Episode notes
वीडियो जानकारी: 27.12.2025, भगवद् गीता सत्र, बेंगलुरु, Title: खुलकर घूमें या पैसे बचाएँ? || आचार्य प्रशांत (2025), विवरण: इस संवाद में आचार्य प्रशांत से Gen Z के ट्रैवल के लिए लोन लेने और सुबह 5 बजे उठकर अनुशासित दिनचर्या अपनाने को लेकर सवाल किए गए हैं। चर्चा में समझाया गया है कि न यात्रा करना अपने आप में अच्छा या बुरा है, न ही किसी तय रूटीन को अपनाना सफलता की गारंटी है। असली सवाल यह है कि हम जो कर रहे हैं, उसके पीछे हमारी सोच और उद्देश्य क्या है। बिना अपनी दिशा और जीवन के उद्देश्य को समझे, केवल बाहरी बदलावों और अनुशासन से वास्तविक बदलाव नहीं आता।
आचार्य प्रशांत
by PrashantAdvait Foundation · Hindi · Devotional & Spiritual
आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं। आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प
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What Haunts You, IITian? || Acharya Prashant, IIT Kharagpur (2025)
Video Information: 01.11.2025, IIT Kharagpur, Title : Who Sold You the Dream Job and Fat Package? || Acharya Prashant, IIT Kharagpur (2025), Context:- Acharya Prashant explores the hidden authority behind words like “must,” “supposed to,” “normal,” and “settle down.” He explains how these seemingly ordinary ideas can quietly dictate our education, career choices, relationships, and entire way of living. The discussion challenges students to question the unseen assumptions they carry and to examine whether their decisions come from love and openness or from fear and conformity.He also…
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वीडियो जानकारी: 14.06.24, बातचीत सत्र, ग्रेटर नॉएडा, विवरण:- ब्रिक्स सम्मेलन में विदेशी मेहमानों के लिए शाकाहारी भोजन पर बहस छिड़ी है। लेकिन क्या हमारी थाली में क्या है, यह सिर्फ़ हमारी निजी पसंद का मामला है—या इसका असर उस पृथ्वी पर भी पड़ता है जिस पर हम सब निर्भर हैं? मांसाहार को अक्सर स्वाद, संस्कृति या व्यक्तिगत पसंद से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अगर हमारे भोजन का संबंध जंगलों, खेती, जानवरों और जलवायु संकट से हो, तो क्या “मेरी मर्ज़ी, मैं कुछ भी खाऊँ” कहकर बात खत्म की जा सकती है? यह चर्चा भोजन से आगे जाकर उस सोच पर सवाल उठाती है जिसमें खाने को केवल निजी मामला माना जाता है। जब खेती का बड़ा…
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