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Episode notes

Jerry Fodor’s The Mind Doesn’t Work That Way (2000) serves as a sharp, intellectually salty rebuttal to the "New Synthesis" of cognitive science. At the time of its release, figures like Steven Pinker and Henry Plotkin were popularizing the idea that the human mind is a massive collection of evolved, computational modules. Fodor, despite being one of the fathers of the Computational Theory of Mind (CTM), stepped in to tell his colleagues they were getting ahead of themselves.His argument isn't that CTM is wrong, but rather that it is fundamentally limited. He contends that while computation…

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मैंने कई सालों में बहुत सी किताबें लिखी हैं। इनमे मैंने एक खास बात कही है कि दिमाग एक कंप्यूटर की तरह काम करता है जिसे हम सीटीएम कहते हैं। मेरे हिसाब से सोचने का यह सबसे अच्छा तरीका है। यही एक तरीका है जीस पर बात करना जरूरी है। दिमाग के बारे में कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें इसके बिना समझना इम्पॉसिबल है। इसका मेन आइडिया बहुत सुंदर है। दिमाग में सूचना एक मशीनी काम की तरह है। यह सच का एक बड़ा हिस्सा है। पर मुझे नहीं लगा था कि कोई इसे ही पूरा सच मान लेगा। कुछ लोग समझते हैं कि दिमाग बस इतना ही है। मशीनी दिमाग यानी आर्टिफीसियल इन्टेलिजेन्स बनाने वाले ऐसा सोचते हैं पर मशीनी दिमाग बनाना एक इंजीनियरिंग का काम है। यह असली साइंस नहीं है। जब भी मैंने सीटी एम पर किताबें लिखीं तो मैंने हमेशा एक बात साफ साफ कही। यह पूरी कहानी का बस एक छोटा हिस्सा है। सोचने के सबसे मुश्किल सवालों का जवाब इससे नहीं मिलता। मुझे लगा कि हम सब इस बात पर राजी हैं, एग्री हैं। पर मैं गलत था। 2 साल पहले मैंने दो नई किताबें पढ़ीं, एक पिंकर की थी और एक प्लाटकिन की। वे कहते हैं कि हमारा दिमाग मशीनी है और हम बहुत सी जानकारी लेकर पैदा होते हैं। वे इसे पुराने विकास के नियम यानी रेवोल्यूशन से जोड़तें हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने दिमाग

का मैप दिमाग का नक्शा ढूंढ लिया। मुझे उनकी किताबें अच्छी लगीं, पर मैं उनकी हर बात से खुश नहीं था। पहली बात तो यह है कि उन्होंने यह नहीं बताया कि सारी बातें आपस में कैसे जुड़ती हैं। दूसरी बात। एक और बड़े एक्स्पर्ट हैं नोमचोंस्की वह भी इन लेखेकों की बातों से सहमत नहीं है। तीसरी बात उन्होंने दिमाग को बायोलोजी से जोड़ा है। मुझे यह बात कुछ खास जमीन नहीं। आखरी बात ये है कि पिंकर बहुत ज्यादा ऑप्टिमिस्टिक हैं। पिछले 50 सालों में हमने एक बात सीखी है। दिमाग के कुछ काम बहुत ही कॉम्प्लेक्स हैं, बहुत उलझे हुए हैं। कंप्यूटर वाले तरीके वहाँ बिल्कुल काम नहीं करते। यह बात सब जानते हैं, फिर भी कुछ लोग इतने खुश कैसे हो सकते हैं?

इसीलिए मैंने अपनी यह किताब लिखी। मैं कुछ पुरानी बातों को आगे बढ़ाना चाहता था। यह किताब पिंकर की किताब से छोटी है और यह थोड़ी कड़वी भी है। मैं यहाँ सब कुछ शुरू से नहीं समझाऊंगा मैं बस अपना एक अलग नजरिया दूंगा। नतीजा यह है कि कंप्यूटर वाला तरीका अच्छा है, पर यह बुरा सच नहीं है। मैंने जब लिखना शुरू किया तो मैं परेशान हो गया। मैं सिर्फ पैदाइशी ज्ञान पर लिखना चाहता था नेटिविज्म पर, पर मुझे समझ आया कि सब कुछ आपस में जुड़ा है। क्या दिमाग वाकई कंप्यूटर है?

हमें यह साफ करना होगा। 50 साल पहले एक बड़ा काम शुरू हुआ था, एक बड़े आदमी थे, नाम था एलन ट्यूरिंग। उन्होंने कहा कि सोचना एक लैंगुएज की तरह है, जिसे छोटे शब्दों से बड़े सेंटेंसेस बनते हैं, वैसे ही छोटे विचारों से बड़ी सोच बनती है। दिमाग में यह सब एक मशीन कॉम्पटीशन की तरह होता है। मुझे लगता है कि यह बात काफी हद तक सही है। हमारा सोचना किसी लैंगुएज की तरह ही है, लेकिन सोच को सिर्फ मशीन मानना आंधी जीत है। हाफ। पिछले 40 सालों में हमने नेचर से बहुत सवाल पूछे, नेचर ने हमें जवाब भी दिए। हमें समझ आया कि यह मशीनी तरीका कहाँ तक चलता है?

मैं आपको एक छोटी सी समरी बताता हूँ। दिमाग के दो तरह के हिस्से होते हैं एक वो। जहाँ हमारी इच्छाएं और यकीन होते हैं जहाँ हमारे बिलीव्स होते हैं और दूसरे को जहाँ हमें महसूस होता है, जहाँ हमारी फीलिंग्स होती है। ऐसे ही दिमाग के काम करने के दो तरीके हैं एक है लोकल और दूसरा है ग्लोबल लोकल काम छोटे और बटे हुए होते हैं। ये काम कंप्यूटर की तरह ही होते हैं। ये हमें पैदाइश में मिलते हैं, इनेट होते हैं, पर बड़े कामों का हिसाब कुछ अलग है। दूसरी तरफ ग्लोबल बिल्कुल अलग है। ये हमारे छोटे कामो जैसा नहीं है। इसीलिए हमें गहराई से समझ नहीं आता। हमारे दिमाग की सबसे खास बातें यही हैं, पर हमें इनके बारे में कुछ नहीं पता। इसलिए मैं बहुत खुश नहीं हूँ। दिमाग का साइंस अभी बहुत पीछे है। इसे ठीक करने में बहुत समय लगेगा। अभी हमारे पास सही औजार नहीं है, जिसे योर नाम का गधा कहता है। की बर्फ़ गिर रही है और ठंड बहुत है। शुक्र है कि अभी भूकंप नहीं आया। बाकी के भूख में हम सबसे पहले पैदाइशी ज्ञान के बारे में जाएंगे। पिंकर और प्लॉट्किन की सोच अलग है, एक्सपर्ट्स की सोच उनसे काफी अलग है। कभी कभी वे एक जैसे शब्द बोलते हैं पर उनका मतलब अलग होता है। चमस्की नॉलेज मिलने की बात करते हैं, बाकी लोग सोचने के तरीके यानी प्रोसेसेस की बात करते हैं। पुराने जानकार शायद ये बातें

जानते होंगे पर एक बहुत जरूरी बात छूट रही है वह है ड्युरिंग का मशीनी तरीका। इसके बिना कहानी एक दमदूरी है। यह तो बिना दूल्हे की शादी जैसा है। मैं इस जरूरी बात को वापस लाऊंगा। इससे मुश्किलें तो थोड़ी बढ़ेगी पर सच जानना ज्यादा जरूरी है। फिर आगे हम कमियों को देखेंगे। उसके बाद कुछ पुराने रास्तों को देखेंगे और वे रास्ते सक्सेसफुल नहीं हुए। ये समझेंगे। उसके आगे एक नई सोच मॉड्यूलेरिटी आएगी, पर वह भी फैल हो गई। फिर लास्ट में हम पुरानी कहानियों पर बात करेंगे। मुझे लगता है कि चमच के सही हो सकते हैं, पर उनकी बात अभी अधूरी है। नया तरीका शायद गलत साबित हो जाए। दिमाग को समझना बिल्कुल आसान नहीं है। मैंने पहले भी यही कहा था, मेरी सोच सालों से बदले नहीं है। मैं बस सही रास्ता ढूंढ रहा हूँ। चलिए अब शुरू करते हैं। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे हैं सिलेबस विथ रोहित आजकल की नई सोच चमस्की से शुरू हुई चमस्की ने दो बहुत जरूरी बातें कहीं। पहली बात, हर लैंग्वेज के कुछ पक्के नियम होते हैं। ये नियम पूरी दुनिया में एक जैसे हैं। दूसरी बात, ये नियम हमारे दिमाग में पहले से हैं। हम इन्हें अपने साथ लेकर पैदा होते हैं। ये हमारे शरीर की बनावट में छिपा है। चोम्स्की ने इसे दो तरीकों से समझाया। पहला दुनिया की सारी भाषाओं को देखिए।

सारी लैंग्वेजेज को देखिए कि उनमें क्या क्या एक जैसा है। जो चीज़ सब में एक जैसी है, वही असली नियम है। दूसरा यह देखिए कि बच्चे बोलना कैसे सीखते हैं? आसपास के लोग तो बहुत कम सिखाते हैं। फिर भी बच्चा बहुत जल्दी सब सीख जाता है। मतलब बहुत सी जानकारी उसके अंदर पहले से थी। यही पैदाइशी ज्ञान यानी इनेट नॉलेज उसे बोलना सीखाता है। इसीलिए इंसान और जानवर में फर्क होता है। इंसान का बच्चा लैंगुएज आसानी से सीख लेता है। पर बंदर या दूसरे जानवर ऐसा नहीं कर पाते। यह सुनने में बहुत सीधा और आसान लगता है पर इसे साबित करना बहुत डिफिकल्ट बहुत मुश्किल काम है। साइंटिस्टों को रिसर्च के लिए पैसा नहीं मिलता। एक्सपर्ट लोग आपस में बहुत झगड़ते भी हैं। कोई कहता है कि लैंगुएज समाज से आती है। सोसाइटी से कोई कहता है कि यह जरूरत से आती है या नीड से आती है पर अपनी बात पर अड़े रहे की यह बात बहुत पुरानी है। पुराने जमाने के प्लेटों भी यही कहते थे। जैसे हम ज्योमैट्री के बारे में पहले से जानते हैं, वैसे ही हम लैंगुएज के नियम भी जानते हैं। चोम्स्की बस पुरानी बातों को एक नए तरीके से कह रहे हैं। वो पिंकर और प्लाटकिन की बात करते हैं। ये लोग चोम्स्की से थोड़ा अलग सोचते हैं। चोम्स्की कहते हैं कि हम जानकारी लेकर पैदा होते हैं पर ये लोग

दिमाग के काम पर ध्यान देते हैं। इनका मेन ऐडिया कंप्यूटर से जुड़ी है। इसे हम कंप्यूटर वाला तरीका या कॉम्प्यूटेशन कह सकते हैं। इसे ने शुरू किया था दिमाग को एक मशीन की तरह समझना ही। ये नई सोच है कॉम्पिटिशन एक मजेदार बात पर ध्यान दीजिए अगर मैं कहूं, शिव पढ़ रहा है और शाम हो गई है इस एक वाक्य में दो बातें हैं। अगर यह पूरा वाक्य सच है तो इसका मतलब है कि शिव पढ़ रहा है भी। सच है, इसे समझने के लिए शिव को जानना जरूरी नहीं। बस शब्दों की सेट्टिंग देखनी पड़ती है। यही टूरिंग की सबसे बड़ी खोज थी मशीनें मतलब नहीं समझती। वे दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानती पर वे शब्दों के ढांचे को। उनके सिंटेक्स को समझ सकती हैं। वे बहुत तेजी से ये हिसाब किताब कर सकती हैं। नई सोच कहती है कि दिमाग भी ऐसा ही है। सोचना असल में एक मशीन का एक कॉम्पिटिशन है। हमारा दिमाग सच को सच से जोड़ता रहता है। यह एक बढ़िया सौदा लगता है। फिर है रेशनलिस्ट साइकोलॉजी पैदा होते ही हमें कुछ तरीके पता होते हैं। दिमाग के पास सोचने के कुछ खास टूल्स हैं, कुछ खास औजार यौजर हमें इनहेरिटेंस में मिले हैं, हमें विरासत में मिले हैं। पुराने एक्सपर्ट भी यही बात मानते थे। दिमाग के अंदर कुछ मेकेनिज़्म्स लगी हैं, कुछ कुदरती मशीनें लगी हैं, वे जानकारी का सही इस्तेमाल

करना जानती हैं। इस सोच की सबसे बड़ी बात को समझिए कि हमारी हर पसंद ना पसंद। और सोच का एक ढांचा एक स्ट्रक्चर होता है। इसी ढांचे से इसी स्ट्रक्चर से तय होता है कि दिमाग आ के क्या करेगा? एग्ज़ैम्पल के तौर पर मान लीजिए रोहन तैर रहा है और सीमा पी रही है। यहाँ और यानी एंड दो बातों को जोड़ रहा है। इसलिए आप जड़ से समझ जाते हैं कि रोहन तैर रहा है एक और एग्ज़ैम्पल समझिए भूत जैसी कोई चीज़ नहीं होती, यह मना करने वाली बात है। नेगेटिव इसलिए आप समझ जाती हैं की आपका दोस्त भूत नहीं है तो आसान बात ये है। की दिमाग की हर बात का एक खास फॉर्म होता है। एक खास रूप और उसी फॉर्म के हिसाब से। उसी रूप के हिसाब से दिमाग काम करता है। यहाँ कुछ और जरूरी बातें भी हैं। हर सोच का अपना एक। पक्का स्ट्रक्चर होता है। अगर दो बातों का स्ट्रक्चर अलग है तो वे अलग है, चाहे उनका मतलब उनके मीनिंग एक जैसा ही क्यों न हो। अलग अलग बातों का ढांचा एक जैसा हो सकता है, जिसे सांता क्लॉज नहीं होता और परियां नहीं होती। ये दोनों बातें अलग हैं पर इनका ढांचा इनका स्ट्रक्चर एक ही है। हमारी हर सोच कई टुकड़ों से मिलकर बनती है। जैसे आकाश गंजा है, इसमें एक हिस्सा आकाश है और दूसरा गंजा। इन्हीं टुकड़ों को हम कॉन्सेप्टस कहते हैं। ख्याल। कुछ लोग कहते हैं कि सोचना बस

पुरानी यादों का जूना है। जैसे चाय भूनने पर बिस्कुट याद आ जाना, पर हमारी ये सोच सिर्फ ऐसी असोसिएशन पर नहीं। टिक्की यह नियमों और स्ट्रक्चर्स पर चलती है, तभी तो हम किसी पुरानी बात पर अपना फैसला बदल सकते हैं। जैसे मुझे पक्का यकीन है कि रोहन गंजा है पर आपको शायद थोड़ा सा ही शक है। मुझे इस बात से बहुत फर्क पड़ता है, पर आपको नहीं, फिर भी हम दोनों की सोच का फॉर्म हम दोनों की सोच का ढाँचा बिल्कुल एक है। आदते अलग हो सकती हैं पर दिमाग का नियम एक ही रहता है। अब सवाल है कि यह ढांचा काम कैसे करता है? पुराने एक्सपर्ट इस बात को ठीक से नहीं समझा पाए पर कंप्यूटर के आने से यह आसान हो गया। दिमाग में हर सोच के लिए एक रिप्रजेंटेशन होती है एक निशानी यह निशानी दिमाग में किसी। असली चीज़ की तरह होती है। ये निशानी हमारे दिमाग में हलचल पैदा करती है। कंप्यूटर की तरह हमारा दिमाग भी निशाने को पढ़ता है। वह मतलब नहीं देखता, बस सिनटैक यानी ढांचे को देखता है जैसे कंप्यूटर को जीरो और वॅन समझ आता है। वैसे ही दिमाग भी रीप्रेजेंटेशन यानी निशानी के हिसाब से काम करता है। पुरानी सोच कहती है कि सब कुछ आदतों का खेल है जैसे बार बार साथ होने से बातें जुड़ जाती हैं। ने हमें एक नया मेकानिज्म दिखाया। एक नया रास्ता। उन्होंने बताया कि मशीन भी नियमों को समझ सकती है।

हमारा दिमाग भी इसी तरह नियमों पर चलता है। दिमाग की सबसे बड़ी खूबी यही है एक सच हमें दूसरे सच तक ले जाता है। पर यह कोई जादू नहीं है बल्कि दिमाग का हिसाब किताब है। उसका कम्प्यूटेशन है, यही वह पहली है जिसे हम सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। अब हम पुराने सोच और कंप्यूटर के काम को मिलाते हैं। इसको दिमाग का कंप्यूटर वाला तरीका यानी कम्प्यूटेशनल थ्योरी ऑफ माइंड कहते हैं। इसके तीन मेन प्रिंसिपल्स हैं। पहला, हमारी सोच अपने ढांचे की अपने लॉजिकल फर्म की वजह से काम करती है। सोच का ढांचा दिमाग के निशानी यानी। दिमाग के रिप्रजेंटेशन पर टिका है और तीसरा सोचना असल में एक कंप्यूटेशन है, एक मशीनी हिसाब है। यह तरीका हमें हमेशा सच की तरफ ले जाता है। इस मेल से हमें दो बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। सोच का ढांचा यानी फॉर्म कैसे बनता है और यह ढांचा हमारे दिमाग पर कैसे असर डालता है?

जवाब है दिमाग की लिखावट। उसका सिंटेक्स ही ढांचा तय करती है और यही लिखावट तय करती है कि दिमाग आगे क्या करेगा। अब हम कह सकते हैं कि सोचना समझदारी भरा काम है, पर यह एक मशीन की तरह भी है। यह पहली बार हुआ है कि किसी ने ऐसी मशीन के बारे में बताया जो समझदारी यानी रैशनलिटी से काम करती है। यह सच में एक बहुत ही प्यारा ख्याल है, बहुत ही सुंदर आइडिया। अब हमारे पास नई सोच की आंधी कहानी तैयार है। हम बहुत कुछ बचपन से ही जानते हैं और हमारा दिमाग एक मशीनी ढांचे जैसा बना है। एक मशीनी आर्किटेक्चर जैसा इसे ही नई सोच यानी न्यू सिन्थेसिस कहते हैं, लेकिन बहुत से लोग इसे एक। मॉडुलर एक बंटा हुआ डिब्बा मानती हैं, वे इसे पुराने इवोल्यूशन पुराने विकास से जोड़तें हैं। मुझे लगता है कि इस सोच में कुछ बड़ी गलतियाँ है, पर उन गलतियों की बात हम बाद में करेंगे। अभी हम दिमाग के लिखावट यानी सिनटक्स के बारे में जायेंगे। ये लिखावट ही दिमाग की सबसे बड़ी ताकत है। तो आखिर ये लिखावट यह सिंटेक्स क्या है? देखिए ये लिखावट बड़ी अजीब होती है। ये सब शब्दों की अंदरूनी सेट्टिंग है। उनकी लोकल प्रॉपर्टी है। जैसे किसी शब्द की स्पेलिंग को देखना इसके लिए आपको बाहर देखने की जरूरत नहीं है। पर ये लिखावट बाहर की बातों पर भी असर डालती है। यह अंदर और बाहर दोनों तरफ एक साथ

देखती है, जैसे शिव तैरता है, यहाँ शिव नाम है और तैरनायक काम है। ये इस वाक्य की अपनी सेट्टिंग है इसका सिंटेक्स है। पर इसी सेट्टिंग से हमें पता चलता है कि सवाल क्या होगा जैसे कौन तैरता है? अगर कोई मशीन इस सेट्टिंग को समझ ले तो वो खुद बता देगी की सही सवाल क्या है? यही बात तर्क यानी लॉजिक पर भी लागू होती है। अगर शिव तैरता है यह बात सच है तो इसका मतलब है कि कोई तो तैर रहा है। मशीन इस लिखावट को देखकर ही रिसाल्ट निकाल लेती है। उसे दुनिया की जानकारी होने की जरूरत नहीं है। इसे एक मछली की कहानी से भी समझ सकते हैं। एक खास मछली होती है। स्टिकल बेक जब मेल मछली जोश में होती है तो उसके पेट पर लाल निशान आ जाता है। दूसरे मेल मछली इस लाल निशान को देखकर गुस्सा दिखाते हैं। मछली का जोश में होना एक अंदरूनी स्टेट है एक अंदरूनी बात है। पर पेट का लाल निशान एक बाहरी निशानी है। एक लोकल प्रॉपर्टी है, दूसरी मछलियां उस निशान को देखकर समझ जाती हैं कि मामला क्या है? वह निशान को देखती है और गुस्से को समझ लेती है पर मछली और सोच में एक बड़ा फर्क है। मछली का रंग बदलने से मछली नहीं बदलती। पर अगर सोच की लिखावट उसका सिनटैक बदल दिया जाए तो वह सोच ही बदल जाती है। बिना शिव के शिव गंजा है वाली सोच नहीं रह सकती तो हमने क्या सीखा? हम बहुत सी बातें बचपन से जानते

हैं। दिमाग का अपना एक मशीनी ढांचा होता है एक मशीनी सिंटेक्स और सोचना असल में एक कम्प्यूटेशन है एक मशीनी हिसाब किताब ड्युरिंग और की बातें तो बस आंधी कहानी है बाकी आंधी कहानी दिमाग के अलग अलग हिस्सों यानी मॉडल्स की है। कुछ लोग कहते हैं कि दिमाग छोटे छोटे डिब्बों जैसा है। छोटे छोटे मॉड्यूल्स जैसा वो यह भी कहते हैं कि यह सब इवोल्यूशन की देन है, हम देखेंगे कि दिमाग को कंप्यूटर मानना कहाँ गलत है। कंप्यूटर वाला तरीका सिर्फ छोटे हिस्सों में है, सिर्फ। मॉड्यूल्स में काम करता है। बड़े और खुले कामों में यह तरीका फैल हो जाता है। यही इस पूरे साइंस की सबसे बड़ी कमी है। हमने पहले सीखा था कि लिखावट यानी सिनटैक बहुत जरूरी है। अगर आप लिखावट बदल दें तो थॉट बदल जाएगी। यहाँ एक नियम काम करता है सिर्फ एसेंशियल प्रॉपर्टीस, सिर्फ पक्की खूबियाँ ही दिमाग पर असर डालती हैं। लिखावट यानी सिंटेक्स एक पक्की खूबी है जो कभी नहीं बदलती। चाहे माहौल चाहे कॉन्टेक्स्ट कुछ भी हो, लिखावट वही रहती है। कंप्यूटर भी सिर्फ इसी लिखावट को देख कर काम करता है पर असली मुश्किल यहीं से शुरू होती है। हमारी सोच कॉन्टेक्स्ट पर टिक्की होती है पर कंप्यूटर तो कॉन्टेक्स्ट को समझ ही नहीं सकता। सिम्प्लेसिटी को एक एग्ज़ैम्पल की तरह देखिए। इंसान हमेशा आसान बात या आसान

रास्ता चुनता है, यही हमारी इन्टेलिजेन्स की निशानी है, पर कंप्यूटर के लिए आसान का क्या मतलब है? शायद वो सोचे की शार्ट सेन्टेन्सेस आसान है। इसे बिल्ली कंप्यूटर पर है, छोटा और आसान है। और बिल्ली कंप्यूटर पर सो रही है। थोड़ा बड़ा है परसल जिंदगी में आसान होना कॉन्टेक्स्ट पर टिका है। एक ही बात कहीं आसान होती है तो कहीं बहुत मुश्किल। एक और एग्ज़ैम्पल लीजिए, मान लीजिए आप कल नाव चलाना चाहते हैं तभी आपको पता चला कि कल हवा नहीं चलेगी। यह बात आपके पूरे प्लान को बिगाड़ देगी। अब आपको अपना सफर बहुत मुश्किल लगेगा, लेकिन अगर आप कार से जा रहे हैं तो हवा नहीं चलेगी वाली बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आपका प्लान अभी भी बहुत आसान रहेगा। खूब ध्यान दीजिए, बात तो एक ही है। लिखावट भी बिल्कुल एक ही जैसी है। यानी सिन्टेक्स भी बिल्कुल एक ही जैसा है पर अलग अलग कॉन्टेक्स्ट में अलग अलग प्लान में उसका असर अलग हुआ। एक जगह उसने काम बढ़ा दिया। दूसरी जगह कोई असर नहीं। कंप्यूटर सिर्फ शब्दों की बनावट देखता है, उनका सिन्टेक्स देखता है। वह यह नहीं देख पाता की बात किस माहौल में कही गई है। इसीलिए सोच की सादगी, उसकी सिम्प्लिसिटी को सिर्फ लिखावट से नहीं नापा जा सकता। यही वजह है कि दिमाग को कंप्यूटर मानना एक अधूरी बात है। मशीन शब्दों की बनावट देखकर काम

करती है। मशीन शब्दों के सेन्टेक्स देखकर काम करती है। यह लॉजिक वाले काम के लिए बहुत बढ़िया है पर कुछ बातें पूरे सिस्टम पर टिक्की होती हैं। इसे ग्लोबल या बड़ी सोच कहते हैं यहाँ कंप्यूटर वाला तरीका। थोड़ा फंस जाता है। यहाँ एक ही बात का मतलब कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से उसके माहौल के हिसाब से बदलता है और कंप्यूटर तो कॉन्टेक्स्ट को समझ ही नहीं पाता। पहली नजर में लगता है कि सूचना और कंप्यूटर का काम अलग है। पर यहाँ एक बारीक बात छिपी है। दिमाग एक कंप्यूटर है इस बात के दो मतलब हो सकते हैं पहला है पक्का तरीका यह कहता है कि दिमाग सिर्फ लोकल सेन्टेक्स सिर्फ अंदरूनी बनावट दिखता है यानी सिर्फ वो हिस्सा। जो सेख थॉट के अंदर है, उस एक ख्याल के अंदर है, पर जैसा हमने देखा, इससे ग्लोबेलिटी यानी बड़ी सोच समझ नहीं आती। दूसरा है ढीला तरीका यह कहता है की दिमाग किसी भी तरह की बनावट देख सकता है। चाहे वो अंदर की हो या बाहर की कॉन्टेक्स्ट की। इसमें सिम्प्लिसिटी भी इसमें सादगी भी एक नियम हो सकती है। बस शर्त ये है कि दिमाग उससे एक मशीन की तरह पड़ सके। अगर ये ढीला तरीका सही है तो बात बन सकती है। तो हम कह सकते हैं कि बड़ी सोच भी एक तरह का कंप्यूटर ही है, लेकिन यहीं पर असली गड़बड़ शुरू होती है। मशीन को सचमुच देखने के लिए सब कुछ एक साथ मिलाना होगा।

मान लीजिए एक छोटी सी बात आहार। पूरे सिस्टम टी से जुड़ी है। मशीन की उस बात का असर समझने के लिए पूरा सिस्टम पढ़ना पड़ेगा। उसे पूरी जानकारी को एक लंबा सेन्टेन्स बनाना होगा तभी वह उसे देख पाएगी। पर ऐसा ज़िन्दगी में हमारा दिमाग ऐसे काम नहीं करता। हमारा पूरा ज्ञान हमारा पूरा बिलीफ सिस्टम बहुत ही ज्यादा बड़ा है, इतना बड़ा की उसे हर बार पूरा पढ़ना मुमकिन नहीं। एक एग्ज़ैम्पल लीजिए, मान लीजिए बाहर बादल है और आपको छाता लेना है। आप आसमान देखेंगे और बादल देख कर फैसला लेंगे। क्या आप उसी वक्त अपनी जिंदगी की सारी यादें चेक करेंगे?

क्या आप बचपन की बातें या अपनी पूरी पढ़ाई याद करेंगे? हम बिल्कुल नहीं। आप सिर्फ काम की बात देखेंगे। अगर दिमाग कंप्यूटर होता तो उसे पूरा सिस्टम छानना पड़ता। पूरी दुनिया की जानकारी खंगालने बहुत भारी काम है। इंसान का दिमाग इतना बड़ा बोझ नहीं झेल सकता। हमारा दिमाग सिर्फ छोटे टुकड़ों में सिर्फ छोटे यूनिट्स में सोचता है। पूरी थ्योरी को एक साथ लेकर चलना मशीन के लिए भी मुश्किल है। कुछ बड़े स्कॉलर्स कहते हैं कि सब कुछ आपस में जुड़ा है। वे मानते हैं कि एक छोटी सी बात बदलने से पूरा सिस्टम बदल जाता है। हो सकता है वह सही हों, पर दिमाग के लिए यह तरीका बहुत धीमा है। यही वह मोड़ है जहाँ कंप्यूटर वाला रास्ता यानी कॉम्पटीशन कमजोर पड़ जाता है। यकीन करने के लिए हमें बस एक छोटी बात चाहिए जैसे यह आम मीठा है। यह सबसे छोटी बात है जो सच हो सकती है। पर कौन सी बात किस्से जुड़ी है, यह पहले से नहीं पता होता। यह दुनिया की बनावट पर टिका है। नेशन ने दुनिया को कैसे बनाया यह उस पर है दिमाग के पुराने मॉडल यहाँ फैल हो जाते हैं। वे बड़ी सोच को नहीं समझ पाते, सिर्फ मशीन होना काफी नहीं है असली मुश्किल यह है कि दिमाग काम कैसे करता है सबको पता है कि यहाँ बड़ी गड़बड़ है। मशीन को सब कुछ एक साथ देखना पड़ता है। इंसान का दिमाग ऐसा नहीं करता। हम नई सोच के करीब पहुँच रहे हैं।

दिमाग को एक अलग तरीके से देखना होगा एक मैसिव मॉड्यूलेरिटी की तरह पर उससे पहले एक और एग्ज़ैम्पल देखते हैं। हम सब अपनी पुरानी बातों पर टिके रहना चाहते हैं। हम अपने सोच या प्लान जल्दी नहीं बदलते। यह समझदारी की निशानी है। बिना किसी मजबूत वजह के हम नहीं बदलते। हम चाहते हैं कि हमारी पुरानी बातें बची रहे पर यहाँ भी कंप्यूटर को मुश्किल आती है। जब हम अपने सोच बदलते हैं तो कीमत चुकाने पड़ती है। कुछ बातें हमारे लिए बहुत जरूरी होती हैं। अगर वो बदल गई तो सब कुछ बदल जाएगा। पर कौन सी बात जरूरी है? यह कॉन्टेक्स्ट और हमारी थियरी पर टिका है। इस एक एग्ज़ैम्पल से समझिए। पुराने वैज्ञानिक सोचते थे कि भारी चीजें जल्दी गिरती हैं। उन्हें लगता था कि यह नियम बहुत जरूरी है, जिससे पत्थर तेज गिरता है और पंख थैरे पर बाद में पता चला कि यह हवा की वजह से है। असली नियम तो कुछ और ही था जैसे थ्योरी बदली पुरानी। जरूरी बात बेकार हो गई। एक और बात देखिए पहले लोग सोचते थे की मेटल हमेशा सख्त होते हैं। मरकरी यानी पारा तो बहुत लिक्विड है तो वह मेटल नहीं हो सकता और बाद में समझ आया की मेटल लिक्विड भी हो सकते हैं। यहाँ भी कॉन्टेक्स्ट ने सब बदल दिया। हमारी सोच में क्या जरूरी है?

यह बदलता रहता है। परक्षरों की बनावट उनके सिनटेक्स कभी नहीं बदलते। सिनटेक्स को नहीं पता कि कौन सी बात जरूरी है, वह तो बस एक मशीन की तरह काम करती है तो फिर दिमाग। सेंट्रेलिटी यानी महत्त्व को कैसे समझता है? कंप्यूटर के पास इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। यही वह गड़बड़ है जो नई सोच को कमजोर बनाती है। बहुत से लोग कहते हैं कि दिमाग छोटे डिब्बों में छोटे मॉडल्स में बंटा है। वे ऐसा इसलिए कहते हैं ताकि वे यह मान सकें कि दिमाग सिर्फ अपने आसपास की चीजें देखता है। वे इस बात को छिपाना चाहते हैं कि दिमाग कॉन्टेक्स्ट को भी समझता है। ये सिर्फ किताबें बहस नहीं है या असली साइंस के लिए भी एक बहुत बड़ी सिरदर्दी है। अगर दिमाग को कंप्यूटर मानने वाला तरीका सही होता तो अब तक हमारा साइंस बहुत आगे होता। पर सच तो यह है कि यह तरीका कई जगह फेल हो रहा है। कंप्यूटर वाली सोच सिर्फ कुछ छोटी बातों के लिए तो सही है पर यह हर जगह काम नहीं करती। एग्ज़ैम्पल के तौर पर आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स यानी मशीनी दिमाग आज भी आम आदमी जैसा काम नहीं कर पाता। यह बड़े शर्म की बात है। हम आज तक ऐसा रोबोट नहीं बना पाए जो घर का नाश्ता बना सके, वह घर जलाये बिना नाश्ता नहीं बना सकता। ये एक लैंगुएज का दूसरी लैंगुएज में सही ट्रांसलेट नहीं कर सकता। वह किसी किताब का छोटी समरी नहीं लिख सकता।

पिंकर कहते हैं कि हम दिमाग को समझ चूके हैं पर वे यह नहीं बताते कि अगर सब हम जानते हैं तो हमारे रोबोट्स इतने बुद्धू क्यों हैं? रोबोट के फेल होने का एक खास तरीका है। आम जिंदगी में अंदाजा लगाने के लिए कॉन्टेक्स्ट समझना पड़ता है। यह एक बड़ी डायलेमा है। बड़ी दुविधा सही फैसले के लिए आपको अपनी सारी पुरानी जानकारी चेक करनी पड़ती है। पर जल्दी काम करने के लिए आप सिर्फ थोड़ी सी जानकारी ही देख सकते हैं। मशीन को यह समझ नहीं आता कि कौन सी बात जरूरी है और कौन सी नहीं। इसे ही साइंटिस्ट फ्रेम प्रॉब्लम कहते हैं। इसी चक्कर में रोबोट लग जाते हैं और काम नहीं कर पाते। कंप्यूटर छोटी लॉजिक वाली बातों में बहुत तेज है। जैसे शिव और मोहन आए। इसे यह समझना कि शिव आया यहाँ उसे सिर्फ शब्दों की सेटिंग देखनी है, सिर्फ उनका सिनटैक्स। यह काम बहुत आसान और लोकल है। यहाँ तक तो सब ठीक है पर आम जिंदगी की सोच ऐसी नहीं होती। ज्यादातर बातें कॉन्टेक्स्ट पर टिक्की होती हैं। कंप्यूटर के पास कॉन्टेक्स्ट को समझने का कोई पक्का तरीका नहीं है। वह पूरी आने पूरे डेटबेस छाने लगता है। और इसी में हार जाता है। इसीलिए हमारे रोबोट आज भी वो काम नहीं कर पाते जो एक बच्चा आसानी से कर लेता है। उम्मीद है कि आप पिछली बातों से सहमत होंगे। दिमाग के नए साइंस की नींव में एक

बड़ी दरार है एक। बड़ा क्रैक है। अब आप सोच रहे होंगे कि वैज्ञानिक इस पर परेशान क्यों नहीं होते? उन्हें क्यों नहीं लगता कि कंप्यूटर वाला तरीका यहाँ फैल हो रहा है? इसके दो मेन कारण हैं। पहला, कुछ वैज्ञानिक सोचते हैं कि हम शॉर्टकट यूरिस्टिक से काम चला सकते हैं। दूसरा, कुछ लोग कनेक्शनिस्ट तरीका पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी। पर मुझे लगता है कि मामला बहुत गंभीर है। बड़ी सोच एक बहुत बड़ी समस्या है। इसे सुलझाना आज के विज्ञान के बस की बात नहीं लग रही। हाँ जी देखते हैं क्यों पहले बात करते हैं शॉर्टकट वाले तरीके के ट्यूरिस्टिक सोलूशन्स की। यह सच है कि इंसान हमेशा एकदम सही फैसला नहीं लेता। हम अक्सर कामचलाऊ तरीके से सोच लेते हैं। अप्रॉक्समेशन से। लोग कहते हैं कि शायद हमारा दिमाग बड़ी सोच की जगह छोटे छोटे शॉर्टकट इस्तेमाल करता है। आर्टिफीसियल इन्टेलिजेन्स यानी मशीनी दिमाग वाले से फ्रेम प्रॉब्लम कहते हैं। उनका मानना है कि हम छोटे छोटे टुकड़ों में सोचकर बड़ी समस्या हल कर लेते हैं। पर इसमें एक बहुत बड़ी गड़बड़ है। गड़बड़ क्या है यह सोचना कि कौन सा शॉर्टकट इस्तेमाल करें। यह खुद एक बहुत मुश्किल काम है। मान लीजिए, मान लीजिए आप सोच रहे हैं कि आलू के बिज़नेस में पैसा लगाया या नहीं, यह फैसला लेना

मुश्किल है। अब आप सोचते हैं कि इसके लिए कौन सा शॉर्टकट चुने, क्या किसी दोस्त से पूछें या अखबार पढ़ें? यहाँ भी वही समस्या आ जाती है। दोस्त की बात मानूं या नहीं? यह भी कॉन्टेक्स्ट पर टिका है। अगर आपका दोस्त जोंस आलू का बड़ा बिजनेसमैन है तो उसकी बात जरूरी है। पर अगर वो सिर्फ एक साधारण पड़ोसी है तो उसकी बात का कोई मतलब नहीं। यानी शॉर्टकट चुनने के लिए भी हमें बड़ी सोच चाहिए। कंटेक्चुअल थिंकिंग चाहिए? हम एक ही दायरे में गोल गोल घूम रहे हैं तो दिमाग के काम करने के दो तरीके हो सकते हैं। पहला, कम्प्यूटेशनल यानी हिसाब किताब वाला जैसे एक बात से दूसरी बात पर पहुंचना जैसे 2+2 इक्वल्स, फोर दूसरा दिमाग की बनावट यानी आर्किटेक्चरल, वो तरीका जिससे दिमाग खुद ब खुद काम करता है। कंप्यूटर सिर्फ। एक एक सिंबल्स को देख सकता है उसे पूरा कॉन्टेक्स्ट का अंदाजा नहीं होता। ट्यूरिंग की मशीन सिर्फ लोकल काम कर सकती है। वह एक एक पुर्जे को तो देख सकती है पर पूरी मशीन को एक साथ नहीं समझ सकती। मशीन को यह समझ नहीं आता कि कौन सी बात साधारण है और कौन सी स्पेशल। कौन सी खास? उसे यह भी नहीं पता चलता कि पुरानी बातों को कब छोड़ना है। पहेली यही है कि हमारा दिमाग बिना किसी मेहनत के कॉन्टेक्स्ट को कैसे समझ लेता है। टूरिंग का कंप्यूटर वाला तरीका इसका जवाब नहीं दे पाता।

वह सिर्फ छोटे। और बंटे हुए कामों में ही एक्स्पर्ट है। हम क्रिसमस के बाद के समय को आसानी से समझ सकते हैं। इसके लिए बस एक घड़ी की जरूरत होती है। घड़ी एक मशीन है जो समय बता देती है पर बड़ी सोच यानी ग्लोबलिटी के लिए ऐसी कोई मशीन नहीं है। इसीलिए यह कंप्यूटर वाला तरीका फैल हो जाता है। तो हमने दो बातें मानी थी। पहले पहली कि दिमाग में बड़ी सोच यानी ग्लोबल इफेक्ट्स सच में होती है। हो सकता है कि आगे चलकर यह मशीन जैसा ही निकले। पर फिलहाल हमारे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है। दूसरी टूरिंग का तरीका शायद हर जगह काम नहीं करता। टूरिंग की कहानी सिर्फ छोटे और सीधे कामों के लिए है पर बड़ी सोच के लिए यह बिल्कुल बेकार है। अगर आपको लगता है कि बड़ी सोच जरूरी नहीं है तो आप। ट्यूनिंग की कहानी पर यकीन कर सकते हैं, पर मुझे लगता है कि यह कहानी अधूरी है। इन्कम्प्लीट है दिमाग सिर्फ एक मशीनी सेन्टेक्स नहीं है। अब एक नया तरीका देखते हैं, जिसे कनेक्शनिज्म या नेटवर्क्स कहते हैं। पर सच कहूं तो यह तरीका और भी ज्यादा बुरा है। यह ना तो लॉजिक समझ पाता है और ना ही यह बड़ी सोच को समझा पाता है। पता नहीं लोग इसे इतना पसंद क्यों करते हैं? तो ये नेटवर्क्स क्या चीज़ है?

ये नेटवर्क हमारे डेस्कटॉप कंप्यूटर जैसे नहीं होते। इनमें मेमॅरि और प्रोग्राम अलग नहीं होते। ये बहुत सारे छोटे स्विच जैसे होते हैं। छोटे नोट्स जैसे ये स्विच आपस में कनेक्शन से जुड़े होते हैं। तारों से जब एक स्विच जलता है तो वह दूसरे को मैसेज भेजता है। इसे आप पुराने ख्यालों के जुड़ने यानी असोसिएशन जैसा समझिए। इसमें सोचने की शी लहर के चलने जैसा है। जब हमारी आँखें कुछ देखती हैं तो नेटवर्क चालू हो जाता है। अब क्या सोचने हैं? यह दो बातों पर टिका है पहली आपने बाहर क्या देखा यानी सेंसेशन्स और दूसरा। आपके दिमागी तारे यानी कनेक्शन्स कितने मजबूत हैं?

ये बहुत ही पुराना और सीधा तरीका है, लेकिन नेटवर्क के साथ एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम है। इसमें हर स्विच अपनी जगह से पहचाना जाता है। एक स्विच का अपना कोई वजूद नहीं होता, कोई ऐडेंटिटी नहीं। वो सिर्फ अपने आस पास के तारों से पहचाना चाहता है। इसका मतलब है कि आप एक नोड को एक स्विच को दूसरी जगह नहीं ले जा सकते। अगर नेटवर्क बदल गया तो ख्याल भी बदल जाएगा। इस वजह से नेटवर्क यह नहीं समझ पाते कि राम ने श्याम को मारा या श्याम ने राम को मारा। इनमे क्या फर्क है? वे शब्दों के अदल बदल को नहीं समझ सकते। ये नेटवर्क बड़ी सोच में वैसे ही फैल होते हैं जैसे कंप्यूटर। नेटवर्क ये नहीं समझ सकते कि कौन सी बात कितनी जरूरी है। उनके कनेक्शन्स एक बार जुड़ गए तो वैसे ही रहती है। वे कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से खुद को बदल नहीं पाते पर असल जिंदगी में हमारी सोच बदलती रहती है। आज जो बात हमें जरूरी लगती है कल वो बेकार हो सकती है। नेटवर्क अपनी इन तारों को इतनी जल्दी नहीं बदल सकते, इसीलिए वे हमारी बड़ी सोच का मुकाबला नहीं कर सकते। तो अब हमारे पास क्या रास्ते बचे हैं? पहला कुछ मत करो, बस अच्छे आइडिया का इंतजार करो। यह सुनने में तो अच्छा है पर काम नहीं आएगा। दूसरा ये। कि यह मान लो कि बड़ी सोच जैसा कुछ नहीं होता, यह तो सरासर झूठ बोलने वाली बात होगी तो हमने देखा कि बड़ी सोच यानी ग्लोबेलिटी

कंप्यूटर के लिए एक कांटा है, लेकिन। अगर हमारा दिमाग छोटे छोटे डिब्बों से छोटे छोटे मॉड्यूल से बना हो तो अगर ये डिब्बे सिर्फ अपना काम सिर्फ लोकल वर्क करें तो कंप्यूटर वाला तरीका काम कर सकता है। अब यहाँ तीन बातें हो सकती हैं। पहला अगर दिमाग में कोई डिब्बा नहीं है, कोई मॉड्यूल नहीं है। तो मामला खत्म अगर दिमाग का सिर्फ कुछ हिस्सा डिब्बों वाला है, तो हम सिर्फ उसी पर ध्यान देंगे। अगर पूरा दिमाग है डिब्बों से भरा है मॉड्यूल से भरा है, तो पिंकर और प्लाटकिन सही है और मैं आपका समय बर्बाद कर रहा हूँ। पूरे दिमाग को डीबो जैसा मानने को मैसिव मॉड्यूलेरिटी कहते हैं। मुझे लगता है कि यह बात सच नहीं है। अगर हम इसे सच मान ले तो बहुत सी बातें समझ नहीं आती। पहले यह डिब्बा है क्या? साइंस में मॉड्यूल्स?

विज्ञान में डिब्बों को लेकर लोग अलग अलग बातें कहते हैं। असल में दो तरह के दिमागी आर्किटेक्चर होते हैं। दो तरह के दिमागी ढांचे, एक वो जहाँ जानकारी बंद रहती है और एक वो जहाँ नहीं। हम सिर्फ वो बंद वाली जानकारी पर बात करेंगे। कुछ लोग हर उस हिस्से को मॉडल कहते हैं जो अपना एक खास काम, एक खास फंक्शन करता है जैसे शरीर के अलग अलग वर्स होते हैं। इस हिसाब से तो हर किसी का दिमाग डिपो वाला ही है। चमस्की के हिसाब से डिब्बा यानी मॉड्यूल सिर्फ पैदाइशी जानकारी सिर्फ इनेट नॉलेज का एक डेटबेस है। एक भंडार मैं मॉड्यूल से कहूंगा, मैं डिब्बा से कहूंगा जो एक बंद मशीन की तरह हो। इसका मतलब है कि वह मशीन बाहर की बातों से कोई मतलब नहीं रखती। वह बस अपना काम जानती है। अक्सर कहा जाता है कि हर डिब्बा अपने काम में माहिर होता है। डोमेन स्पेसिफिक होता है। इसे थोड़ा ध्यान से समझना होगा। अगर हम चोंस्की की बात माने तो यह बहुत सीधा है। जानकारी हमेशा किसी एक चीज़ के बारे में ही होती है जैसे खरगोश के सीन नहीं होते। यह जानकारी सिर्फ खरगोश के बारे में ही है। एक और मतलब यह है कि कुछ जानकारी बहुत खास होती है जैसे। चोम्स्की कहती हैं कि लैंगुएज सीखने का नियम बहुत ही खास है। यह सिर्फ इंसानी लैंगुएज पर ही लागू होता है। यह वैसा ही है जैसे एक खास जानवर प्लेटीपस सिर्फ एक ही जगह पाया

जाता है लैंगुएज का डिब्बा लैंगुएज का मॉड्यूल सिर्फ। लैंगुएज के ही नियम जानता है और कुछ नहीं। बात सिर्फ जानकारी की नहीं है, सिर्फ इन्फॉर्मेशन की नहीं है। प्लेटिपस की जानकारी सिर्फ उसके लिए है, पर यह नहीं बताती कि हम सीखते कैसे हैं। हमें ऐसी चीज़ चाहिए जो दिमाग के काम से जुड़ी हो। दिमाग के काम करने का तरीका भी खास होता है पर इसमें एक बात फंसती है। क्या लॉजिक का नियम किसी एक चीज़ के लिए है? लॉजिक का एक फेमस नियम है मोडस पोनेस इसका मतलब है अगर ये है तो ब होगा। अगर ये है तो बी होगा एग्ज़ैम्पल के तौर पर दो बातें देखिए पहली अगर इसमें पानी है तो यह जहर है। दूसरी अगर दो एक नंबर है तो यह छोटा है। लॉजिक के हिसाब से ये दोनों एक जैसे हैं। नियम कहता है कि यह हर जगह काम करना चाहिए। पर क्या हमारा दिमाग से हर जगह इस्तेमाल करता है?

कुछ साइंटिस्ट कहते हैं कि नहीं, शायद हमारा दिमाग नंबरों के लिए लॉजिक जानता है, पर वही दिमाग जहर की बात पर गड़बड़ कर देता है। ऐसे ही डोमेन स्पेसिफिक यानी खास काम में। माहिर होना कहते हैं। यह जानकारी और काम के बीच का तालमेल है। अब बात करते हैं बंद डिब्बे की इस एक एग्ज़ैम्पल से समस्या मान लीजिए आपको एक मजेदार बात पता है, आप उसे काम में तो इस्तेमाल कर लेते हैं पर दूसरे काम में आप उसे भूल जाते हैं। आपकी जानकारी एक डिब्बे में बंध है। वह बाहर नहीं निकल पा रही। दिमाग के पास अलग अलग मशीनों के डिब्बे हैं। रास्ता ढूंढने वाली मशीन अलग है। मैथ करने वाली मशीन अलग है। मैप वाली मशीन की बात हिसाब वाली को नहीं पता। यह दिमाग की बनावट। निम्मा के आर्किटेक्चर की वजह से है। ये कोई भूलने वाली बिमारी नहीं है तो डिब्बा तो मॉड्यूल असल में क्या है?

ये एक ऐसी मशीन है जिसके पास अपना खजाना है, अपना डेटबेस है। ये अपना काम करने के लिए बाहर से मदद नहीं लेती। यह सिर्फ अपने डिब्बे की जानकारी इस्तेमाल करती है इसीलिए यह बहुत तेज काम करती है। यही बड़ी सोच वाली समस्या का हल है। जब जानकारी एक छोटे डिब्बे में बंद होती है तो दिमाग को पूरी दुनिया नहीं छाननी पड़ती। उसे सिर्फ अपने छोटे से डिब्बे में देखना होता है। इससे फ्रेम प्रॉब्लम अपने आप सुलझ जाती है। डिब्बे के बाहर क्या है उससे मशीन को मतलब नहीं। तो सीधी बात यह है कि कंप्यूटर छोटे और लोकल कॉन्टेक्स्ट में अच्छा है। दिमाग की ये मॉडल्स भी वैसे ही हैं इसीलिए। कंप्यूटर वाली थ्योरी यहाँ एकदम फिट बैठती है। फिर मान लीजिए कि बहुत सारे डिब्बे हैं, मैसिव मॉड्यूलेरिटी है। मान लीजिए हमारा पूरा दिमागी डिब्बों से यानी मॉड्यूल से बना है। इसका मतलब है हर समस्या के लिए एक अलग मशीन है, एक अलग प्रोसेसर है। पर फिर दिमाग में ऐसी कोई जगह नहीं बचेगी जो यह बता सके कि सबसे अच्छा फैसला क्या है, क्योंकि हर डिब्बा बस अपना ही काम जानता है। अगर ऐसा है तो मेरी बड़ी सोच वाली बात गलत होगी, पर मैं इसे मानूंगा नहीं। मैं साबित करूँगा की पूरा दिमाग डिब्बों वाला होना पॉसिबल नहीं। इसके लिए कोई पक्का सबूत भी नहीं है। तो चलिए इस सोच की कमियों को देखते हैं कुछ वैज्ञानिक टू बी

एंड कोसमिडेस कहते हैं कि इंसानी दिमाग सिर्फ डिब्बों से ही बन सकता था। वह कहते हैं। कि बिना डिब्बे वाला दिमाग बच नहीं पाता। मुझे यह बात हजम नहीं होती। दिमाग की बनावट कई चीजों का मेल है जैसे स्पीड और अच्युरेसी के बीच तालमेल। ऐसा कोई नियम नहीं है कि सिर्फ डिब्बे ही जीतेंगे पर ये वैज्ञानिक अपने बात पर अड़े हुए हैं। वे कहते हैं कि बिना डिब्बों के बिना मॉडल्स के जीना इम्पॉसिबल है। आइए देखते हैं उनकी तीन बड़ी वजहें क्या हैं पहली सही और गलत की पहचान। वह कहते हैं कि हर काम के लिए कामयाबी अलग होती है, हर काम के लिए सक्सेस का पैरामीटर अलग होता है। जैसे शिकार करना और बच्चे पालना अलग काम है। वे पूछते हैं, क्या एक ही मशीन इन सब को समझ सकती है?

अगर किसी को पता चले कि बच्चे के लिए सेक्स जरूरी है तो क्या उसे हर वक्त वही करते रहना चाहिए? वह कहते हैं कि सिर्फ एक खास डिब्बा ही बता सकता है। की कब रुकना है? पर मेरा मानना है कि सच्चाई हर जगह काम आती है। सच्ची जानकारी होना हर काम के लिए कामयाबी है। कुछ लोग कहेंगे कि सिर्फ सच जानना काफी नहीं है। जिंदा रहने के लिए हाथ, पैर और खाना भी चाहिए। पर सच तो यह है कि सच जानना और काम करना साथ चलते हैं। दिमाग जानकारी इकट्ठा करता है और शरीर उसे इस्तेमाल करता है। यह एक टीम की तरह काम करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि काम अलग अलग है। सच्चाई ढूंढना एक जनरल रूल हो सकता है। फिर है दूसरी वजह कम जानकारी में सीखना। वे कहते हैं कि दुनिया में जानकारी बहुत कम है। पॉवर्टी ऑफ़ स्टीमुलस है, इसलिए हमें पैदा होते ही खास डिब्बे चाहिए। पर यहाँ वे एक गलती कर रहे हैं पैदाशी यानी इनेट नॉलेज और डिब्बे या मॉड्यूल्स अलग चीजें हैं। हम बहुत कुछ सीख कर पैदा हो सकते हैं पर जरूरी नहीं कि वो सब अलग अलग मॉड्यूल्स में अलग अलग डिब्बों में बंद हो। जैसे हम चलना जानते हैं पर वो कोई बंद डिब्बा नहीं है। तीसरी वजह है कोंबिनटोरियल एक्सप्लोजन यानी बहुत सारी उलझनें। वे कहते हैं कि अगर दिमाग डिब्बों में न बटा हो तो वह इतनी सारी जानकारीयों में खो जाएगा। जैसे अगर आपको हजारों रास्ते दिखे

तो आप रुक जाएंगे, सिर्फ छोटे डिब्बे ही काम को आसान बना सकते हैं। पर मुझे लगता है कि इसका एक और रास्ता भी है। हो सकता है दिमाग का काम करने का तरीका ही अलग हो, वो शायद मशीनी हिसाब किताब यानी कम्प्यूटेशन से कुछ ज्यादा हो। अब मैं अपनी एक दलील देता हूँ, एक आर्गुमेंट मान लीजिए हमारे पास दो टिब्बी हैं। एक डिब्बा ट्रायंगल्स के बारे में सोचता है, दूसरा डिब्बा स्क्वायर के बारे में जब दिमाग के सामने कोई फोटो आती है तो उसे कैसे पता चलता है कि कौन सा डिब्बा खोलना है?

यहाँ दो रास्ते हो सकते हैं दो ऑप्शन्ज़ पहला रास्ता एक बड़ा डिब्बा बॉक्स वॅन बाहर खड़ा है। वो फोटो देखता है और उसे सही छोटे डिब्बे यानी एम वॅन या एम टू में भेज देता है। पर अगर ऐसा है तो दिमाग पूरा डिब्बों वाला नहीं रहा क्योंकि वो बड़ा डिब्बा तो सबका काम कर रहा है। दूसरा रास्ता दो और छोटे दरबान बिठा दीजिए बॉक्स टू और बॉक्स थ्री। एक सिर्फ ट्रायंगल्स पहचाने दूसरा सिर्फ स्क्वेयर पर। फिर सवाल आएगा उन दरबानों में कौन बताएगा कि फोटो किसकी है? यह तो अंडे और मुर्गी वाली कहानी बन जाएगी। हर छोटे डिब्बे के लिए एक और छोटा डिब्बा चाहिए होगा। यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। इसका मतलब है कि शुरुआत में एक जनरल बात होना ही चाहिए। एक आम रास्ता जो सारी जानकारीयों को देख सके और उन्हें बांट सके। इसीलिए पूरा दिमाग डिब्बों वाला है, यह बात सही नहीं लगती। पुराने जमाने के लोग एक बात मानते थे। दिमाग में कुछ भी आने से पहले वह इंद्रियों से गुजरता है। इसे ही एम्पेरिसिस्ट प्रिन्सिपल कहते हैं। हमारी इंद्रियां हमारी सबसे ज्यादा खुली होती हैं, डोमेन जनरल होती हैं, वे हर तरह की जानकारी को अंदर आने देती हैं। वे तय करती हैं कि कौन सी बात किस डिब्बे में किस मॉड्यूल में जाएगी। इस तरह सेन्सस ही दिमाग का असली दरवाजा है। अब मान लीजिए आप मैसिव

मॉड्यूलेरिटी मानते हैं, पर आप यह नहीं मानते कि हर चीज़ सेन्सस से आती है। तो फिर मामला और भी उलझ जाता है। एग्ज़ैम्पल के तौर पर धोखेबाजों को पकड़ने वाली मशीन चीटर डिटेक्शन मॉडल को लीजिए। वैज्ञानिक कहते हैं कि यह मशीन सिर्फ सोशल एक्सचेंज के वक्त चलती है सिर्फ लेन देन के वक्त। जब आप किसी से सौदा करते हैं तो यह मशीन चालू होती है। यह मशीन बताती है की सामने वाला धोखा तो नहीं दे रहा। पर सवाल ये है की दिमाग को कैसे पता चलता है? उसे कैसे पता है की अभी लेन देन अभी सोशल एक्स्चेंज चल रहा है। इसके लिए एक और मशीन चाहिए जो लेनदेन को पहचाने वह मशीन धोखे वाली मशीन से भी ज्यादा बड़ी होनी चाहिए। तो फिर पूरा दिमाग डिब्बो वाला है, यह बात यहाँ भी गलत साबित होती है। तो आखिर एक डिब्बा एक मॉड्यूल फैसला कैसे लेता है? क्या लेनदेन का क्या?

सोशल एक्सचेंज का कोई खास रंग होता है नहीं या कोई सेंसरी वाली पहचान नहीं है? ऐसा नहीं है कि लेन देन होते ही कोई लाल बत्ती जल जाती है। इसे पहचानने के लिए बहुत बारीकी से सोचना पड़ता है। इंसान को इशारे समझने पड़ते हैं। आज के वैज्ञानिक पुराने शिकारियों की बात करते हैं। वे कहते हैं कि पुराने जमाने में सब आसान था। शायद तब लेनदेन को पहचानना बहुत आसान रहा होगा। पर आज तो ऐसा नहीं है। आज हमें बहुत सोच समझ कर कॉन्टेक्स्ट को समझना पड़ता है। और डिब्बे और मॉड्यूज तो ऐसी बड़ी सोच रख ही नहीं सकते। यही हाल लैंगुएज वाले मॉड्यूज का भी है। दिमाग को कैसे पता चलता है कि सामने वाला बोल रहा है या कोई सिर्फ शोर मचा रहा है?

वैज्ञानिक सालों से इसकी आवाज वाली पहचान ढूंढ रहे हैं। ऐकूस्टिक फीचर्स पर आज तक किसी को कुछ नहीं मिला साइन लैंगुएज में तो आवाज भी नहीं होती, फिर भी दिमाग समझ जाता है की यह लैंगुएज है तो सीधी बात यह है। की चीजों को पहचानना और उन्हें सही मॉडल तक पहुंचाना। यह काम खुद एक बहुत बड़ी सोच मांगता है और यही वह काम है जो बंद मॉड्यूल्स जो बंद डिब्बे कभी नहीं कर सकते, बिना बड़ी सोच के बिना ग्लोबेलिटी के। ये छोटे डिब्बे बेकार हैं यूज़लेस सच कहूं तो हम पिछली बात पर ही रुक सकते थे। पुरानी नई सोच दो बातें मानती है। पहली दिमाग एक कंप्यूटर की तरह काम करता है और दूसरी। दिमाग छोटे छोटे डिब्बों में बंटी हुई है। कंप्यूटर सिर्फ अपने आसपास की चीजें देखता है यानी लोकल। इसलिए वह बड़ी सोच में कच्चा है, लेकिन अगर दिमाग डिब्बों वाला है तो काम आसान है, जितना ज्यादा डिब्बा बंद होगा, उतना ही कम उलझन होगी, उतनी ही कम कम्प्लेक्सिटी होगी। नई सोच एक तीसरी बात भी कहती है, हमारा दिमाग एवोल्यूशन की एक अडेप्टेशन है। विकास की एक देन है और अब हम इसी तीसरी बात पर गौर करेंगे। नई सोच वाले एक अजीब दलील देते हैं, एक अजीब सा आर्गुमेंट। वे कहते हैं की दिमाग को एवोल्यूशन के नियम मान नहीं होंगे। अगर हम ऐसा नहीं मानते तो ये एक बड़ी गलती होगी।

वे इसे कंसिस्टेंसी कहते हैं। एक जैसा होना। उनका कहना है कि सारा विज्ञान आपस में जुड़ा होना चाहिए। जैसे डार्विन ने शरीर की बनावट को समझाया। वैसे ही वोल्यूशन ही दिमाग की बनावट को समझाता है, पर मुझे यह बात थोड़ी अच्छी लगती है। थोड़ी वीक पहला गलत तर्क ये है कि सब कुछ एक जैसा यानी कन्सिस्टेन्सी यह कहना कि सारा विज्ञान एक जैसा होना चाहिए, यह बहुत। मजबूत बात नहीं है। इसके दो बड़े कारण हैं। आप ये जान सकते हैं कि दिमाग कैसे काम करता है, उसका मेकानिज्म क्या है। इसके लिए यह जानना जरूरी नहीं कि वह कैसे बना, उसकी हिस्टरी जरूरी नहीं। जैसे हवाई जहाज या बर्ड्स कैसे उड़ते हैं?

इसके लिए हवा के दबाव यानी एरोडाइनैमिक्स को समझना जरूरी है। यह जानना जरूरी नहीं कि बोर्ड्स ने उड़ना कैसे शुरू किया। दो अलग अलग विज्ञान हमेशा आपस में नहीं मिलते, जैसे तारों का विज्ञान और पौधों का विज्ञान। ये दोनों सच हैं इसलिए ये आपस में लड़ते नहीं। पर इसका मतलब यह नहीं कि पौधों को तारों से जोड़ना जरूरी है। यही बात दिमाग और एवोल्यूशन पर भी लागू होती है। हो सकता है डार्विन का नियम सही हो और हो सकता है मेरे दिमाग का नियम भी सही हो पर जरूरी नहीं। कि दोनों को एक दूसरे की जरूरत पड़े। विज्ञान में अक्सर चीजें एक दूसरे से बिल्कुल अलग होती हैं। नई सोच वाले चाहते हैं कि बायोलोजी सब कुछ समझाये पर असल में अलग अलग विज्ञान के बीच रिश्ता ढूँढना बहुत मुश्किल काम है। यह कहना कि सब कुछ जुड़ा है, बस एक बड़ी बात है। इसे साबित करने के लिए मजबूत सबूत चाहिए। सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा। तो दिमाग कैसे बना? यह एक अलग कहानी है। दिमाग आज कैसे काम करता है? यह एक अलग कहानी है। हमें इन दोनों को जबरदस्ती मिलाने की जरूरत नहीं है। दूसरा गलत तर्क है, काम का मकसद यानी टेलीोलॉजी बायोलोजी और दिमाग के विज्ञान में एक खास बात है। हमें यह पता करना पड़ता है कि कौन सा हिस्सा क्या काम करता है। जैसे दिल का काम खून को शरीर में दौड़ाना है। आँखों का काम दुनिया को देखना है।

कुछ लोग कहते हैं कि बिना क्यों पूछे हम विज्ञान नहीं समझ सकते। आपको पूछना पड़ेगा कि कोई चीज़ किस काम के लिए बनी है, पर यहाँ एक बड़ी गड़बड़ है। लोग कहते हैं कि काम का मतलब वही है जिसके लिए डार्विन ने हमें चुना। वे कहते हैं कि डार्विन ने हमें क्यों का जवाब देना सिखाया? अगर आपके दिमाग को समझना है तो उसकी पुरानी कहानी यानी उसके एवोल्यूशन को जानना होगा। बिना डार्विन के आप काम को नहीं समझ सकते पर मैं इस बात को नहीं मानता। डार्विन की कहानी पुरानी यादों जैसी है। वह कहती है कि दिल आज खून दौड़ाता है क्योंकि पुराने जमाने में इसे इसी काम के लिए चुना गया था। ज़रा सोचिए अगर डार्विन की बात गलत निकल जाए तो क्या दिल खून साफ करना बंद कर देगा?

नहीं। दिल अपना काम फिर भी करता रहेगा। हमें किसी चीज़ का काम समझने के लिए उसका इतिहास जानने की जरूरत नहीं जैसे हाथ पकड़ने के लिए है। आखिर देखने के लिए पुराने डॉक्टरों ने डार्विन को पढ़े बिना ही दिल का काम समझ लिया था। हवाई जहाज के पंख क्या करते हैं, यह उसे देखकर पता चलता है। उसके लिए करोड़ों साल पीछे जाने की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि हम पहले काम देखते हैं। हम देखते हैं कि आज दिमाग क्या क्या कर सकता है। फिर हम अंदाजा लगाते हैं। ये शायद इसीलिए हमें चुना गया होगा। आज के काम को समझना आसान है पर करोड़ों साल पुरानी कहानी का सबूत ढूंढ़ना बहुत मुश्किल है। तीसरा गलत तर्क है दिमाग की बनावट, उसकी कम्प्लेक्सिटी लोग कहते हैं कि हमारा दिमाग बहुत कॉम्प्लेक्स है। इतना मुश्किल और बढ़िया दिमाग सिर्फ डार्विन का चुनाव ही उनका सेलेक्शन ही बना सकता है। पिंकर और बाकी लेखक बार बार यही बात कहते हैं। उनके हिसाब से मुश्किल चीजें बिना सेलेक्शन के बन ही नहीं सकते, पर दिमाग का उलझा होना इस बात का सबूत नहीं है। असली सवाल यह है कि पुराने पूर्वज पुराने एनसेस्टर से हम तक आने में कितना बदलाव हुआ?

अगर यह बदलाव बहुत छोटा था तो यह धीरे धीरे नहीं हुआ होगा। हमें अपने पुराने पूर्वज मंदिरों के दिमाग के बारे में कुछ नहीं पता। हमें यह भी नहीं पता कि दिमाग की नर्स सोच को कैसे बनाती है। हो सकता है कि नसों में एक छोटा सा बदलाव हुआ हो और उस छोटे बदलाव ने ही बंदर के दिमाग को इंसान जैसा बना दिया हो। बंदर और इंसान का दिमाग देखने में एक जैसा ही लगता है, पर दोनों की सोच में दोनों के माइंडसेट में। जमीन आसमान का फर्क है। इसका मतलब है कि छोटे से बदलाव ने बहुत बड़ा असर दिखाया। अगर ऐसा है तो यह करोड़ों साल का धीरे धीरे होने वाला काम नहीं है। सिर्फ दिमाग के उलझे होने से यह साबित नहीं होता कि यह डार्विन का ही खेल है। डार्विन की कहानी में एक खास बात है। शरीर की बनावट में थोड़ा सा बदलाव आता है। इसे जिंदा रहने में थोड़ा सा फायदा होता है। जैसे जिराफ की गर्दन थोड़ी सी लंबी हुई, वह ऊंचे पेड़ के फल थोड़े आसानी से खा सका। ऐसे धीरे धीरे गर्दन लंबी होती गई। डार्विन का नियम तभी काम करता है जब छोटे बदलाव से छोटा फायदा हो। प्रख्यात दिमाग के साथ भी ऐसा ही है। हमें इसके बारे में कुछ नहीं पता। हमें नहीं पता कि दिमाग किन्नर से सोच को कैसे बनाती है। हो सकता है कि नर्स में बहुत छोटा बदला हुआ हो, पर उसे सोचने का पूरा तरीका बदल गया हो। अंदर से इंसान बनने में शायद यही

हुआ हो। टुरिंग ने हमें कंप्यूटर के बारे में सिखाया था। कंप्यूटर के प्रोग्राम में ज़रा सा बदलाव करिए। तो वह मशीन एकदम अलग और बड़ा काम करने लगती है। दिमाग भी शायद ऐसा ही हो। अगर दिमाग के सारे हिस्से आपस में जुड़े हैं तो एक छोटा सा बदलाव हर जगह फैल जाएगा। तो फिर नई सोच वाले डार्विन को इतना क्यों मानते हैं? इसके पीछे एक मजेदार लॉजिक है। हर डिब्बा, हर मॉड्यूल अपने साथ एक खजाना, एक डेटबेस लेकर आता है। यह वो बातें हैं जो हम बचपन से जानते हैं और रेशनलिस्ट जैसे डेकाट अलग सोचते थे। उन्हें लगता था कि बचपन का ज्ञान मेस जैसा पक्का होता है जैसे। 2+2 इक्वल्स फोर पर आज के वैज्ञानिक कुछ और कहते हैं। हमारे अंदर ऐसी बहुत सी बातें हैं जो सिर्फ हमारे एनवायरनमेंट के लिए सच हैं, जैसे साथ चलने वाली चीजें एक ही होती हैं या गहरी जगत से गिरना खतरनाक है। ये बातें हर पॉसिबल वर्ल्ड में सच नहीं होती पर हमारी दुनिया में ये सच है। अब सवाल है कि हमें ये बातें पहले से कैसे पता है? इसका जवाब सिर्फ ड्रार्विन के पास है। हमारी दुनिया के हिसाब से ही हमारा दिमाग चुना गया है। इसीलिए बंद डिब्बों वाली सोच बंद मॉड्यूल्स वाली सोच को डार्विन की जरूरत पड़ती है। अब यह एक मजेदार बात समझिए। दिमाग के डिब्बों और डार्विन का गहरा रिश्ता है। माना कि दिमाग की बनावट में थोड़ा

बदलाव हो सकता है। पर क्या किस्मत से हमें सारी सच्चाई पता चल जाएगी? बिल्कुल नहीं। यह पॉसिबल ही नहीं है। बच्चे पैदा होते ही कुछ बातें जानते हैं जैसे बिना सहारे के चीजें नीचे गिरती हैं या एक चीज़ के सारे हिस्से साथ चलते हैं। ये सारी बातें हमारी दुनिया के लिए सच है पर ये सच दिमाग में अपने आप नहीं आ सकते। इस एक एग्ज़ैम्पल से समझिए, मान लीजिए आपने फ़ोन डाइरेक्टरी के पन्ने काट दिए। अब आप नामों और नंबरों को आंख बंद करके जोड़ रहे हैं, क्या पक्का है कि सही नाम को सही नंबर मिलेगा?

कभी नहीं यह तो बस एक अक्सीडेंट होगा एक इत्तफाक। इतनी सारी सच्ची बातें दिमाग में लाने के लिए कोई चाहिए? नेचर में डार्विन का चुनाव नेचुरल सेलेक्शन ही वह टीचर है। वो हमारे दिमाग में ये पक्की सच्चाई भरता है ताकि हम अपनी दुनिया में ठीक से रह सकें। इंसानी लैंगुएज के बारे में सोचना बहुत मजेदार है। यह भी दिमाग का एक खास डिब्बा है, पर इसका डार्विन की कहानी से कम लेना देना है। दूसरे डिब्बों को दुनिया की सच्चाई जाननी पड़ती है पर लैंगुएज को सिर्फ दूसरे लोगों की सोच जाननी है। अगर हम एक ही स्पीशीज़ के लोग हैं। तो मेरे दिमाग के नियम और आपके नियम एक जैसे होंगे। मुझे आपकी बात समझने के लिए सिर्फ आपके जैसा होना है। इसके लिए हमें करोड़ों साल के सेलेक्शन की जरूरत नहीं। इसलिए जोम्स्की कहते हैं कि लैंगुएज पैदाशी तो है पर यह डार्विन का कोई खास खेल कोई। अडेप्टेशन नहीं है। तो अगर आप मानते हैं कि पूरा दिमाग डिब्बों से बना है तो आपको डार्विन की बात भी माननी ही पड़ेगी क्योंकि बिना उसके इन डिब्बों में जानकारी नहीं आएगी। पर जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, हमारा दिमाग सिर्फ छोटे डिब्बों का ढेर नहीं है। हमारा दिमाग बड़ी सोच में बहुत माहिर है। हम पहेलियों को सुलझाने में एक्सपर्ट हैं। इंसान और मंदिर के दिमाग में बस जानकारी का फर्क नहीं है।

ऐसा नहीं है कि हमारे पास बस ज्यादा बात नहीं जमा है, बल्कि हमारे सोचने का तरीका ही बदल गया है। बंदर से इंसान बनने के बीच दिमाग में एक बड़ी छलांग लगी है। इसी छलांग की वजह से हम आज यहाँ तक पहुँच पाए हैं। अब तक हमने बहुत सारी बातें की। मैं आपको सब कुछ छोटा करके बताता हूँ। हमारी बहुत सी सोच पहेली सुलझाने जैसी है। अगर ऐसा है तो दिमाग डिब्बों वाला नहीं डिब्बित तो अपनी जानकारी में बंद रहते हैं पर पहेली सुलझाने के लिए सब कुछ देखना पड़ता है। दिमाग को पूरे सिस्टम यानी ग्लोबल सिस्टम की जरूरत होती है। बड़ी सोच यानी ग्लोबल थिंकिंग सिर्फ सिनटैक नहीं है, सिर्फ लिखावट नहीं है। लिखावट सिर्फ ख्यालों के अंदरूनी हिस्सों को देखती है। यह तरीका सिर्फ पास की चीजों को समझता है। पर बड़ी सोच तो पूरे ख्यालों को एक साथ देखती है। इसलिए। बड़ी सोच और सिर्फ लिखावट में फर्क है। ख्यालों के अंदर की लिखावट उसका सिन्टेक्स पक्का होता है। इससे बाहर के कॉन्टेक्स्ट से फर्क नहीं पड़ता। अगर हमारी सोच सिर्फ अंदर की लिखावट पर टिक्की है तो उसे एक दिमाग से दूसरे में ले जाना मुश्किल है। वह अपनी जगह पर ही पक्की हो जाती है। फिक्स्ड हो जाती है। बड़ी सोच भी शायद एक मशीन हो पर यह सिर्फ अंदरूनी हिस्सों के मेल को नहीं देखती। यह ख्यालों के आपस के बाहरी

रिश्तों को भी देखती है। अगर ऐसा है। तो दिमाग एक मशीन जैसा ही है, पर यह पुराने डिज़ैन वाला कंप्यूटर नहीं है। पुराना डिज़ैन बाहरी रिश्तों को नहीं समझ पाता। आज के लिए बस इतना ही हम फिर मिलेंगे आपसे एक नई एपिसोड में एक नई किताब के साथ। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस विथ रोहित धन्यवाद।

Transcript supplied by the publisher with the episode.

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