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Episode notes

Did Netaji Subhas Chandra Bose Really Die in a Plane Crash? | Untold Death Mystery In this episode, we dive deep into one of India's most controversial and unsolved mysteries — the death of Netaji Subhas Chandra Bose. Was it really a plane crash in 1945, or is there more to the story? Explore the shocking theories, secret files, and lesser-known facts surrounding Netaji’s disappearance. From the official narrative to the Gumnami Baba theory, this episode uncovers every angle that has kept India guessing for decades. Tune in to uncover the truth behind the mystery that still haunts Indian…

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Read the transcript · about 4,000 words, follows along as you listen

आज से लगभग 80 साल पहले एक खबर ने पूरे देश को हिला के रख दिया था। सुभाष चंद्र बोस प्लेन क्रैश में शहीद हो गए। तारीख थी 18 अगस्त 1945। जगह ताइयो कोयपो ताइवान कहा गया है, एक जापानीज़ बॉम्बर प्लेन ने उड़ान भरी और कुछ ही देर में तहस नहस हो गया। डीन में नेताजी सवार थे। रिपोर्ट्स बोले की उनके शरीर पर और कुछ घंटों के अंदर उनका देहांत हो गया। फिर बिना किस फोटो, मेडिकल प्रूफ या डीएनए के उनकी बॉडी को तुरंत जला दिया गया। बस एक कहानी छोड़ दी गई और हमसे उस कहानी पे भरोसा करने को कह दिया गया। लेकिन सोचिए ज़रा क्या कोई इतना बड़ा लीडर इतनी आसानी से दुनिया से चला जाता है?

बिना किसी ठोस सबूत के हबीबुर रहेमान उनके साथ ही कह रहे थे की उन्होंने हॉस्पिटल में नेताजी को खुद देखा पर हबीबुर तो नेताजी के सबसे वफादार लोगों में से थे। क्या उन्होंने असली सच बताया या सिर्फ वही बोला जो उन्हें बोलने को बोला गया था? क्या बताऊँ? ये सब एक वेल रिटन स्क्रिप्ट थी जिसमे रोल्स भी थे, डायलॉग्स भी और एक पर्फेक्ट्ली टाइम्ड एंडिंग भी और जापान इसका रोल भी कनफ्यूज़िंग था। एक बार रिपोर्ट आया की इंजन फैल हुआ, दूसरी बार कहा टेल ब्लास्ट हो गया। तीसरी बार बोला गया पायलट का फॉल्ट था। एक नेशन जो हर चीज़ का प्रॉपर डॉक्यूमेंटेशन रखता है, वो नेताजी जैसे आदमी के डेथ पे कॅन्फ्यूज हो गया। उनके जाने का तो एक एक सेकंड डॉक्युमेंटेड होना चाहिए था, लेकिन यहाँ बस कॅन्फ़्यूज़न ही कॅन्फ़्यूज़न। और ट्विस्ट तो तब आया जब 19 नाइनटीज़ में ताइवान के वॉर रिकॉर्ड्स डिकलसिफाइड हुए अनुजदार जैसे रिसर्चर्स निजबन फाइल्स को खोला तो जो मिला ये कहना चाहिए। जो नहीं मिला उसने सबको हिला दिया। उस दिन 18 अगस्त 1945 किसी। प्लेन क्रैश का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था, ना फाइर रिपोर्ट ना हॉस्पिटल का एंट्री लोग नहीं अक्सीडेंट का कोई प्रूफ कुछ भी नहीं मतलब जीस क्रैश की कहानी पे। देश ने इतने साल भरोसा किया वो क्रैश वो ही नहीं तो सवाल ये है

अगर प्लेन क्रैश नहीं हुआ तो नेताजी गए क्या? वो किसी और देश में छुप गए। क्या उन्होंने डिसअप्पिरन्स प्लान किया था? और सबसे बड़ी बात अगर ये कहानी इतनी फेक थी तो हमें इतने सालों तक क्यों बताई गई? जवाब मिलता है पॉलिटिक्स में 1947 के बाद गाँधी नेहरू मॉडल एस्टाब्लिश करना था। नेताजी का आइडियोलॉजी अलग थी। डायरेक्ट फियरलेस ऑर रेवोल्यूशनरी। अगर वो वापस आते तो पूरा पोलिटिकल इक्वेशन हिल जाता। शायद इसलिए एक कहानी बना दी गई और असली सच को उनका अंतिम संस्कार मिल गया। हैलो एंड वेलकम बेक टु इंडिया एनफील्ड और आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसे शख्स की जो क्नॉइस। इंडियन हिस्टरी का बहुत ही प्रोमिनेंट हिस्सा है। उनका नाम है सुभाष चंद्र बोस, जिनको जाना जाता है नेताजी के नाम से तो शुरू करते है सुभाष चंद्र बोस डेड ऑर ए लाइफ?

अब हम एक और लेयर के अंदर जाते है। एक ऐसे लेयर जहा सिर्फ राय नहीं, सरकारी सबूत मिलते है। बात है उन फाइल्स की जो सदियों तक बंदल मारियों में धूल खा रही थी। डिक्लासिफाइड डाक्यूमेंट्स जो अब हमारे पास है। सवाल ये है जब सरकार ने अपने ही राज़ खोलने शुरू किए तो उनमे क्या लिखा था? 2006 में यु पीए गवर्नमेंट के दौरान एक बड़ा कदम उठाया गया। यु पीए गवर्नमेंट से यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायन्स एक सेंट्रल लेफ्ट अलायन्स ऑफ़ पोलिटिकल पार्टी इन इंडिया। जो 2004 जनरल इलेक्शन के बाद फॉर्म हुई थी। नेताजी के डिसअप्पिरन्स से जुड़ी कुछ फाइल्स को पब्लिक डोमेन में डाला गया। देशभर में उम्मीद जाग उठी की अब सच सामने आएगा लेकिन जब वो फाइल्स रिसर्चर्स जैसे अनुज धरने पड़ी। तो उनके अंदर लिखी बातें और भी ज्यादा हैरान करने वाली थी। कोई कॉंक्रीट एविडन्स नहीं था। नेताजी की डेथ का बस स्पेकुलेटिव रिपोर्ट्स, सेकंड हैंड स्टेटमेंट्स और कॉन्फ़ीड़ेन्शीयल नोट्स जो क्लियरली दिखाते थे की सरकार के अंदर भी डाउट था की नेताजी जिंदा थे या नहीं?

एक फाइल जिसका नंबर था आई बी फाइल नंबर 2031156 उसमें लिखा था की 19 फिफ्टीज़ के दौरान इन्टेलिजेन्स ब्यूरो ने बोस पर सर्वेलेंस रखा था इवन आफ्टर हिज़ सपोज़ डेथ। जी हाँ, ऐसे इनपुट्स थे की कुछ लोगों को लगता था की नेताजी डिस्गाइज्ड ऐडेंटिटी में इंडिया में ही कही अक्टिव है। और ये सिर्फ अफवाह नहीं थी। ये आई बी के रिपोर्ट्स में डॉक्युमेंटेड था तो सोचिए अगर सरकार को भी शक था कि वो जिंदा हो सकते हैं तो पब्लिक को उनकी मौत का पक्का यकीन क्यों दिलाया गया? एक और शॉकिंग डीटेल थी। 19 सेवेंटीज़ तक नेताजी के फैम्ली मेंबर्स के लेटर्स और मूवमेंट्स पर आईबी नजर रखती थी। इनमे कुछ लेटस नेताजी के नेफ्यूज़ के नाम थे। उनके ऊपर भी सस्पिशियस आई थी की उनका कॅाटाक्ट किसी अनोनिमस सोर्स से था। इतनी टाइट सर्वेलेंस तब की जाती है जब सिस्टम को लगता है की कोई राज़ जिंदा है। क्या वो राज़ नेताजी खुद थे और फिर बात आती है? मुखर्जी कमिशन की 19199 में बनाई गई एक इंडिपेंडेन्ट जुडिशियल एन्क्वारी जस्टिस मनोज मुखर्जी ने ताइवान भी जाके क्रैश साइट की डीटेल इन्वेस्टिगेशन की। उन्होंने डॉक्टर्स, नर्सेज और आई विटनेस से बात की, लेकिन किसी ने भी नेताजी को पर्सनली क्रैश के बाद हॉस्पिटल में देखने का कॅन्फर्मेशन नहीं दिया। और जब फाइनल रिपोर्ट्स सरकार के

सामने आयी उसमें लिखा था देर इस नो डेफिनिटिव प्रूफ दट। नेताजी डाइड इन दी प्लेन क्रॅश तो सवाल फिर वही जब इंडिपेंडेन्ट कमिशन भी कह रहा है की नेताजी के मरने का कोई ठोस सबूत नहीं है तो ऑफिसियल नैरेटिव पर भरोसा क्यों किया जाए? क्या ये सब एक बिगर कवर अप का हिस्सा था? क्या कुछ ऐसे डाक्यूमेंट्स अभी भी सीक्रेट है जो असली कहानी बताते है? और सबसे बड़ी बात अगर नेताजी जिंदा थे तो वो कौन सी जिंदगी जी रहे थे? तो जब ऑफिसियल कहानी बिखरने लगती है। तब नए क्लूज़ सामने आते हैं और इस राज़ की दुनिया में सबसे बड़ा और कंट्रोवर्शियल क्लू था गुमनामी बाबा एक ऐसे व्यक्ति जो जिंदगी भर छुप कर रहे, जिनके दर्शन सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों को मिले और जिन्हें लोगों ने कभी सुभाष चंद्र बोस का रूप तो कभी उनका साया कहा, लेकिन ये कौन थे? और क्यों इतने बड़े लेवल पर उनका नाम नेताजी से जोड़ा गया? गुमनामी बाबा का नाम सबसे पहले 19 एटीस में सुनने में आया। फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश के राम भवन में एक साधू रहते थे। इनके बारे में लोग कहते थे की वो हैली एजुकेटेड है, फ़्लू एंड जर्मन बोलते है और भारत के पोलिटिकल अफेयर्स पर उनकी पकड़ बहुत गहरी है। क्नॉइस उनका चेहरा हमेशा पर्दों के पीछे छुपा रहता था। कहीं कोई फोटो नहीं, कोई पब्लिक अपीयरेंस नहीं। लेकिन जो लोग उनके करीब गए उन्होंने कुछ ऐसा महसूस किया जो

आम नहीं था। एक रिटायर्ड जज दिवान सिंह उन्होंने लिखा की बाबा किसी भी आम व्यक्ति जैसे नहीं थे। उनका मैन्यूरिज्म, उनका डिसिप्लिन और उनका सोचने का तरीका किसी मिलिट्री बैकग्राउंड वाले इंसान जैसा था। बाबा कभी भी किसी का नाम नहीं लेते थे लेकिन जब देश के पॉलिटिक्स और आज़ादी के मूवमेंट की बात होती तो उनकी आँखों में एक अलग सी चमक आ जाती थी। उन्होंने कभी अपनी असली पहचान नहीं बताई लेकिन कुछ लोगों का मन ना था। नेताजी थे और सबसे बड़ी बात जब बाबा का देहांत हुआ। 1985 में 1985 में तो उनके कमरे से जो चीज़े मिली उन्होंने सब को हिला दिया। हंड्रेड्स ऑफ़ हंड्रेडन लेटर्स नेताजी के नाम वाले चश्मे जर्मन डाइव राइटर, आईना के रिकॉर्ड्स और इवन बोस फैम्ली के पर्सनल फोटोस ऐसे आइटम्स जो किसी आम व्यक्ति के पास नहीं हो सकते, एक डायरी भी मिली जिसमें कुछ पेजेज़ पर जर्मन और बंगाली में लिखी गई थी। हैंडराइटिंग एक्सपर्ट्स ने कहा कि वो लिखाई नेताजी के सैंपल से मैच करती है। तो क्या ये सब कोइंसिडेन्स था? ये मिस्ट्री इतनी गहरी थी की 2016 में सरकार ने इस मैटर पे फिर से एक बार फाइल्स डिक्लासिफाइ की, लेकिन गुमनामी बाबा को लेकर कोई कॉंक्रीट क्लैरिफिकेशन नहीं दी गई। फैम्ली डिवाइडेड थी, कुछ लोगों ने इस थियरी को रिजेक्ट किया, जबकि कुछ ने ओपेंली सपोर्ट किया।

रिसोर्स जैसे अनुज धार और। चंद्रचूर घोष ने लिखा कि अगर किसी भी थियरी में सबसे ज्यादा सरकमस्टैंशियल एविडेन्स मिलता है तो वो गुमनामी बाबा वाली कहानी है। लेकिन अभी सरकार छुपे और फाइल कैबिनेट में बंद है। तो सवाल फिर वही क्या गुमनामी बाबा वाकई नेताजी थे? अगर हाँ क्नॉइस। तो उन्होंने अपनी असली पहचान क्यों छुपाई? क्या वो किसी नई भारत के लिए प्लानिंग कर रहे थे या उन्हें इस पोलिटिकल स्ट्रक्चर में अपना स्पेस नहीं दिखा? शायद वो जिंदा थे लेकिन अपने असली मिशन के लिए एक गुमनाम जिंदगी जी रहे थे। जब किसी एक कहानी के 1000 चेहरे हो जाए तब समझ लीजिए की कहीं ना कहीं कोई राज़ छिपा हुआ है। नेताजी के डिसपिरियंस को लेकर ऐसा ही हो रहा था। प्लेन क्रैश थियरी सोविएट थ्योरी गुमनामी बाबा थ्योरी हर अगल में अपनी एक अलग दुनिया थी, लेकिन सबसे गहरा और अनदेखा अगल था। पोलिटिकल साइलेंस आखिर क्यों देश की सबसे इन्फ़्लुएन्शल लीडरशिप ने इस मु्द्दे पर इतने सालों तक चुप्पी साधी रही? सबसे पहले बात करते है सोविएट कनेक्शन थियरी की। कई हिस्टोरियन और रिसर्चर्स का मानना है कि 1945 में क्रैश का ड्रामा करने के बाद नेताजी सोविएट यूनियन गए थे। शायद। स्टाइलिन से मदद लेने नेताजी का विज़न था फ्री इंडिया विथ ए स्ट्रांग सोशलिस्ट बैकबोन। वो बिलीव करते थे की सोवियत हेल्प

के बिना ब्रिटिश एम्पायर के अगेंस्ट लड़ाई जीतना मुश्किल था। कुछ रिपोर्ट्स कहती है की बोस को सोवियत ग्लग्स में देखा गया था। लेकिन यूएस एस आर जैसे देश ने कभी इस पर ऑफिसियल कमेंट नहीं दिया। ना ना ना। 19 फिफ्टीज़ के दौरान जब इंडिया और यूएस एस आर के बीच दोस्ती गहरी हो रही थी तब नेहरू गवर्नमेंट ने कभी मॉस्को से बोस के बारे में एन्क्वारी ऑफिशियली नहीं की। ये फॅक्ट भी? एक डिक्लासिफाइड फाइल में मिलता है जब एक सीनियर आई बी ऑफिसर ने सजेस्ट किया था की सोवियत इन्टेलिजेन्स से नेताजी के बारे में पूछना चाहिए तो वो रिकमेन्डेशन इग्नोर कर दी गई। सवाल उठा था क्यों?

क्या सरकार किसी अनकम्फ़र्टेबल सच से बच रही थी? पोलिटिकल लीडरशिप के लिए नेताजी का जिंदा होना एक मुसीबत बन सकता था। वो एक ऐसे लीडर थे जो गाँधी नेहरू मॉडल से बिलकुल अलग सोच रखते थे। बेलटराइज्ड नेशनलिज्म एग्रेसिव फ्रीडम स्ट्रगल ऑर स्ट्रैटेजिक फॉरिन अलायंस, इस उनकी अगर बोस वापस आते तो पावर स्ट्रक्चर का बैलेंस हिल जाता। शायद इसलिए साइलेंस मेंटेन करना एक सेफ ऑप्शन था। एक और अजीब फॅक्ट ये था की जब नेता जी की डेथ या डिसपिरन्स पे सवाल उठता, लीडर्स ने या तो ये टॉपिक डाइवर्ट किया या एन्क्वारी कमिशन बनाके टाइम निकाल दिए। शाहनवाज कमिटी, होसला कमिशन और मुखर्जी कमीशन तीन अलग अलग इन्वेस्टिगेशन्स हुई, तीन अलग अलग कंक्लूषन है और हर बार सरकार ने फाइनल रिपोर्ट को या तो इग्नोर किया या रिजेक्ट जैसे किसी को सच दिखाने में रुचि ही नहीं थी। पब्लिक को एक एमोशनल सिम्प्लिफाइज़ स्टोरी दी गई की नेताजी वीरगति को प्राप्त हुए। और उनका अंतिम यात्रा ताइवान में हुआ, लेकिन ग्राउंड रियालिटी में सब कुछ कॅन्फ़्यूज़न से भरा हुआ था। क्या ये कॅन्फ़्यूज़न नैचुरली था या डेलिब्रेटली क्रियेट किया गया था?

क्या पोलिटिकल स्टेबिलिटी के लिए एक पावरफुल लीडर को हिस्टोरिकल घोस्ट बना दिया गया? यही वो वक्त था जब लोगों ने हिस्टरी को सिर्फ किताबों से नहीं डाक्यूमेंट्स लीक्स और लॉजिकल एनालिसिस से देखना शुरू किया और तब सामने आई एक तस्वीर जो कहानी से ज्यादा साजिश लगती थी। एक वक्त था जब नेताजी का राज़ सिर्फ हिस्टरी के क्लासरूम्स और। डस्टी लाइब्रेरीज़ तक सीमित था, लेकिन 2000 के बाद देश बदल रहा था। लोगों के हाथ में इंटरनेट आ गया था और दिल में सवाल जब किसी ने पूछा नेताजी का असली सच क्या है? तो पहली बार उस सवाल का एक को पूरा देश में सुनाई दिया। जैसे इंडिपेंडेन्ट रिसर्चर्स ने आरटीआइ डालने शुरू किया। उनका एक ही एजेंडा था सरकार से पूछलो की। अगर नेताजी प्लेन क्रैश में मारे गए थे तो उनके घर पे आई 20 स्पाई क्यों कर रही थी?

20 साल बाद तक जब ये फाइल्स बाहर आई तो पब्लिक ने सिर्फ सस्पेंस नहीं महसूस किया। गुस्सा आया वो गुस्सा जो। तब आता है जब आपको लगता है की आपसे कुछ छुपाया गया है। आपके हीरो के साथ नाइंसाफी हुई है। टीवी रिबेट्स ने इस इश्यू को फिर से जिंदा कर दिया था। प्राइम टाइम एंकर, इन्वेस्टिगेट जर्नलिस्ट्स और यूट्यूब हिस्टोरियन सब एक लाइन में खड़े हो गए थे। सच ढूंढने के लिए हैश टैग्स जैसे डिक्लासिफाइ, नेताजी फाइल्स और हूँ। वास् गुमनामी बाबा ट्विटर पर ट्रेंड करने लगे। नेताजी एक बार फिर से न्यूस बन गए, लेकिन इस बार सिर्फ यादों में नहीं। अक्शॅन्स में भी 2016 में मोदी सरकार ने पब्लिक प्रेशर के बाद 100 से ज्यादा क्लासिफाइड फाइल्स डिक्लासिफाइ करने का फैसला किया। दिल्ली में एक ग्रैंड इवेंट हुआ जहाँ पे मोदी ने खुद कहा। सत्यमेव जयते सच हमेशा जीतेगा लेकिन जब लोगों ने फाइल्स पड़ी है तो उनका गुस्सा और बढ़ गया क्योंकि वह फाइल्स ज्यादातर वीक थी और जिन फाइल्स में असली राज़ हो सकता था, उनको या तो एडिट कर दिया गया या रिडक्ट? ये चॅप्टर सिर्फ एक मूवमेंट की कहानी नहीं है। ये आवाज उठाने वालों की कहानी है स्टूडेंट्स, रिसर्चर्स, जर्नलिस्ट्स और आम जनता सब मिलके एक साथ बोले अब और नहीं हमें पूरा सच चाहिए। जब आवाज उठती है तो सरकारों हिलती है नेताजी की डिसपिरन्स की कहानी

भी तभी कंप्लीट होगी क्नॉइस जब हर फाइल, हर डॉक्यूमेंट और हर राज़ पब्लिक के सामने होगा और ये आवाज़ अब रुक नहीं रही थी। जब एक राज़ ज्यादा गहरा होता जाता है तो लोग सच जानने के लिए साइंस का सहारा लेते है। गुमनामी बाबा एक ऐसा नाम जो 30 साल तक अनोनिमिटी के अंधेरे में रहा लेकिन जिसे कई लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस मानते थे। उनके दांतों का डीएनए टेस्ट भी एक टाइम पर एक बड़ा मुद्दा बन गया था। 2005 में मुखर्जी कमिशन के दौरान बाबा के दांतों को डीएनए टेस्टिंग के लिए सी ऐफ़ एसएल कोलकाता भेजा गया। रिपोर्ट कहती है सैम्पल्स डू नॉट मैच विथ सुभाष चंद्र बोस बस। सरकार ने कह दिया केस क्लोज्ड लेकिन ये रिपोर्ट के साथ एक क्रूशियल डॉक्यूमेंट मिस्स था। इलेक्ट्रोफेरोग्राम जो डीएनए टेस्ट का बैकबोन होता है, वो डेटा ही एक्सेंट था। जब लोगों ने आरटीआइ फाइल करके इलेक्ट्रोफेरोग्राम मांगा तो सी ऐफ़ एसएल ने मना कर दिया ये कहकर की। ये इन्फॉर्मेशन देश की सिक्योरिटी और फॉरिन रिलेशन्स को इम्पैक्ट कर सकती है। ये बात समझ से परे थी। एक डीएनए टेस्ट का डेटा देश की सिक्योरिटी से कैसे जुड़ी हो सकती है? रिसर्चर अनुज धार और कई अक्टिविस्ट्स ने इस रिपोर्ट पर सवाल उठाये। उनका कहना था, डीएनए टेस्ट बिना रॉ डेटा के बेकार है। इससे मैनिपुलेट भी किया जा सकता है।

उन्होंने ये भी दिखाया कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट ने गुमनामी बाबा और नेताजी की लिखावट में सिमिलैरिटीज निकाली थी। काफी स्ट्राइकिंग सिमिलेरिटीज़ पर सरकार ने ये सब इग्नोर कर दिया। जस्टिस विष्णु सहाय कमिशन जो स्पेसिफिकल्ली गुमनामी बाबा के केस पे बनी थी। उसने 2019 में रिपोर्ट दी। बाबा नेताजी नहीं थे, लेकिन हैली एजुकेटेड बंगाली थे और उनका अंदर का वर्ल्ड सिर्फ नेताजी जैसा ही था। एक तरह से वो नेताजी नहीं होने का फॉर्मल अनाउंसमेंट था, लेकिन दिल से लोग इस कंक्लूषन को कभी एक्सेप्ट नहीं कर पाए। जबरास का सच खुद गवर्नमेंट से छुपाया जाए। जब साइंस का यूज़ सच दिखने के बजाय उसे छुपाने के लिए हो तो फिर विश्वास टूटने लगता है। डीएनए रिपोर्ट एक मौका था कि हम क्लैरिटी पाए, लेकिन उसने और कॅन्फ़्यूज़न क्रियेट किया। गुमनामी बाबा का डीएनए टेस्ट आखिर एक साइंटिफिक ब्रेकथ्रू था या एक प्लांड व्हाइट वाश? जवाब आज भी हवा में लटक रहा है। नेताजी के डिसएपिरन्स को लेकर काफी कमिशंस बने, लेकिन सबसे ज्यादा अटेंशन मिला मुखर्जी कमीशन का एक ऐसी कोशिश जो सच तक पहुंचने का वादा लेकर चली थी लेकिन खुद भी एक राज़ बनकर रह गई 1999 में 19199 में। गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ने जस्टिस मनोज कुमार मुखर्जी के लीडरशिप में कमिशन बनाया। मकसद सिंपल था। नेताजी के डिसपिरन्स को लेकर सच

किया है ये पता लगाना। इस कमिशन ने लगभग 7 साल तक काम किया। इस दौरान उन्होंने जापान, ताइवान और इंडिया में कई जगह विजिट की। हज़ारों डाक्यूमेंट्स। एक्जामिन किए और कई गवाहों के स्टेटमेंट्स सुने और फिर 2006 में उन्होंने अपनी फाइनल रिपोर्ट्स सबमिट की। उस रिपोर्ट का सबसे बड़ा धमाका ये था सुभाष चंद्र बोस का ताइवान प्लेन क्रैश में मरना साबित नहीं होता। मुखर्जी कमिशन ने कहा कि प्लेन क्रैश वाली थियरी अनरेलियाबल थी। क्नॉइस। उनका कहना था कि ना ताइवान गवर्नमेंट के पास कोई प्लेन क्रैश का रिकॉर्ड है और ना ही नेताजी की डेथ का मेडिकल सर्टिफिकेट या पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट अवेलेबल है। कमीशन ने गुमनामी बाबा को भी सीरियसली कंसिडर किया। उन्होंने बाबा के बिलॉंगिंग्स का डीटेल एग्ज़ैमनेशन करवाया। उनमें से कई आइटम्स नेताजी के पर्सनल आइटम्स से मिलते थे। जर्मन बिनोकुलर, टाइपराइटर, बेंगाली इंग्लिश डिक्शनरीज लेटर साइन्ड एसएस सी बी और आईने का मेमॅरिबीलिया?

फिर भी उन्होंने फाइनल कंक्लूषन में ये नहीं कहा कि बाबा ही नेताजी थे। सिर्फ इतना ही कहा कि देर इस ए स्ट्रांग पॉसिबिलिटी। लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को रिजेक्ट कर दिया। फाइन एविडन्स इन्सुफ्फिसिएन्स एंड स्पेकुलेटिव पार्लियामेंट में रिपोर्ट टेबल में नहीं हुई। पब्लिक ने इस पर नाराजगी जताई। कई लोगों का कहना था अगर 7 साल की इन्वेस्टिगेशन फॉरिन टूर्स और। लाखों रुपए के बाद भी सच को इग्नोर किया जा रहा है। तो फिर किसी एन्क्वारी का मतलब ही किया था। मुखर्जी का मिशन का काम एक मिस्ड ऑपर्च्युनिटी बन गया। एक ऐसी कोशिश जो हिस्टरी बदल सकती थी, लेकिन उससे या तो इग्नोर कर दिया गया ये कह सकते है दफ़न कर दिया गया। सवाल फिर वही अगर सच ढूंढने वाले भी धुंध में खो जाए तो फिर सच मिलेगा कैसे?

1945 1945 के बाद से लेकर आज तक एक छोटी सी टेम्पल वेंकु जी टेम्पल इन टोक्यो हर साल एक बड़ी अटेंशन का सेंटर बन जाता है। यही वो जगह है जहाँ नेताजी सुभाष चंद्र बोस के एशेज यानी राख, अस्थियां, प्रिज़र्व किए गए। लेकिन सवाल ये है क्या ये अस्थियां इनकी है भी? ऑफिसियल स्टोरी के मुताबिक नेताजी की डेथ एयठीन अगस्त 1945 को ताइवान में हुई प्लेन क्रॅश में। उसके बाद उनका बौरी जलाया गया और राख यानी अस्थियां टोक्यो भेज दी गई। रिंको जी मंदिर में यहाँ पर उनकी स्मृति में एक छोटा सा मेमोरियल भी बनाया हुआ है। हर साल इंडियन एम्बेसेडर वहाँ जाके ट्रिब्यूट देते हैं। पर न डीएनए टेस्ट हुआ न कोई स्ट्रांग प्रूफ मिला कि ये राख नेताजी की है। नेताजी के परिवार के कई लोग जैसे की प्रोफेसर चंद्रचूर घोस और सुजाता भोस अलग अलग पोज़िशन्स रखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि राख असली है और नेताजी ने वही अंतिम सांस भी ली थी। दूसरी तरफ कई लोग इन्क्लूडिंग अनुजता और उनकी टीम आरगु करते है की ये एक स्टेज्ड नैरेटिव है। ये किसी और की भी हो सकती है जब तक डीएनए टेस्ट नहीं होता सच पता नहीं चलेगा। आरटीआइ और पब्लिक डिमॅंड के बावजूद इंडियन गवर्नमेंट ने कभी ऑफिशियली डीएनए टेस्ट कंडक्ट करवाया ही नहीं। जापान गवर्नमेंट ने भी राख इंडिया को ट्रांसफर करने से मना कर दिया।

जब तक इंडिया का पूरा परिवार यूनाइटेड डिमॅंड नहीं करता तो ये इश्यू पोलिटिकल ही बन गया। साइंटिफिक टेस्टिंग और डिप्लोमैटिक प्रोसेसेस के बीच भी अटक गया। और ये वही जगह है जहाँ इमोशन्स सबसे ज्यादा स्ट्रांग होते है। जब आप किसी के अंतिम अवशेष पर सवाल उठाते हो तो वो सिर्फ हिस्टरी का नहीं। मानवता का भी सवाल बन जाता है, लेकिन अगर वो अंतिम अवशेष गलत निकले तो हम एक झूठ को संभाल रहे हैं। और अगर वो सच में नेताजी के तो हमने एक महान वीर के बलिदान को दशकों तक क्वेश्चन किया। उनकी मौत और उसके बाद की कहानियों ने उनके परिवार को भी दो हिस्सों में बांट दिया। ये चॅप्टर सिर्फ एक नेशनल मिस्ट्री नहीं है की एमोशनल डिवीज़न की भी कहानी है। नेताजी के परिवार में दो मेजर कैंप्स बने। एक तरफ वो लोग जो गवर्नमेंट की ऑफिसियल प्लेन क्रैश थियरी को मानते हैं, जैसे सुजाधा बोस, जो तृणमूल कांग्रेस से मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट भी बन चूके हैं, उनका कहना है कि सुफ्फिसिएंट एविडेंस अवेलेबल है और राग रिंकू जी टेम्पल में असली है। उनका बिलीफ एमोशनल भी है और पोलिटिकल भी है। क्नॉइस। वो चाहते हैं कि नेताजी को डिग्निटी और क्लोज़र दिया जाए लेकिन दूसरी तरफ वो कैंप है जिनका मानना है कि ट्रुथ है। बीन बरीड चंद्र कुमार बोस नेताजी के ग्रैंड नेफ्यू ओपेंली गवर्नमेंट से डीएनए टेस्टिंग और

फुल डिक्लासिफिकेशन की डिमॅंड करते हैं। उनका कहना है कि फैम्ली डिज़र्व्स टु नो दी ट्रुथ। इंडिया डिज़र्व्स टु नो दी ट्रूथ ये डिवाइड मीडिया में भी रिफ्लेक्ट होता है। जब एक ही परिवार के दो लोग ऑपोजिट नैरेटिव लेके डिबेट करते हैं, ये इंटरनल कॉन्फ्लिक्ट पॉलिटिक्स में भी घुल गई है। अलग अलग गवर्नमेंट्स ने अलग अलग स्टांस लिया। कांग्रेस का समय इश्यू इग्नोर किया गया, लेकिन मोदी गवर्नमेंट ने 2016 में कुछ फाइल्स डिक्लासिफाइ करके एक पॉज़िटिव सिग्नल दिया। उन्होंने नेताजी के म्यूज़ियम और डिजिटल ऑर्काइव बनाने का प्रॉमिस भी किया, लेकिन फुल ट्रांसपेरेंसी आज तक नहीं मिली और पब्लिक के लिए। ये सिर्फ एक हिस्टोरियल डिबेट नहीं यादों का मामला है। बेंगाल में हर दूसरा घर नेताजी का फन है। उनकी फोटो आज भी ड्राइंग रूम्स में लगती है। शादियों में उनका नाम आशीर्वाद जैसे दिया जाता है। एक समय जो इंसान ब्रिटिश एम्पायर से टक्कर ले रहा था उनका अपना परिवार आज तक ये नहीं कह सकता कि हाँ। हम जानते हैं कि क्या हुआ था जब एक परिवार का दर्द पोलिटिकल टर्फ वॉर बन जाए तो वो ट्रेजेडी और भी गहरी हो जाती है। नेताजी की कहानी सिर्फ उनकी नहीं बल्कि हर उस फैम्ली की है। जीस सिस्टम ने कॅन्फ़्यूज़न और अनसर्टेनिटी में जीने पे मजबूर किया क्नॉइस।

ये कहानी 19451945 से चली आ रही है। प्लेन क्रैश या स्टेज्ड एस्केप गुमनामी बाबा या ऐशेज़ इन जापान सीक्रेट फाइल्स या सुप्रेस्ड ट्रुथ। हर वर्शन ने नेताजी के नाम के साथ एक अनसोल्व्ड पज़ल चिपका दिया है। लेकिन अब सवाल ये है। क्या हम कभी जान पाएंगे की नेताजी के साथ असली में क्या हुआ था? एक तरफ डाक्यूमेंट्स है, फाइल्स, रिपोर्ट्स, इन्टेलिजेन्स नोट्स, दूसरी तरफ इमोशन्स, पब्लिक मेमोरी, परिवार का दर्द और एक देश का फ़ेथ। लेकिन उन दोनों के बीच खड़ा है सन्नाटा, जिसमें सरकारी साइलेंस और ब्यूरोक्रेटिक एम्बिगुइटी छुपी हुई है। जो लोग कहते हैं की लेट दी पास्ट बी दी पास्ट, शायद वो ये नहीं समझते की सुभाष चंद्र बोस एक पास्ट नहीं, एक इन्कम्प्लीट सेन्टेन्स है जो एक फ्रीडम फाइटर जिनका नाम बचपन से हम राष्ट्र गीत के बराबर रखते आए हैं, उनकी मौत एक मिथ बन जाए। तो वो सिर्फ हिस्टरी की हार नहीं होती, वो एक नेशन्स कन्सिग्न्स का कोलैप्स होता है। खैर, लोग अब थक गए हैं। हर नए डॉक्यूमेंट्री हर नए आरटीआइ के बाद भी जब जवाब ना मिले तो लोग अंदर से मौन हो जाते हैं लेकिन फिर भी कुछ लोग। कुछ जर्नलिस्ट्स, कुछ रिसर्च, कुछ आर्डिनरी सिटीजंस आज भी सच की तलाश में लगे हुए है। ये उन्हीं लोगों का जुनून है जो इस कहानी को जिंदा रखता है। हो सकता है हम कभी सच जान ना पाए।

हो सकता है नेताजी का चॅप्टर हमेशा के लिए इन्कम्प्लीट रहे, लेकिन एक बात तो तय है। जब तक ये सवाल जिंदा है, तब तक नेताजी की याद भी जिंदा है और शायद यही उनकी असली जीत है। उनका नाम सिर्फ हिस्टरी बुक्स तक सीमित नहीं बल्कि एक पीपल्स मूवमेंट बन गया है। सो थिस वास् अबाउट सुभाष चंद्र बोस स्टिल। जो कि एक मिस्ट्री है कि असल में उनके साथ हुआ क्या था? आई ट्राइड टु रेसोल्वे दी मिस्ट्री एस मच एसआइ कैन आई होप यू लाइक थिस एपिसोड फॉर मोस्ट सच एपिसोड्स यू कैन एक्सप्लोर दी एपिसोड्स सेक्शन ऑफ इंडिया आई विल कम अप विथ दी न्यू एपिसोड रियल सून टिल देन। टेक गुड गाइ ऑफ योर हेल्थ दिस आईएस राकेश साइनिंग अप फ्रॉम इंडिया अनवेल्ड थैंक यू फ़ोर लिसनिंग।

Transcript supplied by the publisher with the episode.

India Unveiled

by Rakesh Soni · Hindi · History

What if the most fascinating stories of India are the ones we've never been told? Welcome to India Unveiled, where history meets mystery, forgotten tales come alive, and the secrets of our past unfold through immersive storytelling.

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