Episode notes
Clayton Christensen’s The Innovator’s Dilemma (1997) is arguably the most influential business book of the last thirty years. It’s the book that popularized the term "disruption"—a word now so overused in Silicon Valley that its original, technical meaning is often lost.At its core, the book tackles a haunting question: Why do world-class companies, led by brilliant managers, still fail even when they do everything "right"?The Core Thesis: Why Good Companies FailChristensen argues that the very management practices that allow companies to become industry leaders are the same ones that lead…
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यह किताब बड़ी कंपनियों के फेल होने के बारे में है। ये कंपनियां बहुत अच्छी और सक्सेसफुल थी। इनके मैनेजर बहुत स्मार्ट और काबिल थे। फिर भी ये कंपनियां मार्केट में अपनी पकड़ खो बैठी। अक्सर कंपनियां घमंड या खराब प्लानिंग की वजह से डूबती हैं। लेकिन ये किताब उन कंपनियों के बारे में नहीं है। यह उन कंपनियों की कहानी है जिन्होंने सब सही किया। उन्होंने अपने कस्टमर्स की हर बात सुनी। नई मशीनों और टेक्नोलॉजी में खूब पैसा लगाया, फिर भी वे अचानक मार्केट से बाहर हो गई। ऐसा तेजी से बदलने वाले बिज़नेस में भी हुआ और धीरे चलने वाले पुराने धंधों में भी जैसे सीर्स नाम की एक बहुत बड़ी दुकान थी। एक समय वह दुनिया की सबसे बेहतरीन कंपनी थी। उसने सामान बेचने के कई नए तरीके शुरू किए। सब कहते थे कि वे लोग कभी गलत नहीं कर सकते, पर आज सियर्स का नाम कोई नहीं जानता। वह वक्त के साथ आने वाले बदलाव को नहीं समझ पाई। सस्ती दुकानों और नए डिस्काउंट ने उसे पीछे छोड़ दिया। उसका पुराना तरीका अब किसी काम का नहीं रहा। जब उसे बदलना चाहिए था तब उसने ध्यान नहीं दिया। यही हाल कंप्यूटर बनाने वाली बड़ी कंपनियों का भी हुआ। आई बी एम जैसी कंपनी ने छोटे कंप्यूटरों पर ध्यान नहीं दिया। उन्हें लगा कि ये छोटे कंप्यूटर किसी काम के नहीं है, लेकिन छोटे
कंप्यूटर बनाने वाली नई कंपनियां आगे निकल गई। जब तक बड़ी कंपनियां जागी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यह सुनकर बड़ा अजीब लगता है। क्या वे मैनेजर बेवकूफ थे? बिल्कुल नहीं। असल में वे बहुत अच्छे से अपना काम कर रहे थे। यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन गई। वे अपने पुराने कस्टमर्स को खुश करने में ही लगे रहे। उन्होंने नई और छोटी चीजों को बेकार समझा। मनेजमेंट के पुराने नियम हमेशा काम नहीं आते, कभी कभी ग्राहकों की बात न सुनना भी सही होता है, कभी कभी छोटा मार्केट चुनना भी जरूरी होता है। इस किताब में आप यही नया तरीका सीखेंगे, इसे डिसरूपतिवे इन्नोवेशन कहते हैं। यह तरीका आपको दुनिया समझने में मदद करेगा। इससे आप आने वाले बदलाव को पहले ही पहचान लेंगे, चाहे आपका काम छोटा हो या बहुत बड़ा। यह किताब आपको जीत का नया रास्ता दिखाएगी। यह किताब दो हिस्सों में बंटी है। पहला हिस्सा बताएगा कि स्मार्ट मैनेजर क्यों फैल होते हैं?
उनकी सही सोच ही उनकी हार का कारण बनती है। दूसरा हिस्सा इस मुश्किल को। सुलझाने का रास्ता दिखाएगा। यह मैनेजरों को नए और पुराने काम साथ करना सिखाएगा। हम पहले कंप्यूटर की डिस्क ड्राइव कंपनियों को देखेंगे। वह अच्छी कंपनियां बार बार मुसीबत में फंसी हैं। वहाँ चीजें बहुत तेजी से बदलती हैं। बड़ी कंपनियों ने अपने लीडरशिप बहुत जल्दी खो दी। यही बात खुदाई वाली मशीनों और स्टील के काम में भी दिखा। तेज हो या धीरे हर बिज़नेस में ही कहानी है इस पूरी जांच। पड़ताल में तीन खास बातें मिली पहली बात, नई मशीनें या। तरीके दो तरह के होते हैं एक वो जो पुराने काम को बेहतर बनाते हैं, दूसरे वो जो पुराना रास्ता ही बदल देते हैं यानी डिस्रप्टिव करते हैं। दूसरी बात मशीनें लोगों की जरूरत से ज्यादा तेज बदलती हैं। तीसरी बात। बड़े कस्टमर्स नई चीजों को जल्दी नहीं अपनाते। ज्यादातर नई चीजें पुराने सामान को और अच्छा बनाती हैं। इसे हम सुधारने वाला तरीका कहते हैं। सस्टेनिंग टेक्नोलॉजी बड़ी कंपनियां इस काम में बहुत एक्स्पर्ट होती हैं। लेकिन कभी कभी रास्ता बदलने वाली चीजें आती हैं। डिस्रप्टिव टेक्नोलॉजीज आती हैं। शुरुआत में ये चीजें पुराने सामान से थोड़ी कमजोर होती हैं पर ये बहुत सस्ती, छोटी और आसान होती है जिससे बड़े कंप्यूटर के सामने
छोटे पर्सनल कंप्यूटर आए या बड़ी। भारी मोटरसाइकिल के सामने होंडा की छोटी बाइक मशीनें लोगों की जरूरत से कहीं ज्यादा तेजी से बदलती हैं। कंपनियां अक्सर ऐसी चीजें बना देती हैं जो बहुत महंगी होती हैं। कस्टमर उतनी ज्यादा फीचर के लिए पैसे नहीं देना चाहता। तभी रास्ता बदलने वाली कमजोर चीजें कल की लीडर बन जाती हैं। आज की सस्ती चीज़ कल मार्केट पर राज़ करती है। लोग पुराने और महंगे सामान को छोड़ देते हैं। बड़ी कंपनियां नई चीजों में पैसा क्यों नहीं लगाती? पहला। इन नई चीजों में प्रॉफिट बहुत कम दिखता है। दूसरा, ये चीजें शुरू में बहुत छोटे बाजार के लिए होती हैं। स्मॉल मार्केट के लिए तीसरा उनके सबसे बड़े और अमीर कस्टमर इन्हें नहीं चाहते। जब तक बड़ी कंपनियां जागती हैं, तब तक बहुत देर हो जाती है। छोटे खिलाड़ी तब तक पूरे बाजार पर कब्जा कर लेते हैं। मैनेज किताब में कई एग्ज़ैम्पल्स दिए हैं। डिस्क ड्राइव से लेकर स्टील बनाने वाली फैक्टरियों तक, दुकानों से लेकर प्रिंटर और बिजली वाली कारों तक हर जगह एक ही जैसा नतीजा देखने को मिला। ये किताब आपको इन खतरों से बचना सिखाएगी। ये आपको एक बेहतर और होशियार लीडर बनाएगी। शुरुआत में ऐसा लगता है कि हारना तय है। अच्छे मैनेजर भी अपनी ही होशियारी में फंस जाते हैं। पुराने तरीके यहाँ काम नहीं आते। ज्यादा मेहनत या अच्छी प्लानिंग
भी फैल हो जाती है। ये सुनकर सिखाने वाले और सीखने वाले दोनों डर जाते हैं, लेकिन इस मुश्किल का एक सलूशन है। हर कंपनी कुछ पक्के नियमों के हिसाब से चलती है जिससे लॉज़ ऑफ नेचर होते हैं। पुराने जमाने में लोग पंख चिपकाकर उड़ना चाहते थे। वे ज़ोर ज़ोर से हाथ मारते, फिर भी गिर जाते। वे लॉस ऑफ़ नेचर के नियमों से लड़ रहे थे। इंसान तब उड़ा जब उसने हवा के नियमों को समझा। बिज़नेस में भी ऐसे ही कुछ नियम होते हैं अगर आप इनसे लड़ेंगे। तो डूब जाएंगे। अगर इन्हें समझ कर इस्तेमाल करेंगे तो बहुत आगे बढ़ेंगे। नियम नंबर वॅन कंपनी अपने कस्टमर्स और पैसा लगाने वालों यानी इन्वेस्टर्स। पर टिक्की है। मैनेजर को लगता है कि पैसा कहाँ खर्च करना है ये उसके हाथ में है में कस्टमर्स तय करते हैं कि पैसा कहाँ जाएगा। बड़ी कंपनियां वही ऐडिया मार देती हैं जो उनके कस्टमर्स को पसंद नहीं। वे नए और सस्ते तरीकों में पैसा नहीं लगा पाती। जब तक वे शुरू करती हैं, बहुत देर हो चुकी होती है तो इसका हल क्या है?
क्या सलूशन है? एक अलग और छोटी टीम बनाइए एक स्मॉल टीम उन्हें नए और सस्ते काम की पूरी आजादी दीजिए। उन पर पुराने कस्टमर्स का प्रेशर नहीं होना चाहिए। तभी वे। नए मार्केट में जीत पाएंगे नियम? नंबर टू नई चीजें हमेशा स्मॉल मार्केट से शुरू होती हैं। शुरुआत में वहाँ से बहुत कम कमाई होती है। कम रेवइन्यू मिलता है। एक छोटी कंपनी के लिए पांच 10,00,000 की कमाई बहुत है। लेकिन एक बहुत बड़ी कंपनी के लिए यह कुछ भी नहीं है। बड़ी कंपनियां इंतजार करती हैं कि बाजार कब बड़ा होगा। जब बाजार बड़ा होता है, तब तक छोटी कंपनियां वहाँ जम चुकी होती हैं, तो इसका क्या सलूशन है?
सलूशन है कि नए काम के लिए एक छोटी ऑर्गेनाइजेशन बनाइए। उनके लिए छोटी जीत भी बड़ी होनी चाहिए। तभी वे पूरे जोश के साथ काम कर पाएंगे। नियम नंबर थ्री जो चीज़ अभी है ही नहीं उसका हिसाब नहीं लग सकता। अच्छी मनेजमेंट का मतलब है सोच समझकर प्लानिंग करना। पुरानी चीजों के लिए यह तरीका बहुत बढ़िया है। वह हमें पता है कि कितने कस्टमर्स हैं और कितनी रिवेन्यू होगी। लेकिन नई और डिस्रप्टिव चीजों के लिए कोई डेटा नहीं होता। एक्स्पर्ट लोग भी इसके बारे में हमेशा गलत अंदाजा लगाते हैं। बड़ी कंपनियां बिना हिसाब किताब के कदम नहीं रखती। यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है। उस बाजार का डेटा मांगती है। जो भी बना ही नहीं। इसका सलूशन क्या है? सलूशन है की प्लानिंग करने के बजाय सीखने पर ध्यान दीजिए। यह मानकर चलिए कि आपका अंदाजा गलत हो सकता है। पैसा ऐसे लगाइए कि आप नई चीजें सीख सकें। इसे डिस्कवरी बेस्ड प्लानिंग यानी खोज वाली प्लानिंग कहते हैं। नियम नंबर फोर ताकत ही कमजोरी बन जाती है। जब कोई नया काम आता है तो मैनेजर अच्छे लोग ढूंढ़ते हैं। उन्हें लगता है कि अच्छे लोग सब संभाल लेंगे, पर कंपनी सिर्फ लोगों से नहीं चलती। कंपनी की अपनी एक कैपेबिलिटी होती है, एक ताकत होती है। यह ताकत दो चीजों से आती है पहला काम करने का तरीका यानी प्रोसेसर
और दूसरा कंपनी की पसंद या प्राथमिकता यानी वैल्यूज लोग बदल सकते हैं पर कंपनी के तरीके यानी प्रोसेसेस नहीं। एक बड़ी कंपनी की मशीनें छोटे काम नहीं कर सकती। जीस तरह से बड़ा कंप्यूटर बनता है उसे। छोटा फ़ोन नहीं बनेगा। इसी तरह कंपनी की पसंद यानी उसकी वैल्यूज भी रुकावट बनती है। अगर कंपनी को ज्यादा मुनाफ़े की आदत है है, प्रॉफिट की आदत है तो वह कम मुनाफ़े वाला काम कभी नहीं करेगी। यही ताकत 1 दिन कंपनी की। कमजोरी यानी डिसेबिलिटी बन जाती है नियम नंबर फाइव जरूरत से ज्यादा तरक्की टेक्नोलॉजी सप्लाई वर्सस मार्केट डिमॅंड शुरू में डिसरूपतिवे टेक्नोलॉजी यानी नई चीजें थोड़ी कमजोर होती हैं। वे बड़े बाजार के लायक नहीं होतीं, पर वे धीरे धीरे बहुत अच्छी हो जाती। हैं। कंपनियां अक्सर जरूरत से ज्यादा अच्छी चीजें बनाती हैं। वे ग्राहक की डिमैंड से आगे निकल जाती। हैं। ग्राहक यानी कस्टमर को उतनी ज्यादा फीचर्स नहीं चाहिए होती। जब सामान जरूरत से ज्यादा अच्छा हो जाता है तो कस्टमर उसे छोड़कर सस्ती चीजें ढूंढता है। अब मुकाबला खूबियों पर नहीं बल्कि भरोसे पर होता है। फिर मुकाबला आसानी यानी कन्वीनियेंस और प्राइस पर होता है। यहीं पर सस्ती और नई चीजें बाजार जीत लेती हैं। बड़ी कंपनियां अपनी स्पीड में बाजार खो देती। हैं। तो खतरे और मौके को कैसे पहचाने? मैनेजर अक्सर डरे हुए होते हैं।
वे जानना चाहते हैं कि उनका बिज़नेस कब डूबेगा या अभी नया मौका कैसे ढूंढे? इसे समझने के लिए बिजली वाली कार को देखिए। इलेक्ट्रिक कार को आज शायद पेट्रोल वाली कारें बहुत अच्छी चल रही हैं पर इलेक्ट्रिक कार का एक बड़ा बदलाव है। बड़े कस्टमर को आज इसकी जरूरत नहीं है पर आने वाले कल में यही कार राज़ करेंगी। हमें नए कस्टमर्स के हिसाब से एक अलग टीम बनानी होगी। आज इंटरनेट की वजह से सब बदल रहा है। पुराने बड़े खिलाड़ी अब खतरे में हैं। पुरानी चीजों के लिए नई चीजें हैं। फोटो वाली रेल के लिए डिजिटल फोटो आ गई। तार वाले फ़ोन के लिए मोबाइल फ़ोन, बड़ी दुकानों के लिए ऑनलाइन शॉपिंग, कॉलेज जाकर पढ़ाई करने की जगह, इंटरनेट से पढ़ाई, बाहरी किताबों की जगह मोबाइल पर किताबें, बड़े ऑपरेशन की जगह छोटे छेद वाले ऑपरेशन ये नई चीजें धीरे धीरे पुरानी चीजों को खत्म कर रही हैं। अगर मैनेजर इन नियमों को समझ ले तो वो बच सकते हैं। वे अपनी कंपनी को फिर से नंबर वॅन बना सकते हैं। भाई अब समझते हैं कि बड़ी कंपनियां फेल क्यों होती हैं? समझने की कोशिश करेंगे। डिस्क ड्राइव की कहानी से। बिज़नेस की पढ़ाई साइंस जैसी है। साइंटिस्ट अक्सर मक्खियों पर रिसर्च करते हैं। मक्खियां 1 दिन में पैदा होकर मर जाती है। इसे बदलाव को समझना आसान होता है। बिज़नेस की दुनिया में डिस्क
ड्राइव कंपनियां ऐसी ही। है। यहाँ सब कुछ पलक झपकते बदल जाता है। कंपनियां बहुत जल्दी बनती हैं और बिगड़ती हैं इसलिए यहाँ से सीखना बहुत आसान है। बड़ी कंपनियां क्यों डूबी इसकी एक पहेली है। वे अपने कस्टमर्स की बात सुनती थी, वे नई मशीनों में खूब पैसा लगाती थी। पर यही उनकी हार का कारण बना। अगर समझे की डिस्क ड्राइव कैसे काम करती है तो ये कंप्यूटर की मेमॅरि जैसा है। यह पुराने ग्रामर फ़ोन मशीन जैसा दिखता है। इसमें एक घूमने वाली प्लेट यानी डिस्क होती है। एक सुई जैसा हिस्सा यानी है इस पर लिखता है। यह सुई मैगनेट की मदद से चलती है। यह जानकारी को जीरो और वॅन में लिखती है। इसे ही कंप्यूटर के लैंगुएज कहते हैं। आज यह छोटा है पर पहले ऐसा नहीं था। सबसे पहली मशीन आई बी एम ने बनाई थी। वह एक बड़े फ्रिज जितनी बड़ी थी। उसमें सिर्फ पांच एम बी डेटा आता था। आज इतना डेटा एक फोटो में होता है। धीरे धीरे बहुत सारी नई कंपनी आई। 1976 में ऐसी 17 बड़ी कंपनियां थी, पर 19195 तक उनमें से सिर्फ आई बी एम बची बाकी सब या तो बंद हो गई या बिक गई। मशीनों का साइज छोटा होता गया पर उनकी कैपेसिटी बढ़ती गई। प्राइस भी बहुत तेजी से गिरने लगे। क्या ये कंपनियां आलसी थीं?
बिल्कुल नहीं, ये ऐसा था जैसे कीचड़ के पहाड़ पर चढ़ना ज़रा सा रुके नहीं कि आप नीचे गिर जाएंगे ऐसे। कीचड़ वाली फिसलन यानी मुडस्लाइड कहते हैं। पर मेरी जांच पड़ताल ने कुछ और बताया। कंपनियां तेजी की वजह से नहीं डूबी। वे बदलाव के तरीके की वजह से डूबी बदलाव यानी चेंज दो तरह के होते। हैं। पहला सुधारने वाला तरीका यानी सस्टेनिंग टेक्नोलॉजी। यह पुरानी चीज़ को और बेहतर बनाता है। बड़ी कंपनियां इसमें हमेशा नंबर एक रहीं। दूसरा है डिस्रप्टिव टेक्नोलॉजी यानी रास्ता बदलने वाला तरीका। यह खेल के नियम ही बदल देता है। यह शुरू में सस्ता और कमजोर दिखता है। बड़ी कंपनियां इसे बेकार समझ कर छोड़ देती। हैं। यही उनकी सबसे बड़ी गलती होती है सस्टेनिंग टेक्नोलॉजी। यह वो तरीका है जिससे पुरानी चीजें और बेहतर होती हैं। जैसे पहले बल्ब आते थे फिर ट्यूब लाइट आई। आजकल बाजार में बढ़िया एलई डी बल्ब मिलते हैं। काम वही है, रौशनी देना बस तरीका बेहतर हो गया। डिस्क ड्राइव में भी ऐसा ही हुआ। वैज्ञानिक ने प्लेट पर जानकारी लिखने की डेंसिटी बढ़ाई। हर नई मशीन एक इस जैसे ग्राफ पर चलती है। शुरू में प्रोग्रेस धीरे होती है। फिर एकदम से तेजी आती है। आखिर में सुधार का स्कोप खत्म होने लगता है। तभी एक बिलकुल नया तरीका एक बिलकुल नई टेक्नोलॉजी जन्म लेती
है। जैसे पुराने लोहे के पुरज़ों की जगह नई थिन फ़िल्म आई। बड़ी कंपनियों ने इसमें करोड़ों रुपए लगाए। आई बी एम और दूसरी कंपनियों ने इसमें 50 मिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च करे। वे इसमें नंबर वॅन रही क्योंकि उनके पास पैसा था। दूसरा है डिस्रप्टिवे टेक्नोलॉजी यानी रास्ता बदलने वाला तरीका असली तबाही तबाही जो मशीनों का साइज छोटा हुआ। पहले 14 इंच की बहुत बड़ी डिस्क आती थी। फिर अचानक एयठ इंच और 5.25 इंच की छोटी डिस्क आई। हैरानी की बात ये है कि ये शुरू में बेकार थी। इनमे डेटा रखने की कैपेसिटी बहुत कम थी। बड़ी कंपनियों के बड़े कस्टमर्स को ये पसंद नहीं आई। कस्टमर्स ने कहा। हमें छोटी नहीं ज्यादा जगह वाली डिस्क चाहिए। बड़ी कंपनियों ने अपने कस्टमर्स की बात मान ली। उन्होंने छोटी डिस्क बनाना छोड़ दिया। वहीं उन्होंने सबसे बड़ी गलती कर दी। मशीनों लोगों की जरूरत से ज्यादा तेज बेहतर होती। हैं। एक आम आदमी को शायद 20 एम बी जगत चाहिए थी, पर बड़ी कंपनियां 100 एम बी 200 एम बी बनाने में लगी रही। वे अपने कस्टमर्स को जरूरत से ज्यादा देने लगी। दूसरी तरफ छोटे डिस्क बनाने वाली नई कंपनियां थीं, वे धीरे धीरे अपनी मशीनों को इम्प्रूव करती रही। 1 दिन ऐसा आया जब छोटी डिस्क भी काफी अच्छी हो गई। अब वो बड़ी मशीनों का काम भी आसानी से कर सकती थी।
ऊपर से वह सस्ती, छोटी और हल्की भी थी। अचानक सब लोग छोटी डिस्क खरीदने लगे। 14 इंच वाली बड़ी कंपनियां देखते ही देखते बर्बाद हो गई। तो बड़ी कंपनियां क्यों हारी? वो इसलिए नहीं हारी कि उन्हें काम नहीं आता था। वो इसलिए हारी क्योंकि वे बहुत अच्छी थी। उन्होंने अपने सबसे अमीर कस्टमर्स की बात सुनी। उन्होंने सिर्फ ज्यादा प्रॉफिट वाले काम पर ध्यान दिया। उन्होंने छोटे और नए मार्केट को बेकार समझा। जब तक उन्हें अपनी गलती, समस्याएं बहुत देर हो गई थी, नई कंपनियों ने पूरे बाजार पर कब्जा कर लिया था। अब समझते हैं कि कंपनियां क्यों फेल होती? हैं। एक्सपर्ट्स और बड़े मैनेजर सालों से एक पहेली सुलझा रहे हैं। आखिर बहुत अच्छी कंपनियां अचानक क्यों डूब जाती हैं?
इसके बारे में लोग दो तरह की बातें करते हैं। पहली कंपनी के अंदर काम करने का तरीका यानी स्ट्रक्चर खराब है। दूसरी नई मशीनों को समझना उनके बस की बात नहीं। पर हम यहाँ एक तीसरी और जरूरी बात सीखेंगे। इसे हम कीमत का जाल या वैल्यू नेटवर्क कहेंगे। कुछ लोगों का मानना है कि कंपनी की टीम की रुकावट है। बड़ी कंपनियों में बहुत सारे छोटे छोटे ग्रुप्स होते हैं। हर ग्रुप सामान का एक अलग हिस्सा बनाता है। जब तक सामान पुराने जैसा रहता है, सब ठीक चलता है पर जब सामान का पूरा आर्किटेक्चर बदलना हो तो मुश्किल आती है। तब ये अलग अलग ग्रुप आपस में कोवार्डिनेशन नहीं बिठा पाती। कंपनियां धीरे धीरे सुधार करने में माहिर होती। हैं। वे वही काम बेहतर करते हैं जो वे बरसों से कर रही हैं, पर जब कोई बिल्कुल नया और अनोखा बदलाव आता है, कोई रेडिकल चेंज तो पुरानी जानकारी किसी काम की नहीं रह जाती। बड़ी कंपनियां अपनी पुरानी कैपेबिलिटीज़ के कारण अपनी पुरानी ताकत के कारण हार जाती। हैं। वहीं नई कंपनियां नया सीखने में ज्यादा तेज होती हैं। लेकिन डिस्क ड्राइव के मामले में ये दोनों बातें गलत साबित हुईं। वहाँ बड़ी कंपनियों ने बहुत मुश्किल और नए काम किए। उन्होंने करोड़ों रुपए लगाए और नई मशीनें भी बना लीं। पर वे?
आठ इंच वाली छोटी डिस्क जैसे आसान काम में फैल हो गई। इन्वेस्टिगेशन से पता चला कि असली वजह कुछ और थी। अगर कस्टमर को बदलाव चाहिए तो कंपनी उसे कर लेती थी पर अगर कस्टमर को वो बदलाव नहीं चाहिए तो कंपनी फैल हो जाती थी। यही से एक नई बात समझ में आती है। हर कंपनी एक खास घेरे या जाल या नेटवर्क में काम करती है। इसी जाल में उसे कस्टमर मिलते हैं और प्रॉफिट होता है। कंपनी की पूरी सोच कंपनी का पूरा माइंडसेट इसी नेटवर्क के हिसाब से बन जाता है। वह वही काम करती है जिसमें उसे ज्यादा फायदा दिखे। वह उन कामों को छोड़ देती है जिसके नेटवर्क से उसके जाल से बाहर है। कंपनी इस जाल में एक दूसरे से जुड़ी होती है जैसे एक बड़ा कंप्यूटर सिस्टम ले लीजिए। उस कंप्यूटर के अंदर एक डिस्क ड्राइव होती है, उस डिस्क ड्राइव के अंदर एक मोटर और हेड होती है। उस मोटर के अंदर भी छोटे छोटे कॉंपोनेंट्स होते हैं। ये एक चैन की तरह काम करता है। मोटर बनाने वाला, डिस्क बनाने वाले को सामान भेजता है। रिस्क बनाने वाला कंप्यूटर बनाने वाले को सामान बेचता है। सब एक दूसरे की जरूरत और फायदे से यानी वैल्यू से बंधे हुए हैं। यही वो जाल है। यही वो वैल्यू नेटवर्क है जो बड़ी कंपनियों को बांधे रखता है। हर नेटवर्क में चीजों को अलग तरह से नापा जाता है। एक आदमी के लिए जो जरूरी है,
दूसरे के लिए नहीं। जैसे बड़े कंप्यूटर यानी मेन फ्रेम वाले कस्टमर्स को क्या चाहिए? उन्हें बहुत ज्यादा कैपेसिटी और तेज स्पीड चाहिए, लेकिन लैपटॉप वाले कस्टमर को कुछ और चाहिए। उन्हें मजबूती और छोटा साइज चाहिए। भले ही दोनों चीजों को डिस्क कहें पर उनकी पसंद अलग है। कंपनियां जीस नेटवर्क में रहती हैं, वैसी ही बन जाती हैं। उनकी पूरी सोच कस्टमर्स की पसंद से बंध जाती है। रिसर्च से पता चला कि 19808 में फर्क बहुत पड़ा था। बड़े कंप्यूटर वाले एक एम बी जगह के लिए ज्यादा पैसे देते थे, पर उन्हें छोटे साइज से कोई मतलब नहीं था। वहीं लैपटॉप वाले छोटे साइज के लिए मोटी रकम देने को तैयार थे। सिर्फ पसंद ही नहीं एक्स्पेन्सस यानी खर्चे भी अलग होते हैं। बड़े कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों के खर्चे बहुत भारी होते हैं। उन्हें हजारों इंजीनियर और बड़ी सर्विस टीम्स चाहिए। इसलिए? उन्हें कम से कम। 50% प्रॉफिट चाहिए ही चाहिए। इसके बिना उनका गुज़ारा उनका सर्वाइवल पॉसिबल नहीं। है। लेकिन छोटे लैपटॉप बनाने वालों का काम अलग है। वे बाहर से बने बनाए पुर्ष यानी कॉंपोनेंट्स खरीद कर जोड़तें हैं। उनके पास फालतू के तामझाम नहीं होते। वे 15% प्रॉफिट में भी बहुत खुश रहते हैं। यही असली पेच है जब कोई नई और सस्ती चीज़ आती है। तो बड़ी कंपनियों को उसमें कोई प्रॉफिट नहीं देखता।
उन्हें लगता है इतने कम पैसे में हमारा क्या होगा? इसलिए वे उसे छोड़ देती हैं और नई कंपनियां बाजी मार लेती हैं। फ्लैश मेमॅरि एक नई टेक्नोलॉजी है। यह डेटा को छोटे चिप पर रखती है। यह आम मेमॅरि यानी राम से बहुत अलग है। पावर यानी बिजली बंद होने पर भी डेटा नहीं होता। फ्लैश मेमॅरि के कई बड़े फायदे हैं। ये बहुत कम पावर खाती है। इसमें कोई हिलने वाला हिस्सा नहीं होता। इसलिए यह बहुत मजबूत होती है पर इसमें कुछ कमियां भी हैं। यह डिस्क ड्राइव से बहुत महंगी है। इसमें डेटा बार बार लिखना मुश्किल होता है। शुरू में इसे फ़ोन और रोबोट में लगाया गया। वहाँ डिस्क ड्राइव बहुत बड़ी और नाजुक थी। 1919 के पास फ्लैश कार्ड आए। ये छोटे क्रेडिट कार्ड जैसे दिखते थे। क्या ये कार्ड डिस्क ड्राइव को खत्म कर देंगे? क्या पुरानी कंपनियां इसमें जीत पाएंगी? कुछ लोग कहते हैं कि पुराना स्किल काम आता है, डिस्क ड्राइव वाले लोहे और मैगनेट के एक्स्पर्ट थे, पर फ्लैश में मॅरि तो बिजली के सर्किट से चलती थी। क्या पुरानी कंपनियां यह नया काम सीख पाएंगी?
हाँ, क्योंकि वे पहले से चिप डिज़ैन करती थीं। सिगर जैसी कंपनियों ने फ्लैश कार्ड बनाना शुरू किया। उनके पास इस काम के लिए जरूरी एक्सपर्टाइज थी, इसलिए उन्हें इसमें कोई बड़ी मुश्किल नहीं आई। कुछ लोग कहते हैं कि टीम अलग होनी चाहिए, नया काम करने के लिए नई टीम बनानी पड़ती है। बड़ी कंपनियों ने अलग ग्रुप्स बनाकर काम किए। सिगेट और क्वांटम ने इसमें अच्छा काम किया। हम ये देखते हैं कि पुरानी चीज़ कितनी अच्छी है। पुराने डिस्क ड्राइव अभी भी बहुत बेहतर हो रही है। उसकी रेट ऑफ इम्प्रूवमेंट बहुत तेज है। जब तक पुरानी चीज़ अच्छी है, नई चीज़ खतरा नहीं है। इसलिए अभी डिस्क ड्राइव को डरने की जरूरत नहीं है। बाजार का जाल यानी वैल्यू नेटवर्क बहुत ताकतवर होता है। यह तय करता है कि कंपनी क्या कर सकती है और क्या नहीं। आप जीस बाजार में काम करते हैं, वह आपको रोकता भी है। वही बाजार तय करता है कि आप अपना पैसा कहाँ लगाएंगे?
हर बाजार में हर मार्केट में अच्छे काम का मतलब अलग होता है। हर जगह। खर्चे का तरीका यानी कॉस्ट स्ट्रक्चर भी अलग होता है। अगर आप वही बनाते हैं जो आपके कस्टमर जानते हैं तो आप जीतेंगे। बड़ी कंपनियां इस काम में हमेशा सबसे आगे रहती हैं। वे अपने कस्टमर्स की हर छोटी जरूरत पूरी कर लेती हैं, लेकिन वे नए और। अनोखे कामों में पीछे रह जाती हैं, क्योंकि नई चीजों का फायदा शुरू में साफ नहीं दिखता। बड़ी कंपनियां तब डूबती हैं जब वे नई मशीनों को छोटा समझती हैं। एक तरफ कस्टमर की डिमॅंड धीरे धीरे बढ़ती है, दूसरी तरफ मशीनों की परफॉरमेंस तेजी से बढ़ती है। जब नई और सस्ती मशीन पुराने कस्टमर्स की जरूरत पूरी करने लगती है तो वह अचानक पूरे बाजार पर अटैक कर लेती है। जैसे छोटे डिस्क धीरे धीरे बड़े कंप्यूटरों में भी चलने लगी। नए खिलाड़ियों के पास अटैकर्स अडवांटेज होता है। हमला करने की ताकत? वैसी चीजें लाते हैं जिनकी पुराने बाजार में कोई कीमत नहीं होती। बड़ी कंपनियां ये नए काम करना ही नहीं चाहती। उन्हें लगता है कि इसमें कोई बड़ा प्रॉफिट नहीं है। यही सोच उनके आगे बढ़ने के रास्ते में सबसे बड़ी दीवार बन जाती। है। असली मुकाबला नई मशीनों का नहीं बल्कि नई स्ट्रेटेजी का है। नई कंपनियां अपनी योजनाओं और खर्चों को जल्दी बदल लेती हैं।
बड़ी कंपनियां अपने पुराने तरीकों और बाहरी खर्चों में फंसी रहती हैं। वे अपनी पुरानी सक्सेस के बोझ से दबी होती हैं। ये बातें सिर्फ कंप्यूटर या चिप वाली कंपनियों पर लागू नहीं होती। हम अभी अर्थ मूविंग इक्विपमेंट यानी मिट्टी खोलने वाली मशीनों की कहानी को समझेंगे। यहाँ में बड़ी कंपनियों के साथ बिल्कुल यही चेल हुआ था। मिट्टी खोदने वाली मशीनों यानी एक्सकैवेटर की कहानी भी डिस्क जैसी है। ये बहुत बड़ी और बहुत महंगी मशीनें होती हैं। पुराने खिलाड़ी एक नया बदलाव के कारण डूब गए। वह नया बदलाव था। हाइड्रॉलिक्स इसे तेल के प्रेशर से चलाया जाता था। बड़े कस्टमर्स ने शुरू में इसे बेकार समझा। यही बड़ी कंपनियों की सबसे बड़ी भूल थी। पुराने जमाने में ये मशीनें इस टीम से चलती थी। इनमे बहुत सारे रस्से और लगे होते थे। इन्हें चलाने के लिए रस्सियों को खींचना पड़ता था। 1920 के पास भाप की जगह पेट्रोल इंजन आए। ये एक बहुत बड़ा बदलाव था, एक रेडिकल चेंज था पर इससे काम करने का तरीका नहीं बदला। रस्से और पुली का सिस्टम वैसा ही रहा। बड़े कस्टमर्स को यह नया इंजन बहुत पसंद आया। बड़ी कंपनियों ने इसे तुरंत अपना लिया। वे नौ दौर में भी सबसे आगे रहे। इसके बाद डीजल इंजन आए और वे भी हिट रहे। असली मुसीबत दूसरे विश्व युद्ध के बाद आई। अब रस्सो की जगह तेल का दबाव यानी हाइड्रॉलिक्स आया।
पुराने रस्से वाले सिस्टम की 30 कंपनियां थी, उनमें से सिर्फ चार कंपनियां ही बच पाईं। बाकी सारी बड़ी कंपनियां मार्केट से बाहर हो गई। नई कंपनियों ने आकर पूरा मैदान मार लिया। आखिर ऐसा क्यों हुआ? चलिए समझते हैं बड़े कस्टमर्स की क्या मांग थी? खुदाई करने वाली मशीनों के तीन बड़े काम थे पहला नहरे और बड़े गड्ढे बनाना। दूसरा सीवर के लिए लंबी पाइप डालना और तीसरा माइंस में भारी खुदाई करना। बड़े कस्टमर्स बहुत बड़ी मशीनें चाहते थे। उन्हें ऐसी मशीन चाहिए थी जो दूर तक पहुंचे। वह एक बार में खूब सारी मिट्टी उठा सके। हर साल वे और भी बड़ी मशीन की मांग करते थे। पहले तेल वाली मशीन यानी हाइड्रॉलिक मशीन 1947 में आई यह मशीन ट्रैक्टर के पीछे जुड़ी होती थी। शुरू में यह बहुत छोटी और कमजोर थी। यह बहुत ही कम मिट्टी उठा पाती थी। बड़े कस्टमर्स ने कहा, यह हमारे काम की नहीं है। उनके लिए यह मशीनें खिलौने जैसी थी। उनकी बड़ी खदानों में यह कुछ नहीं कर सकती थी, इसलिए बड़ी कंपनियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। नई कंपनियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक बिलकुल नया कस्टमर ढूंढा। छोटे घर बनाने वाले लोग इसे पसंद करने लगे। उन्हें पाइप डालने के लिए पतली नालियां खोदनी थी। यह काम पहले मजदूर अपने हाथों से करते थे। ये छोटी मशीन उस काम के लिए एकदम सही थी।
यहाँ से इस नई चीज़ की जीत शुरू हुई। धीरे धीरे ये तेल वाली मशीनें बेहतर होने लगी। 1974 आते आते वे बहुत पावरफुल हो गई। अब वे बड़ी मशीनों जैसा काम करने लगी थी। उन्होंने पुराने रस्ते वाली मशीनों को बाजार से निकाल दिया। बड़ी कंपनियां हाथ मलती रह गई तो हमने देखा कि कंपनियां ऊपर तो जा सकती हैं, पर वे नीचे के। बाजार यानी लो एंड मार्केट में नहीं उतर पाती। वहाँ का वैल्यू नेटवर्क वहाँ का कीमत का जाल उन्हें रोकता है। अब हम समझने की कोशिश करेंगे कि ऐसा क्यों होता है। समझदार मैनेजर अक्सर छोटे और सस्ते बाजार को छोड़ देते हैं। उन्हें महंगे सामान में ज्यादा प्रॉफिट दिखता है, इसलिए वे अपने पुराने ग्राहकों को भी भूल जाते हैं। वे हमेशा ऊपर यानी प्रीमियम की तरफ भागते हैं। सिकेट की कहानी से यह बात साफ हो जाएगी। शुरू में वे आम कंप्यूटर यानी डेस्कटॉप के राजा थे। लेकिन जैसे ही नीचे से सस्ता हमला हुआ, डिस्रप्टिव अटैक हुआ, वे उसे लड़ने के बजाय ऊपर की तरफ भाग गए। उन्होंने सर्वर्स और बड़ी मशीनों के लिए डिस्क बनाई। वहाँ उन्हें ज्यादा पैसा और इजत मिल रही थी। नई कंपनियों के लिए ऊपर जाना बहुत फायदेमंद होता है। पर पुरानी कंपनियों के लिए नीचे आना बहुत डरावना है। कंपनियां अपनी आदतों और खर्चों की गुलाम होती हैं। बड़ी कंपनियों को चलाने में बहुत पैसा खर्च होता है।
उन्हें हजारों लोगों की तनख्वाह और ऑफिस का किराया देना है, इसलिए उन्हें कम से कम 40% मार्जिन चाहिए ही चाहिए। सस्ती चीजों में इतना मुनाफा नहीं मिलता। अगर कोई मैनेजर सस्ती चीज़ बनाने का सजेशन देता है तो कंपनी का हिसाब किताबों से मना कर देता है। उन्हें लगता है कि इसमें समय बर्बाद करना बेकार है। वे सोचते हैं जो ना हम और महंगी चीज़ बनाएं यही ऊपर जाने की सोच उन्हें नीचे से आने वाले खतरे से अंधा कर देती है। हमें लगता है कि सारे फैसले सबसे बड़ा बॉस लेता है, पर असल में फैसले बीच वाले मैनेजर लेते हैं। मिडिल मैनेजर ये मैनेजर वही ऐडिया ऊपर भेजते हैं जो पक्का सक्सेसफुल हो। उन्हें अपने करियर की चिंता होती है। अगर उन्होंने किसी बेकार ऐडिया पर पैसा लगाया तो उनकी नौकरी जा सकती है। मान लीजिए दो लोग अपने बॉस के पास जाते हैं, पहला मार्केटिंग वाले हैं। वो कहते हैं कि सर एक बहुत पावरफुल मॉडल बनाते हैं। पुराने कस्टमर्स इसे महंगे दाम पर खरीदने को तैयार है। मैनेजर कहेंगे बहुत बढ़िया। इसमें खूब प्रॉफिट होगा। दूसरा मान लीजिए इंजीनियर है। वो कहते हैं कि सर एक छोटा और सस्ता मॉडल बनाते हैं। शायद किसी छोटी मशीन में काम आ जाए। मैनेजर कहेंगे इसका मार्केट कहाँ है?
कोई गैरॅन्टी है? हाँ, अभी से रहने दो, पहले महंगे वाले पर ध्यान दो। यही वजह है कि अच्छे आइडिया दम तोड़ देते हैं। समझदार कंपनियां वही करती हैं जो उनके लिए सही लगे, पर यही सही फैसला उन्हें। कल के लिए कमजोर कर देता है। वे अपने ही डिसिप्लिन के जाल में फंस जाती हैं। डिस्क बनाने वाली बड़ी कंपनियों के मैनेजर बहुत स्मार्ट थे। वे 1.8 इंच वाली छोटी डिस्क के बारे में सब जानते थे। उन्होंने इसके अच्छे मॉडल्स भी मना कर तैयार रखे थे। एक बार मैंने एक बड़ी कंपनी के से पूछा। उन्होंने कहा, हमने चार बार ये डिस्क बनाई है पर मार्केट में इसकी कोई डिमॅंड नहीं है। सब जानते हैं हमारे पास ही है पर कोई नहीं खरीदता। लेकिन सच कुछ और ही था। उसे समय होंडा कंपनी अपनी कारों के लिए मैप्स बना रही थी। उन्हें ये छोटी और। मजबूत डिस्क बहुत पसंद आई पर होंडा के लोगों ने कहा कि बड़ी कंपनियां हमें ये नहीं बेचती। हमने इसे एक छोटी सी नई कंपनी से खरीदा। ऐसा क्यों हुआ?
बड़ी कंपनी के लिए 80,00,00,000 का काम बहुत छोटा था। उनके सेल्समैन को बड़े कंप्यूटर वालों से मिलने की आदत थी। उन्हें कार कंपनियों को छोटे डिस्क बेचने में कोई फायदा नहीं दिखा। यही ऊपर जाने की सोच उन्हें नीचे का सच नहीं देखने देती। स्टील की दुनिया की कहानी भी कुछ ऐसे ही है। स्टील बनाने के दो तरीके होते हैं पहला पुराना तरीका इंटिग्रेटेड मिल्स। ये बहुत बड़ी फैक्टरियां होती हैं। इन्हें बनाने में छह अरब डॉलर यानी बिलियन डॉलर्स लगते हैं। दूसरा है नया तरीका मिनी मिल्स ये छोटी फैक्टरियां होती हैं। ये पुराने कबाड़ यानी स्क्रैप को पिघलाकर स्टील बनाती हैं। इन्हें बनाने में सिर्फ। 40,00,00,000 यानी मिलियन डॉलर्स लगते हैं। मिनिमल बहुत सस्ती और तेज होती है। पर शुरू में इनका स्टील थोड़ा कमजोर था, इसलिए वे सिर्फ सरिया बनाती थी। रेबर सरिया बनाने में बहुत कम प्रॉफिट होता है। बड़ी कंपनियों ने सोचा। ये काम नहीं मिल को करने दो, हम तो महंगी और अच्छी चीजें बनाएंगे नहीं। मिल ने पहले सरिया का पूरा बाजार जीत लिया। फिर उन्होंने अपनी क्वालिटी और बेहतर की। अब वे बड़े लोहे के बार्स और बीम्स बनाने लगे। बड़ी कंपनियां यहाँ से भी पीछे हट गई। उन्हें लगा कि वे महंगे स्टील में ज्यादा पैसा कमा रही हैं। अंत में बड़ी कंपनियां सिर्फ एक कोने में सिमट गईं।
वे सिर्फ कारों और डिब्बों के लिए स्टील बनाने लगीं। उनके मालिक खुश थे कि प्रॉफिट बढ़ रहा है। पर रियलिटी में वे अपनी जमीन खो रहे थे। ऐसे ही। स्मार्ट मैनेजरों की हार कहते हैं, उन्होंने वही किया है जो उनके हिसाब से सही था, पर छोटे दुश्मनों को कमजोर समझना उनकी सबसे बड़ी मिस्टेक थी। 1987 में जर्मनी से एक नई टेक्नोलॉजी आई। इसे थिन स्लैब कास्टिंग कहते थे। यह पगले लोहे से सीधे पतली चादरें बनाती थी। पुराने इंडस्ट्रीज में यह काम बहुत कठिन था। नई मशीन की कीमत 10 गुना कम थी, इससे खर्चा 20% तक कम हो जाता था। बड़ी कंपनियों ने इसकी वैल्यूएशन की पूरी जांच पड़ताल की। पर उन्होंने इसे खरीदने से मना कर दिया। शुरू में इसकी फिनिशिंग अच्छी नहीं थी। चादरों पर हल्के दाग धब्बे हल्के से डिफेक्ट्स रह जाते थे। इससे कार या खाने के डिब्बे नहीं बन सकते थे। बड़ी कंपनियां सिर्फ अपने अमीर कस्टमर्स की सुनती थी। सस्ते काम में उन्हें कोई प्रॉफिट नहीं दिखा। उन्होंने पुराने तरीके पर ही और पैसा लगाया। तभी नुकोर नाम की एक छोटी कंपनी आई। उन्होंने यह नई और सस्ती मशीन लगा ली। उन्होंने पहले छोटे मार्केट्स में स्टील बेचा। वहाँ कस्टमर्स को क्वालिटी से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। धीरे धीरे उन्होंने अपनी क्वालिटी बहुत इम्प्रूव कर ली। 19196 तक उन्होंने मार्केट पर
कब्जा करना शुरू किया। बड़ी कंपनियां सिर्फ प्रॉफिट के पीछे भागती रही। उन्होंने बिल्कुल सही और समझदार फैसले लिए थे, पर यही समझदारी उनकी सबसे बड़ी हार बनी। ऐसे ही। इनोवेटर्स डायलेमा कहते हैं, इन्नोवेटर का संकट अच्छे मैनेजर भी इस जाल में फूंस सकते हैं। यह वैसा ही है जैसे पंख लगाकर उड़ने की कोशिश करना। अगर आप हवा के नियमों के खिलाफ़ जाएंगे तो गिरेंगे। पर अगर आप इन नियमों को समझ ले तो आप उड़ सकते हैं। कामयाब मैनेजरों ने पांच पक्के नियमों को समझा। उन्होंने इन नियमों से लड़ने के बजाए इनका इस्तेमाल किया। पहला कंपनी में पैसा कहाँ खर्च होगा, यह कस्टमर तय करते हैं। दूसरा। बड़ी कंपनियों का पेट छोटे बाजार से नहीं भरता। तीसरा नई चीजों का इस्तेमाल पहले से पता नहीं चल सकता। चौथा हर कंपनी के काम करने का एक प्रोसेसर होता है और पांचवा मशीनें अक्सर जरूरत से ज्यादा अच्छी बन जाती हैं। तो कामयाब मैनेजरों ने क्या किया?
उन्होंने नई चीजों के लिए एक अलग छोटी टीम बनाई। उन्होंने छोटे बाजार में छोटी जीत का जश्न मनाया। उन्होंने शुरू में फैल होने और सीखने की तैयारी रखी। उन्होंने नई चीजों के लिए बिल्कुल नया बाजार ढूंढा। बड़ी कंपनी के लिए छोटा मार्केट मुसीबत है। मैनेजर को यहाँ पीछे नहीं बल्कि आगे रहना चाहिए। अगर मशीन बिलकुल नहीं है तो पहले आना जरूरी है। पर बड़ी कंपनी को हर साल बहुत ज्यादा पैसा चाहिए। छोटा मार्केट उनकी इतनी बड़ी जरूरत पूरी नहीं करता। इसलिए नए काम के लिए छोटी टीम बनाना जरूरी है ताकि वे छोटी कमाई में भी खुश रह सकें। एक पुरानी कहावत है कि जो पहले चलता है, उसे ही तीर लगते हैं यानी पहले रिस्क लेने वाला नुकसान में रहता है। पर क्या बिज़नेस में यह बात सच है? डिस्क ड्राइव की दुनिया में इसके दो अलग जवाब मिले। सुधारने वाले काम यानी सस्टेनिंग टिक में पहले आना जरूरी नहीं पुरानी चीज़ को बेहतर बनाने को सुधारना कहते हैं, जैसे थिन फ़िल्म नाम की एक बहुत महंगी मशीन है। इसे बनाने में 15 साल और ₹800,00,00,000 लगे। आई बी एम कंपनी ने इसमें सबसे पहले बाजी मारी पर कुछ कंपनियां बहुत बाद में आई। रिसर्च में एक हैरान करने वाली बात मिली जो पहले आए उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ। जो बाद में आए उन्होंने भी उतनी ही तरक्की। की।
यानी पुराने काम को सुधारने में पहले आना जरूरी नहीं है। फिर दूसरा नए काम यानी डिसरूपतिवे तक में पहले आना बहुत जरूरी है, लेकिन अगर काम रास्ता बदलने वाला है, डिसरूपतिवे है तो नियम बदल जाते हैं। यहाँ जो कंपनियां पहले 2 साल में आईं वे बहुत सफल हुईं। वे बाद में आने वालों से सिक्स टाइम्स ज्यादा कामयाब रही। ये इंतजार करना सबसे बड़ी गलती साबित हुआ। कंपनियां अक्सर गलत रिस्क चुन लेती हैं। वे नया मार्केट बनाने से डरती हैं। उन्हें डर होता है कि शायद लोग सामान ना खरीदे। इस डर के चक्कर में वे पुराने मार्केट में घुस जाती हैं। वहाँ पहले से ही बहुत बड़े कॉंपिटिटर्स बैठे होते हैं। वे मार्केट के रिस्क से बचकर कॉम्पिटिशन के रिस्क में फंस जाते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी हार का कारण बनता है। नया काम करना हमेशा बहुत मुश्किल होता है। बड़ी कंपनी में यह और भी कठिन है। वहाँ लोग पूछते हैं यह काम क्यों करें? मैनेजर अपना सारा समय सफाई देने में बिताते हैं। अक्षय लोग ऐसे प्रोजेक्ट्स में नहीं जाना चाहते। मुश्किल समय में ऐसे काम सबसे पहले रुकते हैं। इसका सबसे अच्छा सलूशन एक छोटी टीम है। ऐसी टीम जो छोटे काम को जरूरी समझे, बड़ी कंपनी को करोड़ों की कमाई चाहिए, छोटा बाजार उनकी भूख नहीं मिटा सकता। इसलिए नया काम एक। छोटी कंपनी को सौंपे। इसे स्पिन आउट या छोटी कंपनी
खरीदना कहते हैं। कंट्रोल डेटा कंपनी ने बिल्कुल यही काम किया। उन्होंने अपनी नई टीम वोकलहोमा शहर भेजी। वहाँ की टीम छोटे ऑर्डर पर भी खुश थी। वे 40,00,000 के काम को भी बड़ा मानते थे। पर मेन दफ्तर में लोग सिर्फ करोड़ों की बात सुनते थे। इस छोटे टीम ने कंपनी को बड़ी जीत दिलाई। हेलेन ब्रैडली मोटर की स्विच बनाने वाली बड़ी कंपनी थी तभी मोडिकोन ने इलेक्ट्रॉनिक स्विच बनाए। शुरू में ये नए स्विच बहुत कमजोर थे। बड़ी कंपनियां इन्हें बेकार समझकर हंसने लगी, पर एलन ब्रेग्ली ने एक होशियार काम किया। उन्होंने एक छोटी नई कंपनी खरीद ली। उन्होंने इसे अपने पुराने दफ्तर से दूर रखा जी जैसी दूसरी कंपनियां यहाँ फैल हो गई। वे अपने पुराने दफ्तर से ही नया काम करना चाहती थी। उनके कस्टमर्स को नया स्विच नहीं चाहिए था। जॉनसन एंड जॉनसन भी यही तरीका अपनाती है। उनकी 160 छोटी अलग कंपनियां हैं। जब भी कोई नया और अनोखा ऐडिया आता है, वे उसके लिए एक छोटी कंपनी खरीद लेते हैं। इस नए ऐडिया को बढ़ने की जगह मिलती है। तो सुधारने वाले काम में आप पीछे रह सकते हैं पर डिस्रप्टिव बनाने में पहले आना जरूरी है बड़े खिलाड़ियों के लिए छोटा बाजार एक जाल। है। वे छोटे प्रॉफिट के लिए मेहनत नहीं करना चाहते, इसलिए नया काम हमेशा छोटी और आज़ाद टीम को दें।
तभी वह टीम पूरे जोश के साथ काम कर पाएगी। जो मार्केट अभी है ही नहीं उसके एनालिसिस पॉसिबल नहीं है। बेचने वाले और खरीदने वाले दोनों को मिलकर उसे डिस्कवरी करना पड़ता है। अक्सर बड़ी कंपनियों के मैनेजरों को पुरानी चीजों को सुधारने की आदत होती है। वहाँ उन्हें पता होता है कि कस्टमर क्या चाहते हैं पर नई और डिस्रप्टिव चीजों के मामले में कोई नहीं जानता कि फ्यूचर क्या होगा। सबसे बड़ी मुश्किल तब आती है जब मैनेजर पुरानी सोच यानी पुराने माइंडसेट से नया काम करना चाहते हैं। वैसे जानकारी मांगते हैं जो अभी मौजूद ही नहीं है। वे प्रॉफिट का पक्का हिसाब चाहते हैं, जबकि अभी बाजार ही नहीं बना है। यह कंपनियों को नया काम करने से रोक देता है। जब मैनेजर किसी नए काम के लिए टीम चुनते हैं तो वो सिर्फ स्मार्ट लोगों को ढूंढ़ते हैं। वे देखते हैं कि इनके पास स्किल है या नहीं, पर यहाँ एक बहुत बड़ी गलती हो जाती है। मैनेजर सोचते हैं कि अगर लोग अच्छे हैं तो पूरी कंपनी भी उस काम में अच्छी होगी, लेकिन ऐसा हमेशा सच नहीं होता है। दो लोग कंपनियों में एक जैसे काबिल लोग अगर रखें। तो भी उनके काम का रिसाल्ट अलग होगा क्योंकि कंपनी की अपनी एक अलग ताकत होती है। अच्छे मैनेजर को सिर्फ लोग नहीं चुनने चाहिए बल्कि सही ऑर्गेनाइजेशन भी तैयार करनी
चाहिए। किसी भी कंपनी की कैपेबिलिटी यानी काबिलियत तीन चीजों से आती। है। पहला रीसोर्सेस यानी सामान, दूसरा काम करने का तरीका यानी प्रोसेसेस और तीसरा वैल्यूज। शुरू में कोई भी कंपनी लोगों के दम पर चलती है। अगर दो चार खास लोग चले जाएं तो कंपनी डूब सकती है। पर धीरे धीरे काम करने का एक। पक्का तरीका एक प्रोसेसर बन जाता है, फिर कंपनी लोगों से ज्यादा तरीकों और वैल्यूज पर चलने लगती है। कई नई कंपनियां शुरू में बहुत तेजी से ऊपर भागती हैं, पर वे नए सामान बनाने का प्रोसेसर नहीं बना पाती इसलिए वे एक ही चीज़ के भरोसे रहकर बाद में फैल हो जाती हैं। शुरू में कंपनी का फाउंडर कंपनी का मालिक तय करता है कि काम कैसे होगा? वह अपनी पसंद पूरी कंपनी पर लागू करता है अगर उसके तरीके काम कर जाते। हैं तो लोग उसे मानने लगते हैं। धीरे धीरे यह काम करने का ढंग कल्चर बन जाता है। कल्चर का मतलब है बिना सोचे समझे काम करने का पक्का तरीका। जब कंपनी बहुत बड़ी हो जाती है तो कल्चर ही उसे संभालना है। सब लोग एक जैसा और सही काम करते। हैं। पर जब हालात बदलते हैं तो इस कल्चर को बदलना बहुत मुश्किल होता है। अगर आपकी कंपनी नया काम नहीं कर पा रही तो तीन रास्ते हैं। पहला कोई दूसरी कंपनी खरीद ले अक्वायर दूसरा अपनी कंपनी के तरीकों को बदलने की कोशिश करें और तीसरा एक बिल्कुल अलग टीम बनाएं।
एक सेपरेट ऑर्गेनाइजेशन। अगर आप किसी कंपनी को उसके काम करने के तरीके के लिए खरीद रहे हैं तो उसे अपनी कंपनी में मत मिलाइए, उसे बिल्कुल अलग रहने दे और उसे पैसा दे। यानी रिसोर्सेस अगर आपने उसे अपने अंदर मिला लिया तो उसके तरीके खत्म हो जाएंगे। आई बी एम ने कंपनी के साथ ही यही गलती की थी। उन्होंने उसे अपने अंदर मिला लिया और कंपनी का बेड़ा घर खो गया। जीसको इस मामले में बहुत होशियार है। वो बहुत छोटी कंपनियों को खरीद कर अपने अंदर मिला लेती है क्योंकि वह सिर्फ उनके लोगों और रीसोर्सेस के लिए उन्हें खरीदती है। पर जब वह किसी बड़ी और जमी हुई कंपनी को खरीदती है तो वह उसे बिल्कुल इंडिपेंडेन्ट रहने देती है। जॉनसन एंड जॉनसन हमेशा यही तरीका अपनाती है। जब उन्हें कोई नया और सस्ता सामान दिखता है तो वे एक छोटी कंपनी खरीद लेते हैं और उसे अलग रखते हैं। आज उनके कई अरबों डॉलर के धंधे इसी तरह बने हैं। वे अपनी पुरानी कंपनी के कल्चर को नए काम के बीच में नहीं आने देते। अक्सर कंपनियां नए लोग और मशीनें जमा कर लेती हैं। उन्हें लगता है कि इससे वे बदल जाएंगी। पर वे नई चीजों को पुराने तरीके में ही डाल देती हैं। रिसाल्ट ये होता है कि कुछ नहीं बदलता। पुराने तरीके बदलना दो वजहों से बहुत कठिन है। पहला कंपनी की दीवारें लोग अपने
अपने ग्रुप में बंधे होते हैं। नया काम करने के लिए इन दीवारों को तोड़ना पड़ता। है। मैनेजर को लोगों को पुराने ग्रुप से बाहर निकालना चाहिए। एक नई टीम बनानी चाहिए जिसे हेवी वेइट टीम कहते हैं। दूसरा आदतों की मजबूरी पुराने तरीके अपने काम में। एक्स्पर्ट होते हैं। वे बने ही इसलिए हैं कि काम रोज़ एक जैसा हो, कंसिस्टेंट हो। वे बदलाव के लिए नहीं बल्कि रुकने के लिए बने हैं। इसलिए एक ही टीम से दो अलग काम कराना नामुमकिन है तो अलग कंपनी कब बनाएं? आजकल इंटरनेट के दौर में अलग कंपनी बनाना फॅशन बन गया। है पर यह कब करना चाहिए इसके कुछ पक्के नियम हैं। जब पुराने कस्टमर्स को नए काम की जरूरत ना हो, दूसरा जब नया बाजार बहुत छोटा और अनजाना हो और जब नए काम में प्रॉफिट बहुत कम मिल रहा हो, बड़ी कंपनी छोटे और कम प्रॉफिट वाले काम को इज्जत नहीं देती, वह नया ऐडिया दम तोड़ देता है। इसलिए इसे एक अलग और अजात टीम को सौंप दे। पर याद रहे इसमें कंपनी के सबसे बड़े बॉस यानी सीईओ का साथ जरूरी है। बिना बॉस के साथ के पुराना सिस्टम नए काम को खत्म कर देगा। मैनेजरों को खुद से दो जरूरी सवाल पूछने चाहेंगे पहला क्या हमारा पुराना तरीका इस नए काम के लिए सही है? दूसरा क्या हमारी कंपनी इस काम को जरूरी समझेगी? अगर जवाब ना है तो घबराए नहीं।
अपनी कमजोरी को पहचानना ही जीत की पहली सीढ़ी है। जबरदस्ती पुराने तरीके थोपने से सिर्फ रुकावट और परेशानी ही आएगी तो अच्छे लोग। होने का मतलब यह नहीं कि कंपनी भी अच्छी है। काबिल लोगों को। काबिल टीम में रखना जरूरी है। तेजी से बदलती दुनिया में यही सबसे बड़ी स्किल है। पुराने तरीकों को वही इस्तेमाल करें जहाँ वे फिट बैठते हो। नए चैलेंजेस के लिए नए रास्ते और नई टीमें बनाएं। मशीन बनाने वाले एक्सर्स बहुत तेज परफॉरमेंस करते। हैं। पर कस्टमर की जरूरत इतनी तेज नहीं पड़ती। एक समय आता है। जब मशीन जरूरत से ज्यादा अच्छी हो जाती है, इसे ही जरूरत से ज्यादा तरक्की यानी परफॉरमेंस ओवर सप्लाई कहते हैं। जब ऐसा होता है तो नई और सस्ती मशीनों को मौका मिलता है। वे नीचे से आकर पूरे बाजार पर कब्जा कर लेती हैं। जब मशीन जरूरत से ज्यादा अच्छी हो जाती है तो मुकाबला बदल जाता है। कस्टमर ऑफ़ चीजों को नए तरीके से चुनने लगता है। इसे बेसिस ऑफ़ कॉम्पिटिशन यानी मुकाबले का आधार बदलना कहते हैं जब बाजार की हर जरूरत पूरी हो जाती है। तो मुकाबला बदलता है। मुकाबला करने का एक खास क्रम होता है एक बाइंग हाइरार्की काम यानी फंक्शनेलिटी कि क्या यह मेरा काम कर सकता है भरोसा यानी रिलायबिलिटी। क्या यह मशीन जल्दी खराब तो नहीं होगी? आसानी यानी कन्वीनियेंस क्या इसे
इस्तेमाल करना आसान है? दाम यानी प्राइस क्या यह सबसे सस्ता है? जब बहुत सारी कंपनियां एक जैसा सामान बनाने लगती हैं तो कस्टमर सिर्फ। सबसे कम दाम दिखता है। किसी को सामान का कमॉडिटी बन जाना। कहते हैं मामूली बन जाना। वहाँ कोई नहीं देखता कि आपका सामान कितना अच्छा है। डिस्रप्टिवेटेक यानी नई चीजों की दो खास बातें। हैं। वीकनेस एस स्ट्रेंथ कमजोरी ही ताकत है। नई चीज़ की जो कमजोरी बड़े बाजार में दिखती है, वही नए बाजार में उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। जैसे छोटे डिस्क में जगह कम थी या कमजोरी थी। पर लैपटॉप के लिए वही छोटा साइज सबसे जरूरी था। यानी ताकत और दूसरा सिंपलर एंड चीपर यानी सादगी और सस्ता दाम। नई चीजें हमेशा पुरानी मशीनों से ज्यादा सादी और सस्ती होती हैं। बड़ी कंपनियां अक्सर नई चीज़ में बहुत सारी खूबियाँ डाल देती हैं। बहुत सारे फीचर्स। यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है। जैसे एस पी की टीटी हॉक डिस्क बहुत महंगी हो गई थी इसलिए वह सस्ती मशीनों और गेम के बाजार में नहीं बिक पाई। इन ट्वीट नाम की कंपनी बहुत फेमस है उनका सॉफ्टवेयर। क्विकन बहुत सफल है। वो इतना आसान है कि कोई भी चला ले, आपको उसकी मोटी किताब पढ़ने की जरूरत नहीं है। वे कस्टमर को देखकर चीजें आसान बनाते हैं। इसी कंपनी ने क्विक बुक्स नाम का
सॉफ्टवेयर बनाया। इससे पहले के सॉफ्टवेयर बहुत डिफिकल्ट होते थे। उन्हें सिर्फ बड़े अकॉउंटेंट ही समझ पाते थे। पर अमेरिका में 85% कंपनियां बहुत छोटी है। वह मालिक खुद ही अपना हिसाब रखता है। उसे अकॉउंटेंट वाली भारी बातें समझ नहीं आती। थी पुरानी कंपनियों ने। जरूरत से ज्यादा तरक्की कर दी थी। परफॉरमेंस शुगर सप्लाई उन्होंने सॉफ्टवेयर को बहुत कॉम्प्लेक्स बना दिया था ने इसे एकदम सरल और आसान बनाया। सिर्फ 2 साल में उसने 70% मार्केट पर कब्जा कर लिया। पुरानी कंपनी अब महंगे ग्राहकों की तरफ भाग रही है। सामान खरीदने का एक खास तरीका होता है। इसे चार फ्रीज़ेस में समझ सकते हैं। काम यानी फंक्शनेलिटी की। क्या यह मेरा काम कर सकता है? दूसरा भरोसा रिलायबिलिटी। क्या यह मशीन टिकेगी या बार बार खराब होगी?
तीसरा, कन्वीनियेंस यानी आसानी जैसे इस्तेमाल करना सरल है और चौथा प्राइस यानी कीमत। जब सब एक जैसा हो तो सबसे सस्ता कौन है? जब मशीन जरूरत से ज्यादा अच्छी हो जाती है तो खेल बदल जाता है। कस्टमर अब और ज्यादा परफॉरमेंस नहीं मांगता, वह अब कन्वीनियेंस या कम दाम ढूंढता है। मैनेजरों के पास तीन रास्ते हैं। जब बाजार में यह बदलाव आए तो तीन रास्ते हैं। पहला ऊपर की तरफ भागो। यानी सस्ते बाजार को छोड़कर महंगे कस्टमर्स के पास जाओ। दूसरा कस्टमर्स के साथ चलो इन कस्टमर्स की नई जरूरतों को पहचान कर खुद को बदलो। तीसरा जबरदस्ती मांग बढ़ाओ। यानी कस्टमर्स को ऐसी आदत डालो कि वे और बेहतर मशीन मांगे। माइक्रोसॉफ्ट और इन्टेल तीसरा रास्ता अपनाते हैं, वैसा सॉफ्टवेयर बनाते हैं जो और ज्यादा मेमॅरि मांगता है। इसे कस्टमर को हमेशा नई और तेज मशीन की जरूरत महसूस होती है। पर यह रास्ता हमेशा काम नहीं करता। इंटरनेट पर आने वाले छोटे ऐपलेट्स इस खेल को बिगाड़ सकते हैं। तो हमने सीखा कि अच्छी कंपनियां क्यों डूब जाती हैं। सिर्फ खराब मैनेजर ही इसकी वजह नहीं होते। बल्कि कुछ पक्के नियम काम करते हैं। जब मैनेजर इन नियमों से लड़ते हैं तो हार जाते। हैं। इसे समझने के लिए हम बिजली वाली कार का एग्ज़ैम्पल लेंगे। मान लीजिए मैं एक बड़ी कार कंपनी का अफसर हूँ, मैं इस नए काम इस इन्नोवेशन को कैसे संभालूंगा?
सबसे पहले मैं खुद से सवाल पूछुंगा क्या बिजली वाली कार पुरानी कारों को खत्म कर देगी? इसे जानने के लिए हमें दो रास्तों को देखना होगा। पहला रास्ता कस्टमर्स को असल में क्या चाहिए और दूसरा रास्ता नई मशीन कितनी तेजी से इम्प्रूव। हो रही है। आज की कारों को कम से कम 125 मील चलना चाहिए। पर बिजली वाली कारें इतना ज्यादा नहीं चलती। उनकी रफ्तार भी बहुत कम है। पुराने बाजार के हिसाब से ये बेकार है पर बिजली वाली कार में बदलाव की खुशबू है। क्यों? क्योंकि इसकी इम्प्रूवमेंट बहुत तेज है। ये हर साल 2-4 परसेंट बेहतर हो रही है। वहीं लोगों की डिमॅंड जरूरतें बहुत धीरे पड़ रही हैं। 1 दिन यह कार सबकी जरूरत पूरी कर देगी। अभी यह बड़े बाजार के लिए नहीं बनी है। पढ़ाने वाले कुल में यह सब को पीछे छोड़ देगी। सब जानते हैं कि यह पुरानी कारों जैसा बाजार नहीं है तो फिर हम अपनी कार किसे बेचेंगे? हमें ऐसे लोग ढूंढ रहे होंगे जिन्हें इसकी कमियां भी पसंद है। शायद स्कूल जाने वाले बच्चों के माता पिता इसे खरीदे। वे चाहेंगे कि उनके बच्चे धीरे और सेफ चले। वे नहीं चाहेंगे कि बच्चे बहुत दूर गाड़ी लेकर जाएं। ऐसी छोटी और सादी कार शायद उनके लिए एकदम सही होगी या फिर उन शहरों को देखिए जहाँ बहुत ट्रैफिक है। वहाँ गाड़ियां बस खड़ी रहती हैं और धीरे चलती हैं। वहाँ बिजली वाली छोटी कारें बहुत
सक्सेसफुल हो सकती हैं। हमें बाजार को ढूंढना होगा। बड़ी कंपनियां इसे पुराने कार जैसा बनाना चाहती हैं। चरसलर ने अपनी बड़ी 1 में हजारों बैटरी भर। दी। इससे गाड़ी बहुत भारी और बहुत महंगी हो गई। उसकी कीमत $1,00,000 पहुँच गई। इतने पैसे में कोई भी इसे नहीं खरीदेगा। वे पुरानी सोच से नया काम करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर मैं मैनेजर होता तो मैं ये तीन काम करता। पहला, मैं मान लेता कि मुझे बाजार का पता नहीं है। दूसरा। मैं सीखने के लिए एक अलग और छोटी टीम बनाता और तीसरा मैं सारा पैसा एक बार में खर्च नहीं करता। हमें सीखने वाला प्लान यानी प्लान फॉर लर्निंग बनाना चाहिए। पहली बार में शायद हम गलत साबित हों, पर हमें इतना पैसा बचाना चाहिए। कि हम दोबारा कोशिश कर सकें तभी हम इस नए बदलाव की जंग जीत पाएंगे। तो इस किताब में हमने समझा कि हार की वजह मैनेजर की कोई बेवकूफ़ी नहीं है। मैंने दुनिया के सबसे होशियार मैनेजरों को देखा है। वे बहुत मेहनत करते हैं और सही फैसले लेते हैं, फिर भी उनकी कंपनियां फैल हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे पुराने नियमों के गुलाम है। वे नियम नई चीजों में काम नहीं आते। साथ पक्की बातें जो हमने सीखी हैं वो जो है पहला। की मशीनें बाजार की जरूरत से ज्यादा तेज प्रोग्रेस करती हैं। आज जो चीज़ यूज़लेस है, बेकार है वो कल काम आएगी।
कस्टमर हमेशा आपको सही रास्ता नहीं दिखा सकता। पुराने कस्टमर्स की बात सुनना यहाँ डेंजरस हो सकता है दूसरा। नया काम पैसा और रीसोर्सेस न मिलने से मरता है। कंपनी के लोग वही काम करना चाहते हैं जहाँ प्रॉफिट हो। वे छोटी और नए ऐडिया को मार देते हैं। उन्हें लगता है कि इसमें समय बर्बाद करना बेकार है। तीसरा नई चीज़ के लिए नया बाजार ढूंढना जरूरी है। पुरानी कंपनी नई चीज़ को पुराने कस्टमर्स पर थोपती है या मेथॅड हमेशा फैल होता है। इसे तकनीक नहीं बेचने की चुनौती माने। चौथा। कंपनी की ताकत उसके पुराने काम से बनती है, वही ताकत नए काम में कमजोरी बन जाती है। एक कंपनी हर काम में एक्स्पर्ट नहीं हो सकती, उनके वैल्यूज, उनके नियम नए बाजार के लिए नहीं बने होते। पांचवा जो बाजार अभी है ही नहीं?
उसकी जांच कैसे होगी? वहाँ कोई पक्के आंकड़े, कोई इन्फॉर्मेशन नहीं मिलती वहाँ सीखने के लिए छोटे कदम यानी स्टेप्स उठाने पड़ते हैं। शुरू में फैल होना ही जीत का असली रास्ता है। छठा। पुराने काम को सुधारने में पीछे रहना ठीक है। पर आस्था बदलने वाले काम में पहले आए। यहाँ पहले आने वाले को बहुत बड़ा फायदा मिलता है। सातवाँ सबसे बड़ी दीवार पैसा या मशीन नहीं है, सबसे बड़ी दीवार है। यह काम हमारे मतलब का नहीं। बड़ी कंपनियां वही काम करती हैं जो उन्हें सही लगे। यही सोच नए लोगों के लिए बड़ा मौका बन जाती है तो नई चीज़ की जिम्मेदारी एक बिल्कुल अलग टीम को दे। ऐसी छोटी टीम बनाएं जो छोटी जीत पर खुश हो। शुरू में फैल होने की पूरी तैयारी रखें। किसी बड़े चमत्कार, किसी ब्रेकथ्रू का इंतजार ना करें। बाजार के बाहर जाकर नया और अलग कस्टमर ढूंढें तो बड़ी कंपनियां डूबती हैं, क्योंकि वे अच्छी मनेजमेंट करती हैं, पर कभी कभी नियमों को तोड़ना और छोटे रास्ते चुनना है। समझदारी है आज के लिए बस इतना ही हम फिर मिलेंगे आपसे। एक नए एपिसोड में एक नई किताब के साथ मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस विथ रोहित, धन्यवाद।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
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