Episode notes
Mean Genes: From S*x to Money to Food, Taming Our Primal Instincts, authored by Terry Burnham and Jay Phelan, is a fascinating cross-disciplinary look at the biological roots of modern human struggle. Published in 2000, it remains a cornerstone of popular evolutionary psychology. The book’s central premise is that our bodies and brains are "running on software" designed for a world that no longer exists—the Pleistocene era.While civilization has advanced at lightning speed, our genes change at a glacial pace. This "mismatch" creates a tug-of-war between our primal instincts (which want us to…
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इस किताब को अपने दिमाग को चलाने वाली गाइड समझिए। जब हम कोई कार्य या माइक्रोवेव खरीदते हैं और उसके साथ उसे चलाने का तरीका न मिले तो हमें बुरा लगता है, लेकिन हमारी सबसे कीमती चीज़ है हमारा शरीर और हमारा दिमाग। बिना किसी गाइड के ही हमें मिल गए हैं। इसी वजह से हम बस अंदाजी से अपनी खुशी ढूंढ़ते रहते हैं। कभी थोड़ी सी एक्सर्साइज़ कर ली, कभी अच्छा खाना खा लिया तो कभी पार्टी कर ली। मेन जीन्स नाम किया किताब हमें वो बातें बताएंगे। जिससे हम अपने ज़िन्दगी को बेहतर तरीके से चला सकें। जब हम कार्ड चलाते हैं तो वो वैसा ही करती है जैसा हम कहते हैं। मशीन अपनी मर्ज़ी नहीं चलाती, लेकिन अगर हम अपने दिमाग से कहें कि कल से तला भु न खाना बंद नो फैटी फूड। तो दिमाग हमारी बात सुनकर हंसता है। जैसे ही सामने मीठा आता है दिमाग हमें उसे खाने के लिए उकसाने लगता है। सच तो ये है कि हमारा दिमाग हमारा कहना मानने वाला नौकर नहीं है, उसकी अपनी एक अलग सोच है, एक अलग माइंडसेट है। ऐसा मान लीजिए कि आप असल में दो लोग हैं, एक वो जिसकी अपनी पसंद, नापसंद और सपने हैं और दूसरा आपके शरीर के अंदर की वो मशीन यानी आपका दिमाग ये मशीन हमेशा आपकी बात नहीं मानती और अक्सर वही जीत जाती है। आखिर हमारी अपने आप से ही लड़ाई क्यों होती है? हम खुद को काबू में हम खुद को
कंट्रोल में क्यों नहीं रख पाते? या कुत्ते बिल्ली भी वजन कम करने या अपनी बुरी आदतों को छोड़ने के लिए परेशान रहते हैं? नहीं तो फिर हमारे साथ ही। ऐसा क्यों होता है? एक पुरानी डरावनी कहानी है, जिसमें एक लड़की को डरावने फ़ोन आते हैं। जब पुलिस जांच पड़ताल करती है तो पता चलता है कि फ़ोन करने वाला आदमी घर के अंदर ही है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही है। हमारी सारी मुश्किलों की जड़ हमारे अंदर ही है। हमारे जीन्स में हमारे दोस्त, परिवार और टीवी अड्वर्टाइज़्मन्ट्स भी हमें बहकते हैं, लेकिन असल में हमारे अंदर की कुछ चीजें हैं। हमें वो काम करने पर मजबूर करती हैं। जो हमारे लिए बुरे हैं। किसी भी किताब की दुकान पर जाकर देखिए तो आपको प्यार पाने, वजन कम करने और अमीर बनने की बहुत सारी किताबें मिलेंगी। लेकिन क्या कभी ऐसी किताब देखी है जिसका नाम हो? पेट कैसे बाहर निकालें या पैसे कैसे फालतू बड़ाए नहीं क्योंकि ये सबका ये सब बैड हैबिट्स तो हम अपने आप ही कर लेते हैं। इसके लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे जीन्स ही हमें ऐसी गलतियाँ करने के लिए उकसाते। हैं। आजकल रोज़ अखबारों में आता है कि। बुढ़ापे के जीन्स मिल गए या बिमारी के जीन्स मिल गए? इससे एक बात साफ है कि हमारे शरीर और बीमारियों का हमारे जीन्स से गहरा नाता है।
वैज्ञानिक हरदें नई खोज कर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में बड़ी बीमारियों का इलाज आसान हो जाएगा। लेकिन हमारी जीन्स सिर्फ बीमारियों तक ही नहीं है, वो हमारी रोज़ की जिंदगी पर भी असर डालते हैं। हम जो भी काम अपनी मर्जी से करते हैं, उसके पीछे भी कहीं न कहीं हमारे जीन्स का ही हाथ होता है। पिछले कुछ सालों में वैज्ञानिक ने इस बारे में बहुत कुछ सीखा है। इस किताब में हम यही देखेंगे कि जीन्स हमें कैसे चलाते हैं, एक एग्ज़ैम्पल लेते हैं, खूबसूरती क्या है, ब्यूटी क्या है और इसे कौन तय करता है? कुछ लोग कहते हैं कि ये भगवान की देन है जिसे समझना मुश्किल। है। कुछ कहते हैं कि जो फैशन की दुनिया में चल रहा है वही खूबसूरत है, लेकिन अगर ऐसा होता तो हर देश में खूबसूरती की पसंद अलग अलग होती। पर ऐसा नहीं है। अगर आप ध्यान से देखें तो हमारा शरीर दोनों तरफ से एक जैसा होता है। जैसे सीधा हाथ और उल्टा हाथ एक जैसे होते हैं। इसे सिमिट्री यानी बराबरी कहते हैं। हालांकि कोई भी पूरी तरह बराबर नहीं होता। किसी का एक कान थोड़ा ऊपर हो सकता है या कोई और छोटा सा फर्क। लेकिन रिसर्च में पाया गया है कि लोग उन्हें ज्यादा पसंद करते हैं। जिनका चेहरा और शरीर दोनों तरफ से एक दम बराबर हो। जानवरों की दुनिया में भी शरीर का बराबर होना इस बात का सबूत है कि शरीर हेल्थी है।
हमें ये बात पता नहीं होती लेकिन हमारा दिमाग बिना बताए ही। ऐसे लोगों को चुनने का फैसला ले लेता है तो बात ये है कि हमारे दिमाग का अपना एक एजेंडा है। हमारा दिमाग एवोल्यूशन से बना है बदलाव के तरीकों से जब हम इस बनावट को इस डिजाइन को समझ जाएंगे। तो हमें हैरानी नहीं होगी कि हमारे रिश्तों में लड़ाई क्यों होती है? यह हमारा वजन क्यों बढ़ जाता है? यह हमें सादे खाने से ज्यादा बर्गर क्यों पसंद आता है? खुद को और अपनी दुनिया को समझने के लिए हमें पुराने विचारों के बजाए साइंस की बातों को समझना होगा। चाहे हमें पसंद हो या ना हो, हम सबके अंदर एक लड़ाई चल रही है। यह लड़ाई हमारे अपने ही शरारती जीन्स यानी मीन जीन्स के खिलाफ़। है। ये जीन्स बड़े चालाक और मास्टर्स होते हैं। ये हमें मज़े और दर्द के जरिए कंट्रोल में रखते हैं। बड़े बड़े कामयाब लोग भी इनके आगे हार मान लेते हैं। ओपरा विनफ्रे को ही देख लीजिए वो इतनी अमीर और ताकतवर है। फिर भी उन्हें अपना वजन कम रखने और सेल्फ कंट्रोल पाने के लिए बहुत स्ट्रगल करना पड़ता। है। ओपरा ने सबको सच सच बताकर यह साबित कर दिया कि हम कोई रोबोट नहीं है जो सिर्फ अपने जीन्स के इशारों पर नाचे। हम अपनी लाइफ बदल सकते हैं। रोज़ की ज़िन्दगी में हमारे सामने दो रास्ते होते हैं। एक है पालतू जानवर वाला रास्ता
यानी। पेट। पाथ। सभी जानवर इसी पर चलते हैं। भूख लगी तो खली सी खाना खत्म होने तक खाते रहिए। अगर कुछ अच्छा लगे तो बार बार करिए और अगर दर्द हो तो उससे दूर भागिए दूसरा रास्ता थोड़ा मुश्किल है, इस पर हम अपनी मर्जी चलाते हैं। जीन्स में हमें विलपॉवर। इच्छाशक्ति भी दी है। इसी ताकत से हम अपनी जानवर वाली आदतों से ऊपर उठ सकते हैं। ये किताब इसी काम के लिए आपकी गाइड है। पहला कदम है अपनी जानवर जैसी आदतों को समझिए जो हमें मुसीबत में डालती है। दूसरा कदम है। इस जानकारी का इस नॉलेज का इस्तेमाल करके अपनी पुरानी आदतों को कंट्रोल में करना सीखिए। इस किताब में लेखक और जे अपनी खुद की कहानियों भी सुनाएंगे। यह कोई बोरिंग किताबी ज्ञान नहीं है बल्कि काम की बातें हैं। जो आपकी ज़िन्दगी को बेहतर बना सकती है। हमें लगता है कि सब कुछ 1 दिन में ठीक हो जाएगा, लेकिन इसका कोई शॉर्टकट नहीं है जैसे रेसिंग कार का वजन कम करने के लिए इंजीनियर हजारों छोटी छोटी जगहों से। थोड़ा थोड़ा वजन घटाते हैं। वैसे ही हमें भी अपनी ज़िन्दगी में छोटे छोटे बदलाव करने होंगे। यह मेन जीन्स वाला तरीका रातो रात सारी परेशानियां खत्म नहीं करेगा। यह तो एक चश्मे की तरह है जिससे दुनिया साफ दिखाई देने लगती है। मुसीबतें तो वही रहेंगी पर अब आप? उन्हें बेहतर तरीके से समझ
पाएंगे। एक एग्ज़ैम्पल देखते हैं तेरी की एक दोस्त है करेन। वो माँ बनना चाहती थी लेकिन उससे पहले थोड़ा वजन घटाना चाहती थी। तेरी ने उसे मना कर दिया क्यों? क्योंकि हमारा शरीर आसपास के एनवायरनमेंट को बहुत जल्दी समझ जाता है। पुराने जमाने में खाना बहुत कम मिलता था। अगर वजन कम होता था तो शरीर को लगता था कि बाहर अकाल पड़ा है और बच्चा पैदा करना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए जब कोई महिला वजन घटाती है। तो उसके माँ बनने की संभावना यानी फर्टिलिटी कम हो जाती है तो सलाह यही है कि अगर माँ बनना है तो वजन घटाना बंद कर दे। एक और छोटी प्रोग्रेस जे के पैसे बचाने के तरीके से सीखी जा सकती है के बैंक खाते में अगर पैसे होते। तो वो उन्हें खर्च कर देता था पर जे की कमी नहीं है बल्कि हम सब इंसानों की पुरानी आदत है। पुराने जमाने में पैसा सिर्फ खाना होता था, खाना जल्दी खराब हो जाता था इसलिए उसे बचाने का सबसे अच्छा तरीका था कि उसे खा लीजिए। इसलिए आज भी हमारा मन फालतू खर्च करने को करता है। जे ने इसका एक सलूशन निकाला। उन्होंने अपनी कंपनी से कहा कि उनकी तनख्वाह उनकी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा पहले ही अलग जमा कर दिया जाए। अब उन्हें वो पैसे सामने दिखते ही नहीं। तो वो उन्हें खर्च भी नहीं कर पाते। उन्होंने अपने अंदर के खर्चीले राक्षस यानी मॉन्स्टर से पैसे
छुपा दिए। मीन जीस का असली मकसद हमें यह समझाना है ये हम इंसान ना फिर ऐसे क्यों? है। इसके लिए हमने दुनिया भर के अलग अलग लोगों के कल्चर्स को उनके रहन सहन को करीब से देखा है। हमने सिर्फ इंसानों को ही नहीं बल्कि अपने करीबी रिश्तेदार चिंपैंजीज़, चूहों और यहाँ तक कि छोटी मक्खियों यानी फ्रूट फ्लैश की आदतों को भी समझा है। लेकिन इस पूरी किताब की सबसे जरूरी चीज़ फाउंडेशन है इंसानों के बदलने की पुरानी कहानी यानी एवोल्यूशनरी बायोलोजी। करीब 150 साल पहले डार्विन नाम के वैज्ञानिक ने बताया था कि इंसान धीरे धीरे बदला। है। अब यह बात पूरी तरह साफ हो गई है कि हमारा दिमाग भी उसी रिवोल्यूशन उसी बदलाव का रिसाल्ट है, जैसे हमारी आँखें, हाथ, पैर और किडनी नेचर ने बनाए हैं, वैसे ही हमारा दिमाग भी नेचर की ही देन है। तो क्या हमारे मन और। सोचने के तरीके को भी। उसी नेशर ने ढाला। है। हमारा मानना है कि हाँ ऐसा ही है। बहुत से लोग इस बात का मजाक उड़ाते हैं या इस पर गुस्सा करते हैं पर हजारों रिसर्च से अब यह बात साफ हो गई है कि हमारे जीन्स ही हमारे ज़िन्दगी में सबसे बड़ा रोल निभाते हैं। क्या सब कुछ जीन्स ही तय करते हैं?
बिलकुल नहीं। इन्वॉल्वमेंट भी बहुत जरूरी है। जैसे अगर किसी बच्चे के साथ बचपन में बुरा बरता हो, अब्यूज हो तो उसका असर उस पर ज़िन्दगी भर रहता है, चाहे उसके जीन्स कैसे भी हो। इसी तरह अगर किसी को जीन्स की वजह से दिल की बिमारी का खतरा है तो वह अपनी अच्छी आदतों से अपनी जान बचा सकता है। कॉलेज में पढ़ाते हैं इस साल भर हजारों ऐसे। बोरिंग रिपोर्ट पढ़ते हैं, जिन्हें समझना आम आदमी के लिए बहुत मुश्किल है। वैज्ञानिक की उन मीटिंग्स में जाते हैं जहाँ बहुत भारी शब्दों का इस्तेमाल होता है। लेकिन पिछले 40 सालों में वैज्ञानिक ने इंसान के बारे में जो कुछ भी नया सीखा है, उससे आपकी जिंदगी बहुत बेहतर हो सकती है। जी किसी दोस्त के हाँ बढ़िया, दावत पर जाने से पहले पुराने और सूखे बेगल क्यों खा लेते हैं और वो हवाई जहाज में मिलने वाले मीठे के परजान बूझकर मेयोनीज़ क्यों लगा देते हैं ताकि उसे खा ना सकें? तेरी अपने कंप्यूटर की इंटरनेट वाली तार यानी केबल फेडेक्स यानी करियर के जरिए वापस खुद को ही क्यों भेज देते हैं ताकि वो रात भर इंटरनेट न चला सके। ये सारी अजीब हरकतें हम इसलिए करते हैं क्योंकि हमें पता चल गया है कि हम इंसान कब और क्यों कमजोर पड़ते हैं। इंसान की नेचर शुरू से ही थोड़ी टेढ़ी है। इसे डांट फटकार कर नहीं बल्कि प्यार से बहला फुसलाकर कंट्रोल
में करना पड़ता है। खुद पर काबू में रख पाना कोई कैरेक्टर की कमी नहीं है बल्कि यह एक कभी ना खत्म होने वाली लड़ाई है। साल 2004 में एक फ़िल्म आई थी जिसका नाम था सुपर स्टाइज मी। इसमें मॉर्गन नाम का एक आदमी पूरे एक महीने तक सिर्फ मैकडोनाल्ड्स का खाना खाता है। उसने खुद के लिए कुछ अजीब नियम बनाए थे जैसे जब भी उसे। बड़े पैचानी सुपर साइज के लिए पूछा जाए तो उसे हाँ ही कहना है और उसे अपनी प्लेट का सारा खाना खत्म करना ही है। रिसाल्ट क्या निकला? मॉर्गन खुद सुपर साइज का हो गया। सिर्फ 30 दिनों में उसका वजन चार पांच किलो बढ़ गया। आखिर इतने सारे लोग मोटे क्यों हो रहे हैं?
उस फ़िल्म में बताया गया है कि असली दिक्कत खाने की मात्रा यानी पोषण साइज है। रेस्टोरेंट वाले ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में हमें बड़ा पैक बेचते हैं और हम उसे खाकर मोटे हो जाते हैं। साल 2003 में अमेरिका के सबसे बड़े डॉक्टर सर्जन जनरल ने भी यही कहा था कि मोटापा एक बिमारी की तरह फैल रहा है और इसे रोका जा सकता है। उनका सोचने का तरीका यह था कि अगर हम बच्चों को हेल्ती पोरशन में सही मात्रा में खाना सिखाएं। तो इस बिमारी को रोका जा सकता है। पर क्या यह मेथड यह तरीका काम आया?
क्या सीखने सीखने से लोगों ने वजन घटाया? बिल्कुल नहीं। लोग पहले से भी ज्यादा मोटे हो गए हैं। चीन और फ्रांस जैसे देशों में भी अब मोटापा बहुत तेजी से बढ़ रहा है। अगर हम डॉक्टर के हिसाब से देखें तो मोटापा एक बिमारी है, लेकिन अगर हम पुराने समय से चले आ रहे एवोल्यूशन के हिसाब से देखें तो यह हमारे शरीर का खुद को बचाने का एक तरीका है। हमारे सिस्टर्स यानी पुराने दादा परदादाओं के समय में। आज की तरह हर जगह खाना नहीं मिलता था। तब असली समस्या यह थी कि खाना बहुत कम था। उस समय खाना रखने के लिए न तो बर्तन थे और ना ही फ्रिज। तो जब भी खाना ज्यादा मिलता था तो उसे बचाने का कोई रास्ता नहीं था। ऐसे में हमारे शरीर ने एक। बहुत ही बढ़िया तरीका ढूंढ निकाला। कुछ ज्यादा खाने को शरीर की चर्बी बॉडी फैट के रूप में जमा कर लेना तो असल में हम इंसान बचत करने में बहुत माहिर है। जैसे ही हमें फालतू खाना मिलता है, हमारा शरीर उसे तुरंत जमा कर लेता है। इसके लिए हमें कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, बल्कि खाते समय हमें बहुत मज़ा आता है। यह हमारी बनावट हमारी बायोलोजी का हिस्सा है। यही वजह है कि जीस भी देश में खाना आसानी से और ज्यादा मिलता है। वहाँ लोग मोटे होने लगते हैं। तो क्या अब लोग कभी पतले नहीं हो पाएंगे? वजन कम करने के सिर्फ दो ही
रास्ते हैं या तो गरीब बन जाइए ताकि खाना न मिले या फिर इंसान के नेचर को बदल दीजिए। अभी तक कोई भी देश मोटापा कम करने में कामयाब नहीं हुआ है। दवाइयां बनाने वाली कंपनियां ऐसी दवाइयां ढूंढ रही है जो हमारे दिमाग को धोखा दे सके और उसे लगे कि बस बहुत खा लिया। लेकिन हमारा शरीर इतना मजबूत है कि वो इन सब चीजों को मात दे देता है पर एक अच्छी खबर भी है। भले ही पूरा समाज अभी पतला नहीं हो पाया है, लेकिन बहुत से लोगों ने अपनी कोशिश और सावधानी से वजन घटाया है। अब एक मजेदार बात सुनिए। मोटापा और पैसे का मामला एक ही सिक्के के दो पहलू है जैसे लोग ज्यादा खाते हैं। वैसे ही लोग पैसे भी ज्यादा खर्च करते हैं। हमारा शरीर तो सुपर साइज हो रहा है लेकिन बैंक खाता एक दम दुबला होता जा रहा है। पर यहाँ एक बहुत बड़ा फर्क है। खाने के मामले में तो पूरी दुनिया के लोग एक जैसे हैं लेकिन पैसे बचाने के समय में। अलग अलग देशों के लोग अलग हैं जैसे चीनी या जापान में लोग अपनी कमाई का आधा हिस्सा बचा लेते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि पैसा एक नई चीज़ है। एक नया इन्वेंशन है। हमारे जीन्स को पैसे बचाने की आदत नहीं है। खेती और पैसा तो सिर्फ कुछ 1000 साल पहले ही आए हैं। इसलिए हमारे अंदर पैसे बचाने वाले जीन्स नहीं है, लेकिन यही सबसे अच्छी खबर है क्योंकि पैसा बचाना
हमारी नेचुरल आदत नहीं है इसलिए इसे बदलना बहुत आसान है। खाना कम करना मुश्किल है क्योंकि वो हमारे खून में है पर पैसा बचाना हम। आसानी से सीख सकते हैं। पैसे बचाने के लिए तीन जरूरी बातें हैं। पहले बचाइए सेव फर्स्ट, फिर बार बार बचाइए सेव और अपनी बचत को खुद से ही छुपा कर रखिए। हाइड सेविंग्स फ्रम यूरसेल्फ़ चलिए। सेविंग यानी बचत सीखने के लिए हम जंगल चलते हैं। वहाँ की गिलहरियों को देखिए। जब सर्दियां आने वाली होती हैं तो वो बहुत मेहनत करती हैं। सितंबर के महीने में एक गिलहरी, हजारों दाने और अखरोट यहाँ वहाँ जमीन में छुपा देती है। जब कड़ाके की ठंड आती है और थपेड़ों पर कुछ नहीं मिलता तब उनकी यह मेहनत कम आती है। वो अपनी छुपाई हुई चीजों को ढूंढ लेती हैं और मज़े से खाती हैं। यही वजह है कि वो जिंदा बच जाती हैं। सिर्फ गिलहरी ही नहीं बहुत से बर्ड्स भी ऐसा ही करते हैं। अगर सेविंग करने वालों को कोई इनाम होता तो ये जानवर जरूर जीतते। पर हम इंसान इनसे पीछे क्यों रह गए? आपने छींटी और टिड्डी की कहानी सुनी होगी। छींटी गर्मियों में खाना जमा करती है और सर्दियों में बस जाती है। टेढ़ा सिर्फ खेलता है और मर जाता है। नशेर उन्हीं को बचाती है जो शेविंग करना जानते हैं, तो फिर हमारे अंदर यह आदत क्यों नहीं आई?
इसे समझने के लिए हमें उन लोगों को देखना होगा जो हमारे पूर्वजों की तरह रहते थे, जैसे साउथ अफ्रीका के। लोग ये लोग जंगलों में रहते थे जहाँ पानी और खाने की बहुत कमी थी, वहाँ जब कोई शिकारी किसी बड़े जानवर जैसे जिराफ़ को मारता था तो उसके पास बहुत सारा मांस होता था, लेकिन उनके पास कोई बैंक नहीं था अगर वो मांस बचा कर रखते। तो या तो वो खराब हो जाता या पड़ोसी आकर खा जाते। यही समय पता चलता है कि हम इंसान पैसे क्यों नहीं बचा पाते। उस जमाने में मुश्किल समय की तैयारी का मतलब बैंक में पैसा रखना नहीं बल्कि खूब खाना था। एलिफेंट शील नाम के जानवर को देखिए वो। मीटिंग के समय से पहले प्रजनन से पहले खूब खाकर अपने शरीर पर हजारों किलो चर भी जमा कर लेते हैं। फिर वो तीन महीने तक बिना कुछ खाये सिर्फ अपने शरीर की बचत अपने इस बॉडी फैट के दम पर जिंदा रहते हैं। इंसान भी सीतराम बचत करते। हैं। अपने पेट या जांघों को देखिए आपको वहाँ जो चर्बी जो फैट दिख रही है वो असल में आपका बचत खाता है, सेविंग्स अकाउंट है जिसका बैलेंस लगातार बढ़ रहा है। एक फेमस किताब है दी मिलेनियर नेक्स्ट डोर। इसमें बताया गया है कि अमीर लोग इसलिए अमीर नहीं है क्योंकि वो बहुत ज्यादा कमाते है, बल्कि इसलिए है क्योंकि वो खर्च कम करते है। असली अमीर लोग पुरानी कार्ड चलाते है और महंगी घड़ियों के बजाय
सस्ती घड़ी पहनते है। आखिर हमें पैसे बचाने के लिए इतनी मेहनत क्यों करनी पड़ती है जब कि बाकी काम हम बड़ी आसानी से कर लेते हैं? इसका जवाब यह है कि जो काम हमारे पूर्व हमारे को जिंदा रखने के लिए बहुत जरूरी थे, उन्हें सीखने की जरूरत नहीं पड़ती, वह हमें अपने आप आते हैं। हम उन पुरानी मुश्किलों को चुटकी में हल कर लेते हैं, लेकिन जब बात नई चीजों की आती है तो हमारे पसीने छूट जाते हैं। एक एग्ज़ैम्पल से देखिए कि छोटे बच्चे खतरों को कैसे देखते हैं अगर आप एक छोटे बच्चों के पालने में एक भरी हुई बंदूक रखने तो बच्चा उसे खिलौना समझकर उसके साथ खेलने लगेगा। हंसेगा और शायद उसके मुँह में भी डाल ले, लेकिन अगर आप उसे पालने में एक प्लास्टिक का सांप रख दे तो बच्चा डर के मारे दुबक जाएगा। चाहे कोई बच्चा अमेरिका का हो या जापान का। सांप को देखते ही उसका दिल तेज धड़कने लगता है और हाथ पैर ठंडे पड़ जाते हैं। हम सांपों से इतना क्यों डटते हैं और बंदूकों से क्यों नहीं? जबकि सच तो ये है कि बंदूकों से हर साल हजारों लोग मरते हैं और सांपों से बहुत ही कम। हमें डरना तो बंदूक से चाहिए, पर हम डरते सांप से हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे जीन्स हमें हमारे पुरखों से मिली है। जब हमारे पुरखों जंगलों में रहते थे तब सांप उनके सबसे बड़े दुश्मन
थे। उस समय बंदूकें भी नहीं थी इसलिए हमारा दिमाग सांप को देखते ही। खतरा चिल्लाने लगता है, लेकिन बंदूक को पहचान ही नहीं पाता। यही बात चिंपनजी और बंदरों के साथ भी है। जो बंदर पूरी जिंदगी चिड़ियाघर में रहे हैं जू में और जिन्होंने कभी असली सांप नहीं देखा वो भी पहली बार सांप को देखते ही बुरी तरह डट जाते हैं। अब ज़रा सोचिए आज से 10,000 साल पहले आपके पास बैठे हमारे दादा परदादा कैसी बातें करते होंगे? पति कहते हैं अजी सुनती हो। मैं सोच रहा हूँ कि अपनी 25% सेविंग्स किसी जापानी कंपनी के शेयर में लगा दूँ। पत्नी कहती है। क्या पागलपन है? हम हजारों सालों से जानते हैं कि पैसा उन कंपनी में लगाना चाहिए जो नई टेक्नोलॉजी बनाती है। सुना है आग बनाने वाली कंपनी के शेयर आजकल बहुत ऊपर जा रहे हैं। हँसी आती है ना क्योंकि उस जमाने में पैसा या बैंक जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं। जब हमारे पुरखों ने कभी पैसे के बारे में सोचा ही नहीं तो हमारे अंदर पैसे बचाने वाली अक्ल ये इंस्टिंक्ट आएगी कहाँ से? हमारे दिमाग की बनावट आज के पैसे वाले फैसलों के लिए बनी ही नहीं है। आज हमारे पास मशीनें हैं, रिमोट फ़ोन, फ्रिज और कार। हम बस सोफे पर या ऑफिस की कुर्सी पर बैठे रहते है। हमारा शरीर हिलता नहीं है, पर खाना लगातार अंदर जा रहा है। पुराने समय में वही लोग जिंदा बच पाए जिनके शरीर में चर्बी जमा
करने की ताकत थी, वही आपके पुरखे बने एंसेस्टर्स इसलिए हम आज भी हमेशा भूखे महसूस करते हैं। ये भूख पहले हमें बचाने के लिए थी पर अब ये हमारे लिए एक प्रॉब्लम बन गई है। आज हर चार में से एक आदमी मोटापे का शिकार है। मोटापा कम करना सिर्फ वजन की बात नहीं है। ये दिल की बिमारी और डायबिटीज़ से बचने के लिए भी जरूरी है। लेकिन वजन कम करना इतना मुश्किल क्यों है? इसका एक बड़ा कारण है भूख का दर्द। बायोस्फीयर टू नाम के एक एक्स्पेरमेन्ट में आठ लोग 2 साल तक एक बंद जगह में रहे। वह खाना कम था। इसलिए उनका वजन तो कम हो गया और वो हेल्ती भी हुए पर वो लोग बहुत चिड़चिड़े हो गए। वो खाने के छोटे छोटे टुकड़ों के लिए भी आपस में लड़ने लगे। जैसे ही वो बाहर आए उन सबका वजन फिर से पहले जैसा हो गया। वैज्ञानिक ने पाया कि हमारे शरीर का एक फिक्स। लेवल होता है। एक सेट पॉइंट यह एक मशीन एक थर्मोस्टेट की तरह काम करता है। जैसे ही हम वजन घटाते हैं हमारा शरीर घबरा जाता है। उसे लगता है कि कोई मुसीबत आ गई है। रिसाल्ट ये होता है कि शरीर अपना काम करने की। रफ्तार अपनी मेटाबॉलिज्म बहुत धीमी कर देता है ताकि वो एक एक ग्राम चर्बी को बचा सके। साथ ही शरीर कुछ ऐसे चेमिकल्स छोड़ता है जिससे हमें मीठा और चिकना खाना खाने की जबरदस्त इच्छा यानी क्रेविंग होने लगती है। बहुत ज्यादा डाइटिंग करना कभी कभी
नुकसानदेह भी हो सकता है। जब शरीर को लगता है कि खाना नहीं मिल रहा तो वो अपने कुछ जरूरी काम बंद कर देता है जैसे बीमारियों से लड़ने की ताकत कम हो जाना। एक्सर्साइज़ हमारे लिए अच्छी है। पर पुराने समय से चले आ रही एवोल्यूशन ने हमें आलसी बनाया है। हमारे जीन्स आज भी यही सोचते हैं कि कभी भी आकाल कभी भी सूखा पड़ सकता है। इसलिए जब भी मौका मिलता है वो हमें सुस्त यानी एथर्जिक बना देते हैं ताकि हम अपनी एनर्जी बचा सके। तो क्या हम कभी सोफे से उठ पाएंगे? चलिए उन चूहों की बात करते हैं जिन्हें दौड़ना पसंद नहीं था। वैसे तो वो बिना वजह नहीं दौड़ते पर अगर उन्हें भूख लगे तो वो दिन भर दौड़ते रहते हैं क्यों? क्योंकि वो खाना ढूंढ रहे होते हैं? एक स्टडी में भूखे चूहे उन चूहों से दो गुना ज्यादा दौड़ें जिन्हें भरपेट खाना मिला था। एक वैज्ञानिक ने तो एक मजेदार स्कीम निकाली। उसने चूहों के लिए ऐसा नियम बनाया की उन्हें खाना तभी मिलेगा जब वो पहिये पर दौड़ेंगे। चूहे जितना ज्यादा दौड़ें, उन्हें उतना ही खाना मिला। रिसाल्ट ये हुआ कि कुछ चूहे दिन में 1010 घंटे दौड़ने लगे और उनका वजन बहुत कम हो गया। शायद हमें भी ऐसा टीवी या फ्रिज बनाना चाहिए जो तभी चले जब हम एक्सर्साइज़ वाली साइकिल चलाएं। अपने सुस्ती दूर करने के लिए हम या तो जीन से लड़ सकते हैं या उन्हें अपनी अकल से हरा सकते हैं।
अगर हम एक्सर्साइज़ को किसी जरूरी गोल से जोड़ दें तो मेहनत कम लगेंगी। डोकोमाइन एक ऐसा केमिकल है जो हमारे दिमाग में तब निकलता है जब हमें। मज़ा आता है जब हमें प्लेज़र आता है, चाहे वो सिक्स हो, जितना हो या अच्छा खाना, पुराने समय में यह केमिकल इसलिए था ताकि हम वो काम बार बार करें जिससे हम जिंदा रह सके। इसे नया इलाका ढूंढ़ना या खाना तलाशना हमारे ये सिस्टर्स बहुत रिस्क लेते थे। और उनके उससे निडर स्वभाव की वजह से हम आज यहाँ है। लेकिन आज ड्रग्स और नशीली चीजें इस सिस्टम को हाईजैक कर लेती हैं। वो बिना कोई मेहनत किए हमारे दिमाग को नकली प्रेशर देती हैं। यही बात फालतू रिस्क लेने के बारे में भी सच है। तो क्या पैसा खुशियां खरीद सकता है? रिसर्च कहती है, नहीं। एक बार जब हमारी जरूरतें पूरी हो जाती हैं तो ज्यादा पैसा हमें ज्यादा खुश नहीं बनाता। फिर भी हमें हमेशा और ज्यादा चाहिए होता है। जीन्स के हिसाब से। होने से ज्यादा जरूरी पाना है। हमारा दिमाग ऐसे मना है कि जैसे ही हमें कुछ मिलता है, हमें थोड़ी देर के लिए खुशी होती है पर फिर वो गायब हो जाती है। हमारे जीन्स नहीं चाहते कि हम हमेशा खुश और आराम से रहे क्योंकि अगर हम खुश होकर बैठ गए। तो हम आगे बढ़ने की कोशिश छोड़ देंगे। इसलिए वो हमें बार बार मज़े का लालच यानी रिवॉर्ड देकर काम
करवातें रहते हैं। तब एक बड़ा सवाल उठता है अगर एवोल्यूशन हमें बेहतर बनाना चाहती थी तो उसने हमें? नशेड़ी को बनाया। इसे समझने के लिए हमें मज़े और दर्द के पीछे की वजह को समझना होगा। आखिर हमारे शरीर में मज़ा यानी प्लेज़र में महसूस करने की ताकत क्यों है? चलिए इसकी शुरुआत एक कॉफी से करते हैं कैफीन इतना अच्छा क्यों लगता है? फेमस कॉमेडियन डेविड लेटरमैन कहते हैं, अगर कॉफी ना होती तो मेरी कोई पहचान ही नहीं होती। कैफीन दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नशा है। पानी के बाद लोग सबसे ज्यादा चाय पीते हैं और उसके बाद कॉफी। अमेरिका में मिलने वाली 19% कोल्ड ड्रिंक्स में कैफीन होता है एवरेज अमेरिकी साल भर में करीब 380 लीटर एसिड ड्रिंक्स पी जाता है। बड़े बड़े लेखेकों और वैज्ञानिक ने माना है कि कॉफी उनके दिमाग को तेज करने के लिए बहुत जरूरी चीज़ है। सैकड़ों सालों से लोग कॉफी की तारीफ कर रहे हैं। इसका असर सिर्फ इंसानों पर ही नहीं जानवरों पर भी होता है। चूहों को जब भूल भुलैया का रास्ता सिखाया जाता है तो कॉफी पीने वाले चूहे से जल्दी सीख जाते हैं और ज़्यादा समय तक याद रखते हैं। साइकिल चलाने वाले खिलाड़ियों ने देखा कि कॉफ़ी पीने के बाद वो 20% ज़्यादा समय तक साइकिल चला सकते हैं। यहाँ तक कि इंसान इस पंप भी कैफीन
मिलने पर ज़्यादा तेजी से तैरने लगते हैं जिससे बच्चे पैदा होने की प्रोबेबिलिटी बढ़ जाती है। सबसे अच्छी बात यह है कि कैफीन ज्यादातर लोगों के लिए सेफ है। अगर आप इसे बहुत ज्यादा न पिएं तो इससे दिल या फेफड़ों की बिमारी का कोई खतरा नहीं होता। तो कैफीन अपना जादू कैसे चलाता है? जब तक हम जागे रहते हैं, हमारा दिमाग कड़ी मेहनत करता है। हमारे आसपास की हजारों बातें दिमाग तक सेल्स के जरिए पहुंचती हैं। जैसे स्वेटर चुभ रहा है, धूप बहुत तेज है, बॉस चिल्ला रहा है। इटी से यह सारा काम हमारे दिमाग की छोटी सेल्स करती हैं, जिन्हें न्यूरॉन्स कहते हैं। जब ये सेल्स काम करती हैं तो इनमें से कचरा निकलता है। इसे चलती कार से धुआँ निकलता है। इस कचरे को एडेनोसिन कहते हैं। जब ये कचरा दिमाग में जमा हो जाता है तो हमारा शरीर हमें सोने का इशारा देता है ताकि बैटरी चार्ज हो सके। खुद हमें नींद नहीं दिलाता, वो बस पास की सेल्स को शांत हो जाओ का मैसेज भेजता है। कैफीन इसी मैसेज को बीच में ही रोक देता है। कैसे देखिए दिमाग की सेल्स एक दूसरे को मैसेज भेजने के लिए एक लॉक एंड की एक ताले और। चाबी वाले मेथड का इस्तेमाल करती हैं। डेनोसिन एक चाबी की तरह है जो के ताले यानी रिसेप्टर में फिट हो जाता है। जैसे ही ताला खुलता है, हमें नींद आने लगती है, लेकिन जब हम कॉफी पीते हैं तो कैफीन दिमाग में
पहुँच जाता है। कैफीन का शेप एडेनोसिन की चाबी से बहुत मिलती जुलती है। यह नकली चाबी की तरह रिसेप्टर में जाकर बैठ जाता है और असली एडेनोसिन को अपनी जगह नहीं मिलती और वो दिमाग को सोने का मैसेज नहीं दे पाता। नतीजा यह होता है कि हम थके होने के बावजूद भी बहुत। अलर्ट महसूस करते हैं। कैफीन हमारे शरीर के नेचुरल सिग्नल्स को रोककर हमारे दिमाग को धोखा देता है। ज्यादातर ड्रग्स इसी तरह हमारे दिमाग को बेवकूफ बनाते हैं। क्या दिमाग की कुछ छोटी सी सेल्स। चश्मे हमारे मूड या व्यवहार को बदल सकती। हैं। 1950 के समय में एक वैज्ञानिक ने चूहों के दिमाग में कुछ तार लगाए, कुछ इलेक्ट्रोड्स। उन्होंने देखा कि दिमाग के एक खास हिस्से जिसे हाइपोथैलमस कहते हैं वहाँ हल्का सा करंट देने से। चूहे बहुत ज्यादा खुश हो गए। खुश कहना तो बहुत कम होगा। वो पागलपन वाली खुशी महसूस करने लगे। बाद में एक मजेदार रिसर्च हुई। चूहों को एक पहेली सुलझाने को दी गई। जब वो रास्ता ढूंढ लेते तभी उन्हें वो करेंट वाला ही न मिलता। चुहै ने मेहनत से काम करने लगे कि उन्होंने वो रास्ते में ढूंढ लिए जो इंसानों के लिए भी बहुत मुश्किल होते। लेकिन चूहों को वो काम करना पसंद नहीं था। उन्हें तो बस वो दिमाग का मज़ा चाहिए था जब चूहों को खुद वो बटन दबाने का मौका दिया गया जिससे
उन्हें मज़ा मिलता था। तो वो सब कुछ भूल गए। उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया, अपने दोस्तों को भूल गए और बस 1 मिनट में 100 बार वो बटन दबाने लगे। वो भूखें मर गए, पर उन्होंने बटन दबाना नहीं छोड़ा। अगर हमारे पास भी ऐसा बटन हो तो हम क्या करेंगे? सस्ती ये है कि हमारे पास भी ऐसे बटन हैं जैसे ऑर्गिसम जब हमें बहुत अच्छा महसूस होता है तो असल में हमारे दिमाग में कुछ चेमिकल्स निकलते हैं जो हमें चूहों की तरह ही पागल कर देते हैं। इन हिस्से को हम इसे फिर से करो वाली सेंटर कह सकते हैं। डू इट अगेन सेंटर्स ये मज़ा ये ब्लेज़र हमें उस काम की याद दिलाता है जिससे वो मज़ा मिला। ऐसा समझिए कि आपके दिमाग में अलग अलग आकार के स्लॉट्स बने हैं। सेक्स करना एक स्क्वायर पे एक चौकोर टुकड़े की तरह है जो उस खाँचे में फिट हो सकता है। उस स्लॉट में हमें मज़ा आता है और हमारा दिमाग कहता है इसे फिर से करो। जब हम मज़े ले रहे होते हैं, तब हमारे जीन्स पीछे बैठकर हंस रहे होते। हैं। उनका माइंडसेट ये है कि मज़ा लो ताकि बच्चे पैदा हो और हम अगले पीढ़ी तक पहुँच सकें। जीन्स ने हमें जिंदा रखने के लिए कई ऐसे स्लॉट्स बनाए हैं। जब हम मीठा खाते हैं तो कैलोरी ढूंढने वाला स्लॉट भर जाता है और हमें खुशी मिलती है। जब हम किसी से आगे निकलते हैं तो स्टेटस वाला स्लॉट भर जाता है और हम प्राउड महसूस।
करते हैं। जीन्स ने ये मज़े वाला तरीका ये सिस्टम इसलिए बनाया ताकि हम वो काम करें जो उनके लिए जरूरी है। कोई भी व्यक्ति जीन्स को आगे बढ़ाने के लिए बच्चा पैदा नहीं करता, वो तो बस मज़ा ढूंढता है और दर्द से बचता है। पर अनजाने में जीन्स का काम हो जाता है। नशीली चीजें यानी ड्रग्स हमारे इसी नेचुरल सिस्टम को हैचैक कर लेते हैं। हमारे पुरखों को मज़ा पाने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी, लेकिन ड्रग्स के साथ बिना कोई अच्छा काम किए ही। दिमाग के उन मज़े वाले सेंटर को जगाया जा सकता है। जुगनू यानी फायरफ्लाई की कहानी से इसे समझिए। रात के अंधेरे में जुगनू अपनी पूंछ से रौशनी की एक खास कोडिंग भेजते हैं। एक मोर्स कोड ताकि वो अपना साथी ढूंढ सके। लेकिन कुछ छला शिकारी जानवर उसी रौशनी की नकल करते हैं। बेचारा जुगनू प्यार की तलाश में वहाँ पहुंचता है और शिकारी का खाना बन जाता है। हमारे दिमाग के साथ भी ऐसा ही होता है। जब हम कोई अच्छा काम करते हैं तो हमारे दिमाग में। मैसेज भेजने वाले चेमिकल्स निकलते हैं, जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर कहते हैं। ड्रग्स चाहे वो कोकेन हो या कैफीन, इन चेमिकल्स की नकल करते हैं। दिमाग को लगता है कि हमने कोई बहुत बड़ा काम किया है जैसे खाना ढोढ़ना जबकि हम शायद किसी। गंदी जगह बैठकर नशा कर रहे होते हैं।
दिमाग को तो बस उन चेमिकल्स का मज़ा दिखता है। चूहों वाले उस मज़े के पीछे डोपे में नाम का एक केमिकल था। इसे खुशीवाला संदेश या हैपीनेस न्यूरोट्रांसमिटर कह सकते हैं। जब यह निकलता है तो हमें बहुत अच्छा लगता है लेकिन ये खुशी बहुत छोटी होती है क्योंकि दिमाग तुरंत उस डोपेमिन को वापस सूख लेता है, कोकेन डोपेमिन को वापस सूखने वाले रास्ते को ब्लॉक कर देती है। अब दिमाग में डूबा रहता है और इंसान को लगता है कि बस मज़े ही मज़े हैं। डिप्रेशन की दवा यानी ऐंटी डिप्रेशन, ये सेरोटोनिन नाम के दूसरे खुशी वाले केमिकल के साथ भी ऐसा ही करती है, जिससे इंसान खुश रहता। है। इन डॉल्फिन ये हमारे शरीर के नेचुरल पेन किलर्स दवा है। जब हमें बहुत चोट लगती है या हम बहुत दौड़ते हैं तो शरीर इन्हें छोड़ता है। अफीम, यानेओपियम और हीरोइन इसी की नकल करते हैं। पर इनका असर शरीर के नेचुरल सिस्टम से कहीं ज्यादा तेज होता है। सिगरेट या निकोटीन यह हमारे दिमाग में ऐड्रेनिलिन और डोपेमिन को बढ़ा देती है। शुरू में मज़ा आता है पर धीरे धीरे दिमाग को इसकी लत लग जाती है और मज़ा कम होने लगता। है। शराब दी ग्रेट इमपेरसोनटोर है यानी सबका भाव। शराब एक ऐसी चीज़ है जो एक साथ कई चेमिकल्स की नकल करती है। ये हमारे दिमाग को सुस्त कर देती है। ये कोकेन की तरह थोड़ा सा नशा देती है।
ये हीरोइन की तरह दर्द को कम करती है। ये डिप्रेशन की दवा की तरह खुश रखती है। इतने सारे मज़े एकसाथ मिलने की वजह से ही लोग शराब की तरफ खींचे चले जाते हैं। लेकिन जब एक ग्लास से शुरू हुई बात बहुत आगे बढ़ जाती है तो असल मुसीबत शुरू होती है। अमेरिका के स्कूलों में करीब 5,00,000 स्टूडेंट्स अपनी बॉडी बनाने के लिए स्टेरॉएड्स लेते हैं। मान लीजिए कैप्टन अमेरिका नाम का एक लड़का अपनी मसल्स को बढ़ाने के लिए बाहर से टस्टोस्टरॉन के इंजेक्शन लगता है। कैप्टन अमेरिका तगड़ा तो हो जाता है। लेकिन उसके शरीर की मशीन सोचने लगती है कि अरे इतना सारा जुइस बाहर से आ रहा है तो मुझे बनाने की क्या जरूरत?
शरीर एक बहुत ही समझदार मशीन है। वो अपनी तरफ से यह जुइस बनाना बंद कर देता है। रिसाल्ट ये होता है कि कैप्टन अमेरिका बाहर से तो चौड़ा हो जाता है। पर उसके शरीर के असली अंग जो यह जुइस बनाते थे, वह सुकड़ कर गायब हो जाते हैं। हमारे शरीर को चेंज पसंद नहीं है। हमारा शरीर एक तय सीमा एक फिक्स्ड रेंज के अंदर ही काम करना चाहता है। जैसे कार चाहे ठंडी हो या गर्म हो, जल जाती है। पर हमारा शरीर अगर दो तीन डिग्री भी ज्यादा गर्म या ठंडा हो जाए तो हम मर सकते हैं। इसलिए हमारा शरीर किसी भी बाहरी चेंज के खिलाफ़ लड़ता है। अगर आप डाइट शुरू करते हैं तो शरीर अपना काम करने की मेटाबोलिज्म यानी रफ्तार धीमी कर देता है। ताकि वो आपकी मेहनत को बेकार कर सके। हमें खतरों में मज़ा क्यों आता है?
ज़्यादातर जानवर खतरा डालते हैं जैसे दोबारा सीने लड़ने से पहले बस एक दूसरे को देख कर शोर मचाते हैं, जो छोटा होता है वो डर कर भाग जाता है। वो बिना लड़े ही हार मान लेता है ताकि उसे चोट ना लगे। पर कभी कभी जानवर जानलेवा रिस्क भी लेते है। एक छोटी मकड़ी की कहानी को सुनिए जब एक बड़ी मकड़ी वह होती है तब भी छोटी मकड़ी भागने के बजाय लड़ती है। उसे पता है कि अगर वो अभी पीछे हट गई तो उसे। दोबारा। कभी साथ ही नहीं मिलेगा। वो अपने जान पर खेल जाती है ताकि उसके बच्चे दुनिया में आ सके। जो डर गए उनके जीन्स खत्म हो गए, जो लड़के और जीत गए, हम उन्हीं के बच्चे हैं, इंसान भी ऐसे ही हैं। हजारों साल पहले जो लोग अपनी गुफाओं में डर कर बैठे रहे। वो कहीं नहीं पहुँच पाए, लेकिन इन लोगों ने खतरा उठाया और नई जगहों की खोज की। उन्होंने पूरी दुनिया को बसा दिया। आज भी खुशखबीलों में जो आदमी सबसे ज्यादा लड़ाई करता है और खतरा मोल लेता है, उससे उतनी ही ज्यादा पत्नियां और बच्चे मिलते हैं। यानी खतरा उठाना हमारे। के लिए फायदेमंद का सौदा था। इसलिए आज भी हम जब कोई रिस्क लेते हैं तो हमारा दिमाग हमें मज़े का नाम यानी रिवॉर्ड देता है। हमारे जीन्स हमें रिस्क लेने के लिए उकसाते हैं, क्योंकि उन्हें खतरे के खेल में मज़ा आता है। जब हम तेज मोटरसाइकिल चलाते हैं
या ऊंचे झूले पर बैठते हैं तो हमारे दिमाग में एक खास केमिकल निकलता है जिसे अड्डों पे कहते हैं। ये हमें बहुत ही बढ़िया महसूस कराता है। हमारे जीन्स हमें जरूरत से ज्यादा भरोसा भी दिलाते। हैं। हमें लगता है कि हम दूसरों से ज्यादा जीएंगे। हमें बीमारियां कम होंगी और हम बाजार में बढ़िया शेयर चुनेंगे। एक बार जब आदमियों से पूछा गया तो 19 4% ने कहा कि वो खेलकूद में बाकी सबसे बेहतर है। मैथ के हिसाब से सब लोग एवरेज से ओपेन नहीं हो सकते, लेकिन हमारे जीन्स हमें ऐसा ही यकीन दिलाते हैं। ताकि हम और रिस्क ले सके। हमारे पूर्वजों के लिए समाज में गलती करना जानलेवा हो सकता था। अगर आप अपने कबीले के किसी गलत आदमी को गुस्सा दिला देते तो शायद आपको मार दिया जाता। इसलिए हमारे जीन्स हमें बहुत संभल कर रहना सिखाते हैं, लेकिन आज की दुनिया अलग है। अगर आप किसी नौकरी में फैल भी हो जाते हैं तो आपकी जान नहीं जाएगी। आप दूसरी नौकरी ढूंढ लेंगे। अपनी नौकरी और काम के मामले में अक्सर हम अपने पुराने डर। की वजह से बहुत पीछे रह जाते हैं। हमारे जीन्स ने हमें ऐसा क्यों बनाया कि हम कभी पूरी तरह खुश होकर नहीं बैठते और हमेशा कुछ पाने की तलाश में रहते हैं? डॉग रेसिंग करवाने वाले लोग एक छलासी करते हैं, वो कुत्तों के आगे एक नकली खरगोश दौड़ाते।
हैं। कुत्तों को लगता है कि वो उसे पकड़कर आ जाएंगे, पर वो खरगोश हमेशा उनसे थोड़ा आगे ही रहता है। हमारी खुशियां भी उस नकली खरगोश जैसे ही है। हमारे जीन्स खुशियों को एक और जारे का टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं ताकि हम वो काम करें जिससे उनका फायदा हो। हमें लगता है कि अगर बस थोड़ा सा और मिल जाए तो हम हमेशा के लिए खुश हो जाएंगे। हमें लगता है कि अगली तरक्की, अगला प्रमोशन ये लॉटरी के बाद सारी दिक्कतें खत्म हो जाएंगी। पर हमारे सपने हमेशा एक कदम आगे रहते हैं ताकि हम कभी रुके नहीं और मेहनत करते रहे। इस सिस्टम की वजह से हम अपनी अच्छी किस्मत के भी बहुत जल्दी आदी हो जाते हैं। कितना भी मिल जाए कम ही है। हम एक्स्ट्रा पैसे पाकर बहुत मज़ा आता है, पर थोड़े समय बाद वो मज़ा खत्म हो जाता है। यह एक। ऐसी मशीन की तरह है जीस पर हम भागते तो बहुत हैं पर अपनी जगह से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ते। ऐसा क्यों है? क्योंकि वो एक कॉम्पिटिशन है। लिहाज़िद उसकी नहीं होती जिसके पास एनफ हो, जिसके पास काफी हो। ये तुसकी होती है जिसके पास दूसरे से ज्यादा हो। हमारे पूर्वज वो लोग थे जिन्होंने सबसे ज्यादा बच्चे पैदा किए और सबसे ज्यादा खाना जमा किया। रिसर्च में ये भी देखा गया कि अगर किसी को जमीन पर गिरा हुआ 10 पैसे का सिक्का भी मिल गया।
तो वो पूरे दिन के लिए खुद को बहुत खुश महसूस करने लगता है। एक पुरानी कहानी है। एक किसान अपने छोटे से घर और शोर मचाते परिवार से बहुत दुखी था। वो एक फिलॉसफर के पास गया। उस आदमी ने कहा। अपने बकरे भी घर के अंदर ले आओ। किसान परेशान हो गया पर उसने ऐसा ही किया। अगले हफ्ते उस आदमी ने कहा अब अपनी गाय भी अंदर ले आओ। घर में बहुत गंदगी और भीड़ हो गई। आखिर में उस आदमी ने कहा अब सारे जानवरों को बाहर निकाल दो। किसान वापस आया और बोला अरे वाह। अब हमारा घर कितना बड़ा और खुला खुला लग रहा है। घर तो उतना ही बड़ा था पर किसान का सोचने का तरीका बदल गया। अगर आप किसी को ₹800 का गिफ्ट देना चाहते हैं तो उसे एक बार में देने के बजाय 600 का एक दीजिए और बाकी के 200 के। छोटेछोटे सरप्राइज़ बाद में दीजिए। बारबार मिलने वाली खुशी ज्यादा बड़ी होती है। अगर आपको कोई बड़ा काम करना है जैसे पूरी किताब लिखना तो उसे छोटेछोटे हिस्सों में बांट दीजिए। हर छोटा हिस्सा पूरे होने पर आपको प्रोग्रेस का अहसास होगा। खाली बैठकर ये आलस करके लोग खुश नहीं होते। असली खुशी तब मिलती है जब हम किसी काम में पूरी तरह हो जाते हैं और अपनी काबिलियत का इस्तेमाल करते। हैं। सारे जानवर बच्चा पैदा करने का खेल खेलते हैं। एक फ़िल्म है ईडी टी वि। इसमें हीरो अपनी गर्लफ्रेंड को धोखा देते हुए पकड़ा जाता है।
जब उससे पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया तो वो कहता है मैं लड़का हूँ, मैं रुकता नहीं, ये औरतों का काम है, हम गैस है और वो ब्रेक। आखिर लड़के और लड़कियों के बारे में हमारी ये सोच कहाँ से आई? हम इंसानों के बारे में एक छोटे से कीड़े बस क्रिकेट से बहुत कुछ सीख सकते हैं। इन कीड़ों में एक अजीब बात है जब ये बच्चा पैदा करने के लिए मिलते हैं तो मेल क्रिकेट अपने वजन का चौथा हिस्सा निकाल देता है। यह फीमेल क्रिकेट के लिए खाने की तरह होता है। अगर इंसानों में ऐसा होता तो एक आदमी को एक बार में करीब 23 किलो का सीमेन निकालना पड़ता। अगर मर्दों के साथ ऐसा होता तो क्या वो आज भी ऐसे ही होते? जवाब ही नहीं। फीमेल क्रिकेट के लिए यह खाना बहुत जरूरी चीज़ है। उसे जितना ज्यादा खाना और इस पर मिलता है वो उतने ही ज्यादा बच्चे पैदा कर पाती है। इसलिए मेल क्रिकेट अपनी पसंद को लेकर बहुत सावधान रहते हैं। वो सिर्फ उन बड़ी फीमेल्स को चुनते हैं जो ज्यादा बच्चे दे सके। यहाँ फीमेल क्रिकेट मेल को रह जाती है। अगर वो बोल। पाती तो शायद मेल क्रिकेट से वफादारी और प्यार के झूठे वादे भी करती। इसके उलट इंसान के मेल मर्द बड़े इजी होते। हैं। वो बिना सोचे समझे सेक्स बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। एक स्टडी में कॉलेज के 75% लड़कों ने एक अजनबी लड़की के साथ जाने के लिए फौरन हाँ कह दिया।
वहीं जब लड़कियों से पूछा गया तो एक भी लड़की राजी नहीं हुई। कल्चर। समाज लोग अक्सर हमें अलग तरह से पालते हैं। पहले औरतों को वोट देने का हक नहीं था, ये उन्हें जज नहीं बनाया जाता था। हमें लगता था कि ये नेचुरल है पर असल में ये समाज की बंदिशों की वजह से था। लेकिन क्या ऐसी कुछ चीजें हैं जो सच में हमारे जीन्स की वजह से अलग हैं? जवाब है हाँ मर्दों का वजन औरतों से ऑन एवरेज 20% ज्यादा होता है और उनकी मसल से ज्यादा मजबूत होती है। मर्द औरतों से करीब पांच इंच ज्यादा लंबे होते। हैं। अगर हम दोतीन साल के छोटे बच्चों को देखें, जिन्हें अभी समाज ने ज्यादा कुछ सिखाया नहीं है तो भी 19% लड़के लड़कियों से ज्यादा दूर तक बॉल फेंक सकते हैं। यहाँ तक कि माँ की कोख में। कुंभ में भी लड़की के हाथ की हड्डियों लड़की के मुकाबले शरीर के हिसाब से बड़ी होती हैं। यानी पैदा होने से पहले ही लड़कों के पास कुछ फायदे होते हैं। एक मजेदार सबूत यह है कि अगर मर्दों के शरीर से मेलहार्मोन टेस्टोस्टोरोन को कम कर दिया जाए तो वो 15 साल से ज्यादा जी सकते हैं। यानी। लंबे समय तक जीने के लिए औरत का शरीर बेहतर तरीके से बना है। मर्दों को क्या चाहिए? अगर आप आज की मिस अमेरिका को देखें तो खूबसूरती की एक एग्ज़ैम्पल है। 20 साल पुराने विनर को देखें। तो वो थोड़ी अलग और शायद पतली
दिखेगी और 1920 की विनर्स तो थोड़ी गोलमटोल भी हो सकती है लेकिन अगर आप ध्यान से इन्वेस्टिगेशन करें तो इन सब में एक ही चीज़ बिल्कुल एक जैसी है। भले ही लड़कियों का शरीर छोटा या बड़ा रहा हो लेकिन उनकी सेब। हमेशा ही एक जैसी रही। 1920 से लेकर 1980 तक की 60 से ज्यादा विनर की कमर उनकी वेस्ट हो। जब उनके हिप्स से नापा गया तो नतीजा हमेशा 0.7 के आसपास ही आया। इसका मतलब क्या है? चाहे कमर? 26 इंच और हिप्स 37 इंच या फिर कमर 22 और हिप्स 31 इंच। मर्दों को शरीर की बनावट यानी आवर ग्लास शेप पसंद आती है, साइज नहीं। हाइबरन से लेकर मर्लिन मुनरो तक सबका यही हिसाब था। वैज्ञानिक ने पाया कि ऐसी बनावट वाली औरतों के माँ बनने की संभावना सबसे ज्यादा होती है इसलिए मर्दों की जींस इस खास बनावट की तरफ खींचे चले जाते हैं। मर्दों को जवान लड़कियां और उनके चेहरे के कुछ खास निशान पसंद आते हैं। जैसे भरे हुए होंठ, बड़ी आँखें और चमकते बाल। ऐसा इसलिए नहीं कि जवानी में कोई जादू है बल्कि इसलिए क्योंकि जवानी का मतलब है बच्चा पैदा करने का सबसे सही समय लिपस्टिक से होंठ जवान लगते हैं और क्रीम से। स्किन साफ दिखती है जिससे हमारी जीन्स बिमारी से मुक्त यानी हेल्थी पड़ते हैं। इसीलिए ईजिप्ट के राजाओं के समय से ही लोग सजने धवरने का काम कर रहे हैं। एक और मजेदार बात।
मर्दों को वो औरतें पसंद आती हैं जो उनमें इंट्रेस्ट दिखाती हैं। जब कोई महिला किसी मर्द को पसंद करती है तो उसकी आँखों की पुतलियां, उसकी प्यूपिल्स बड़ी हो जाती। हैं। एक्ट्रेस में देखा गया है कि जब औरतों ने आँखों में दवा डालकर पुतलियों को बड़ा कर लिया। तो मर्द उनकी तरफ बहुत ज्यादा खिचे चले आते हैं। मुनरो के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तब तक जॉन ऐफ़ कैनेडी के साथ सेक्स नहीं किया जब तक वो राष्ट्रपति नहीं बन गए। बहुत से जानवरों में फीमेल सिर्फ उन्हीं मर्दों को चुनती है। जिनका स्टेटस सबसे ऊंचा हो। इंसानों में स्टेटस बहुत मायने रखता है। ये औरतें पढ़ी लिखी और ऊंचे रुतबे वाले मर्दों से शादी करती हैं। वो अक्सर ज्यादा खुश रहते हैं और उनके ज्यादा बच्चे होते। हैं। औरतों के लिए पैसा और कामयाबी? बहुत बड़ा अट्रैक्शन। है। एक टेस्ट में देखा गया कि औरतों को एक बदसूरत आदमी रोलक्स घड़ी पहनना ज्यादा पसंद आया बजाए एक हैंडसम आदमी के, जिसने मामूली कपड़े पहने थे। जब मर्द और औरत से पूछा गया जो उन्हें साथी में उन्हें मेट में क्या चाहिए? तो दोनों का पहला जवाब था काइंडनेस एंड अंडरस्टैंडिंग, दयालु और समझने वाला और जब औरतों ने स्पम बैंक से स्पम चुना तो उन्होंने भी उन मर्दों को पसंद किया जो ईमानदार और। भरोसेमंद थे।
ऑन ए स्टोर डिपेंडेबल तो भले ही हम अपने जीन्स नहीं बदल सकते पर हम अच्छे इंसान तो बन ही सकते हैं। खुश रहना, सेहत का ध्यान रखना और दूसरों की इज्जत करना। ये वो रास्ते हैं जो किसी को भी सबसे ज्यादा सुंदर बना सकते हैं। लियो टॉलेस्टाइन नाम के एक बड़े लेखक ने कहा था, सारे खुश परिवार एक जैसे होते हैं पर हर दुखी परिवार की अपनी अलग ही कहानी होती है। जीतने भी खुश लोग हैं। उनमें एक बात कॉमन होती है। उनका अपनी इच्छाएं अपने पैशन्स पर सेल्फ कंट्रोल होता है। अब सबके अंदर कुछ ऐसे काम करने की इच्छा होती है जिन्हें करने के बाद हमें पछतावा होता है। अगर हम खाने सिक्स। यह पैसे के लालच जैसी बुरी आदतों से बच सके, तभी हम एक सुखी ज़िन्दगी जी सकते हैं। हम अपनी बुरी आदतों को ना क्यों नहीं कह पाते?
अगर हम खुद के मालिक नहीं हैं तो फिर कौन है? हमारे मुश्किल यह है कि हमारा शरीर एक बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड मशीन है, जिसका बहुत पुराना इतिहास है, पर हमें इसे चलाने का तरीका किसी ने नहीं सिखाया। हम अक्सर गलतियाँ करके ही सीखते हैं, इसलिए हम बहुत बार फेल होते हैं। अब्राहम लिंकन को ही देख लीजिए। प्रेसिडेंट बनने से पहले वो अपनी जिंदगी में कई बार हारे। वो कई चुनाव हारे पर उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी। हम सब की जिंदगी में भी ऐसी ही बड़ी बड़ी लड़ाईयां चलती रहती हैं। दिक्कत सिर्फ ये नहीं है कि हमें चीजें सीखनी। पड़ती हैं। असल मुसीबत तो ये है कि हमें लगता है कि हमारा खुद पर बहुत काबू है और सच में ऐसा नहीं है। वैज्ञानिक ने एक एक्स्पेरमेन्ट किया। उन्होंने लोगों को एक मशीन के अंदर रखा और कहा, आप अपनी मर्जी से लेफ्ट या राइट बटन दबाइए और हमें बताइए कि आपने फैसला कब लिया? रिज़ल्ट बहुत चौंकाने वाला था। लोगों को यह लगा कि उन्होंने फैसला लिया है उससे सात सेकंड पहले ही उनके दिमाग में फैसला कर लिया था। मतलब हमारा दिमाग हमारे सोचने से पहले ही काम कर देता है। हमें बस धोखा दिया जाता है कि फैसला हमने। लिया है। जबकि वो काम हमारा सब कॉन्शस पहले ही कर चुका होता है। अपनी आदतों को बदलने में तीन बड़ी रुकावटें आती हैं। प्लेज़र यानी मज़ा बुरी आदतें
हमें बहुत मज़ा देती हैं क्योंकि वो दिमाग में नाम का एक केमिकल छोड़ती हैं। दूसरा कंट्रोल की कमी क्योंकि वो चीजें अच्छी लगती हैं इसलिए हम खुद को रोक नहीं पाते। तीसरा, जरूरत से ज्यादा भरोसा ऑप्टिमिस्म हमें लगता है कि जब हम चाहे खुद को रोक लेंगे, पर असल में हमारी विलपॉवर हमारी इच्छाशक्ति बहुत कमजोर होती है। खुद पर काबू पाने के चार तरीके हैं फॉर स्ट्रेटेजीज सिगरेट छोड़ना बहुत आसान है। मैंने इसे सैकड़ों बार छोड़ा है। यह मजाक हमें बताता है कि खुद पर कंट्रोल करना कितना मुश्किल है पर हम अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकते हैं। इसके लिए चार तरीके काम आते हैं। तरीका एक पहला तरीका विलपॉवर इच्छाशक्ति यह तरीका काम करता है पर यह सबसे मुश्किल है। अगर आप किसी पुरानी आदत से जूझ रहे हैं तो शायद आप इस तरीके को पहले ही आजमा चूके होंगे और फैल हुए होंगे। दूसरा तरीका है अल्टरनेटिव। यानी बेहतर रास्ता कोई ऐसा रास्ता ढूंढिए जो बुरा ना हो पर मज़ा तो नहीं दे जैसे नशे के बजाय रोलर कोस्टर की सवारी करना शुगर के बजाय बिना कैलोरी वाली मीठी चीजें खाना तीसरा तरीका रास्ता ही बंद कर देना। बुरी आदत का मौका ही मत दीजिए, रात को फ्रिज पर ताला लगा दीजिए, जुआ खेलने जाइए तो क्रेडिट कार्ड घर छोड़ दीजिए। सिगरेट पीने वाले दोस्तों से दूर
रहिए, चौथा तरीका पहले ही मन बदल लेना। फैसला लेने के समय से पहले ही कुछ ऐसा करिए। कि आपकी इच्छा बदल जाए, जैसे किसी दावत में किसी पार्टी में जाने से पहले कुछ हेल्ती खा लीजिए ताकि वहाँ जाकर आप जंक फूड पर न टूट पड़ें। बैंक से पैसे कटकर सीधे सेविंग अकाउंट में चले जाएं ताकि आपके हाथ में फालतू पैसे ना रहें। हमारी प्रोब्लम्स असल में उन आदतों की वजह से है जिन्होंने हमारे पूर्वजों, हमारे एंसेस्टर्स को जिंदा रखने में मदद की थी। हमें खुद का स्टूडेंट बनना होगा और यह समझना होगा कि हम खुद को कैसे आउट स्मार्ट कर सकें। चकमा दे सकते हैं?
हमारे हमारी इच्छाएं बहुत ताकतवर और जिद्दी हैं पर हमारा हारना तय नहीं है। हमारे पुराने और सेल्फिश जीन्स स्वार्थी जीन्स हमें हर दिन प्रभावित करते हैं। पर अगर हम उनके सोचने का तरीका समझ ले, उनका माइंडसेट समझ ले। तो हम अपनी अक्ल और डिसिप्लिन से एक अच्छी और खुशहाल जिंदगी जी सकते हैं। इस बुक में बस इतना ही हम फिर मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में एक नई किताब के साथ मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस विथ रोहित? धन्यवाद।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
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by SyllabuswithRohit · Hindi · Learning
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