटी या मालिक है। यही हिस्सा हमारे पुराने घमंड को संभाल कर रखता है। यही वह दिमाग का पिंजरा है जो हमें कैद रखता है। जब हम खाली बैठकर फालतू चिंता करते हैं तब यही चलता है। डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क एक बड़े साहब जैसी है, वह दिमाग के हर हिस्से पर अपना हुक्म चलाती है। साहब के डर से बाकी हिस्से चुपचाप बैठे रहते हैं। जब साहब चले जाते हैं तो सब आजाद हो जाते हैं। दबी हुई यादें और स्पिरिचुअल बातें बाहर आने लगती हैं। ये साहब दुनिया की हर चीज़ को छान कर दिखाते हैं।
वे हमें उतनी ही बात बताते हैं जितनी जरूरी है। हमारा दिमाग हर चीज़ का बस अंदाजा लगाता है। गेस हम जिसे सच कहते हैं वह दिमाग की कल्पना है। दवाई इस अंदाजे की मजबूत पकड़ को ढीली करती है। बहुत डिसिप्लिन दिमाग में जंग यानी रस्ट लगा देती है।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
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