Episode notes
The most reliable way to get rich is to start or join a startup. Economically, a startup is a method of compressing a lifetime’s worth of work into a few years. Instead of working at low intensity for forty years, you work at maximum intensity for four.This compression relies on a specific calculation of productivity. A typical corporate employee might generate $80,000 in value annually. However, a startup founder has several multipliers: Hours: Working twice as many hours. Intensity: Working three times as fast (focus). Efficiency: Eliminating the drag of bureaucracy (middle management).…
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अगर आप अमीर बनना चाहते हैं रिच तो क्या करेंगे? मेरे हिसाब से स्टार्टअप शुरू करना सबसे अच्छा है। अमीर बनने का यह तरीका सैकड़ों साल पुराना है। भले ही स्टार्टअप नाम नया है पर इसका काम पुराने जमाने के बिज़नेस जैसा है। तब लोग समुद्री जहाजों के सफर पर पैसा लगाते थे। आज ये स्टार्ट अप में नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है। स्टार्ट अप असल में एक छोटी कंपनी होती है। यह किसी बहुत मुश्किल प्रॉब्लम का सलूशन निकालती है। बहुत से लोग यह जाने बिना अमीर बन गए जैसे। अच्छा खिलाड़ी बनने के लिए साइंस जानना जरूरी नहीं पर इसके पीछे के रूल्स समझना अच्छा है। इससे आपको दूसरों से ज्यादा अडवांटेज मिलेगा। सोचने वाली बात है कि स्टार्ट अप स्मॉल क्यों होते हैं?
क्या बड़ा होने पर इनका काम बदल जाता है? वे हमेशा नई चीजें ही क्यों बनाना चाहते हैं? वे नई दवाइयां, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ही क्यों बेचते हैं, वे खाने का तेल या साबुन क्यों नहीं बेचते? ये स्टार्टअप का मतलब है अपनी पूरी जिंदगी की कमाई। इसे बस कुछ ही सालों में समेट लेना। 40 साल तक धीरे धीरे काम मत करिए, सिर्फ 4 साल अपनी पूरी जान लगा दीजिए। नई टेक्नोलॉजी में तेजी से काम का बहुत पैसा है। मान लीजिए आप कंप्यूटर के काम में एक्स्पर्ट हैं। बड़ी कंपनी में आपको अच्छी सैलरी मिलेंगे पर आप इससे बहुत ज्यादा काम कर सकते हैं। कैसे? पहले तो आप ज्यादा घंटे काम करेंगे, फिर आप पूरा मन लगा कर काम करेंगे। बड़ी कंपनी में बेकार के बॉस काम रोकते हैं। स्टार्टअप में ऐसा कोई हेडेख नहीं होता। आप अपनी पूरी ब्रेन का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह आप साल भर में करोड़ों कमा सकते हैं। यह हिसाब किताब एक दम सही न भी हो पर आप कम से कम 10 गुना ज्यादा काबिल होंगे। इतना कमाने के लिए बड़ी कीमत चुकानी होगी आपके पास आराम के लिए ज़रा भी समय नहीं होगा इतनी मेहनत की शायद हेल्त भी दांव पर लग जाए। स्टार्ट अप कोई जादू नहीं है, कोई मैजिक नहीं। ये पैसा कमाने का तरीका नहीं बदलते, बस ये काम को बहुत तेज कर देते हैं। यहाँ एक पक्का रोल काम करता है। अगर करोड़ों कमाने हैं तो उतनी ही
तकलीफ सहनी होगी जैसे कोई पूरी जिंदगी पोस्ट ऑफिस में काम करें। वो अपनी पूरी सैलरी बचाकर अमीर बने सोचिए। 50 साल तक उस नौकरी का कितना स्ट्रेस होगा? ये स्टार्टअप में आप यह सारा स्ट्रेस तीन 4 साल में झेलते हैं। एक साथ ज्यादा तकलीफ सहने पर थोड़ा डिस्काउंट मिलता है पर आप मेहनत और दर्द से बच नहीं सकते। अगर ये स्टार्टअप शुरू करना आसान होता तो सब कर लेते। कुछ लोगों को करोड़ों रुपये भी कम लग सकते हैं। वे सोचेंगे की बिल गेट्स जैसे अरबपति कैसे बने। तभी बिल गेट्स की बात छोड़ देते हैं। इतने बड़े अमीर लोगों को एग्ज़ैम्पल बनाना ठीक नहीं अखबार सिर्फ सबसे अमीर लोगों के बारे में लिखते हैं पर ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। बहुत रेयर। बिल गेट्स समझदार और मेहनती तो बहुत थे पर इतना अमीर बनने के लिए किस्मत भी चाहिए किसी भी कंपनी की सक्सेस में किस्मत का यानी लक का बड़ा हाथ होता है। अखबारों में हम उन्हीं लोगों के बारे में पढ़ते हैं जो स्मार्ट थे। साथ ही इनकी किस्मत की लॉटरी भी लग गई थी। बिल गेट्स बहुत समझदार और मेहनती जरूर थे पर माइक्रोसॉफ्ट को एक बहुत बड़ी गलती का फायदा मिला। यह गलती आई बी एम नाम की कंपनी ने की थी। उन्होंने कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर का सौदा करने में चूक कर दी। बिल गेट्स ने आई बी एम को उस गलती की तरफ मोड़ा।
पर अगर आई बी एम में कोई भी अकलमंद होता स्मार्ट होता तो सब बदल जाता। उस समय माइक्रोसॉफ्ट की कोई ज्यादा पावर नहीं थी। वे तो बस एक छोटा सामान बेचने वाले सप्लायर की तरह थे। अगर आई बी एम कोई कड़वी शर्त कोई कंडीशन रखता तो बिल मान जाते। क्योंकि वह सौदा भी माइक्रोसॉफ्ट के लिए बहुत बड़ा था। परबियम की उसे गलती ने माइक्रोसॉफ्ट की किस्मत खोल दी। इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट को बस अपना काम सही से करना था। उन्हें फिर कभी कोई बड़ा खतरा उठाने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्हें बस दूसरों की अच्छी चीजों की नकल करनी थी। अगर आईबीएम वह गलती ना करता तो बिल इतने अमीर ना होते। वे अमीर तो होते पर दुनिया के सबसे बड़े आदमी नहीं बनते। अमीर बनने के बहुत से तरीके हैं। यहाँ हम सिर्फ एक रास्ते की बात करेंगे वह ऐसी चीजें बनाना जिसकी सबको जरूरत हो। लोग जुआ, शादी या चोरी से भी अमीर बनते हैं, पर हम सिर्फ मेहनत वाली कमाई की बात करेंगे। वेल्थ और मनी दौलत और पैसा एक चीज़ नहीं है। दौलत यानी वेल्थ बहुत पुरानी है। पैसा तो बाद में आया चीटियां भी अपना खाना यानी दौलत जमा करती है। दौलत का मतलब है वह सामान जो हमें चाहिए जैसे अच्छा खाना, कपड़े, घर और खिलौने। बिना पैसे के भी आपके पास दौलत हो सकती है। सोचिए आपके पास एक जादुई मशीन है। वह आपको खाना और कपड़े बनाकर दे
देती है। तब आपको पैसों की कोई जरूरत नहीं होगी। अब मान लीजिए आप बर्फ़ के सुनसान पहाड़ पर हैं। वहाँ जेब में पैसा होने का भी कोई फायदा नहीं, तो असली चीज़ दौलत है, वेल्थ है, पैसा नहीं। लोग हमेशा पैसे की ही बात क्यों करते हैं? पैसा बस सामान के लेनदेन का तरीका है। दोनों एक चीज़ नहीं है, यह समझना जरूरी है। आज के समाज में सब अलग काम करते हैं। आप खुद अपने लिए सब कुछ नहीं बना सकते। सब्जी या घर चाहिए तो दूसरों से लेना होगा। मान लीजिए आप गिटार बनाना जानते हैं। पर किसान को गिटार नहीं, सिर्फ खाना चाहिए। सामान के बदले सामान बदलना बहुत मुश्किल है। इसलिए हमने बीच का एक आसान रास्ता निकाला। गिटार के बदले सीधे आलू मत मांगिए पहले गिटार को चांदी या पैसों में बदलिए, फिर उन पैसों से अपनी पसंद का सामान खरीदिए। आजकल हम नोट या डॉलर का इस्तेमाल करते हैं। सरकार पक्का करती है कि ये नोट कीमती रहे। वैल्युएबल रहे। लोग सोचते हैं कि बिज़नेस सिर्फ पैसा बनाता है, बिज़नेस असल में जरूरत का सामान बनाता है, वेल्थ बनाता है, वे वही बनाते हैं जो लोगों को चाहिए। बहुत से लोग एक पुरानी बात मानकर बैठ जाते हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया में दौलत सीमित है, दुनिया में वेल्थ फिक्स्ड है, लिमिटेड है। जैसे खाने की एक ही थाली हो, एक ही पाई हो। अगर किसी को ज्यादा मिला तो दूसरे
को कम मिलेगा। नेताओं को भी अक्सर ऐसी ही बातें करते सुना होगा। बचपन में मुझे भी ऐसा ही लगता था कि अमीरों ने सारा पैसा सारा मन ही छीन लिया है। इसीलिए बाकी लोग गरीब रह गए। पर स्टार्ट अप शुरू करने का मतलब ही अलग है। इसका मतलब है नई दौलत पैदा करना, नया वेल्थ बनाना। पैसा और दौलत मनी और वेल्थ दो लगवाते हैं। पैसा बस चीजों को बदलने का जरिया है। पैसा बस मीडियम है, पर असली दौलत यानी वेल्थ आप खुद बना सकते हैं। मान लीजिए आपके पास एक पुरानी खटारा कार है। आप अपनी मेहनत से उसे एकदम नया बना देते हैं। अब आपकी वह कार और कीमती हो गई। आपने दुनिया में एक अच्छी चीज़ बढ़ा दी, इससे आप अमीर हुए पर कोई गरीब नहीं हुआ। इसका मतलब है कि दौलत यानी वेल्थ की थाली बड़ी हो सकती है। बच्चे भी यह बात बखूबी जानते हैं। जब उनके पास पैसे नहीं होते तो वे तोहफा खुद बनाते हैं। भले ही उनके हाथ के बने खिलौने बाजार जैसे न हो, पर वे खाली हाथ से कुछ नया बनाना जानते हैं। चीजें बनाने वाले जानते हैं कि दौलत यानी वेल्थ बनाई जाती है। हाथ से काम करने वाले कारीगर। कीमती सामान बनाते हैं। आजकल ऐसे असली कारीगर असली क्राफ्ट्समैन बहुत कम बच्चे हैं। कंप्यूटर पर कोड लिखने वाले आज के नए कारीगर हैं, नए क्राफ्ट्समैन हैं। एक प्रोग्रामर कंप्यूटर पर बैठकर वेल्थ बना सकता है।
एक अच्छा सॉफ्टवेयर अपने आप में कीमती चीज़ है। इसे बनाने के लिए किसी बड़ी फॅक्टरी की जरूरत नहीं, बस कीबोर्ड पर टाइप करिए और सामान तैयार है। जैसे कोई बहुत अच्छा इंटरनेट ब्राउज़र बना दे तो उसे पूरी दुनिया की दौलत पूरी दुनिया की वेल्थ बढ़ जाएगी। कंपनी में सब लोग मिलकर दौलत यानी वेल्थ पैदा करते हैं। पर प्रोग्रामर सीधे नई चीज़ तैयार करते हैं। उन्हें पता है की वेल्थ मेहनत से बनाई जाती है। ये कोई केक नहीं जिसे कोई ऊपर से बांट रहा है। सबके काम करने की स्पीड बहुत अलग होती है। मैंने एक बहुत ही तेज प्रोग्रामर को देखा था। उसने एक ही दिन में लाखों रुपयों का काम कर दिया। अच्छा प्रोग्रामर कुछ ही हफ्तों में करोड़ों बना सकता है पर अनारी आदमी बस गलतियाँ और नुकसान करता है। कुछ लोग कहते हैं कि अमीरों के पास ज्यादा पैसा है वैसे नाइंसाफी वैसे इन्जस्टिस मानकर गुस्सा करते हैं, पर एक पुराना प्रोग्रामर इसे अलग तरह से सोचेगा। दुनिया का ज्यादातर अच्छा सॉफ्टवेयर बहुत कम लोग बनाते हैं। वेल्थ बनाने के लिए उसे बेचना जरूरी नहीं। जैसे साइंटिस्ट ने पेनिसिलिन की खोज की, इससे लोगों की जान बची। यह भी एक बड़ी वेल्थ है, बड़ी दौलत है। बहुत से लोग फ्री सॉफ्टवेयर बनाकर दुनिया को देते हैं। इससे याहू जैसी बड़ी कंपनियों को भी फायदा होता है। अमीर देशों में लोग 20 साल तक
स्कूलों में रहते हैं। उन्हें सुबह उठकर किसी बिल्डिंग में जाना पड़ता है। वहाँ पे अक्सर ऐसा काम करते हैं जो उन्हें पसंद नहीं। आपकी पहचान, आपकी ऐडेंटिटी बस आपका नाम और स्कूल बन जाती है। पढ़ाई के बाद सब कहते हैं कि अब नौकरी ढूंढो। नौकरी भी स्कूल जैसा ही एक ग्रुप है। आप कंपनी में अप्लाई देते हैं और वहाँ जुड़ जाते हैं। फिर से वही सुबह उठना और बिल्डिंग जाना शुरू होता है। फरक बस सीखना है। कि अब आपको पैसे मिलते हैं, पर कॉलेज जैसा मज़ा कॉलेज जैसा फन अब जिंदगी में नहीं रहता। असल में कंपनी का मेन काम पैसा कमाना होता है, कंपनी वही चीज़ बनाती है जो लोगों को चाहिए। सामान को सही जगह पहुंचाना भी एक बड़ी सेवा है। एक बड़ी सर्विस है। अगर खाना सही जगह न मिले तो वह बेकार है। लगभग हर कंपनी लोगों की जरूरत पूरी करने के लिए है। जब आप नौकरी करते हैं तो आप भी यही करते हैं। कंपनी में आपका काम सबके साथ मिला दिया जाता है। शायद आपको पता भी न चले कि आप क्या मदद कर रहे हैं, पर कंपनी को प्रॉफिट तभी होगा जब आप काम करेंगे। जितनी आपकी सैलरी है, आपको उससे ज्यादा काम करना होगा। अगर सब कम काम करेंगे तो कंपनी बंद हो जाएगी। लोग कहते हैं कि नौकरी करो जैसे किसी ग्रुप का हिस्सा बनना हो, पर सच तो यह है कि आपको बस लोगों की मदद करनी है। इसके लिए किसी कंपनी से जुड़ना
जरूरी नहीं है। कंपनी तो बस साथ मिलकर काम करने का एक मेथॅड है, एक तरीका है। ज्यादातर लोगों के लिए बनी बनाई कंपनी में जुड़ना ही ठीक है। पर याद रखें काम का असली मतलब है लोगों की जरूरत पूरी करना। बड़ी कंपनियों में सब के काम को एक जैसा मान लिया जाता है। ये एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम है। वहाँ यह पता करना मुश्किल है कि किसने कितना काम किया। सबको बस एक फिक्स्ड सैलरी मिल जाती है। बस आपसे ये उम्मीद होती है कि आप आलसी न हों, वहाँ अपनी पूरी जान लगाने की जरूरत नहीं पड़ती, पर कुछ कामों में ज्यादा मेहनत का बहुत बड़ा फल मिलता है। एक काबिल आदमी आम वर्कर से 100 टाइम्स ज्यादा वेल्थ बना सकता है। जैसे एक प्रोग्रामर कोई बिल्कुल नया सॉफ्टवेयर बना दे। ऐसे कंपनी के पास बहुत सारा नया पैसा आएगा। मगर बड़ी कंपनियां ऐसे लोगों को इनाम नहीं देतीं। अब ब से। 10 टाइम्स ज्यादा सैलरी नहीं मांग सकते कंपनी को लगता है कि आप पहले से ही पूरी मेहनत कर रहे हैं उनके पास आपके काम की कीमत नापने का, आपके काम को मेजर करने का कोई तरीका नहीं है। वह सामान बेचने वालों के लिए नियम अलग होता है। उनका काम नापना बहुत आसान होता है। वे जितना सामान बेचेंगे, उन्हें उतना ज्यादा हिस्सा मिलेगा। वे जितनी मेहनत करेंगे उतना ही ज्यादा पैसा कमाएंगे। सेल्स की तरह बड़े मनेजमेंट का काम भी नापा जा सकता है।
उनकी रिस्पांसिबिलिटी पूरी कंपनी को चलाने की होती है। हम एम्प्लोयी का काम अलग से नहीं चमकता। उससे बस रोजाना मेहनत करने की उम्मीद होती है, पर कंपनी के बड़े मालिक यानी सीईओ को रिसाल्ट देने होते हैं। अगर कंपनी में घाटे में गई तो सीईओ ही जिम्मेदार होगा। अगर सबको उनके काम के हिसाब से पैसा मिले तो मज़ा आ जाए। ऐसी कंपनी सबसे आगे निकल जाएगी। पर सबको सेल्समैन जैसा पैसा देना आसान नहीं। सेल्समैन अकेले काम करता है पर बाकी सब मिलकर सोचिए। एक नया मोबाइल बनाने में कितने लोग लगे? किसी ने पार्ट्स बनाया तो किसी ने उसे सुंदर डिजाइन दिया। फिर किसी ने मार्केटिंग दिखाकर उसे बेचा। अब यह कहना मुश्किल है कि मोबाइल किसकी वजह से बिका? सबका काम एक दूसरे के साथ जुड़ा होता है। बड़े ग्रुप में काम करना आपको स्लो कर देता है वह आपकी अपनी परफॉरमेंस पहचानना मुश्किल हो जाता है। अमीर बनने के लिए दो चीजें बहुत जरूरी हैं, पहली हैं। काम की जांच पड़ताल यानी मेज़रमेंट और दूसरी है बड़े फैसले लेने की ताकत यानी लीवरेज काम को नापना यानी मेज़र करना बहुत जरूरी है। तभी ज्यादा काम का ज्यादा पैसा मिलेगा। लीवरेज यानी ताकत का मतलब है फैसलों का बड़ा असर। फॅक्टरी में कपड़े सिलने का काम देखिए। वह गिना चाहता है कि आपने कितना काम किया पर वहाँ आपके पास कोई
लिवरेज नहीं है। अब बस थोड़ा तेज काम करके कमाई बढ़ा सकते हैं। फ़िल्म के बड़े हीरो के पास दोनों होते हैं। फ़िल्म कितनी चली? इससे हीरो का काम नापा जाता है। हीरो की अक्टिंग से फ़िल्म हिट या फ्लाप होगी। बड़ी कंपनी के मालिक यानी सीई ओह का हाल भी यही है। उनके फैसले पूरी कंपनी की डायरेक्शन चेंज कर देते हैं। जहाँ फायदा ज्यादा है वहाँ डर भी है। सुरक्षित नौकरी में आप कभी अमीर नहीं बनेंगे। बिना खतरे के ज्यादा पैसा कमाना मुश्किल है। इसके लिए आपको बस एक छोटे ग्रुप में जुड़ना है। वह ग्रुप जो किसी बड़ी प्रॉब्लम का हल निकाल रहा हो। छोटे ग्रुप में हर इंसान का काम साफ दिखता है। छोटी कंपनी में काम का सही रिसाल्ट साफ दिखता है। अगर सिर्फ 10 लोग हैं। तो सबकी मेहनत पहचानी जाती है। स्टार्ट अप का मतलब है ज्यादा मेहनत और ज्यादा कमाई। यह आप किसी बॉस के लिए नहीं बल्कि कस्टमर्स के लिए ग्राहकों के लिए काम करते हैं। पर आप अकेले नहीं एक छोटे ग्रुप के साथ काम करते हैं। याद रखिए, आपके साथी भी बहुत टेलेन्टेड होने चाहिए। क्योंकि आपका काम उनके काम के साथ जुड़ जाता है, एवरेज हो जाता है। बड़ी कंपनी 1000 लोगों वाली एक बहुत बड़ी नाव जैसी है। वहाँ एक इंसान के तेज चप्पू चलाने से नाव तेज नहीं होती। वहाँ काम करने वालों की हिम्मत यानी मोटिवेशन कम हो जाती है।
पर अगर 10 काबिल लोगों को एक छोटी नाव में डाल दें तो वह नाव सबसे तेज दौड़ेगी, क्योंकि सब एक से बढ़कर एक है। वहाँ आलस करने वालों की चोरी तुरंत पकड़ी जाएगी। ये स्टार्ट अप का असली मतलब यही है। आप अपने जैसे 10 स्मार्ट लोगों के साथ टीम बनाते हैं, वहाँ आपकी मेहनत का फल आपको सीधे मिलता है। स्टीव जॉब्स कहते थे, शुरू के 10 लोग सबसे जरूरी हैं। मेरे हिसाब से शुरू के सिर्फ पांच लोग ही काफी हैं। स्टार्टअप में सबसे अच्छे लोगों की टीम होनी चाहिए। यह खिलाड़ियों के एक छोटे ग्रुप जैसा होना चाहिए। बड़ी कंपनी में काबिल आदमी का काम सबके साथ दब जाता है। वहाँ आपकी मेहनत का पूरा फायदा आपको नहीं मिल पाता। अगर आप स्मार्ट हैं तो छोटे ग्रुप में काम करना बेहतर है। स्टार्टअप में नई टेक्नोलॉजी की बहुत बड़ी ताकत होती है। तकनीक यानी टेक्नोलॉजी का मतलब है काम करने का नया तरीका नया मेथॅड। एक नया तरीका ढूंढने से लाखों लोगों की मदद होती है। यह मछली पकड़ने के जाल जैसा है जो बार बार काम आता है। सिर्फ बाल काट कर यह खाना बेचकर कोई अमीर नहीं बन सकता। पुराने जमाने में भी नए तरीकों ने ही लोगों को मालामाल किया। नई टेक्नोलॉजी हर समय बहुत तेजी से बदलती है। छोटी कंपनियां तेजी से बड़े फैसले ले सकती हैं। वहाँ फालतू की कागजी कार्रवाई का
कोई बोझ नहीं होता। छोटे ग्रुप में आप नए और अनोखे आजमा सकते हैं। बड़ी कंपनियां भी नई चीजें बना सकती हैं, पर वे बहुत धीरे काम करती हैं। तो मेहनत करने वालों को इनाम नहीं दे पाती। वे सिर्फ उन कामों में टिकती हैं जहाँ बहुत पैसा चाहिए जैसे हवाई जहाज या बिजली घर यानी पावर प्लांट बनाना। फिर भी उन्हें नए ऐडिया के लिए स्टार्टअप चाहिए। ये स्टार्टअप सिर्फ कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए नहीं होते। मैकडॉनल्ड्स ने भी एक खास सिस्टम बनाया। यह तरीका एक कंप्यूटर प्रोग्राम जैसा है। एक बार नियम बनाए और उन्हें पूरी दुनिया में चला दिया। वॉलमार्ट ने भी दुकान चलाने का नया तरीका खोजा। हमेशा मुश्किल काम को अपनी मंजिल बनाइए। हमने एक नियम बनाया था, सीढ़ियों से ऊपर भागो। मान लीजिए कोई भारी भरकम गुंडा आपका पीछा कर रहा है तो आप सीढ़ियों से नीचे नहीं बल्कि ऊपर भागिए ऊपर चढ़ना आपके लिए मुश्किल है, पर उसके लिए और भी ज्यादा मुश्किल है। स्टार्टअप में हमेशा सबसे कठिन समस्या चुनिए सबसे डिफिकल्ट प्रॉब्लम। कठिन काम की वैल्यू बहुत ज्यादा होती है। इससे बड़े और सुस्त दुश्मन आपका पीछा नहीं कर पाएंगे। हम मुश्किल पहाड़ों में छिपे गोरिल्ला जैसे हैं। अगर काम हमारे लिए मुश्किल है तो उनके लिए नामुमकिन होगा। ये स्टार्ट अप असल में यही चीज़ है। पैसे लगाने वाले इसे एक नाम देते
हैं। वैसे बैरियर टु एंट्री रास्ते की रुकावट कहते हैं। वे पूछते हैं, क्या इसे बनाना दूसरों के लिए मुश्किल है? क्या आपने दूसरों के लिए कोई डिफिकल्ट रास्ता बनाया? कोई मुश्किल रास्ता आपको समझाना होगा कि ये आपकी नकल, आपकी कॉपी करना नामुमकिन है। वरना कोई भी बड़ी कंपनी उसे झट से बना लेगी। वे अपने नाम और पैसे से आपको हरा देंगी। अब खुले मैदान में फंसे कमजोर सिपाही जैसे होंगे। कुछ लोग सरकारी कागज बनवाकर खुद को बचाते हैं। यानी पेटेंट पर यह कागज यह पेटेंट हमेशा प्रोटेक्शन नहीं देता। बड़ी कंपनियां इसे चालाकी से पार कर लेती हैं या फिर वे आपसे कानूनी लड़ाई लड़ने लगेंगी। उनके पास बहुत सारा पैसा और समय होता है। क्या आपने फिलो फार्न्सवर्थ का नाम सुना है? उन्होंने ही टीवी का असली काम शुरू किया था टीवी यानी टेलीविज़न का। पर वो इसमें कभी भी अमीर नहीं बन पाए। एक बड़ी कंपनी ने सारा फायदा उनसे छीन लिया। बेचारे सालों तक कोर्ट के चक्कर ही काटते रहे। इसलिए बचाव का सबसे अच्छा तरीका हमला करना है। ऐसी चीज़ बनाओ जिसे कोई और बना ही ना सके। हमेशा मुश्किल काम चुनो और उस पर डटे रहो। हर मोड़ पर सबसे कठिन रास्ता है चुनो, सिर्फ मेहनत करके अमीर बनना आसान नहीं है, वरना हर कोई स्टार्ट अप ही शुरू करता। बड़ी कंपनी में काम बहुत धीरे चलता है।
वहाँ फालतू की मीटिंग और सुस्त मैनेजर होते हैं, पर स्टार्ट अप में कुछ प्रोब्लम्स भी हैं। यहाँ आप अपनी मेहनत खुद तय नहीं कर सकते। आपकी मेहनत आपके दुश्मन तय करते हैं आपके कॉंपिटिटर्स वे चाहते हैं कि आप दिन रात एक करते जरूरी नहीं कि मेहनत के बराबर ही पैसा मिले। यह किस्मत यानी लक का भी बहुत बड़ा हाथ है। ज्यादातर ये स्टार्ट अप्स पूरी तरह डूब जाते हैं। भले ही उनका सामान बहुत अच्छा हो, समय एनीटाइम या पैसा खत्म होते ही काम रुक जाता है। एक स्टार्टअप मच्छर जैसा होता है। मॉस्किटो जैसा भालू या केकड़ा अपने डिफेंस कर सकते हैं, पर मच्छर का सिर्फ एक ही काम है हमला करना। वह अपनी सेफ्टी पर ध्यान नहीं देता या तो वह जीतेगा या फिर वह मारा जाएगा। स्टार्ट अप में या तो जीत है या सब खत्म। हमारी कंपनी भी कई बार डूबने वाली थी। वाया वेब एक बार हम इसे बेचने की बात कर रहे थे, तभी हमें पैसे के लिए बहुत मिन्नतें करनी पड़ी। सब कुछ एकदम खत्म होते होते बचा था। स्टार्ट अप में सब या कुछ नहीं वाला। डर हमें नहीं चाहिए था। हमारी टीम रिस्क को उठाने से बहुत डरती थी। हम बस खूब मेहनत करके उसका पक्का पैसा चाहते थे। हमें किस्मत के भरोसे रहना बिल्कुल पसंद नहीं था। हमें करोड़ों के लालच से बेहतर। पक्के लाखों रुपए लगते थे। पर बिज़नेस की दुनिया में ऐसा
पक्का सौदा नहीं मिलता। एक रास्ता है अपनी कंपनी को शुरू में ही बेच देना। इससे कम अगर पक्का पैसा मिल जाता है, हमने एक बार ऐसा मौका गलती से गंवा दिया। इसके बाद हम कंपनी बेचने के लिए बेताब हो गए। कोई ज़रा भी पूछता तो हम कंपनी बेचने को तैयार रहते पर कोई खरीदने वाला नहीं मिला। सो हमें काम करना पड़ा। शुरू में हमें खरीदना सस्ता था पर बड़ी कंपनियां डरती थीं। बड़ी कंपनियों के मैनेजर बहुत सावधानी से चलते हैं। वेरिस्क लेने के बजाय सेफ चॉइस चुनते हैं। वे जमी जमाई कंपनी के लिए खुशी खुशी ज्यादा पैसे दे देते हैं। इसीलिए चलती हुई कंपनी को बेचना आसान होता है। अगर मौका मिले तो कंपनी को बेच देना चाहिए। बिज़नेस शुरू करना और उसे हमेशा चलाना अलग है। जब काम उचाई पर पहुँच जाए तो उसे सौंप दो। इससे आपका पैसा भी सेफ हो जाता है। सारा पैसा एक ही जगह रखना अक्लमंदी नहीं है। कंपनी बेचने के लिए अपना काम बढ़िया करिए, बेस्ट दीजिए। प्रॉफिट का माना सबसे ज्यादा जरूरी काम है। खरीदार अक्सर डील करने में डिले करते हैं। उन्हें फायदे से ज्यादा कुछ खोने का डर रहता है। उन्हें लगना चाहिए कि कोई और आपको खरीद लेगा। बड़ी कंपनियां सिर्फ आपके यूजर्स की गिनती देखती हैं, उन्हें आपकी टेक्नोलॉजी से उतना मतलब नहीं होता। ज्यादा यूजर्स ही आपकी असली सक्सेस है।
यूजर्स ही इस बात का प्रूफ होते हैं अगर लोग आपकी चीज़ इस्तेमाल नहीं कर रहे तो समझिए कि आपने उनकी जरूरत नहीं समझी। पैसे लगाने वाले यानी इन्वेस्टर्स कुछ चीजों से बहुत डरते हैं। वैसे इंजीनियरों से बचते हैं जो बस कोडिंग में खोये रहते हैं। जो यूजर्स की खुशी के बारे में नहीं सोचते। स्टार्ट अप में सिर्फ मुश्किल सवाल हल करना काफी नहीं है। आपको वो काम करना है जो लोगों के काम आए। यूजर्स की गिनती को ही अपना असली टेस्ट मानिए। जीतने ज्यादा यूजर्स उतना ही सफल आपका काम। जैसे किसी मशीन को ठीक करने के लिए मेज़रमेंट जरूरी है। सिर्फ गेस्ट लगाकर आप काम को बेहतर नहीं बना सकते। ज्यादा यूज़र से ही ये आपकी असली कमाई होगी। इससे आपके दुश्मन आपके कॉंपिटिटर्स डरेंगे और अखबारों में आपका नाम होगा। अपनी पसंद छोड़कर लोगों की जरूरत को समझिए। सामान्य यानी प्रॉडक्ट बनाने में बहुत ज्यादा समय मत खराब करिए। अपना पहला मॉडल यानी वर्शन 1.0 जल्दी से बाजार में लाइए। जब तक लोग इसे इस्तेमाल नहीं करेंगे, आपको सच पता नहीं चलेगा। याद रखिए। वेल्थ यानी दौलत वही है जो लोग पाना चाहते हैं। बहुत कम कंपनियां कस्टमर्स को खुश रखने पर ध्यान देती हैं। टेक्नोलॉजी में आप एक ही चीज़ बनाकर सबको देते हैं। या तो आप सबको खुश करेंगे या फिर सबको नाराज आप लोगों की पसंद के
जीतने करीब होंगे। उतने ही अमीर बनेंगे। अमीर यानी रिच बनने का सिर्फ एक तरीका नहीं है। हिस्टरी में लोग कई तरह से अमीर बने। पहले लोग खदानों, जमीन और जानवरों से अमीर होते थे। ये चीजें अक्सर छीनने या लड़ाई से मिलती थी, इसीलिए तब अमीर लोगों को बुरा माना जाता था। फिर दुनिया में दो बड़े बदलाव आए। दो बड़े चेंजस पहला बड़ा बदलाव था कानून यानी लॉ का राज़। पहले राजा या उनके गुंडे लोगों की कमाई छीन लेते थे पर फिर व्यापारियों ने एक साथ रहना शुरू किया। वे इतने ताकतवर हुए कि राजा उन्हें नहीं लूट पाए। पहली बार मेहनत करने वालों का पैसा सेफ रहा। जब पैसा बचने लगा तो नई मशीनों का जन्म हुआ। इंसान तभी मेहनत करता है जब उसे शांति मिले। अगर आप किसी से उसकी मेहनत का फल छीन लेंगे तो वह नई चीजें बनाना बंद कर देगा। सोवियत यूनियन जैसे देशों में यही गलती हुई। इनाम न मिलने पर लोगों ने मेहनत करना छोड़ दिया। बिना फायदे के नई इन्वेंशन करना मुश्किल है। नई खोज बहुत मुश्किल है। स्टार्टअप का मतलब है तेजी से काम करना। आप 50 साल तक धीरे धीरे पैसा नहीं कमाना चाहते, आप कम समय में हिस्सा पाना चाहते हैं? ऐसी सरकारों ऐसी गवर्नमेंट्स जो अमीर बनने से रोकती हैं, वे आपको धीरे धीरे काम करने पर मजबूर करती हैं। वे कहती हैं कि 50 साल में पैसे
कमा लो, पर 2 साल में खूब मेहनत करके अमीर मत बनो। वे उस बॉस की तरह हैं जो ज्यादा सैलरी नहीं देता। इस सरकारी बॉस से पीछा छुड़ाना मुश्किल है। धीरे काम करने से नई खोज यानी नए इन्नोवेशन नहीं हो पाते। असल में नया काम होना ही बंद हो जाता है। जब आप मुश्किल समस्या चुनते हैं तभी तेजी से बढ़ पाते हैं नई टेक्नोलॉजी बनाना बहुत। इस स्ट्रेस का काम है बहुत सिरदर्दी है। एडिशन ने कहा था दिमाग कम पसीना ज्यादा लगता है। अगर फायदा न मिले तो कोई इतनी मेहनत क्यों करेगा? रॉकेट बनाने के लिए इंजीनियर कम पैसों में मान जाएंगे पर बल्ब ये चिप बनाने के लिए बड़ा लालच चाहिए। तो स्टार्टअप्स कोई नई चीज़ नहीं है। सैकड़ों सालों से अमीर बनने का ही एक रेसिपी है, वो है सही जांच यानी मेज़रमेंट और काम का बड़ा असर। यानी बेवरेज जब थोड़े से लोग मिलकर कोई नया टेकनिक ढूंढ़ते हैं। तो वे बहुत कम समय में बहुत आगे निकल जाते हैं। यही वजह है कि यूरोप इतना पावरफुल बन पाया। इतना ताकतवर महाराजाओं ने मेहनत करने वालों का पैसा नहीं छीना। जब लोगों को लगा कि उनकी कमाई सेफ है सुरक्षित है तो उन्होंने नई मशीनें और नई टेक्नोलॉजी बनाई। रूस के पास बहुत बड़े साइंटिस्ट थे पर उनके पास काम करने के लिए अच्छे कंप्यूटर्स नहीं थे। वहाँ की सरकार ने नया काम करने वालों को दबा दिया।
इतिहास से हमें बस एक ही सबक मिलता है एक ही लेसन कि नेताओं को नया काम करने वालों को बढ़ावा देना चाहिए। अगर आप होशियार लोगों को उनकी कमाई रखने देंगे तो वे आपके देश को पूरी दुनिया का राजा बना देंगे। इस हिस्से में बस इतना ही हम फिर मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में एक नए टॉपिक के साथ। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस विथ रोहित धन्यवाद।
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I finally realized today why politics and religion yield such uniquely useless discussions.As a rule, any mention of religion on an online forum degenerates into a religious argument. Why? Why does this happen with religion and not with Javascript or baking or other topics people talk about on forums?What's different about religion is that people don't feel they need to have any particular expertise to have opinions about it. All they need is strongly held beliefs, and anyone can have those. No thread about Javascript will grow as fast as one about religion, because people feel they have to…
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27 Jun 2026 · 1 hr 2 min
The Innovator's Dilemma
Clayton Christensen’s The Innovator’s Dilemma (1997) is arguably the most influential business book of the last thirty years. It’s the book that popularized the term "disruption"—a word now so overused in Silicon Valley that its original, technical meaning is often lost.At its core, the book tackles a haunting question: Why do world-class companies, led by brilliant managers, still fail even when they do everything "right"?The Core Thesis: Why Good Companies FailChristensen argues that the very management practices that allow companies to become industry leaders are the same ones that lead…
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26 Jun 2026 · 10 min
The Bus Ticket Theory of Genius (Hindi/हिंदी में)
To do great work, it is widely accepted that you need natural ability and determination. However, there is a third, often overlooked ingredient: an obsessive interest in a particular topic.To understand this, look at bus ticket collectors. Like many collectors, they possess an obsessive fascination with minutiae that seems pointless to the average person. They track distinctions others ignore because they simply do not care. Importantly, this love is "disinterested"—it is not done for money or status, but for its own sake.When examining the lives of those who have achieved genius, a…
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24 Jun 2026 · 55 min
How to Do Great Work (Hindi/हिंदी में)
Doing great work across any field isn’t just about "working hard"; it requires a specific, intersecting set of principles. For the highly ambitious, the path to groundbreaking achievements involves a distinct process of discovery, execution, and mindset.1. Finding What to Work OnYour chosen work must meet three criteria: you have a natural aptitude for it, you possess a deep interest in it, and it offers the scope to do great work.Since you can't always predict the third criterion, focus on the first two. Figuring this out is messy because educational systems falsely assume you can plan your…
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23 Jun 2026 · 1 hr 6 min
The mind doesn't work that way
Jerry Fodor’s The Mind Doesn’t Work That Way (2000) serves as a sharp, intellectually salty rebuttal to the "New Synthesis" of cognitive science. At the time of its release, figures like Steven Pinker and Henry Plotkin were popularizing the idea that the human mind is a massive collection of evolved, computational modules. Fodor, despite being one of the fathers of the Computational Theory of Mind (CTM), stepped in to tell his colleagues they were getting ahead of themselves.His argument isn't that CTM is wrong, but rather that it is fundamentally limited. He contends that while computation…
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22 Jun 2026 · 49 min
The Prologue to Friedrich Nietzsche’s Thus Spoke Zarathustra
The Prologue to Friedrich Nietzsche’s Thus Spoke Zarathustra is not merely an introduction; it is a self-contained philosophical masterpiece that lays the groundwork for one of the most profound and challenging works of modern thought. It opens with a powerful image of isolation and abundance: Zarathustra, having spent ten years in the mountains, realizes that his wisdom has grown too vast to contain. Like a cup that must overflow or a sun that must set to share its light, he resolves to "go under" (descend) and bring his revelations to humanity. This descent marks the beginning of a…
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5 Jul 2026 · 5 hr 37 min
Demian (Hindi/हिंदी में)
Published in 1919 under the pseudonym "Emil Sinclair," Demian is far more than a standard coming-of-age story. It is a feverish, introspective, and philosophical exploration of the human soul. Written by Hermann Hesse during a period of deep personal crisis and psychoanalysis (under a disciple of Carl Jung), the novel serves as a guide for anyone struggling to reconcile societal expectations with their own inner truth.It is a Bildungsroman (a novel of education/formation) that moves away from the physical world of action and adventure, diving instead into the turbulent waters of the…
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4 Jul 2026 · 1 hr 23 min
How to Change Your Mind (Hindi/हिंदी में)
In his 2018 masterpiece, How to Change Your Mind: What the New Science of Psychedelics Teaches Us About Consciousness, Dying, Addiction, Depression, and Transcendence, Michael Pollan performs a remarkable feat of cultural alchemy. He takes a subject long relegated to the fringes of "hippie" counterculture and places it firmly within the realm of rigorous science, clinical medicine, and profound philosophical inquiry. The book is structured as a "mental travelogue," blending meticulous historical research with cutting-edge neuroscience and Pollan’s own transformative experiences as a…
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3 Jul 2026 · 1 hr 9 min
On the Shortness of Life (Hindi/हिंदी में)
Seneca was a Roman thinker and a leader in the Stoic school. He wrote a short work called On the Shortness of Life. It is a letter to a man named Paulinus. But it also feels like a letter to us. The claim is bold and simple: life is not too short; we just waste most of it. This line sounds sharp. Yet the essay is warm. It gives us a way to use time well.Seneca starts by naming the problem. People say there is not enough time. They rush. They groan. They blame fate. Seneca says the fault is ours. We “are not given a short life but make it so.” Many fill their days with work that is not their…
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2 Jul 2026 · 50 min
Enchiridion (Hindi/हिंदी में)
Epictetus wrote a small book called Enchiridion—meaning “manual,” or a sort of practical guide. This little text has had a profound impact on modern thought and philosophy. When it was translated into everyday language, it quickly became popular, especially among those who thought for themselves, those who challenged the Church, and those who valued their own inner life. Montaigne owned a copy. Pascal disliked the pride of Stoic philosophers. Frederick the Great carried it with him to every battle. When Anthony, Earl of Shaftesbury, was gravely ill, this book gave him strength and courage,…
