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Episode notes

In the chaotic streets of Philadelphia, Robert Kurzban noticed something peculiar: sometimes, ignorance is a survival strategy. If a driver sees that you’ve seen them, they expect you to stop. But if you cross the street looking confused or distracted—like a tourist lost in thought—the driver is forced to brake. By appearing "ignorant," you’ve won the social game.This observation serves as the launchpad for Kurzban’s book, Why Everyone (Else) Is a Hypocrite. As an evolutionary psychologist, Kurzban argues that the human mind isn't a single, unified "self." Instead, it is a collection of…

Transcript

Read the transcript · about 11,700 words, follows along as you listen

फ़िलाडेल्फ़िया शहर में कभी कभी अनजान बने रहना ही आपकी जान बचा सकता है। अगर आप मेरी तरह कैलिफोर्निया में रहे हैं तो आपको आदत होगी कि जब आप सड़क पार करते हैं तो कारें आपके लिए रुक जाती हैं। आप कभी कभी ड्राइवर की आँखों में देखते हैं। मैंने तुम्हें देख लिया तुमने मुझे देख लिया और आप जानते हैं कि उसे रुकना ही पड़ेगा, लेकिन फ़िलाडेल्फ़िया में ऐसा करने से आपकी जान जा सकती है। अगर ड्राइवर ने देख लिया कि आपने उसे देख लिया है तो वो समझ जाएगा कि अब आप सड़क पार नहीं करेंगे। क्योंकि इंसान और कार की टक्कर में नुकसान हमेशा इंसान का ही होता है। इसलिए वहाँ सड़क पार करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है कि अपनी आँखों को ट्रैफिक से दूर रखें, सड़क ऐसे पार करें जैसे आप खो गए हों या उलझन में हों, बस एक टूरिस्ट की तरह चलें। मकसद ये है कि आप बिल्कुल अंजान दिखे। ड्राइवर उन लोगों के लिए रुक जाते हैं जिन्हें अपनी जान बचाने का कोई मौका नहीं दिखता। इसलिए आपका सबसे बड़ा साथी है कुछ भी ना पता होना जब ड्राइवर को लगेगा कि आपको उसके आने की खबर ही नहीं है। तो वो समझ जाएगा कि आप खुद को बचाने के लिए पीछे नहीं हटेंगे तब वो अपनी गाडी धीरे कर लेगा, वैसे वो शायद ही धीरे करेगा। अगर आप पूरी तरह सेफ रहना चाहते हैं तो दूसरे लोगों के साथ सड़क पार करें और अगर बहुत ज्यादा

सुरक्षित रहना है। तो अपनी कार के अंदर ही रहें या फिलाडल्फिया से दूर रहें। फिलाडल्फिया की जिंदगी पुराने वीडियो गेम फ्रॉगर जैसी नहीं है। उस गेम में आपको एक मेंढक को पांच लेन के ट्रैफिक से बचाकर ले जाना होता था। सड़क पार करने के बाद आपको लकड़ी के लट्ठों और कछुमों के ऊपर से कूदकर दूसरी तरफ जाना होता था। फ़िलाडेल्फ़िया के उलट गेम में आँखें बंद करने से कोई फायदा नहीं होता। गेम की कारों और ट्रकों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता या आप उन्हें देख रहे हैं या नहीं। उन्हें बस आपको कुशलने के लिए बनाया गया है तो उस गेम में आप किसी इंसान से नहीं बल्कि नेचर के नियमों से लड़ रहे हैं। वहाँ सिर्फ सच मायने रखता है। वहाँ अनजान या बेवकूफ बनने से कोई मदद नहीं मिलती लेकिन फिलाडल्फिया में आप दूसरे लोगों के साथ एक खेल खेल रहे हैं। यह नियम अलग हैं। यह अनजान या इग्नोरेंट या बेवकूफ बनना आपके काम आ सकता है। जब नतीजा सिर्फ नेचर पर टिका हो तो बेवकूफ बनने का कोई फायदा नहीं। अगर आप कार को नहीं देखेंगे तो नेचर आपके मेंढक को कुशल देगी और खेल खत्म, लेकिन जब आप दूसरे लोगों के साथ कोई खेल खेलते हैं तो सब कुछ बदल जाता है, जैसे फ़िलाडेल्फ़िया में सड़क पार करना जहाँ आपकी जीत दूसरों पर टिक्की है। वह अनजान या बेवकूफ दिखना बहुत काम की चीज़ हो सकती है।

मैं दिमाग की पढ़ाई करने वाला एक एक्सपर्ट हूँ। रिवोल्यूशनरी साइकोलॉजिस्ट हूँ। मैं अक्सर सोचता हूँ कि इंसान का दिमाग कैसे बना है? निशा ने हमें बहुत कमाल का बनाया है। हमारे दिमाग की वजह से ही हमने इस पेस में पहुंचने वाले जहाज़ बनाए और बेहतरीन कविताएं लिखीं। लेकिन हमारे दिमाग की इतनी तारीफ के बीच कुछ लोग इसकी बुराइ भी करते हैं। आजकल ऐसी किताबों और खबरों की बाढ़ आई है जो बताती है कि इंसान कितने? गलत फैसले लेता है। कैसे हम बेकार की बातों में आ जाते हैं और गाड़ी चलाते वक्त कितना बुरा बर्ताव करते हैं। मैं ये कह सकता था कि ये किताब सब कुछ ठीक कर देगी और बताए कि इंसान बुरा नहीं है, लेकिन ये किताब ऐसा नहीं करेगी। ये किताब स्थल में समझाने की कोशिश है कि हम जो करते हैं वो क्यों करते हैं? मैं ये दिखाना चाहता हूँ कि अगर हम बहुत बार गलत होते हैं तो उसके पीछे भी कोई वजह है। हमेशा सही होना ही सब कुछ नहीं होता। मेरी बात यह है कि हम जो अनजान या बेवकूफ बनते हैं। ये जो हम दोगलापन दिखाते हैं हाइपोक्रिटिकल वो इसलिए है क्योंकि हमारा दिमाग दूसरों के साथ चालाकी भरा खेल खेलने के लिए बना है। हमारा दिमाग इस बात का फायदा उठाता है कि हमेशा सब कुछ जानना। यह हमेशा सही होना हमारे लिए फायदेमंद नहीं होता। इंसान एक सोशल स्पीशीज़ है इसलिए

सही होने से कहीं ज्यादा जरूरी दूसरी चीजें होती हैं। सच तो ये है कि अनजान गलत। और बेवकूफ बनना आपको बहुत ज्यादा फायदा पहुंचा सकता है, बशर्ते आप इसे सही तरीके से करें। हमारा दिमाग एक नहीं बल्कि बहुत सारे अलग अलग हिस्सों से मिलकर बना है। ये हिस्से अक्सर एक दूसरे से बिल्कुल उल्टी बातें मानते हैं। कभी कभी तो ये साफ दिखता है जैसे जब किसी के दिमाग में चोट लग जाए या जब हमारी आँखें हमें धोखा देती हैं लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो आसानी से नहीं दिखती पर होती बहुत मजेदार है। एक फेमस कवि ने कहा था। क्या मैं अपने ही बात काटता हूँ? हाँ बिलकुल, क्योंकि मैं बहुत बड़ा हूँ और मेरे अंदर बहुत सारे लोग बसते हैं। हमारे दिमाग की बनावट ही ऐसी है कि हम एक ही समय पर दो अलग बातें सोच सकते हैं। इस किताब में मैं आपको ये समझाना चाहता हूँ। ये हमारा दिमाग बहुत सारी छोटी छोटी मशीनों या प्रोसेसर से बना है। इन्हें आप अपने मोबाइल के अलग अलग ऐप्स की तरह समझ सकते हैं। हर ऐप का अपना काम होता है और इसे नेशन ने एक खास गोल के लिए बनाया है। आप। कब क्या करते हैं ये इस पर डिपेंड करता है कि उस वक्त आपके दिमाग का कौन सा ऐप चल रहा है, क्योंकि अलग अलग समय पर अलग अलग हिस्सा राज़ करते हैं। इसलिए इंसान का बिहेव्यर थोड़ा उलझा हुआ होता है। इसमें हैरान होने वाली कोई बात

नहीं है। सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमारे दिमाग के अंदर क्या चल रहा है ये हमें खुद भी पता नहीं होता। हम अक्सर ये नहीं बता पाते कि हमने कोई काम क्यों किया? अगर आप मेरी तरह हैं तो आपने भी कई बार इस सवाल कहा किए। तुमने ऐसा क्यों किया? जवाब दिया होगा कि मुझे सच में नहीं पता। अच्छी खबर ये है कि दिमाग की पढ़ाई यानी साइकोलॉजी हमें ये समझने में मदद करती है कि ये हिस्से कैसे काम करते हैं। मेरा काम एवोल्यूशनरी साइकोलॉजी। है। जिसका मतलब है यह समझना कि नेचर ने हमारे दिमाग के हिस्सों को क्या काम सौंपा है, जैसे दिमाग का एक हिस्सा देखने के लिए है, एक भाषा समझने के लिए और एक शरीर को चलाने के लिए, वैसे ही बाकी हिस्सों के भी काम। है जैसे। साथ ही चुनना, दोस्त बनाना या दूसरों की बुराइ करना, ये किताब सिर्फ इस बारे में नहीं है कि हम बेवकूफी भरे फैसले क्यों लेते हैं। ये इस बारे में भी नहीं है कि हमारे अंदर एक दिल है और एक दिमाग। हम दिमाग को सिर्फ दो तीन हिस्सों में नहीं बांट सकते क्योंकि मामला उससे कहीं ज्यादा उलझा हुआ है। यह किताब उन बातों के बारे में है जो आपस में मेल नहीं खाती कॉन्ट्रेडिक्शन्स है। जैसे आपका एक मन करता है कि सुबह दौड़ पर जाएं। लेकिन दूसरा मन कहता है कि रजाई में सोए रहे। जब पैसे की तंगी हो, इकोनॉमिक

क्राइसिस हो, तब आप ये जानना भी चाहते हैं कि आपके बैंक में कितने पैसे बचे हैं और साथ ही डर के मारे चेक भी नहीं करना चाहते। आप चाहते हैं कि सरकार लोगों के काम में दखल न दे। लेकिन फिर भी आप चाहते हैं कि सरकार उन लोगों को रोके जो आपकी पसंद का काम नहीं कर रहे हैं। सबसे मजेदार बात ये है कि हमारे दिमाग में इतनी सारी उल्टी बातें चलती हैं पर हमें पता तक नहीं चलता। हम ऐसे समय पर अलग अलग बातें क्यों सोचते? हैं। इसका जवाब यही है कि नेचर ने दिमाग को बहुत सारे हिस्सों में बांटा है। बहुत सारे मॉड्यूल्स में यही से हमेशा मिलजुल कर काम नहीं करते। दिमाग के इन हिस्सों को आप अलग अलग इंसान की तरह समझ सकते हैं। कोई हिस्सा आपको मेहनती बनाता है, कोई आलसी। कोई समझदार तो कोई बिलकुल बुद्ध हो। आपको इनके बारे में पता भी नहीं चलता। ये बस अपना काम करते रहते हैं। अब मैं आपको ये साबित करूँगा की आप एक ही समय पर दो ऐसी बातों पर यकीन करते हैं जो एक दूसरे से बिलकुल अलग। है। हमारा दिमाग दो आधे हिस्सों में बंटा होता है लेफ्ट और राइट। आमतौर पर ये दोनों हिस्से एक तार कॉरपस कैलोसम के जरिए एक दूसरे से बात करते हैं और जानकारी बांटते। हैं। लेकिन कुछ मरीजों की बिमारी ठीक करने के लिए डॉक्टर इस तार को काट देते हैं। ऐसे में बाएं हिस्से को नहीं पता होता कि दायें हिस्सा क्या कर रहा

है। वैज्ञानिक ने ऐसे ही एक मरीज पर टेस्ट किया। नियम ये है कि आपकी दाईं आँख जो देखती है वो दिमाग के। बाएं हिस्से में जाता है और बाएं के जानकारी यानी लेफ्ट आई की जानकारी। दायें हिस्से में राइट ब्रेन में वैज्ञानिक ने उस आदमी को 172 फोटो दिखाई, लेफ्ट दिमाग को मुर्गी का पंजा दिखाया। राइट दिमाग को बर्फ़ का सीन दिखाया, फिर उसे बहुत सारे कार्ड्स दिखा कर कहा गया कि जो देखा है उससे जुड़ी चीजें चुनो। उसके दायें हाथ ने राइट हैंड ने, जिसे लेफ्ट ब्रेन चलाता है, मुर्गी चुनी। यह सही था। उसके लेफ्ट हाथ में जिसे राइट ब्रेन चलाता है बर्फ़ हटाने वाला फावड़ा चूना यह भी सही था लेकिन जब उससे पूछा गया कि उसने ये चीजें क्यों चुनी तो असली खेल शुरू होगा। बोलने का काम लेफ्ट ब्रेन का होता है। लेफ्ट ब्रेन ने मुर्गी तो देखी थी पर उसने बर्फ़ नहीं देखी थी। उसने देखा कि उसका लेफ्ट हैंड फावड़े पर टिका है। अब उसे कारण बताना था। उसने झट से झूठ बोल दिया। यह कहानी बना ली। यह फावड़ा मुर्गी का दरबा साफ करने के लिए है। सोचिए उसे सच नहीं पता था, फिर भी उसके दिमाग ने एक झूठी कहानी बना ली ताकि वह सही दिख सके। असल में उस मरीज का कोई एक सच नहीं था क्योंकि उसके दिमाग के दो हिस्से अलग अलग बातें देख रहे थे। हम सबके साथ भी ऐसा ही होता है।

बस हमारे दिमाग के तार कटे हुए नहीं है, फिर भी अलग अलग हिस्से अपनी मनमानी करते हैं। सिर्फ कटे हुए दिमाग वाले लोग ही नहीं बल्कि आम लोगों के साथ भी ऐसा होता है कि उनके दिमाग के दो हिस्से। अलग अलग बातों पर यकीन करते हैं। इसके कुछ बहुत मजेदार एग्ज़ैम्पल्स हैं। कई बार जिन लोगों का हाथ या पैर किसी वजह से काट दिया जाता है उन्हें फिर भी उस जगह पर दर्द महसूस होता है। अगर आप मुझसे पूछे तो वो कहेंगे की हाँ मेरा हाथ कट चूका है। लेकिन उनके दिमाग का एक हिस्सा अब भी यही मानता है कि हाथ वहीं है। एक बार एक डॉक्टर ने ऐसे ही एक मरीज को अपने गायब हाथ से कॉफी का कप पकड़ने को कहा। जैसे ही मरीज ने हाथ आगे बढ़ाया, डॉक्टर ने कप खींच लिया। मरीज दर्द से चिल्ला उठा। उसके दिमाग के एक हिस्से को पक्का यकीन था कि उसका हाथ वहाँ है और कब से टकरा गया है। फिर एक और है एलियन एंड सिंड्रोम जिद्दी हाथ ये एक बहुत अजीब बिमारी है। इसमें मरीज का एक हाथ उसकी बात नहीं मानता। वो हाथ अपनी मर्जी से काम करता है जैसे बटन खोल देना, खाना छीन लेना या कपड़े खींचना। मरीज को ऐसा लगता है जैसे उस हाथ का अपना अलग दिमाग है। कई बार तो मरीज अपने ही हाथ को तू कहकर डांटते हैं और दूसरा हाथ उसे रोकने की कोशिश करता है। ऐसा लगता है जैसे शरीर के अंदर ही दो लोग आपस में लड़ रहे हों।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहते हैं कि उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। वे पूरी तरह अंधे हैं लेकिन अगर आप उनके सामने एक्स या वो लिखकर पूछ रहे हैं कि क्या लिखा है? तो वे सही अंदाजा लगा लेते हैं। यहाँ दिमाग का एक हिस्सा जानता है कि सामने क्या है पर वो हिस्सा जो बोलता है उसे नहीं पता कि आंखें क्या देख रही हैं। इसलिए वो बार बार यही कहता है कि मैं तो अंधा हूँ पर असल में दिमाग का दूसरा हिस्सा सब देख रहा होता है। हमारा दिमाग अलग अलग डिब्बों यानी मॉडल्स की तरह काम करता है। कुछ डिब्बे एक दूसरे से बात करते हैं और जानकारी शेयर करते हैं। कुछ डिब्बे बिल्कुल अलग रहते हैं। उन्हें दूसरे डिब्बों की बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे वैज्ञानिक ने इनके अब सलूशन कहा है। इसका मतलब है एक डिब्बे की बात दूसरे तक नहीं पहुंचती। अगर दिमाग की ये गड़बड़ियां सिर्फ आँखों के धोखे तक ही सीमित रहती। तो शायद हमें इतनी चिंता करने की जरूरत नहीं थी, लेकिन कुछ गड़बड़ियां ऐसी होती हैं जिनसे लोग काफी परेशान हो जाते हैं। एक बड़े विद्वान ने एक बार कहा था कि दुनिया के दो सबसे बड़े मिस्ट्रीज़ हैं। पहला ये कि ये दुनिया बनी ही क्यों और दूसरा ये। जो लोग रात को अपने फ्रिज पर ताला क्यों लगाते हैं? अब फ्रिज पर ताला लगाने वाली बात को गॉड से समझिए। जो लोग डाइटिंग कर रहे होते हैं

उन्हें अक्सर सलाह दी जाती है कि खाने को खुद से दूर रखें या फ्रिज लॉक कर दें ताकि जब रात को अचानक कुछ खाने का मन करें। तो आलस की वजह से आप उठ कर न जाए, लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ी उलझन है। अगर आप रात को खाना नहीं चाहते तो बस मत खाइए। ताला लगाने की नौबत ही क्यों आई? बहुत से लोग और पैसे का मामला समझने वाले एक्सपर्ट्स से मानते हैं। कि इंसान का दिमाग एक ही टुकड़ा है। उनके हिसाब से दिमाग एक जादुई गेंद की तरह है। आप उससे कोई भी सवाल पूछें वो सारी जानकारी को इकट्ठा करेगा और एक सही जवाब दे देगा। अगर ये सच होता। तो चाहे रात के 12:00 बज रहे हो या सुबह के आठ, आपका जवाब ही चाहिए होता कि मुझे खाना नहीं खाना है, फिर ताले की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन मेरा मानना है कि दिमाग एक नहीं है बल्कि इसके अलग अलग हिस्से हैं। अलग अलग मॉड्यूल्स हैं। इस किताब को पढ़ते पढ़ते आप समझ जाएंगे कि फ्रिज पर ताला लगाना कोई रहस्य नहीं बल्कि दिमाग के अलग अलग हिस्सों की लड़ाई है। एक तरह की गड़बड़ी होती है दोगलापन यह हिपोक्रिसी इसका मतलब है दूसरों को। किसी काम के लिए बुरा भला कहना और खुद वही काम छिप कर करना, इसे समझने के लिए एक और रोबोट की कल्पना करें। मान लीजिए उस रोबोट के पास एक डायरी है जिसमें सारे नियम लिखें हैं कि क्या सही है और क्या गलत। जब वो किसी दूसरे को देखता है तो

अपनी डायरी देखता है और कहता है ये गलत है और जब वो खुद खुश करने जाता है तब भी वही डायरी देखता है। ऐसा रोबोट कभी हाइपोक्रिक नहीं हो सकता, कभी दोगला नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पास नियमों की एक ही लिस्ट है। पर हम इंसान ऐसे नहीं हैं। हमारे दिमाग में नियमों की कोई एक लिस्ट नहीं है। हमारे दिमाग में अलग अलग हिस्से हैं और हर हिस्से की अपनी अलग सोच है। इसी वजह से हम वो काम कर बैठते हैं जिन्हें हम दूसरों के लिए गलत बताते हैं। इंसान की बनावट ही ऐसी है कि उसमें दोगलापन होना आम बात है। भले ही आपको लगता हो कि आप एक ही इंसान हैं और सब कुछ आपके कंट्रोल में है, लेकिन सच ये है कि आपके अंदर बहुत सारे आप बसते हैं। ये सब मिलकर काम तो करते हैं पर अक्सर एक दूसरे की बात नहीं मानते। यही वजह है कि दुनिया में हर कोई सिर्फ आपको छोड़कर थोड़ा हिपोक्रिट नजर आता है। मशीनों में अगर हम कुछ आदतें डाल दें कुछ इंस्टिंक्ट। तो वे और भी समझदार लगने लगती हैं। इंसान भी एक तरह की नेचुरल मशीन ही है। जैसे जैसे एवोल्यूशन हुआ हमारे अंदर छोटे छोटे कई हिस्से जुड़ते गए। इससे हम समझदार तो बन गए पर हमारे अंदर ही अंदर झगड़े भी शुरू हो गए। एक बहुत ही दिलचस्प किताब है जिसमें सोचने वाली मशीनों का जिक्र है। मान लीजिए आपके पास माचिस के डिब्बी के बराबर एक छोटी खिलौना

कार है। इसके आगे एक सेंसर लगा है जो गर्मी को पहचानना है। हमने इसे ऐसे बनाया है। कि जितनी ज्यादा गर्मी होगी, इसके पहले उतने ही तेजी से उलटे घूमेंगे। अगर आप इस कार को देखे तो आप कहेंगे कि इसे गर्मी पसंद नहीं है। आप सोचिए अगर हम इसमें और भी सेंसर लगा दे, एक लाइट के लिए एक हिट के लिए एक फुड के लिए एक। ऑक्सीजन के लिए अविष्कार की अपनी पसंद ना पसंद होगी। हो सकता है इसे खाना तो पसंद हो पर गर्मी से नफरत हो। अगर खाना बहुत गर्म हो तो कार कॅफ्यूज हो जाएगी। उसका एक हिस्सा उसे खाने की तरफ खींचेगा और दूसरा हिस्सा उसे गर्मी से दूर भगाएगा यही हमारे दिमाग के साथ भी होता है। जब मैं मॉड्यूल कहता हूँ तो मेरा मतलब किसी इंट या ब्लॉक से नहीं है। ये एक छोटे कंप्यूटर प्रोग्राम जैसा है जिसका एक खास काम होता है। जैसे आपके फ़ोन में अलग अलग काम के लिए अलग अलग एप्प्स होते हैं, एक फोटो खींचने के लिए एक मैसेज भेजने के लिए वैसे ही दिमाग में भी अलग अलग एप्प्स या मॉड्यूल होते हैं एक मॉड्यूल का काम है खतरा देखना दूसरे का काम है दोस्त बनाना और तीसरे का काम है खाना ढूंढना। जब हम बहुत सारे छोटे, छोटे और कम समझदार ऐप्स को एक साथ जोड़ देते हैं तो एक बड़ी और बहुत स्मार्ट मशीन बन जाती है क्योंकि हमारे अंदर बहुत सारे मॉड्यूल हैं इसलिए उनमें झगड़ा होना पक्का है।

जैसे वो खिलौना का उसे खाना चाहिए पर गर्मी नहीं चाहिए। अगर खाना गर्म है तो वो क्या करेगी? यहाँ दो तरीके हो सकते। हैं। दोनों मॉड्यूल ज़ोर लगाएं और जो ज्यादा ताकतवर होगा कार उस तरफ जाएगी। एक नया कनेक्शन बनाया जाए जो कहे कि अगर खाना दिख जाए तो गर्मी वाले डर को कुछ देर के लिए भूल जाओ। पर जैसे जैसे दिमाग बड़ा होता गया, इतने सारे कनेक्शन बनाना मुश्किल होता गया। इसलिए अक्सर हमारे दिमाग के हिस्से आपस में बस। लड़ कर फैसला करते हैं। हमारा दिमाग आज की दुनिया के हिसाब से नहीं बना है। इसे हजारों साल पहले के जंगलों और गुफाओं वाले माहौल के हिसाब से बनाया गया। नहीं सर बहुत धीरे धीरे बदलती है हमारे पूर्वजों को जो मुश्किलें आती थीं। हमारा दिमाग भी आज भी उन्हीं को सुलझाने के लिए तैयार है। मछली के दिमाग में एक मॉड्यूल है। जो भी चीज़ पानी में हिले उसे खा लो। शिकारी इसी बात का फायदा उठाते हैं। वे कांटे में कीड़ा फंसाते हैं। मछली का पुराना मॉडल उसे खाने को कहता है और वो फंस जाती। है। पुराने समय में मीठा फल मिलना बहुत बड़ी बात थी क्योंकि उसमें कैलोरीज उसमें ताकत होती थी इसलिए हमारा दिमाग मीठा देखते ही पागल हो जाता है। आज हमारे पास मिठाई और कोल्ड ड्रिंक की कमी नहीं है, पर दिमाग का वो पुराना ऍप आज भी कहता है बस

खाते जाओ। इसी वजह से आज लोग बीमार पड़ रहे हैं। भले ही दुनिया बदल गई है पर जमीन और नेचर के कुछ नियम नहीं बदले। जैसे ग्रेविटी आज भी वैसे ही काम करती है। हम आज भी बीमार पड़ते हैं। हमारे आज भी दोस्त और दुश्मन होते हैं। इंसान और बाकी जो जंतु असल में नेचर की बनाई हुई मशीनें हैं पर हमारी मशीनों और नेचर की मशीनों में एक फर्क है। हम मशीनें अपने फायदे के लिए बनाते हैं, लेकिन नेचर ने हमें सिर्फ एक मकसद एक गोल्ड के लिए बनाया है। रिप्रोडक्शन अपनी नसल को आगे बढ़ाने के लिए हजारों सालों से नेचर ने हमें इस तरह तराशा है। ये हमारे शरीर का हर हिस्सा बन गया है। मेरे पास एक पत्ती वाला कीड़ा है। इसे देखकर कोई भी धोखा खा जाए। ये असली पत्ती है या कीड़ा है?

नेचर ने इसे ऐसा रंग और डिज़ैन दिया है। ये बिलकुल एक स्टडी हुई पत्ती जैसा दिखता है। इसकी ऐसी बनावट इस बात का सबूत है कि इसका काम क्या है? इसका काम है दुश्मनों से छिपना जैसे हमारी आँखें देखने के लिए बनी हैं, वैसे ही इस कीड़े का शरीर छिपने के लिए बना है। हमारा दिमाग भी इसी तरह। काम के हिसाब से बना है। इंजीनियरिंग का एक पक्का नियम है जो मशीन एक ही काम करती है वो उस काम को सबसे बेहतर तरीके से करती है। एग्ज़ैम्पल के तौर पर एक टोस्टर को ले लीजिए टोस्टर में ब्रेड के लिए खास जगह होती है? गर्म करने के लिए तार होते हैं और एक टाइमर होता है। इसे देखकर आप तुरंत समझ जाएंगे कि ये ब्रेड सेकने के लिए बना है। मगर आप चाहे तो टोस्टर को कागज़ दबाने के लिए या शीशे की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं, पर वो इन कामों में बहुत बेकार साबित होगा। टोस्टर सिर्फ। टोस्ट बनाने में एक्स्पर्ट है क्योंकि वो उसी के लिए बनाया गया है। हमारा दिमाग भी ऐसे ही टोस्टर जैसे बहुत सारे छोटे छोटे हिस्सों से बना है। कंप्यूटर की दुनिया में भी यही होता है। सॉफ्टवेयर बनाने वाले जानते हैं कि एक ही बड़ा प्रोग्राम बनाने से अच्छा है। कि छोटे छोटे बहुत सारे मॉडल्स बनाए जाए। ढेर सारे प्रोग्राम इसका सबसे अच्छा एग्ज़ैम्पल है। आई फ़ोन आई फ़ोन इतना काम का

क्यों है? क्योंकि इसमें हर काम के लिए एक अलग ऍप है। मौसम देखने के लिए अलग ऍप मैप्स के लिए अलग ऍप टॉर्च के लिए अलग ऍप अगर आप इन सबको मिलाकर एक ही ऐप बना देते तो वो बहुत धीमा और बेकार होता। हमारा दिमाग भी बिल्कुल फ़ोन जैसा है। इसमें हजारों छोटे छोटे दिमागी एप्प्स है या मॉडल्स है? कोई ऐप हमें लैंगुएज सीखाता है कोई ऐप हमें? दोस्त बनाने में मदद करता है और कोई ऐप हमें खतरे से बचाता है। इन हजारों स्पेशलाइज़्ड ऐप्स की वजह से ही हम इंसान इतने समझदार बन पाए हैं। कुल मिलाकर बात ये है कि अगर आप किसी एक काम में स्पेशलाइज़्ड बन जाते। हैं। तो आप उस काम को ज्यादा अच्छे से और तेजी से कर पाते हैं। नेचर भी इसी नियम पर चलती है। इसीलिए हमारे शरीर और दिमाग के हिस्से अलग अलग कामों के लिए बंटे हुए हैं। चिड़ियों को ही देख लीजिए, गलपगोस आइलैंड पर। अलग अलग तरह की चिड़िया मिलती हैं। किसी की चोंच सख्त बीज तोड़ने के लिए है, तो किसी के कीड़े पकड़ने के लिए जिसकी जैसी जरूरत वैसे उसकी चोंच जानवरों की दुनिया में भी। यही होता है मकड़ियां इनके। नन्हे से दिमाग में जला बुनने का एक खास प्रोग्राम फिट होता है। चमगादड़ ये आवाज की मदद से अंधेरे में भी शिकार ढूंढ लेते हैं। मधुमक्खियां ये नाचकर अपनी सहेलियों को बताती हैं कि खाना कहाँ है?

यही बात हमारे शरीर पर भी लागू होती है। हमारा दिल खून को पंप करने में एक्स्पर्ट है पर वो खून को साफ नहीं कर सकता। खून साफ करने का काम लिवर और किडनीस का। है। हर ऑर्गन, हर अंग अपना अपना काम बखूबी जानता है। यहाँ तक कि पैसे का मामला समझने वाले भी यही कहते हैं कि हर देश को वही चीज़ बनानी चाहिए जिसमें वो सबसे अच्छा है। इसे काम का बंटवारा या डिवीज़न ऑफ लेबर कहते। हैं। हमारी आँखें भी इसी तरह काम करती हैं। आँखों का सिस्टम सिर्फ देखने के लिए माना है। इसमें भी अलग अलग हिस्से हैं। कोई हिस्सा सिर्फ कोनों को पहचानना है तो कोई रंगों को यही लॉजिक हमारे दूसरों के साथ बर्ताव पर भी लागू होता है। दोस्त चुनना, जीवन साथी ढूंढना या दूसरों की बुराइ करना। इन सबके लिए दिमाग में अलग अलग हिस्से या ऐप्स बने हुए हैं। अक्सर चीजों पर लिखा होता है जनरल पर्पस यानी हर काम में आने वाली। पर सच तो ये है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती जो सब कुछ कर सके। गूगल भी सिर्फ। जानकारी सर्च करने के लिए स्पेशलाइज़्ड है। आपका इम्युन सिस्टम सिर्फ बीमारियों से लड़ने के लिए जैसे एक टोस्टर सिर्फ ब्रेड सेकने के लिए बना है, भले ही उसमें आप कोई और चीज़ भी गर्म कर ले पर वो बना तो ब्रेड के लिए ही है। एथलीट। ऑस्कर पिस्टोरियस की एग्ज़ैम्पल लीजिए। उनके दोनों पैर नहीं थे इसलिए वे नकली पैरों का इस्तेमाल करते थे।

मज़े की बात ये है कि उनके पास भागने के लिए अलग पैर थे और चलने के लिए अलग। जो पैर उन्हें तेजी से भगाते थे उनसे वो ठीक से चल नहीं पाते थे। हमारा दिमाग भी ऐसा ही है। वो बहुत सारी खास चीजों का एक बंडल है। दिमाग के ये अलग अलग हिस्से ये अलग अलग मॉड्यूल्स हमेशा एक दूसरे से बात नहीं करते कभी कभी इनके बीच एक दीवार होती। है। दिमाग के एक हिस्से को कुछ पता हो सकता है जो दूसरे हिस्सों को नहीं पता। इसी वजह से हमारे अंदर इतनी सारी उलटी पुलटी बातें यानी कॉन्ट्रेडिक्शन्स चलती रहती हैं। कभी कभी तो दिमाग जानबूझकर कुछ जानकारी छिपा लेता है क्योंकि कम जान नहीं हमारे लिए फायदेमंद होता है। डिज़्नीवर्ल्ड में एक बहुत मजेदार शो हुआ करता था, जिसका नाम था क्रेनियम कमांड। इसमें एक बहुत ही इंटरेस्टिंग कहानी दिखाई गई थी। कहानी ये थी कि हर इंसान के दिमाग के अंदर एक छोटा सा पायलट बैठा होता है। जोश इंसान को चलाता है। इस शो में बजी नाम का एक छोटा सा रोबोट 112 साल के लड़के बॉबी के दिमाग को कंट्रोल करता है। बजी के पास बहुत सारे बटन और स्क्रीन है। उसे दिल, पेट और दिमाग के अलग अलग हिस्सों से खबरें मिलती रहती हैं। जैसे ही बजी कोई बटन दबाता है। बॉबी वैसे ही काम करने लगता है। ये शो देखने में तो बहुत मजेदार है पर असीयत में हमारा दिमाग ऐसे काम नहीं करता।

क्यों? ज़रा सोचिये अगर बजी बॉबी को चला रहा है तो बजी को कौन चला रहा है? क्या बजी के दिमाग के अंदर भी कोई उससे भी छोटा पायलट बैठा है और उस छोटे पायलट। के अंदर कौन है ये बात कभी खत्म ही नहीं होगी। सच तो ये है कि दिमाग के अंदर कोई छोटा आदमी या बॉस नहीं बैठा होता। हमारा दिमाग बहुत सारे छोटे छोटे टुकड़ों से मिलकर बना है और यही टुकड़े मिलकर हमें समझदार बनाते। हैं। जैसा कि हमने पहले बात की थी, दिमाग बहुत सारे हिस्सों से बना है। बहुत सारे मॉड्यूल्स से हर हिस्से का अपना एक खास फंक्शन होता है। ये खास काम इसे आप अपने फ़ोन के ऐप्स की तरह समझिए। अगर आप अपने फ़ोन में एक छेद कर दें तो आप किसी एक खास ऐप को बाहर नहीं निकाल सकते क्योंकि वे सॉफ्टवेयर हैं, वैसे ही दिमाग के मॉड्यूल्स, दिमाग के हिस्से भी पूरे दिमाग में फैले हो सकते हैं। पर उनका काम तय होता है। शो में बॉबी को पता ही नहीं चलता कि बजी उसके लिए डिसीजन ले रहा है। हमारे साथ भी बिल्कुल ऐसा ही होता है। हमारे दिमाग के बहुत सारे हिस्से ऐसे काम करते हैं जिनकी हमें भनक तक नहीं लगती। जैसे जब आप किसी से बात करते हैं तो आपका बोलने वाला हिस्सा शब्द चुनता है पर उसे ये नहीं पता होता कि दिमाग के दूसरे हिस्सों ने वो बात क्यों चुनी। एक बहुत ही फेमस एक्स्पेरमेन्ट

हुई थी। इसमें वैज्ञानिक ने देखा कि जब कोई इंसान अपना हाथ हिलाने का फैसला लेता है। तो उसके दिमाग में हलचल यानी ब्रेन अक्टिविटीज फैसले का महसूस होने से पहले ही शुरू हो जाती है। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब ये है कि आपके दिमाग के किसी हिस्से ने हाथ हिलाने का फैसला पहले ही ले लिया था और आपको उसका पत्थर। थोड़ी देर बाद चला। आपको लगा कि मैंने अभी फैसला लिया पर सच ये है कि काम पहले ही शुरू हो चुका था तो फिर मैं कौन हूँ? अगर दिमाग में हजारों छोटे छोटे हिस्से हैं, हजारों छोटे छोटे मॉडल्स हैं। और वे अपना अपना काम कर रहे हैं तो फिर मैं यानी ये सेल्फ कौन है? अक्सर हमें लगता है कि जो हिस्सा बोल रहा है वही मैं हूँ। हमें लगता है कि हम ही सब कुछ कंट्रोल कर रहे हैं पर ये बस एक एहसास है। सच तो ये है कि दिमाग के हजारों हिस्सों में से किसी एक को मैं कहना गलत होगा। दिमाग में कोई एक खास बॉस नहीं है। वहाँ बस बहुत सारे छोटे छोटे समझदार पुर्जे हैं जो मिलजुल कर काम कर रहे। हैं। दिमाग का एक हिस्सा प्रेस सेक्रेटरी की तरह काम करता है। इसका काम है दुनिया को यह बताना कि आप कितने सही हैं और इसके लिए वह अक्सर चालाकी का सहारा लेता है। एक फेमस टीवी शो दी वेस्ट विंग था। इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति को एक बड़ी बिमारी थी। पर उन्होंने यह बात जनता से छिपा

कर रखी थी। उनकी प्रेस सेक्रेटरी सी जे क्रेग को भी इस बारे में कुछ नहीं पता था। सी जे ने राष्ट्रपति से बहुत चालाकी से पूछा था, क्या कोई ऐसी बात है जो मुझे जाननी चाहिए? राष्ट्रपति ने कहा, नहीं, यह एक बड़ा पिच है। सीजे ने जानबूझकर राष्ट्रपति से यह नहीं पूछा कि क्या ऐसी कोई बात है जो मुझे पता होनी चाहिए क्योंकि अगर वह ऐसा पूछती और राष्ट्रपति सच बोल देते तो सीजे को जनता को सच बताना। पड़ता पर क्योंकि वह अनजान बनी रही, इसलिए वह पूरी ईमानदारी। और भरोसे के साथ मीडिया के सामने कह सके कि राष्ट्रपति बिल्कुल हेल्ती है तो इस कहानी से क्या पता चलता है? कभी कभी कम जानना ही आपके लिए सबसे अच्छा होता है। अगर आपको सच नहीं पता तो आप बिना झूठ बोले दूसरों को यकीन दिला सकते हैं कि सब ठीक है। प्रेस सेक्रेटरी का काम सिर्फ खबरें देना नहीं होता, उसका असली काम है बातों को घूमा, फिरा कर इस तरह पेश करना कि सरकार अच्छी दिखे, जैसे किसी हार को नई स्ट्रैटेजिक है ना हमारे दिमाग का एक हिस्सा भी बिल्कुल ऐसा ही है। वह दुनिया को वही बातें बताता है जिससे हमारी इज्जत बनी रहे। इसे कार वाले खेल से समझिए। दो कारें तेजी से एक दूसरे की तरफ आ रही हैं जो पहले मुड़ेगा वो हार जाएगा अगर आप अपने स्टीयरिंग व्हील खिड़की से बाहर फेंक दे और

सामने वाला ड्राइवर ये देख ले। तो उसे मुड़ना ही पड़ेगा क्योंकि वो जानता है कि अब आप के हाथ में। कुछ नहीं है। लेकिन अगर सामने वाला ड्राइवर अपनी आँखों पर पट्टी बांध ले तो आपकी सारी छलाकी फैल हो जाएगी। यह अंधापन, ये अनजान बनना एक बड़ी ताकत है। हम सबको लगता है कि हम अपने दिमाग के मालिक हैं, पर सच तो ये है कि हम सिर्फ अपने दिमाग के प्रीसेक्रेटरी या खबरें हैं। हमारा काम भी समाज के सामने अपने दिमाग की सफाई पेश करना है। जैसे किसी कंपनी का पीआर यानी पब्लिक रिलेशन्स ऑफिसर सिर्फ वही बोलता है जो उसे बताया जाता है, वैसे ही आप भी सिर्फ अपने दिमाग के एक छोटे से हिस्से का रिप्रजेंटेशन कर रहे हैं। आपको खुद नहीं पता कि आपके दिमाग के बाकी हिस्से क्या खिचड़ी पका रहे हैं?

दिमाग के हिस्से एक दूसरे से बात क्यों नहीं कर पाते? इसे कंप्यूटर की फाइलें से समझिए। जैसे एक फोटो डॉट जेपीजी को आप गाना बजाने वाले ऐप में नहीं खोल सकते, वैसे ही दिमाग का देखने वाला हिस्सा। अपनी जानकारी को ऐसे तरीके में रखता है जिसे बोलने वाला हिस्सा नहीं पढ़ पाता। इसीलिए आपके अंदर हजारों कॉन्ट्रेडिक्शन्स हजारों उलटी पुलटी बातें एक साथ रह सकती हैं और आपको उनका पता भी नहीं चलता। दिमाग के अंदर बहुत सारी उलटी पुलटी बातें चलती रहती हैं। पर क्या ये कोई बहुत बड़ी चिंता की बात है?

क्या इस बात से फर्क पड़ता है की हम ये नहीं बता पाते की हमें कुछ चीजें गलत क्यों लगती हैं? शायद हाँ। दिमाग के इन अलग अलग हिस्सों को समझने से हमारी सोच बदल जाती है। अब हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि हमारे दिमाग का कोई एक बॉस है। इसके बजाय हमें ये समझना चाहिए कि अलग अलग समय पर दिमाग के अलग अलग हिस्से राज़ करते हैं। हम उस वक्त क्या करेंगे? ये इस बात पर डिपेंड करता है कि हम किस हालत में हैं, जैसे जंगल में भालू को देखकर हमारे अंदर बचने वाला हिस्सा तुरंत चालू हो जाता है और हमें वहाँ से भागने पर मजबूर कर देता है। हमारे दिमाती हिस्से जरूरत के हिसाब से चालू और बंद होते रहते हैं। कभी कभी बाहर की छोटी छोटी चीजें भी हमारे दिमाग के हिस्सों को जगा देती हैं और हमें पता तक नहीं चलता। एक स्टडी में लोगों को पैसे वाला एक खेल खिलाया गया। उन्हें चुनना था कि वे सेल्फिश बनेंगे। ये सबके साथ मिलकर चलेंगे। जब उन लोगों ने बस एक पल के लिए एक दूसरे की आँखों में झाँका तो वे दूसरों की मदद करने के लिए ज्यादा तैयार हो गए। बस एक छोटी सी नजर ने उनके मिलजुलकर रहने वाले हिस्से। यानी प्रो सोशल मॉड्यूल को जगा दिया। एक बहुत फेमस एक्स्पेरमेन्ट में एक सुंदर लड़की ने कुछ लड़कों से बात की। पहली हालत में बात एक ऊंची और हिलते हुए खतरनाक पुल पर हुई। दूसरी हालत में बात एक सेफ और

मजबूत पुल पर हुई। हिलते हुए पुल पर मिलने वाले करीब 50% लड़कों ने बाद में उस लड़की को फ़ोन किया जबकि सुरक्षित पुल वाले बहुत कम लड़कों ने ऐसा किया यहाँ हुआ जी कि पुल के डर से लड़कों का दिल तेज धड़का पर उनके दिमाग के खिस्से ने उसे प्यार या पसंद समझ लिया। उनके दिमाग को बेवकूफ बनाना कितना आसान था? दिमाग के हिस्से सिर्फ बाहर की चीजों से नहीं बल्कि अंदर की चीजों से भी बदलते हैं। जब आपको बहुत तेज भूख लगती है तो खाना ढोने वाला हिस्सा दिमाग पर कब्जा कर लेता है। इसीलिए कहते हैं। की भूखे पेट बाजार नहीं जाना चाहिए, वरना आप ऐसी चीजें खरीद लेंगे जिन्हें बाद में आपका दूसरा हिस्सा पसंद नहीं करेगा। 18 साल के लड़कों में अक्सर लड़की ढूंढने वाला हिस्सा ही सबसे ज्यादा अक्टिव रहता है। वहीं जब कोई नया माता पिता बनता है तो उनके अंदर। बच्चे का ख्याल रखने वाला हिस्सा अचानक जाग जाता है और बाकी सब पीछे छूट जाते हैं। अब समझते हैं कि डर क्या है? असल में डर और कुछ नहीं बल्कि दिमाग का एक तरीका है जब आप भालू देखते हैं। तो डर आपके खाने, पीने या रोमांस वाले ऐप्लिकेशंस को बंद कर देता है और सिर्फ जान बचाने वाला ऐप्लिकेशॅन जान बचाने वाला ऍप को चालू कर देता है। बहुत से पढ़े लिखे लोग और फिलोसोफर्स मानते हैं कि इंसान का दिमाग एक ही है।

इस बात से परेशान हो जाते हैं कि एक ही इंसान दो अलग बातें कैसे सोच सकता है? वह कहते हैं, एक आदमी एक ही समय पर दो अलग बातें कैसे मान सकता है? पर सच तो ये है कि इंसान कोई एक चीज़ नहीं है। आप एक ही समय पर एस वॅन, एस टू और शायद एस एयठ। 571 भी हो सकते हैं। आपके दिमाग के हजारों हिस्से हो सकते हैं और हर हिस्से की अपनी अलग बात हो सकती है। दिमाग के कोने में लाइनें बराबर हो सकती हैं और दूसरे कोने में छोटी बड़ी हमारा प्रेस सेक्रेटरी यानी बोलने वाला हिस्सा। अक्सर सच से अनजान रहता है। कभी कभी कम जानना ही उसके लिए अच्छा होता है ताकि वह दूसरों को पूरे भरोसे के साथ अपनी बात समझा सके। इसीलिए हमारे अंदर हिपोक्रिसी यानी दोगलापन पैदा होता। है एक हिस्सा कुछ बोलता है और दूसरा हिस्सा। कुछ और ही कर रहा होता है। अब यकीन के धोखे को देखिये बिलीफ के धोखे को मान लीजिये। कोई इस बात पर यकीन करता है ये कहना गलत है क्योंकि हो सकता है कि। उसके दिमाग का एक हिस्सा उस बात को माने और दूसरा ना माने। इसे समझने के लिए एक टेस्ट देखिए जिसे आई ए टी कहते हैं। इम्प्लिसिट असोसिएशन टेस्ट यह लोगों के मन के अंदर छिपे स्टीरियोटाइपिंग यानी भेदभाव को जांचने के लिए है। इस टेस्ट में लोगों को स्क्रीन पर नाम और अच्छे बुरे शब्द दिखाए जाते हैं।

रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि जब लोगों को ब्लैक नाम प्लस अच्छे शब्द को एक साथ जोड़ना होता है तो उनका दिमाग थोड़ा स्लो काम करता है। वहीं व्हाइट नाम और अच्छे शब्द को जोड़तें वक्त वे तेज होते हैं। जब वैज्ञानिक कहते हैं कि इंसान खुद को रोकता है तो वे एक बड़े बॉस की बात कर रहे होते हैं जो अंदर बैठा है पर असल में वहाँ कोई बॉस नहीं है वहाँ बस एक हिस्सा दूसरे हिस्से को दबा रहा होता है मैं। किसी बात पर बिलीव करता हूँ, मैं किसी बात पर यकीन करता हूँ, यह कहना बोलचाल में तो ठीक है, पर अगर हमें सच में समझना है कि हमारा दिमाग कैसे काम करता है तो हमें हर मॉड्यूल के बारे में अलग से सोचना होगा। हमें यह देखना होगा कि बिलीफ या यकीन? असल में दिमाग के किस डिब्बे, किस मॉड्यूल या हिस्से के अंदर हैं? दिमाग के बारे में गौरजी बात सोचिए आपके दिमाग के कुछ हिस्से बोलने वाले हिस्से यानी प्रेस सेक्रेटरी को खबर भेजते हैं और कुछ नहीं भेजते। इसका मतलब ये है कि आपके दिमाग के अंदर बहुत कुछ ऐसा चल रहा है जिसके बारे में आपको कभी पता ही नहीं चल सकता, जिसे आप कभी यह नहीं जान सकते की एक बैट को एक चमगादड़ को कैसा महसूस होता है, वैसे ही आप यह भी नहीं जान सकते। की आपके दिमाग के उन हिस्सों में क्या चल रहा है जो आपसे बात नहीं करते?

क्या पता आपके दिमाग के उन खामोश हिस्सों को भी सब कुछ महसूस होता हो। ये सोचना थोड़ा डरावना है की आपके सिर के अंदर कुछ ऐसे हिस्से हैं जो सब देख सुन रहे हैं। पर वे किसी को कुछ बता नहीं सकते। दिमाग के बारे में सबसे अच्छी बात फेमस वैज्ञानिक मार्टिन मिश्की ने कही थी। उन्होंने कहा था कि दिमाग छोटे छोटे एजेंट्स का एक सोसाइटी है। एक समाज है हर एजेंट की अपनी छोटी सी ताकत। है। कोई जानकारी रखता है, कोई दूसरों को काम करने का तरीका सीखाता है तो कोई गलत बातें सोचने पर रोक लगाता है। अकेला कोई भी एजेंट समझदार नहीं है, पर जब ये सब मिल जाते हैं तो एक बहुत समझदार मशीन एक स्मार्ट मशीन बन जाती है। कोई एक असली बॉस। या मैं जैसी चीज़ असल में होती ही नहीं है, ज्यादातर लोग और बड़े बड़े स्कॉलर्स यही सोचते हैं कि हमारा दिमाग सिर्फ इसलिए बना है ताकि वह सच को जान सके। वे कहते हैं कि अगर हमें सच नहीं पता होगा तो हम सही काम कैसे करेंगे। यह बात सुनने में तो सही लगती है पर पूरी तरह सच नहीं है। अक्सर सच जानना हमारे लिए नुकसान दे। यानी डैमेजिंग हो सकता है नेशन ने हमारा दिमाग सिर्फ स्वच्छ ढूंढने के लिए नहीं बल्कि हमें जिंदा रखने और अपनी नस्ल को बढ़ाने यानी। रिप्रोडक्शन के लिए बनाया है और इस काम में कभी कभी अनजान रहना ही सबसे अच्छा होता है।

सोचिए आप एक दुकान में शैम्पू खरीदने गए हैं, वहाँ 50 तरह के शैम्पू हैं और सबकी कीमत और क्वालिटी लगभग एक जैसी है। अगर आप हर एक की गहराई से रिसर्च करने बैठेंगे तो आपका पूरा दिन बर्बाद हो जाएगा। यही बात जीवनसाथी यानी मेट चुनने पर भी लागू होती है। अगर आप दुनिया के सबसे परफेक्ट इंसान को ढूंढने के चक्कर में अपनी पूरी उम्र लगा देंगे तो शायद आप। हमेशा अकेले ही रह जाएंगे। इसलिए हमारा दिमाग एक समय के बाद जानकारी जुटाना बंद कर देता है और कहता है जो मिला है वही काफी है। गुड एनफ कभी कभी सच न जानना हमें सेल्फिश हमें। स्वार्थी बनने की आज़ादी देता है, वह भी बिना बुरा महसूस किए। एक मजेदारी स्टडी में लोगों को दो ऑप्शन्ज़ दिए गए हैं। पहला आपको $5 मिलेंगे और दूसरे आदमी को भी $5 दूसरा ऑप्शन आपको $6 मिलेंगे और दूसरे आदमी को सिर्फ $1। ज्यादातर लोगों ने पहला वाला चुना क्योंकि वे अच्छा लिखना चाहते थे लेकिन जब दूसरे ग्रुप को यह मौका दिया गया कि वे अपनी मर्जी से $6 चुन लें और उन्हें यह पता ना चले कि दूसरे को क्या मिल रहा है तो बहुतों ने जानबूझकर सच जानने वाला बटन नहीं दबाया। उन्होंने $6 लिए और मन में सोचा मुझे क्या पता इन दूसरों को क्या मिला?

मैंने तो बस पैसे लिए समाज या लोग या सोसाइटी हम पर तभी ऊँगली उठाते हैं जब उन्हें पता हो कि हमें सच पता है, मान लीजिए घर में आग लगी है, आप बाहर खड़े हैं। और आपको बुरा लग रहा है तभी एक लड़का आकर चिल्लाता है, देखो खिड़की में एक बिल्ली फंसी है। अब आप मुसीबत में है, अगर आप बिल्ली को नहीं बचाएंगे तो लोग कहेंगे कि आप पत्थर दिल है, अगर बचाएंगे तो आपकी जान को खतरा है। अगर वह लड़का आपको न बताता तो आप चैन से घर चले जाते। और आपकी रेपुटेशन, आपकी इज्जत पर कोई दाग नहीं लगता। एक ट्रेन तेजी से आ रही है और पांच लोगों को कुचलने वाली है। आपके पास एक बाहरी आदमी खड़ा है। अगर आप उसे धक्का देकर पटरी पर गिरा दें तो ट्रेन रुक जाएगी और पांच लोग बच जाएंगे। पर वह आदमी मर जाएगा। ज्यादातर लोग कहते हैं कि धक्का देना गलत है, लेकिन इस सच को जानना ही आपको एक ऐसे धर्म संकट एक ऐसे डिलेमा में डाल देता है जहाँ आप चाहे जो करें रिसाल्ट बुरा ही होगा। एक फेमस टीवी शो में एक पुलिस अफसर बहुत अच्छी बात कहता है। शहर में बाहर शराब पीना मना था, अब पुलिस हर किसी को तो पकड़ नहीं सकती थी वरना वे असली अपराधियों। को कब पकड़ते तो इसका सलूशन लोगों ने खो ढूंढ लिया। उन्होंने शराब के बोतल को एक कागज के भूरे लिफाफे में डालना शुरू कर दिया। अब पुलिस को पता तो था कि अंदर

क्या है? पर वे कह सकते थे कि हमने तो बोतल ठीक ही नहीं। इस तरह पुलिस का काम भी आसान हो गया और लोगों को भी परेशानी नहीं हुई। मान लीजिए किसी को लगता है की उसे कोई इन्फेक्शन हो सकता है? इलाज के लिए टेस्ट करवाना अच्छी बात है। प्रतिमा के कुछ मॉड्यूल्स, कुछ हिस्से जानबूझकर इससे बचते हैं। क्यों? क्योंकि अगर ट्विस्ट पॉज़िटिव आ गया तो उस इंसान को अपने साथियों को यह बताना पड़ेगा अगर वही नहीं बताता। तो उस पर जान बूझकर दूसरों की जान खतरे में डालने का इलज़ाम लग सकता है लेकिन अगर वो टेस्ट ही ना करवाएं तो हम मज़े से कह सकते हैं कि अरे मुझे तो पता ही नहीं था कि मैं बीमार हूँ। यहाँ अनजान रहने का मकसद अपनी सेहत बचाना नहीं बल्कि अपनी इमेज बचाना है। अभी तक हमने देखा कि दिमाग कुछ जानकारीयों से दूर भागता है। वह हम एक बहुत बड़ी बात समझेंगे। हमारा बोलने वाला हिस्सा। हमारा प्रेस सेक्रेटरी कभी कभी जानबूझकर गलत जानकारी रखता है यानी? दिमाग में जान बूझकर झूठ बोलता है, ऐसा क्यों है? इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण। है। इंसान एक समाज में रहने वाला जीव। है। बाकी जानवरों के लिए सिर्फ खाना और बचना जरूरी है। पर इंसानों के लिए सबसे जरूरी चीज़ है समाज लोग। हमारी तरक्की हमारा सक्सेस इस बात पर टिक्की है कि हम दोस्त और साथी कैसे बनाते हैं?

दर्द नेचर का तरीका है यह बताने का कि कुछ बुरा हो रहा है और खुशी का मतलब है कि आप सही काम कर रहे हैं। मज़े की बात ये है। कि समाज से बाहर निकाला जाना उतना ही दर्दनाक होता है जितना की शरीर में चोट लगना। एक स्टडी में देखा गया कि जब लोगों को किसी ग्रुप से बाहर कर दिया जाता है तो उन्हें उतना ही दुख और दर्द होता है जितना कि बच्चे पैदा करते समय या पीठ के पुराने दर्द में होता है। हम सब अच्छे साथी, अच्छे दोस्त और अच्छे ग्रुप का हिस्सा बनने के लिए कॉम्पिटिशन करते हैं। लोग दूसरों के बारे में फैसला लेने में बहुत तेज होते हैं। रिसर्च कहती है कि हम किसी को सिर्फ 30 सेकंड देख कर ही बता देते हैं। की वह कैसा इंसान है? इसे थिन स्लाइसिंग कहते हैं। हैरानी की बात ये है कि 30 सेकंड की जान पहचान उतनी ही सही होती है जितनी की 5 मिनट की। यानी हमारा दिमाग बहुत कम इन्फॉर्मेशन में भी बड़े रिजल्ट्स निकाल लेता है। हम जो भी करते हैं या बोलते हैं, लोग उससे हमारे बारे में अंदाजा लगाते हैं। आप इसे लीक होना कह सकते हैं। हमारे दिमाग के अंदर जो चल रहा है वह हमारी बातों और कामों के जरिए बाहर लीक हो जाता है। इसी से दूसरे लोग हमारे बारे में अपनी राय अपनी ओपिनियन बनाते हैं। इसीलिए हमारे दिमाग का वह हिस्सा जो बोलता है उसे इस तरह बनाया गया है कि वह हमारी सबसे अच्छी फोटो

दूसरों को दिखाए। जो लोग ऊंचे पदों पर पहुंचते हैं, वे अक्सर पहले से ही यह मानकर चलते हैं। वे वहाँ पहुंचने के लायक है उनका यह पागलपन जैसा भरोसा ही उन्हें वहाँ पहुंचा देता है फर्म्स यात्री क्रिस्टोफर कोलंबस ने एक बार बहुत सलाह दी थी। जब वह समुद्र के रास्ते नई दुनिया की खोज पर निकला तो उसने दो रिकॉर्ड्स रखे थे दो। लॉक्स? पहला दिखावे वाला रिकॉर्ड था। इसमें उसने जानबूझकर दिखाया कि जहाज बहुत कम दूर चला है ताकि उसके साथी डरे नहीं और दूसरा असली रिकॉर्ड इसमें उसने सही दूरी लिखी थी ताकि वह खुद राजस्थान में भटक जाए। हमारा दिमाग भी बिल्कुल ऐसा ही करता है। वह एक रिकॉर्ड दुनिया को दिखाने के लिए रखता है जिसमें हम बहुत महान और अच्छे दिखते हैं और दूसरा असली रिकॉर्ड अंदर कहीं छिपा कर रखता है, जिससे वह जरूरत पड़ने पर ही इस्तेमाल करता है। दुनिया में बहुत से लोग ऐसी बातों पर यकीन करते हैं। जिन्हें साइंस या नेचर के नियमों से नहीं समझाया जा सकता। शायद आपको लगे कि ये सब गलत है, पर इसके पीछे भी समाज लोग का एक बड़ा कारण है। पुराने समय में अगर आप वह नहीं मानते थे जो आपके आस पास के लोग या राजा मानते थे। तो आपको जान से मारा जा सकता था। आज भी अगर आप अपने समाज की खास बातों को नहीं मानेंगे तो लोग आपको अपने ग्रुप से बाहर निकाल

सकते हैं। इसलिए दिमाग के लिए कभी कभी सचे जानने से ज्यादा जरूरी यह होता है कि वह ऐसी बातें मानें। जिससे उसके बहुत सारे दोस्त और मददगार बन सके। अकेले सच जानकर भूखा मरने से अच्छा है कि आप सब के साथ मिलकर वह माने जो सब मान रहे हैं। अब हम खुद को धोखा देने यानी सेल्फ डिसेप्शन की बात करेंगे। कभी कभी जानबूझकर गलत होना हमारे लिए फायदेमंद होता है। हमारा दिमाग कुछ बातों को इस तरह गलत मानता है कि अगर दूसरे भी उस पर यकीन कर लें तो हमें समाज, लोग या सोसाइटी के बीच एक बढ़त मिल जाती है। अगर हम मान लें। कि दिमाग में बहुत सारे हिस्से हैं तो यह समझना आसान हो जाता है कि एक इंसान एक ही समय पर किसी बात को जान भी सकता है और उससे अनजान भी रह सकता है। क्या आप जानते हैं कि एक रिसर्च में 19 4% कॉलेज टीचरों ने खुद को एवरेज औसत से बेहतर माना। और 68% ने तो खुद को सबसे टॉप क्वार्टर में रखा। मैथ के हिसाब से यह नामुमकिन है कि 19 4% लोग एवरेज से ऊपर हों। इसका मतलब है कि बहुत सारे लोग शायद मैं भी गलत हों इसे लेख। वो बेगन इफेक्ट कहते हैं। ये वहम उन चीजों में ज्यादा होता है जो साफ साफ नहीं दिखती, जिसे ड्राइविंग करना या अच्छा इंसान होना। एक टेस्ट में करीब 10,00,000 छात्रों से पूछा गया कि वे दूसरों के साथ घुलने मिलने में कितने अच्छे हैं?

25% छात्रों ने कहा कि वे इस काम में दुनिया के सबसे टॉप 1% लोगों में आते हैं। क्यों हमारा दिमाग हमें खुद के बारे में इतना बढ़ा चढ़ाकर बताता है? इसे एक भूखे चिड़िया के बच्चे की कहानी से समझते हैं। घोसले में कई बच्चे होते हैं। माँ उसी को खाना खिलाती है जो सबसे ज्यादा भूखा होता है। इसलिए हर बच्चा अपनी पूरी ताकत लगाकर चिल्लाता है ताकि वह सबसे ज्यादा भूखा दिखे। इंसानों के साथ भी ऐसा ही है अगर आप खुद को काबिल या कापबल और बहुत अच्छा मानेंगे। तो आपके बिहेव्यर से यह बात दूसरों तक पहुंचेगी। अगर आप खुद को एक्स्पर्ट मानेंगे तो आप दूसरों को भी आसानी से यकीन दिला पाएंगे कि आप सच में एक्स्पर्ट हैं। हमारा दिमाग एक प्रचार करने वाली मशीन की तरह एक प्रोपेगेंडा मशीन की तरह काम करता है। क्या आपको अपनी असली शक्ल पता है आपका असली फेस?

एक मजेदार स्टडी में लोगों को उनकी अपनी फोटो दिखाई गई, जिसे कंप्यूटर से थोड़ा ज्यादा अट्रैक्टिव बना दिया गया था। ज्यादातर लोगों ने उसे सुंदर फोटो को अपनी असली फोटो बताया। ड्राइविंग के मामले में भी यही हाल है। वैज्ञानिक ने उन 50 ड्राइवरों का इंटरव्यू लिया। जीतने, बुरे अक्सीडेंट के बाद हॉस्पिटल में थे कि उनकी गाड़ी पलट गई थी। पुलिस के हिसाब से उनमें से ज्यादातर की ही गलती थी। और उन ड्राइवरों ने भी खुद को बहुत अच्छा ड्राइवर बताया। रियलिटी से टकराने के बाद भी वे अपनी एबिलिटी के बारे में गलतफहमी में थे। हमारा दिमाग बहुत छलाक है। वो उन बातों को चुन चुन कर यहाँ रखता है जो हमें अच्छा महसूस कराती। हैं। और उन बातों को भूल जाता है जिनसे हमारी इज्जत हमारी रेपुटेशन कम होती हो। सबसे मजेदार बात तो यह है कि हमें लगता है कि बाकी सब लोग तो अपनी तारीफ के पुल बांधते हैं और बायस्ड हैं पर मैं बिल्कुल सच देखता हूँ। जब स्टूडेंट्स से पूछा गया कि क्या उन पर इन दिमागी कमियों का असर पड़ता है तो सब ने कहा दूसरों पर पड़ता होगा मुझ पर नहीं तो हमारा दिमाग हमें खुद के बारे में झूठ इसलिए बोलता है ताकि हम समाज लोग इनके सामने अपनी एक बहुत अच्छी तस्वीर पेश कर सकें। यह झूठ हमें दूसरों को प्रभावित करने और अपनी जगह पक्की करने में मदद करता है।

एक एग्ज़ैम्पल फैंटेसी फुटबॉल में भी ये दिखता है। ये एक तरह का खेल है। अगर कोई खिलाड़ी सिर्फ किस्मत की वजह से जीत रहा हो तो भी वह यही कहेगा। कि ये मेरी बढ़िया स्ट्रेटेजी का नतीजा है। यहाँ तक कि नेता भी यही करते हैं। अगर तेल की कीमतें कम हो जाए तो वे कहेंगे मार्केट हमारी बातों की वजह से सुधर रहा है। समाज लोगों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए सिर्फ अच्छा होना काफी नहीं है। बल्कि दूसरों से बेहतर होना जरूरी है। इसे एक एग्ज़ैम्पल से समझते हैं जिसे बैंकर्स पैराडॉक्स कहते हैं। बैंक उन्हीं को पैसा उधार देता है। जिनके पास पहले से पैसा हो वैसे ही हम उन्हीं से दोस्ती करना चाहते हैं, जो हमें फ्यूचर में काम आ सके। इसलिए हर कोई यह दिखाने की कोशिश करता है कि वह सबसे खास और वैल्यूएबल है। फेमस स्कॉलर विलियम जेम्स ने कहा था कि अगर कोई साइकोलॉजिस्ट है तो उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उसे दूसरी भाषाओं का ज्ञान नहीं है। लेकिन अगर कोई उससे बड़ा मनोवैज्ञानिक मिल जाए, उससे बड़ा साइकोलॉजिस्ट तो उसे बहुत बुरा लगता है। हमें दुख तब नहीं होता जब हम दुनिया में पीछे होते हैं। दुख तब होता है जब हम अपने खास मुकाबले में दूसरे नंबर पर आते हैं। एक और एक्स्पेरमेन्ट में देखा गया कि हम अपने दोस्तों के साथ कैसा बिहेव् करते हैं। लोगों को एक शब्दों वाला गेम

खेलने को कहा गया। जब खेल को सिर्फ मज़े के लिए बताया गया तो लोगों ने अपने दोस्तों को आसान क्लूज दिए। आसान सुराग ताकि उनका दोस्त जीत सके। पर जब खेल को बुद्धिमानी की पहचान बताया गया इन्टेलिजेन्स टेस्ट तो लोगों ने अपने दोस्तों को कठिन क्लूज़ दिए। कठिन सुराग और अनजान लोगों को आसान यहाँ दिमाग का एक हिस्सा चाहता है कि दोस्त हमसे आगे ना निकल जाए ताकि समाज लोग में। हमारी इम्पोर्टेंस कम न हो जाए। पर जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने यही कहा कि वे सबके साथ ईमानदार थे, फेयर थे एक और चीज़ जो हमारा दिमाग हमें गलत दिखाता है, वह है बिना वजह की उम्मीद अनजस्टिफ़ायबल ऑप्टिमिस्म हमें लगता है कि हमारे साथ तो सब अच्छा ही होगा जिससे करियर में कामयाबी और बुरी चीजें जैसे अक्सीडेंट सिर्फ दूसरों के साथ होंगी। अगर हम स्टेटिस्टिक्स देखें तो यह बिल्कुल गलत है। समाज या लो के बीच रहने के लिए ऑप्टिमिज्म रखना एक। अच्छी स्ट्रेटेजी है। अगर मैं आपको यकीन दिला दूँ कि मेरा फ्यूचर बहुत शानदार है, तो आप मुझसे दोस्ती करना चाहेंगे। फ्यूचर के बारे में झूठ बोलना आसान है क्योंकि वो अभी तक हुआ ही नहीं है। दूसरी तरफ जो लोग हमेशा बुरा सोचते हैं, जो पेसिमिस्टिक हैं। उन्हें लोग कम पसंद करते हैं, लेकिन याद रहे अगर आप अकेले कोई काम कर रहे हैं जैसे फ्रॉगर गेम खेलना तो रियलिटी जानना ही बेहतर

है। ज्यादा उम्मीद के चक्कर में आप गलत फैसला ले सकते हैं और अपना नुकसान कर सकते हैं। आपको लगता होगा कि वैज्ञानिक सिर्फ सच की तलाश करते हैं, पर वे भी इंसान हैं। विज्ञान की दुनिया में नई खोज की कीमत बहुत हैं। अपनी बात को नया दिखाने के लिए कई वैज्ञानिक दूसरों की बातों को गलत तरीके से पेश करते हैं। वो किसी पुराने वैज्ञानिक की बात उठाते हैं, उसे थोड़ा थोड़ा मरोड़कर पेश करते हैं। जैसे की उस पुराने वैज्ञानिक ने कुछ गलत कहा हो और फिर अपनी बात को सुधार के रूप में इम्प्रूवमेंट के रूप में पेश करते हैं, चाहे वो खुद की तारीफ। हो? फ्यूचर की उम्मीद हो या बिना काम की दवा। हमारा दिमाग जानबूझकर हमें गलत दिखाता है ताकि हम समाज में बेहतर दिख सके और हमारा शरीर बेहतर तरीके से काम कर सके। चलिए आगे बढ़ने से पहले एक बार पीछे मुड़कर देख लेते हैं कि हमने अब तक क्या क्या बातें की?

मैंने खास शब्द का इस्तेमाल किया है स्ट्रेटेजिकली रॉन्ग इसका आसान मतलब है कि फायदे के लिए गलत होना। कुछ लोग इसे पॉज़िटिव इलूशन या हसीन सपने भी कहते हैं। पर मुझे फायदे के लिए गलत होना शब्द ज़्यादा पसंद है। क्यों? क्योंकि अब बताता है कि हमारा दिमाग ऐसा जानबूझकर करता है। इसका असली मकसद है दूसरों को अपनी बातों पर यकीन दिलाना। अगर दूसरे लोग आपकी उन बातों को सच मान लें जो असल में गलत है तो इसमें आपका ही फायदा होता है। बहुत से लोग इन बातों को खुद को धोखा देना कहते हैं। जैसे मेरी टीम पक्का जीतेगी, भले ही वो बुरी तरह हार रही हो। मैं दुनिया का सबसे अच्छा ड्राइवर हूँ, भले ही मैंने अभी अभी गाड़ी ठोक दी हो। अगर मैं पासा ठीक से फेंकू तो मेरी मर्जी का नंबर आएगा। अगर हम यह सोचेंगे, हमारा दिमाग एक ही टुकड़ा है तो यह बात बड़ी अजीब लगती है। कोई खुद को धोखा कैसे दे सकता है? पर अगर हम दिमाग को छोटे छोटे हिस्सों के रूप में देखें तो यह सब बहुत सिंपल हो जाता है। दिमाग के कुछ हिस्से सिर्फ प्रोपगंडा करने के लिए मने हैं जैसे किसी नेता का खबरे झूठ फैलाता है वैसे ही ये हिस्से आपके बारे में अच्छी अच्छी बाते फैलातें हैं। इनका काम सच बोलना नहीं बल्कि आपको महान दिखाना है। साइकोलॉजी की किताबों में सेल्फ यानी मैं शब्द का बहुत इस्तेमाल

होता है, पर मेरा मानना है कि जब भी आप ये शब्द सुनें तो सावधान हो जाए। हमारे सिर के अंदर कोई एक मैं नहीं बैठा है बल्कि बहुत सारे छोटे छोटे मॉड्यूल्स अपना अपना काम कर रहे हैं। यहाँ कोई किसी को धोखा नहीं दे रहा, बस अलग अलग हिस्से अपना काम कर रहे हैं। कभी कभी सच जानना बहुत जरूरी होता है और कभी कभी गलत होना फायदेमंद तो हमारे दिमाग में एक ही समय पर दो अलग बातें चल सकती हैं बाहर दिखाने के लिए दिमाग का एक हिस्सा। प्रेस सेक्रेटरी ये दुनिया को दिखाने के लिए गलत बात मानेगा ताकि लोग आपसे इम्प्रेस हो सके। दिमाग का दूसरा हिस्सा असली सच जानता होगा ताकि आप सही फैसला ले सकें। हमारा दिमाग खुश रहने के लिए नहीं बना है वह। काम करने के लिए बना है। हम खुद को बढ़ा चाह कर इसलिए दिखाते हैं ताकि समाज और लोग हमें पसंद करें और हम से जुड़े ये सिर्फ एक स्ट्रेटेजी है, कोई दिमागी बिमारी नहीं, हमारा दिमाग इस तरह बना है। कि हमें हजारों तरह के फीलिंग्स होते हैं, पर ज़रा सोचिये अगर हमारा दिमाग ऐसा होता कि दुनिया में कुछ भी हो रहा हो, हमें सिर्फ खुशी ही महसूस होती, हमेशा मज़ा आता रहता। सुनने में तो अच्छा लगता है पर रेवोलुशन के हिसाब से ऐसा दिमाग किसी काम का नहीं है। क्यों? क्योंकि नेचर को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितना नाखुश महसूस कर रहे हैं।

उसे सिर्फ इस बात से मतलब है कि आप क्या कर रहे हैं खुशी या दुख अपने आप में कोई मायने नहीं रखते अगर किसी के पास ऐसा दिमाग हो जो उसे हमेशा बहुत खुश रखे। पर वह अपनी जान बचाने या परिवार बढ़ाने के लिए कुछ न करे तो ऐसा इंसान और उसके जीन्स रेस में पीछे छूट जाएंगे। यही वजह है कि दर्द होना बहुत जरूरी है। दर्द नेचर का तरीका है, आपको काम पर लगाने का हाथ से हाथ हटाओ। खराब खाना थूको कुदरत को नेचर को आपकी खुशी में तभी इंट्रेस्ट है, जब वह आपको कोई जरूरी चीज़ यानी अडैप्टिव गोल हासिल करने में मदद करे। अगर किसी के सामने भालू खड़ा हो और उसका दिमाग उसे डर के बजाए बहुत सुकून और। खुशी महसूस कराये तो ये आदमी भालू से भागेगा नहीं। वो भालू को गले लगाने की सोचेगा और रिसाल्ट ये होगा कि भालू उसे खा जाएगा। ऐसे दिमाग को हम कहते हैं भालू का खाना बनाने वाला दिमाग। नेचर खुशी के मामले में बहुत लालची है। मान लीजिए आपने 15 साल मेहनत की और आपको मन चाही, नौकरी मिल गई। आपको लगेगा कि अब तो मैं पूरी जिंदगी खुश रहूंगा पर ऐसा नहीं होता। थोड़े समय बाद आप फिर से उतने ही खुश या दुखी हो जाएंगे। जीतने पहले थे। अब आपका दिमाग किसी और बड़ी चीज़ के पीछे भागने लगेगा। इसे खुशी की दौड़ हेडोनिक ट्रेड मिल कहते हैं। ये नेचर का तरीका है आपके सामने गाजर लटकाए रखने का ताकि आप कभी

थक कर न बैठें और हमेशा काम करते रहें। अक्सर लोग कहते हैं कि हमें अपनी इज्जत, अपनी सेल्फ स्टीम बढ़ाने के लिए खुद को धोखा देना पड़ता है। पर सच तो ये है कि सेल्फ स्टीम अपने आप में कोई मंजिल नहीं है। हम खुद को खुश रखने के लिए धोखा नहीं देते बल्कि फायदे के लिए ऐसा करते हैं। अनजान रहना या गलत होना कभी कभी समाज में अपनी जगह पक्की करने की एक स्ट्रेटेजी होती है। हमने बात की थी कि एक विद्वान के हिसाब से एक स्कॉलर के हिसाब से दो सबसे बड़े रहस्य हैं। पहला ये कि दुनिया बनी है क्यों?

और दूसरा ये कि लोग रात को अपने फ्रिज पर अपने रेफ्रीजिरेटर पर ताला क्यों लगाते हैं? अब इस सेक्शन में हम दूसरे रहस्य को सुलझाएंगे। इकोनॉमिक्स समझने वाले एक्सपर्ट्स मानते हैं कि हर इंसान की अपनी कुछ पसंद होती है। जैसे मुझे मीठा स्कीइंग और मेरी गर्लफ्रेंड पसंद है। अब एक्सपर्ट्स का कहना है कि हमारी पसंद एक लिस्ट की तरह जमी हुई होती है। अगर मुझे सेब के मुकाबले चॉकलेट केक ज्यादा पसंद है तो मैं हमेशा केक ही चुनूंगा। उनके हिसाब से हमारा दिमाग एक। मैजिक बॉल जैसा है एक जादुई गेंद जैसा चाहे रात के 8:00 बजे हो या रात के 12। अगर आप उससे पूछेंगे कि क्या मुझे केक खाना चाहिए तो वो हमेशा एक ही जवाब देगा। अगर आपकी सेहत आपके लिए केक से ज्यादा जरूरी है तो आपका जवाब हमेशा नहीं होना चाहिए। फिर फ्रिज पर ताला लगाने की नौबत क्यों आती है?

अगर आप रात को केक नहीं खाना चाहते तो आप उसे नहीं खाएंगे और अगर आप खाना चाहते हैं तो ताला लगाकर अपना ही रास्ता क्यों रोक रहे हैं? यह बात एक्सपर्ट्स को बड़ी उलझी हुई लगती है, लेकिन मेरा मानना अलग है। दिमाग कोई जादुई गेंद नहीं है बल्कि बहुत सारे छोटे छोटे मॉड्यूल्स छोटे छोटे हिस्सों का एक ग्रुप है। हर हिस्सा अपनी मर्जी चलाता है। सोचिए आपको काफी ज्यादा पसंद है या रेड वाइन? इसका जवाब इस बात पर टिका है कि अभी वक्त क्या हुआ है? सुबह 8:00 बजे मुझे कॉफ़ी चाहिए 1 नहीं पर रात को 8:00 बजे मुझे 1 चाहिए कॉफ़ी नहीं तो क्या मेरी पसंद बदल गई? हाँ। हमारी पसंद इस बात पर डिपेंड करती है कि हम किस एनवायरनमेंट या वक्त में हैं। जैसे हमारी कोई एक रियल बिलीव नहीं होती। एक असली बात वैसे ही हमारी कोई एक असली पसंद एक रियल परेफरेंस भी नहीं होती। हमारा दिमाग हजारों टुकड़ों से बना है, कभी कोई हिस्सा जीत जाता है तो कभी कोई। इसलिए हम कभी खुद पर काबू रख पाते हैं और कभी फ्रिज का ताला तोड़कर केक खा लेते हैं। आखिर हमारा दिमाग ऐसा क्यों काम करता है?

क्या एक ऐसा दिमाग बेहतर नहीं होता जो हर वक्त एक जैसा रहे? चाहे कॉन्टेक्स्ट कैसा भी हो, इकोनॉमिक्स समझने वाले शायद यही कहेंगे पर हकीकत हैसी नहीं है। हमारे दिमाग के अलग अलग हिस्से अलग अलग माहौल में जागते हैं। दिमाग के कुछ हिस्से सिर्फ आपकी आज की जरूरतों को पूरा करने के लिए बने हैं। बायोलोजी में इन्हें फोर ऐप्स कहा जाता है। फीडिंग यानी खाना फ्लीइंग यानी भागना फाइटिंग यानी लड़ना और मिलना यानी सिक्स। अगर हमारे पूर्वजों में ये हिस्से न होते तो वे अपनी नस्ल आगे नहीं बढ़ा पाते। ये हिस्से हमें तुरंत मिलने वाली खुशी यानी इन्स्टंट ग्रेटिफिकेशन की तरफ ले जाते हैं, जैसे मीठा और तला हुआ खाना, सुबह देर तक रजाई में सोए रहना, ताकत बचाने के लिए बिना सोचे समझे किसी की तरफ खींचे चले जाना। इसे ऐसे समझें कि यहीं से तब राज़ करते हैं जब आपको लगे कि कल। हो ना हो। दूसरी तरफ हमारे पास कुछ ऐसे हिस्से भी हैं जो दूर की सोचते हैं। ये हिस्से ही हमें सुबह जल्दी उठकर दौड़ने पर मजबूर करते हैं ताकि हम फ्यूचर में हेल्ती रहे। यही हिस्से हमें पैसे बचाने और फालतू के कामों से बचने की सलाह देते हैं। डिस्काउंट रेट नाम का एक शब्द आता है। इसका आसान मतलब है कि आप किसी नाम के लिए कितना इंतजार कर सकते हैं। हाई डिस्काउंट रेट यानी आप बहुत

उतावले हैं। इंपेशेंट हैं आपको आज ही सब कुछ चाहिए। लो डिस्काउंट रेट यानी आप में बहुत पेशेंस है, बहुत सब्र है। आप कल के बड़े फायदे के लिए आज का छोटा मज़ा छोड़ सकते हैं। मज़े की बात ये है कि इंसान हजारों साल तक इंतजार कर सकता है पर एक नन्हा बंदर सिर्फ आठ सेकंड इंतजार कर पाता है। हमारी ज़िन्दगी अक्सर इन दो तरह के हिस्सों की लड़ाई बन जाती है। आप इसे ऐसे पहचान सकते हैं। मुझे आइस क्रीम खानी तो बहुत पसंद है पर बाद में दुख होता है कि क्यों खाये? यानी उतावले हिस्से इम्पेशेंट वाले नहीं। पेशेंट वाले यानी सब्र वाले हिस्से में हैं, जो मुझे सुबह 6:00 बजे उठना तो पसंद नहीं है पर उठने के बाद बहुत अच्छा लगता है। हमारा दिमाग इन दोनों के बीच ट्रेड ऑफ करता रहता है। अगर आप बहुत भूखे हैं तो खाने वाले हिस्सा जी जाएगा अगर आप सेफ महसूस कर रहे हैं। तो सब्र वाला हिस्सा जी जाएगा क्योंकि हमारे सब्र वाले हिस्से जानते हैं कि मौका मिलते ही उतावले हिस्से गड़बड़ करेंगे। इसलिए वे पहले से ही तैयारी कर लेते हैं। जैसे लोग अलार्म को बिस्तर से दूर रखते हैं ताकि सुबह उसे बंद करने के लिए उठना ही पड़े। अपने सैलरी से अपने आप पैसे कटने का इंतजाम करते हैं ताकि हाथ में पैसे आने पर वे उन्हें खर्च ना करते हैं। ओडिशस की एक पुरानी कहानी है

जिसमें राजन ने खुद को जहाज के खंभे से मँधवा लिया था ताकि वह परियों के जादुई गाने को सुनकर। समुद्र में ना कूद जाए हमारा दिमाग कोई एक बॉस नहीं चलाता। कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से कभी उतावला हिस्सा जीतता है तो कभी सब्र वाला हिस्सा। हम कौन सा फैसला लेंगे? यह इस बात पर टिका है कि उस वक्त हमारे दिमाग का कौन सा ऐप सबसे ज्यादा अक्टिव है? खुद पर काबू यानी सेल्फ कंट्रोल कोई जादुई ताकत नहीं है। यह दिमाग के अलग अलग हिस्सों के बीच का एक हिसाब किताब है। कॉन्टेक्स्ट और इनाम को देखकर हमारा दिमाग यह तय करता है कि उसे अभी मज़ा लेना है या कल के लिए रुकना है। इकोनॉमिक्स के एक्सपर्ट्स और दिमाग के डॉक्टर दोनों ही इंसान को समझने की कोशिश कर रहे हैं, पर दोनों का तरीका अलग है। कुछ एक्सपर्ट्स पत्थर की मूर्ति की तरह सोचते हैं। वे मानते हैं कि इंसान का दिमाग पहले से ही परफेक्ट और समझदार है। बस उसमें कुछ कमियां हैं, बाइसेस हैं, जिन्हें पत्थर की तरह तराशकर हटाना है, पर मेरा मानना है कि दिमाग मिट्टी की मूर्ति जैसा है। जैसे एक मूर्तिकार मिट्टी के छोटे छोटे टुकड़े जोड़कर मूर्ति बनाता है, वैसे ही नेशन में हजारों सालों में एक एक करके। नए दिमागी हिस्से यानी मॉडल्स जोड़े हैं, तब जाकर आज का इंसान बना है। हमारा दिमाग कोई ऐसी मशीन नहीं है

जो शुरू से ही बिल्कुल सटीक और समझदार बनी हो। ये तो छोटे छोटे टुकड़ों का एक जोड है जो वक्त के साथ धीरे धीरे इवॉल्व्ड हुआ। है। अगर हम इस बात को मान लें तो हमें इंसान की उठ पटांग बातें और गलतियाँ समझना बहुत आसान हो जाएगा। हमारा दिमाग हमें दूसरों पर ऊँगली उठाना तो सीखाता है पर अपनी बारी आने पर वह हमें अनजान बना देता है। यह दोगलापन या हिपोक्रिसी कोई बिमारी नहीं बल्कि दिमाग के काम करने का तरीका है। अमेरिका की आज़ादी इस बात पर शुरू हुई थी कि हर इंसान के पास कुछ ऐसे हक हैं, ऐसे राइट्स हैं जिन्हें कोई छीन नहीं सकता। जैसे जीने का हक, आजाद रहने का हक। और खुश रहने का हक जब भी लोग झंडे को सलाम करते हैं तो वो सबके लिए आजादी यानी लिबर्टी का वादा करते हैं। वहाँ के राष्ट्रगान में भी देश को 1000 लोगों की धरती कहा गया है। दुनिया के और भी कई देश आजादी को सबसे जरूरी चीज़ मानते हैं। आजादी। यानी लिबर्टी का सीधा सा मतलब यही है कि मैं जो चाहूँ वो कर सकूँ बशर्ते उससे आपकी आज़ादी में कोई खलक न पड़े, ये आपको कोई नुकसान न पहुंचे पर हमारा दिमाग बहुत चालक है। हमारे दिमाग का प्रेस सेक्रेटरी दुनिया को चिल्ला चिल्लाकर बताता रहता है कि। हमें आज़ादी बहुत पसंद है पर उसी वक्त दिमा के दूसरे बहुत सारे हिस्से बिल्कुल उल्टा काम करते

हैं। सही गलत की हमारी ये सोच एक बहुत बड़े राक्षस की तरह है। साइंस अभी तक ये पूरी तरह नहीं समझा पाया है। की। हम दूसरों को बहुत सारे काम करने से क्यों रोकना चाहते हैं? दिमाग के ये छोटे छोटे हिस्से दूसरों को खास तरह की दवाएं लेने से अपने शरीर के साथ कुछ भी करने से ये अपनी किडनी बेचने से रोकने में लगे रहते। हैं। इसमें थोड़ी गलती हम दिमाग के डॉक्टरों यानी साइकोलॉजिस्ट की भी है। हमें अभी तक ये नहीं पता कि दूसरों की बुराइ करने वाली ये सोच आखिर पैदा कहाँ से होती?

है। पर एक बात तो साफ है जो मैंने इस पूरी किताब में आपको समझाने की कोशिश की है। की आपके सिर के अंदर ये सारे हिस्से ये सारे सिस्टम्स अलग अलग काम कर रहे हैं। इसका मतलब ये है कि दिमाग का एक हिस्सा आजादी को बढ़ावा देने में यकीन रखता है तो दूसरा हिस्सा उसी वक्त दूसरों की आजादी छीनने पर तुला होता है इस बंटे हुए दिमाग इस। मॉडुलर मैएंड के साथ तालमेल बिठाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। हम इस दोगले पन इस इनकनसिस्टेंसी को चुपचाप मान सकते हैं हम कह सकते हैं कि हाँ, मैं आजादी की बातें तो करूँगा पर वो पैसा दूंगा जिससे दूसरों की आजादी छीन जाए। अगर आपको हाइपोक्राइट कहलाने में कोई बुराइ नहीं लगती तो ये रास्ता आपके लिए ठीक है। पर मेरा मानना ये है कि भले ही दोगलापन इंसान का नेचर है पर ये समाज के लिए अच्छा नहीं है। अगर लोग सिर्फ आज़ादी का ढोंग करेंगे और दूसरों पर पाबंदियां लगाएंगे। तो वे अपने अथॉरिटी का गलत इस्तेमाल करेंगे और रोज़ बनाने का असली मकसद ही ये है कि हम अपनी ताकत की एक सीमा तय करें। अगर हम अपनी मर्जी से नियमों को तोड़ते रहेंगे तो हमारे बीच के समझौते खत्म हो जाएंगे। सही और गलत के हमारे फैसले असल में डंडे की तरह हैं। एक नियम बनाने का मतलब है ये कहना कि जो ऐसा करेगा उसे सजा मिलेंगे। खासतौर पर डेमोक्रेसी में जब हम सब एक ही बात कहते हैं तो हम एक

ग्रुप बनकर अपने डंडे से दूसरों को रोकने की कोशिश करते हैं। कई बार ये डंडे चलाना सही होता है। जो दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं, उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए। पर अगर हम इन डंडों का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए करने लगे क्योंकि हमारे दिमाग के किसी हिस्से को किसी की कोई बात पसंद नहीं आई, चाहे वो उनके कपड़े हों या उनकी पसंद तो ये दूसरों को दबाना होगा। मेरे हिसाब से। अगर कोई नियम हमारी आजादी के प्रिन्सिपल से मेल नहीं खाता तो उसे नहीं होना चाहिए। एक जैसा बने रहना मुश्किल है। बहुत से लोगों को सच में लगता है कि समाज में कुछ चीजें बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। हमें नहीं पता कि हमारे अंदर ये हिस्से ये मॉडल्स क्यों हैं?

पर ये हैं जैसा कि एक फेमस कवि ने कहा था हम बहुत बड़े हैं। हमारे अंदर हजारों लोग बसते हैं। ये अलग अलग हिस्से हमें उलझन यानी कॉनफ्लिक्ट में डालते हैं लेकिन ये हिस्से हमें फ्लेक्सबल भी बनाते हैं। हमें लचीला बनाते हैं, अलग अलग हालातों में दिमाग के अलग अलग हिस्से जीते हैं। अगर हमें इस अंदरूनी लड़ाई का पता चल जाए तो हमें मौका मिलता है कि हम अपने सोच को बदल सकें। अक्सर हमारे अंदर का बुराइ करने वाला हिस्सा आजादी की सोच को हरा देता है। हमारी बातों और हमारे काम के बीच एक बहुत बड़ी है। मेरे हिसाब से एक ऐसी गड़बड़ी है, एक ऐसी इनकनसिस्टेन्सी है जिससे अगर हम पीछा छुड़ा लें तो हम सब की ज़िन्दगी बेहतर हो जाएगी। इस बुक में बस इतना ही हम फिर मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में एक नई किताब के साथ मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस विथ रोहित धन्यवाद।

Transcript supplied by the publisher with the episode.

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