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Episode notes

In his follow-up to the classic Influence, Robert Cialdini introduces the concept of Pre-Suasion. The core thesis is that the most effective persuaders don't just rely on what they say during a pitch; they focus on what they do in the moments before the pitch. By strategically directing an audience’s attention, a communicator can "prime" them to be more receptive to the coming message.1. The Privileged MomentCialdini identifies the "privileged moment" as a brief window of time when a person is uniquely susceptible to a specific suggestion. You don't change a person's mind; you change their…

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1946 में कवि ने सलाह दी नंबरों के खेल से दूर रहो। पुराने बड़े लोग अंदाजे से फैसले लेते थे। अब वो पुराने दिन खत्म हो गए। पक्के सबूत अब एविडन्स का दौर है। बिज़नेस और सरकार डेटा मांगते हैं। साइंटिस्ट की आज बहुत ही इज्जत है। मैंने यह सब खुद होते देखा है। मेरी पहली किताब 1984 में आई थी। शुरू में वो बिल्कुल नहीं बिकी। पब्लिशर ने कहा, पैसे बर्बाद हो गए, किसी को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। फिर 5 साल बाद सब बदल गया। किताब बीस्ट सेलर होने लगी। ज़माना बदल गया, लोगों को पक्की जानकारी चाहिए थी एविडन्स चाहिए था एक नया तरीका मशहूर हुआ बिहेवियरल इकोनॉमिक्स इसने लोगों के बेहेवियर को उनके बर्ताव को समझा। इससे हमारे काम की इज्जत बढ़ी अब। हमें बड़ी मीटिंग्स में बुलाया जाता है, अवैज्ञानिक आम लोगों से जुड़ रहे हैं। पहले हम सिर्फ आपस में लिखते थे। आज ब्लॉग और वीडियो का दौर है। यह हमारा गोल्डन एज है। सुनहरा टाइम यह किताब आपकी मदद करेगी। यह आपके रोज़ काम आएगी। बात शुरू करने से पहले क्या करें? यही इस किताब का नया राज़ है। नया सीक्रेट पुराने लोग कहते थे कि तैयारी जरूरी है। चीन के सेनापति ने भी यही कहा था पर उन तरीकों में बहुत समय लगता था। हफ्तों और महीनों की मेहनत चाहिए थी। क्या एक सेकंड में असर हो सकता है इन्फ्लुयेन्स हो सकता है हाँ, यह बिल्कुल पॉसिबल है बात कहने से

ठीक पहले क्या कहें यहाँ सारा खेल उस पल का है उस मूवमेंट का मैं एक जासूस की तरह काम करता था। मैं लोगों से हाँ कहलवाने के राज़ ढूंढ रहा था, जो उनके सीक्रेट्स थे। मैंने 3 साल तक ट्रेनिंग ली। मैंने कार बेचने वालों और हेड्स वालों से सीखा। मैंने नोटबुक लेकर हर अच्छी बात लिखी। मैं देखना चाहता था कि सबसे सफल लोग सबसे सक्सेसफुल लोग क्या करते हैं? जो लोग सबसे टॉप पर थे वो अलग थे। वो अपनी बात कहने से पहले बहुत तैयारी करते थे। वे एक गार्डनर की तरह काम करते थे। पत्थर जैसी मिट्टी में बीज नहीं उगते। वे पहले लोगों का मन तैयार करते थे। इसे ही प्रि सुवेशन कहते हैं। बात कहने से पहले ही सामने वाले को तैयार कर लो। इसका एक आसान तरीका है जो चीज़ हम पहले दिखाते हैं वह सब बदल देती है। मेरे एक दोस्त ने एक तरीका खोजा, उसे $75,000 चाहिए थी फीस के लिए। उसने मजाक में कहा, मैं आपसे $10,00,000 नहीं मांगूंगा, सामने वाला हँसा और तुरंत मान गया। बड़ा नंबर सुनकर छोटा नंबर आसान लगा। रिसर्चर्स ने भी यही देखा अगर रेस्टोरेंट का नाम स्टूडियो 19 सेवेन हो। तो लोग ज्यादा पैसे देते हैं। अगर नाम स्टूडियो 17 हो तो लोग कम पैसे देते हैं। अगर दुकान में जर्मन गाना बजे तो लोग जर्मन शराब खरीदते हैं, यही दिमाग का खेल है। यही साइकोलॉजी है।

यह कोई जादू नहीं है, पर काम जरूर करता है। इससे आपकी बात मानी जाने का चांस बढ़ जाता है। उसकी लाइक्लीहुड बढ़ जाती है। यह घर में बच्चों पर भी काम आता है और बिज़नेस में तो यह बहुत जरूरी है। मेरे साथ एक सेल्समैन काम करता था, उसका नाम जिम था। जी मांग से बचाने वाली मशीनें बेचता था, वह सबसे ज्यादा मशीनें बेचता था। वह लोगों का भरोसा उनका ट्रस्ट जीतना जानता था। भरोसा बात शुरू करने से पहले ही जीतना पड़ता है। जी मैं चालाकी करता था एक ट्रिक। वो जान बूझकर अपनी किताब कार में भूल जाता था। फिर वो घर वालों से कहता मैं अपनी जरूरी किताब भूल गया। क्या मैं चाबी लेकर खुद कार तक जा सकता हूँ?

लोग उसे अपने घर की चाबी दे देते थे। यही उसका असली राज़ था हम चाबी। यानी कीस सिर्फ उसी को देते हैं। जीस पर भरोसा हो, ट्रस्ट हो जिन ने बिना कहे ही उनका भरोसा सीख लिया। हमारा दिमाग कनेक्शन पर काम करता है। एसोसिएशन्स पर अगर आप भरोसे से जुड़ गए तो लोग आपकी बात मानेंगे। जिमने मशीन के बारे में कुछ नया नहीं कहा। उसने बस पहले अपना माहौल अपना वाइफ बना लिया। लोग कहते हैं कि हर काम अलग होता है, बीमा बेचना और कार बेचना अलग नहीं है। सब जगह इंसान ही है। इंसानों को मनाने के छह पक्के नियम हैं सिक्स प्रिंसिपल्स। मैंने अपनी पहली किताब इनफ्लुएंस में यही बताया था। चाहे कुछ भी बेचिए दिमाग के नियम एक ही रहते हैं। मेरी पहली किताब इनफ्लुएंस बचने के लिए थी ताकि कोई आपको अपनी बातों में न फंसा सके। पर अब लोग इन्फ्लुएंस यानी असर डालना सीखना चाहते हैं। वे दूसरों से अपनी बात मनवाना चाहते हैं, पर याद रहे धोखा देना गलत बात है। चीटिंग ठीक नहीं है। गलत तरीके से काम निकलवाना भारी पड़ सकता है। यह इन्फ्लुएंस डालना कोई। कला नहीं है। यह पूरी तरह एक साइंस है। अब कोई भी इसे आसानी से सीख सकता है। इन्फ्लुयेन्स डालने के लिए सही टाइपिंग जरूरी है। बात कब कहनी है?

यह सबसे बड़ा राज़ है। एक बार एक दीन ने मुझे ऑफिस दिया। उसने मुझे पार्किंग और सारी सुविधा दी। मैंने उसे दिल से थैंक यू बोला उसे पल उसे मोमेंट। उसने मुझसे मदद मांगी। मैं चाहकर भी उसे ना नहीं बोल पाया। अगर वो कल पूछता तो मैं मना कर देता, पर उस खास पल में उस प्रिविलेज्ड मोमेंट में मैं फंस गया। यही प्रिसुवेशन का असली जादू है। मैं पहले हाथ देखना जानता था पमिस्ट्री लोग मेरी बातें सुनकर हैरान रह जाते थे। एक बार मैंने एक आदमी को जिद्दी कहा, उसने झट से मेरी बात मान ली। बाद में मैंने उसी को लचीला कहा, उसने फिर से मेरी बात सच मान ली। ऐसा क्यों हुआ?

क्या मैं कोई जादूगर था? नहीं, यह सब अटेंशन का खेल था ध्यान का जब मैंने जिद्दी कहा स्टबर्न उसने वही बातें सोंची। जब लचीला कहा तो उसका ध्यान उसका अटेंशन लचीलेपन पर चला गया। यही इस किताब का सबसे बड़ा सबक है। सामने वाले का अटेंशन जहाँ जाएगा वो वही मानेगा। सारा खेल इस बात का है कि हमारा दिमाग कैसे काम करता है। मान लीजिए मैं किसी पार्टी में आपका अंगूठा पकडूं मैं कहूँ कि आप थोड़े जिद्दी इंसान हो। जैसे ही मैं यह कहूंगा आपका दिमाग जिद्दी होने के सबूत ढूँढने लगेगा। आप वे पुरानी बातें याद करेंगे जब आपने किसी की बात नहीं मानी। आपको ऐसी बातें तुरंत याद आ जाएंगी क्योंकि हर कोई कभी ना कभी जिद्दी होता है। फिर आप मेरी बात मान लेंगे की मैं सही कह रहा हूँ और मान लीजिए मैं इसका उल्टा कहूं। मैं कहूं की आप बहुत फ्लेक्सिबल इंसान हो, बहुत मिलनसार। अब आपका दिमाग उन बातों को ढूंढेगा जब आपने दूसरों की बात मानी। अब आपको अपना मिलनसार होना सच लगने लगेगा। हमारा दिमाग वही ढूंढता है जो उसे ढूंढने को कहा जाए। इसे पॉज़िटिव ट्विस्ट स्ट्रेटेजी कहते हैं। यानी जो बात बोली गई उसे सच साबित करने वाले सबूत ढूंढना। शेरलोक होम्स जैसे जासूस इस जाल में नहीं फंसते, वे उन बातों पर भी ध्यान देते हैं जो नहीं हुई। अगर मैं आपसे पूछूं की क्या आप अपनी सोशल लाइफ से दुखी हैं?

अपनी सामाजिक ज़िन्दगी से तो आप सिर्फ अपने दुख के बारे में सोचेंगे। कनाडा में ऐसा ही एक टेस्ट हुआ जिनसे पूछा गया कि क्या वे दुखी हैं? वे ज्यादा दुखी निकले। वे लोग दूसरों के मुकाबले 375% ज्यादा दुखी महसूस करने लगे। इसलिए सर्वे करने वालों से सावधान रहे। वे आपसे हाँ या ना में। एक ही तरफ का सवाल पूछ सकते हैं। सही सवाल वो है जो दोनों तरफ की बात पूछे जैसे आप इस चीज़ से खुश हो या नाखुश? गलत लोग भी इसी तरीके का इस्तेमाल करते हैं। वे लोगों से पूछते हैं, क्या आप अपनी जिंदगी में दुखी हैं?

जैसे ही कोई हाँ बोलता है, वे उसे अपने जाल में फंसा लेते हैं। दुकानदार और कंपनी वाले आपकी जानकारी चाहते हैं। आपका डेटा पर कोई भी सर्वे में हिस्सा नहीं लेना चाहता। वैज्ञानिक ने इस पर एक टेस्ट किया। जब उन्होंने सीधे मदद मांगी तो सिर्फ। 29% लोग माने पर जब उन्होंने बात शुरू करने से पहले एक सवाल पूछा क्या आप खुद को मददगार हेल्पफुल इंसान मानते हैं? तो लगभग सब ने हाँ कहा। उसे एक पल में उसे एक मोमेंट में वे खुद को मददगार समझ रहे थे। फिर जब मदद मांगी गई। तो 77% लोग तैयार हो गए। यही खेल नए काम करने के नाम पर भी हुआ। एडवेंचर्स के नाम पे एक नई कोल्ड ड्रिंक का टेस्ट करना था। पहले सिर्फ 33% लोगों ने अपना ईमेल दिया। पर जब पहले पूछा गया कि क्या आप नए काम करना पसंद करते हैं? क्या आप अड्वेंचरस हैं?

तो 75.7% लोगों ने अपना ईमेल दे दिया। यह तरीका इतना सरदार है, इतना पावरफुल है कि लोग खतरा भी भूल जाते हैं। अंजान आदमी को ईमान देना खतरनाक हो सकता है पर उस खास पल में उस प्रिविलेज्ड मूवमेंट में लोग सिर्फ अपने साहसी होने पर ध्यान देते हैं। वे सावधानी बरतना भूल जाते हैं क्योंकि हमारा दिमाग एक बार में एक ही चीज़ पर। ध्यान दे सकता है, फोकस कर सकता है। अटेंशन देने की एक कीमत चुकानी पड़ती है एक कॉस्ट जब हम एक चीज़ पर ध्यान देते हैं तो दूसरी चीज़ छूट जाती है। हमारा दिमाग एक बार में एक ही गाना बजा सकता है। मल्टीटास्किंग एक धोखा है। एक हम बस बहुत तेजी से अपना ध्यान एक चीज़ से दूसरी चीज़ पर बदलते हैं पर अटेंशन बदलने में भी ये ध्यान बदलने में भी समय खराब होता है। इसे अटेंशनल ब्लिंक कहते हैं। जब कोई आपसे बात करते समय फ़ोन देखे तो बुरा लगता है क्योंकि वह आपको कम जरूरी समझ रहा है। कम इम्पोर्टेन्ट जीस चीज़ पर हम ध्यान देते हैं वह हमें कीमती लगने लगती है एक फेमस डॉक्टर मिल्टन एरिक्सन। अपनी बात मनवाने के लिए आवाज धीमी कर देते थे। जब बाहर शोर होता तो वे और भी धीरे बोलते। मरीज को सुनने के लिए आगे झुकना पड़ता। आगे झुकने से वह बात मरीज को बहुत जरूरी लगने लगती। यही बात सामान खरीदने पर भी लागू होती है। अगर हम किसी चीज़ की तरफ़ झुकते

हैं तो वह हमें पसंद आने लगती है। एक बार क्वीन एलिजाबेथ एक पार्टी में थीं, वहाँ एक लड़की का फ़ोन बजने लगा। लड़की बहुत शर्मिंदा हुई और डर गई। क्वीन ने मुस्कुराकर कहा इसे उठा लो, शायद कोई जरूरी इंसान हो। क्वीन जानती थी कि उस पल लड़की का सारा ध्यान उसका सारा अटेंशन फ़ोन पर था और जहाँ अटेंशन होता है, वही चीज़ सबसे जरूरी लगने लगती है। डेनियल कॉन्मैन एक बड़े एक्स्पर्ट हैं। उन्होंने एक बहुत बड़ा सीक्रेट बताया। जिंदगी में कोई चीज़ उतनी जरूरी नहीं होती जितनी वो सोचते समय लगती है। यही प्रीसुबेशन का असली खेल है। अगर आप किसी का अटेंशन एक चीज़ पर टिका दे तो उसे वही चीज़ सबसे कीमती लगने लगेंगी। न्यूस वाले भी यही करते हैं। वो जो दिखाते हैं वही आपको इम्पोर्टेन्ट लगता है? वे नहीं बताते की क्या सोचना है। वे बस बताते हैं कि किस बारे में सोचना है। अगर टी वि पर बार बार एक ही प्रॉब्लम आए?

एक ही समस्या है तो लोग उसे देश की सबसे बड़ी मुश्किल मानेंगे। चाहे रियलिटी में ऐसा ना हो। सोफे बिछने वाली एक वेबसाइट ने टेस्ट किया। उन्होंने बैकग्राउंड में बादलों की फोटो लगाई। क्लाउड्स की लोग आराम वाले सोफे खरीदने लगे। फिर उन्होंने बादलों की जगह सिक्के लगा दिए। अब लोग सस्ते सोफे ढूँढने लगे। बादलों को देखकर दिमाग आराम के बारे में सोचने लगा। सिक्कों को देखकर दिमाग पैसे के बारे में सोचने लगा। लोगों को पता भी नहीं चला कि उनका फैसला बदल गया। अड्वर्टाइज़्मन्ट्स भी विज्ञापन भी ऐसे ही काम करते हैं। इंटरनेट पर आने वाले छोटे बैनर असर डालते हैं। चाहे आप उन्हें याद में रखें पर वे आपके दिमाग में अपना घर बना लेते हैं। आसपास का शोर भी बहुत असर डालता है। ट्रेन की आवाज के पास वाले स्कूल वहाँ बच्चों की पढ़ाई कमजोर होती है। हवाई जहाजों का शोर भी दिमाग को थका देता है। क्लासरूम की दीवारों पर बहुत ज्यादा पोस्टर न लगाएं, इससे बच्चों का अटेंशन भटक जाता है। अच्छे इन्फ्लुयेन्स के लिए माहौल को शांत रखें। ध्यान को यानी अटेंशन को सही जगह लगाना ही असली कामयाबी है। अटेंशन खींचना हमेशा सही नहीं होता। अगर आपकी बात में दम नहीं है, मेरिट नहीं है तो ज्यादा ध्यान देने से लोग और नाराज होंगे। बुरा आइडिया ज्यादा सोचने पर और बुरा लगता है, इसलिए यह तरीका तभी

अपनाएं जब बात। अच्छी हो बिज़नेस में आजकल बहुत कॉम्पिटिशन है, सब एक जैसा सामान बेच रहे हैं, ऐसे में अपना सामान अलग दिखाना मुश्किल है। कंपनियां अड्वर्टाइज़्मन्ट्स पर बहुत पैसा खर्च करती हैं। इसका एक सस्ता और बढ़िया तरीका है। एक मेथॅड है बस। कस्टमर को उसकी अटेंशन अपनी चीज़ पर टिका दे। कैमरा खरीदने वालों पर एक टेस्ट हुआ। सिर्फ कैनन के बारे में पूछा गया। लोगों ने उसे बहुत अच्छा बताया। हाई रेटिंग दी पर जब कैनन के साथ निकोन का नाम लिया। तो कैनन का जादुई असर खत्म हो गया। यानी अटेंशन सिर्फ एक पर है। बड़े अधिकारी भी यही गलती करते हैं। जो सीनियर मैनेजर्स हैं वे अक्सर चार में से सिर्फ एक सलूशन देखते हैं। वे उसे ही सबसे अच्छा मान लेते हैं। मैनेजर्स बहुत बीज़ी होते हैं। वे सब कुछ गहराई से नहीं देख पाते। वे बस कामचलाऊ फैसला ले लेते हैं। ज्यादा भरोसे से बचना चाहिए। ओवर ऑप्टिमिस्म से हमेशा पूछिए की अगर यह गलत हुआ तो क्या होगा? उल्टा सोचने से सही फैसला मिलता है। इससे कंपनियों का मुनाफा प्रॉफिट 7% तक बढ़ सकता है। 2003 में इराक की जंग हुई, सर्कल ने एक चालाकी भरा काम किया। उन्होंने पत्रकारों को फौजियों के साथ भेज दिया इसे। एम्बेडेड रिपोर्टर प्रोग्राम कहा गया। पत्रकार फौजियों के साथ खाते और सोते थे। इससे लोगों का ध्यान बदल गया।

लोग फौजियों की बहादुरी और मुश्किलों को देखने लगे। कोई यह नहीं पूछ रहा था कि जंग क्यों हो रही है? सब देख रहे थे कि जंग कैसे लड़ी जा रही है। सच्चाई के बारे में बहुत कम बातें हुईं। अटेंशन छोटी बातों पर अटक गया बड़े सवाल यानी पॉलिटिकल इश्यूस बहुत पीछे छूट गए। यह एक बड़ा सबक है। एक बड़ा लेसन है। जीस चीज़ पर अटेंशन होगा, वही जरूरी लगेगा। अगर आप किसी चीज़ पर अटेंशन नहीं देंगे तो आपको लगेगा कि वह जरूरी नहीं है। यह दिमाग का खेल या फोकसिंग इल्ल्यूसन बहुत ताकतवर है। चाहे जंग हो या बाजार अटेंशन ही फोकस ही सब कुछ है। जीस चीज़ पर अटेंशन है, वही वजह है वही कॉज है। हमें लगता है यही वो चीज़ है जिससे सब हुआ। यही इंसानी दिमाग का एक सीक्रेट है। हम जिसे देखते हैं उसे ही असली वजह मान लेते हैं। पैसे की बात ही ले लीजिए। हमें लगता है कि लोग सिर्फ पैसे के लिए काम करते हैं पर एक मजेदार रिसर्च में कुछ अलग दिखा। एक आदमी ने लाइन काटने के लिए लोगों को पैसे दिए। उसने $1 से $10 तक का ऑफर दिया। ज्यादा पैसे देने पर ज्यादा लोग मान गए, सबको लगा कि लोग। लालच की वजह से मान रहे हैं पर असली राज़ असली बात कुछ हो रही थी। लगभग किसी ने भी पैसे नहीं लिए। उन्होंने बस उसे आगे जाने की जगह दे दी। दरअसल ज्यादा पैसे का मतलब था कि उसे ज्यादा जरूरत है। लोगों ने पैसे के लिए नहीं, मदद

के लिए जगह दी। पर हमें सिर्फ पैसा दिखा इसलिए हमने उससे ही वजह यानी कॉस मान लिया। 1982 में एक दवा में किसी ने जहर मिला दिया। पुलिस ने बोतलों के नंबर टी वि पर बार बार दिखाए। वो नंबर से 2880 और 1910। ये नंबर हर जगह छा गए। हैरानी की बात यह है कि हजारों लोगों ने लॉटरी में यही नंबर लगा दिए। उन्हें लगा कि ये नंबर जादुई हैं और उन्हें जिता देंगे। सिर्फ टीवी पर दिखने से वे नंबर वजह लगने लगे। कॉज़ पर लॉटरी में ऐसा कुछ नहीं हुआ और सब हार गए। एक और मजेदार बात सुनिए, अगर आप दो लोगों को बात करते देखें आप जिसकी तरफ देख रहे होंगे, आपको लगेगा वही बॉस है। सामने वाला ही बात चला रहा है, ऐसा लगेगा सिर्फ चेहरा दिखने से ही वह इंसान वजह यानी कॉज लगने लगता है। यही खेल पुलिस की पूछ्ताछ में होती है जब पुलिस किसी मुजरिम का वीडियो बनाती है। अगर कैमरा सिर्फ मुजरिम के चेहरे पर है तो देखने वाले को लगेगा कि वही असली गुनहगार है, भले ही उसने कुछ न किया हो। पीटर ऑइली के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसकी माँ का कतल हुआ था। पुलिस ने उसे 16 घंटे तक कमरे में बंद रखा। उसका दिमाग घूमा दिया गया, उसे कहा गया तुमने ही किया है, बस तुम्हें याद नहीं। पीटर को अपनी ही यादों पर शक होने लगा। उसने डर और थकान में लिख दिया कि हाँ, मैं नहीं किया। 2 साल बाद पक्का सबूत मिला डीएनए

एविडेंस पता चला कि पीटर उस रात वह था ही नहीं। वह बिल्कुल बेगुनाह था, इनोसेंट था पर पुलिस के तरीके ने एक मासूम को मुजरिम बना दिया। इसलिए अटेंशन का सही जगह होना बहुत जरूरी है। गलत जगह ध्यान आपको गलत फैसला करवा सकता है। कन्फेशन यानी गुनाह मानना बहुत खतरनाक है। सच हो या झूठ आप फंस जाएंगे। सजा मिलने का चांस बढ़ जाता है। झूठे केस में भी 81% लोग फंसते हैं। असली खेल इंटेरोगेशन के समय होता है। एक फेमस लेखक थे आर्थर मिलर। उन्होंने पीटर राय की मदद की। उन्होंने देखा कि पुलिस सब जगह एक ही सवाल पूछती है, चाहे अमेरिका हो या चीन, तरीके वहीं हैं। इन सवालों से बेगुनाह भी डर जाता है। वीडियो रिकॉर्डिंग में एक बड़ी सलाखी है कैमरा हमेशा। मुजरिम के चेहरे पर होता है कैमरा चलाने वाला पुलिस के पीछे होता है। इसे देखने वालों को मुजरिम ही असली वजह लगती है। अगर कैमरा साइड से दोनों को दिखाए तो फैसला बिल्कुल सही और निष्पक्ष होता है। पर पुलिस ऐसा कैमरा नहीं लगाती। यही आपके लिए एक सीक्रेट टिप है। अगर पुलिस आपको इंट्रोगेशन के लिए बुलाए तो सबसे पहले कमरे में कैमरा ढूंढिए वो अक्सर पुलिस वालों के पीछे होगा। अपनी कुर्सी को थोड़ा साइड में सर का लीजिए। कैमरे में आपका और पुलिस का चेहरा बराबर दिखे इससे आप पर। गलत शक नहीं होगा। बड़ी कंपनियों के बॉस को ज्यादा

पैसे मिलते हैं। ऐसा इसलिए नहीं की वो बहुत काम करते हैं बल्कि इसलिए है की वो सबके सामने रहते हैं। जो ज्यादा दिखता है वह ज्यादा जरूरी लगता है। दिमाग का टेंशन खींचने के दो तरीके हैं। पहला है सिक्स और दूसरा है लड़ाई। सिक्स एंड वायलेंस ये हमें अपनी जान बचाने और परिवार बढ़ाने की याद दिलाते हैं इसलिए अड्वर्टाइज़्मन्ट्स वाले इनका बहुत इस्तेमाल करते हैं। एक मजेदार जांच पड़ताल हुई। एक रिसर्च हुई। एक लड़की ने अनजान मर्दों से मदद मांगी जिनसे वैलेंटाइन डे की बात की गई। वे मदद करने के लिए तुरंत रेडी हो गए। सिर्फ एक शब्द ने उनका दिमाग बदल दिया पर सेक्स हर जगह काम नहीं आता। लिपस्टिक या कपड़ों के लिए यह ठीक है, पर डिटर्जेंट या फ्रीज़ के लिए यह बेकार है। सामान वैसा ही बिकेगा जैसा उसका काम है। शादी या दोस्ती में भी टेंशन जरूरी है। अगर आपका साथी दूसरों को ज्यादा देखता है तो समझिए रिश्ता खतरे में है। ध्यान कहाँ है? वही सबसे बड़ी बात है खतरनाक बातें ध्यान खींचती हैं अक्सीडेंट या डरावनी फिल्मों सब देखते हैं। डर की वजह से लोग गलत रास्ता चुनते हैं। 911 के बाद लोगों ने प्लेन छोड़ दिया। वे कार से जाने लगे। प्रकार ज्यादा खतरनाक है। वहाँ ज्यादा मौतें हुईं। इसे डर का खतरा यानी डरेड रिस्क कहते हैं। सिगरेट के पैकेट पर गंदी फोटो

होती है। इससे लोग डरते हैं और डर के साथ रास्ता भी बताना होगा, वरना लोग बहाने बनाएंगे। उन्हें बताइए कि वे कैसे छोड़ सकते हैं? सही जानकारी ही काम आती है। डर लगने पर हम भीड़ में रहना चाहते हैं। एक ग्रुप में पर प्यार के मूड में हम अलग दिखना चाहते हैं। अगर डरावनी फ़िल्म है तो सबके साथ वाला अड्वर्टाइज़्मन्ट दिखाइए। अगर रोमेंटिक फ़िल्म है। तो सबसे अलग वाला ऐड दिखाइए। यही असली प्रिस्सुवेशन है। इंसान सबसे ज्यादा खुद के बारे में सोचता है। यह बात मनवाने का एक बड़ा हथियार है। अगर आप किसी को उसकी हेल्त के बारे में बता रहे हैं उसकी सेहत के बारे में तो उसका नाम उम्र। या जरूरत के हिसाब से बात करें, ऐसा करने से वह आपकी बात अटेंशन से सुनेगा, ध्यान से सुनेगा। उसे आपकी बात ज्यादा इंटरेस्टिंग लगेंगी। वह उसे लंबे समय तक याद रखेगा। अड्वर्टाइज़्मन्ट्स में भी यही खेल चलता है। एक नया पाउडर बेचना था, उसमें लिखा था। लोग दाग धंबों से परेशान हैं। एक छोटे से बदलाव ने सब बदल दिया। लोग की जगह आप लिख दिया गया, आप भी इन दागों से परेशान होंगे। जैसे ही आप शब्द आया लोगों का टेंशन खींच गया। अगर आप चाहते हैं कि बड़ा बॉस आपकी बात सुने। तो उसके ठीक बगल में मत बैठिए, बगल में बैठने से वह अपनी तैयारी में लगा रहेगा। वह आपकी बात ठीक से नहीं सुन पाएगा।

हमेशा उसके सामने वाली सीट पर बैठिए, वहाँ से वह आपको देखेगा भी और आपकी बात सुनेगा भी। 1920 में जर्मनी के एक वेटर ने सबको चौंका दिया। वह बिना लिखे सबका ऑर्डर याद रखता था पर जैसे ही खाना टेबल पर पहुँच जाता, वह सब भूल जाता ब्लूमर नाम के वैज्ञानिक ने इस पर रिसर्च की। पता चला कि अधूरी बातें अनफिनिश्ड, टास्क्स। दिमाग में चिपकी रहती हैं। जब तक काम पूरा ना हो, दिमाग उसे छोड़ता नहीं। इसे ज्गार्निक इफेक्ट कहते हैं। यही राज़ राइटिंग में भी काम आता है। अगर आप कल के लिए कुछ लिखना चाहते हैं तो आज उसे पूरा खत्म मत कीजिए। एक लाइन या पैराग्राफ अधूरा छोड़ दीजिए, कल उसे पूरा करने की तड़प उसकी डिज़ैर आपको जल्दी काम पर लाएगी। आपकी मेहनत, आपकी प्रोडक्टिविटी बढ़ जाएगी। यही बात प्यार में भी सच है। लड़कियां उन लड़कों के बारे में ज्यादा सोचती हैं। जिन्होंने अभी तक यह नहीं बताया कि वो क्या सोचते हैं। अनजाने बातें और नोन आउटकम दिमाग को चुंबक की तरह खींचती हैं। टीशर्ट के लिए बच्चों का अटेंशन खींचना मुश्किल है। बच्चे अक्सर एक दूसरे को देखने में लगे रहते हैं। इसका एक जादुई तरीका है। पहेली या मिस्ट्री? किसी भी बात को एक अनसुलझी कहने की तरह शुरू करें। पढ़ने वाले या सुनने वाले को जवाब चाहिए होता है। जब तक पहेली नहीं सुलझती कोई अपनी

जगह से नहीं हिलता। सिगरेट कंपनियों ने खुद ही अपने अड्वर्टाइज़्मन्ट्स टीवी से हटवा लिए। सुनने में ये अजीब लगता है, है ना? कंपनियां तो चाहती है कि उनके विज्ञापन हर जगह दिखे पर उन्होंने सरकार से कहकर टीवी पर बैन लगवा दिया। वजह यह थी कि टीवी पर उनके खिलाफ़ भी विज्ञापन आ रहे थे। उन अड्वर्टाइज़्मन्ट्स में दिखाया जाता था कि सिगरेट से बीमारियां होती हैं। सिगरेट कंपनियों को इससे बहुत नुकसान हो रहा था। जैसे ही टीवी से अड्वर्टाइज़्मन्ट्स हटे, उनके खिलाफ़ वाली बातें भी बंद हो गई, उनकी सेल्स बढ़ गई और अड्वर्टाइज़्मन्ट का खर्चा भी बच गया। यही पहेलियों की ताकत है। यह लोगों को जानकारी के करीब लाती है। आइंस्टाइन ने भी कहा था कि मिस्टीरियस यानी रहस्य सबसे सुंदर चीज़ है। यह साइंस और आर्ट दोनों की जान है। मोनालीसा की पैंटिंग भी इसीलिए फेमस है। उसकी मुस्कान आज भी एक मिस्ट्री है। दिमाग में कोई भी बात अकेली नहीं होती। हर बात पुरानी यादों से जुड़ी होती है। लिंक्ड होती है ये जुड़ाव ही। ये असोसिएशन्स ही हमारी सोच को बनाते हैं, जैसे ईंटों से घर बनता है, वैसे ही कड़ियों से यानी लिंक्स से सोच बनती है। बात मनवाने के लिए सही लैंगुएज जरूरी है शब्दों से लोगों के दिमाग के तार जोड़ सकते हैं। लैंगुएज का असली काम अटेंशन

खींचना है। जीस तरफ अटेंशन जाएगा, दिमाग वही सोचने लगेगा। यही बात मनवाने का असली मेथड है। एक हॉस्पिटल ने अपनी लैंगुएज बदल दी। वे वायलेंस वाले शब्द इस्तेमाल नहीं करते। वे बुलेट पॉइंट्स को इन्फॉर्मेशन पॉइंट्स कहते हैं। वे मुश्किलों पर हमला नहीं करते, अटैक नहीं करते, वे मुश्किलों को सुलझाने की कोशिश करते हैं, एप्रोच वर्ड यूज़ करते हैं, छोटे शब्दों से सोचने का ढंग बदलता है, वे ऑफ़ थिंकिंग चेंज होती है। एक मजेदार रिसर्च हुई। जिन लोगों ने लड़ाई वाले शब्द पढ़े, उन्होंने दूसरों को ज्यादा बिजली के झटके दिए। बुरे शब्दों से मन में गुस्सा बढ़ गया, एग्रेशन बढ़ गया। वहीं सक्सेस वाले शब्द मेहनत बढ़ा देते हैं। दौड़ते हुए आदमी की फोटो से काम बढ़ गया। चंदा जमा करने वालों ने 60% ज्यादा पैसे जुटाए। मुश्किल बात समझाने के लिए मेटाफर दे दिमाग एक चीज़ को दूसरी से जोड़कर समझता है। अगर क्राइम को जंगली जानवर कहें, बीस्ट कहें तो लोग उसे पकड़ने और। जेल में डालने की सोचेंगे। अगर उससे बिमारी कहें तो लोग इलाज ढूंढेंगे। सिर्फ एक शब्द से लोगों का फैसला बदल जाता है। बेनफील्ड मैन एक बड़े अच्छे सेल्समैन थे। वो मर जाने को जिंदगी से बाहर जाना कहते थे। इससे लोगों को अपनी जिम्मेदारी याद आती थी। अपनी रिस्पांसिबिलिटी वे तुरंत इन्षुरेन्स खरीद लेते थे।

छूने से भी दिमाग के तार जुड़ जाते हैं। क्लिपबोर्ड पर कागज रखने से बात सीरियस लगती है। भारी चीज़ पकड़ने से इंसान ज्यादा मेहनत करता है। हाथ में गर्म कॉफी हो तो भरोसा बढ़ता है। लोग दूसरों की मदद करने को तैयार हो जाते हैं। गलत शब्दों से जुड़ा असोसिएशन बुरा होता है। कार वाले पुरानी नहीं कहते यूज़्ड कार नहीं कहते वे पहले किसी की थी। कहते हैं प्री ओन्ड कहते हैं। पैसा जाने को खर्चा न कहें, कॉस्ट न कहें, उसे इन्वेस्टमेंट कहें, निवेश, एयरलाइन्स, मौत जैसे शब्दों से बचती हैं। वे फाइनल डेस्टिनेशन नहीं बोलती। सबसे बड़ा राज़, अपनापन है सबको अपना नाम बहुत प्यारा है। अपना बर्थडे भी सबको खास लगता है। कोका कोला ने बोतलों पर नाम लिखे। इससे उनकी सेल्स बहुत बढ़ गई। लोग अपनी पसंद की चीजें चुनते हैं जिनमें उनके नाम के लेटर्स हों, कविता में राइम असरदार होती है। मुश्किल नाम वाली दवाइयां लोग नहीं खरीदते। शेयर बाजार में भी यही खेल है। आसान नाम वाली कंपनियों को मुनाफा ज्यादा है। आप कहाँ बैठते हैं? यह बहुत जरूरी है। कॉलेज में मैं सिर्फ किताबी बातें लिखता। घर की खिड़की से लोग दिखते थे इसलिए मेरी लिखाई आसान हो गई। आसपास का एनवायरनमेंट सोच को बदल देता है। एक टीम ने ऑफिस में फोटो लगाई। उन लोगों की फोटो जिनके लिए काम था, इससे उनके काम का रिसाल्ट सुधर गया।

अपने आसपास वैसी ही चीजें रखी है जो आपको आपके गोल की याद दिलाएं। बाहर की दुनिया हमारा अटेंशन बदल सकती है, पर अटेंशन हमारे अंदर की सोच बदल देता है। जीस चीज़ पर अटेंशन जाएगा, वही इम्पोर्टेन्ट लगेंगी वह हमें किसी काम की वजह लगेंगी। कॉज क्या आपने कभी किसी को खास टेस्ट सुना है? कफ करते हुए? लेकिन इंसान खांसता है तो सब खांसने लगते हैं। कलाकार इस सवाई से नफरत करते हैं क्योंकि यह खांसी पूरे हाल में फैल जाती है। साइंटिस्ट कहते हैं कि यह दिमागी खेल है, बिना किसी बिमारी के भी लोग खांसने लगते हैं। डॉक्टर की पढ़ाई करने वाले भी ऐसे ही होते है जो मेडिकल स्टूडेंट है। वे जीस बिमारी के बारे में पढ़ते है, वही महसूस करते है। उन्हें लगता है कि उन्हें वह बिमारी हो गई है। सिर्फ उस जगह अटेंशन देने से दर्द होने लगता है। दिमाग उस हिस्से पर फोकस करके उसे सच मान लेता है। बुढ़ापा अपने साथ बहुत बीमारियां लता है। आंखें, कान और शरीर कमजोर होने लगते हैं पर एक अजीब पैराडॉक्स है। बूढ़े लोग जवानों से ज्यादा खुश रहते हैं। वैज्ञानिक ने इसका जवाब ढूंढ लिया है। उनके पास फालतू बातों के लिए टाइम नहीं है। वे जानबूझकर अच्छी बातों पर अटेंशन देते हैं। वे बुरी यादों को छोड़कर अच्छी यादें सोचते हैं। वे कुछ चेहरों की तरफ देखना पसंद करते हैं, जो अपना अटेंशन संभालना जानते हैं।

वे खुश रहते हैं। वे जानते हैं कि जिंदगी थोड़ी ही बच्ची है, इसलिए वे उसे दुख में खराब नहीं करते। खुश रहना कोई जादू नहीं है। कुछ काम करके इसे बढ़ा सकते हैं। सुबह अपनी अच्छी बातें सोचे, उन्हें कागज पर लिखे और महसूस करें। दूसरा रास्ता है हमेशा अच्छी उम्मीद रखें। ऑप्टिमिस्म बुरी बातों में भी अच्छी चीज़ ढूंढें। तीसरा, बुरी बातों को सोचना छोड़ दें। दूसरों से खुद की तुलना न करें। कंपॅरिज़न न करें ये जिम जाने जैसा काम है। आपको रोज़ मेहनत करनी पड़ेगी। तभी आपका मन हमेशा मजबूत और खुश रहेगा। एलन ने एक बहुत बड़े इम्तिहान में टॉप किया जी आरी एग्ज़ैम में उसका दिमाग दूसरों से ज्यादा तेज नहीं था पर उसके पास एक खास मेथड था। वह परीक्षा से ठीक पहले साई कप होता था। ज़रा तो लोग आखिरी पल में रट्टा मारते हैं, इससे डर और घबराहट बढ़ जाती है। परलेन वो समय खुद को शांत करता था, वह अपनी पिछली जीत और स्ट्रेंथ को याद करता था। इससे उसका भरोसा बढ़ जाता था। डर में दिमाग काम नहीं करता। पर भरोसे के साथ आप बड़ी जीत हासिल कर सकते हैं। मान लीजिए आप एक स्कूल के बड़े अफसर हैं, आपको अपने स्कूल के लिए सरकारी पैसा चाहिए। इसके लिए लड़कियों को मेस में नंबर बढ़ाने होंगे। पर लड़कियां मेस के नाम से ही डर जाती हैं। उन्हें लगता है कि लड़कियां मेस में कमजोर होती हैं।

यह एक बहुत ही बुरा ना और गलत ख्याल है। परीक्षा से पहले कुछ गलतियाँ मत करिए। लड़कों और लड़कियों को एक साथ मत बिठाइए लड़कों को देखकर लड़कियों को अपनी कमजोरी याद आती है। वहाँ लेडीज टीचर ही ड्यूटी पर लगाइए। सफल औरतों को देखकर लड़कियों को हिम्मत मिलती है परीक्षा से ठीक पहले उन्हें डराइए मत उन्हें अपनी कोई अच्छी बात लिखने को कही है कोई पर्सनल वैल्यू, जैसे मैं दूसरों की मदद कैसे करती हूँ? इससे उनके अंदर एक ताकत महसूस होगी। एक स्ट्रेंथ परीक्षा शुरू करते समय उनसे। उनका जेंडर मत पूछिए। जेंडर पूछते ही उन्हें कमजोर होने वाली बात याद आ जाती है। उनसे उनकी क्लास पूछिए, सीनियर होने का एहसास उन्हें जीत दिलाएगा। एशियन लड़कियों पर भी एक टेस्ट हुआ। उन्हें याद दिलाया गया कि वे एशियन हैं। एशियन लोग मेस में बहुत तेज माने जाते हैं। यह याद आते ही उनके नंबर बहुत बढ़ गए। सारा खेल इस बात का है कि दिमाग किस बात पर टिका है। हमारा दिमाग पहले से तैयार होने पर काम करता है। दिमाग में जो बात पहले आती है। वही रास्ता बनाती है। अगर आप लड़ाई वाले वीडियो गेम खेलेंगे तो आपके दिमाग में गुस्से वाले विचार आएँगे। अगर आप दूसरों की मदद वाले गेम खेलेंगे तो आप असल जिंदगी में भी हेल्पफुल यानी मददगार बन जाएंगे। ये असर बच्चों में बहुत जल्दी

दिखता है। 18 महीने के छोटे बच्चे भी और समझ जाते हैं। उन्हें साथ रहने वाली फोटो दिखाई गई। इसके बाद उन बच्चों ने दूसरों की मदद करना शुरू किया। वे बिना कहे ही सामान उठाने में मदद करने लगे। किसी को अपनी बात मनवाने के लिए सही असोसिएशन जरूरी है। सड़क पर कूड़ा न फेंकने के लिए सही बात याद दिलाएं। वोट डालने की बात करने से कोई कूड़ा फेंकना बंद नहीं करेगा। कूड़ा कम करने के लिए डस्टबिन वाली बात याद दिलानी होगी। रिश्ता जितना गहरा होगा, जितना स्ट्रांग असोसिएशन होगा, असर उतना ही ज्यादा होगा। यही राज़ बड़े अड्वर्टाइज़्मन्ट्स वाले जानते हैं। वे फेमस सेलेब्रिटीज को अपने सम्मान के साथ दिखाते हैं। पेप्सी और बियॉन्ड से इनका कोई असली रिश्ता नहीं है पर उन्हें साथ देखकर हमें पेप्सी अच्छी लगने लगती है इसे। नया रिश्ता बनाना क्रियेटिंग ए कनेक्शन कहते हैं के कुत्ते भी घंटे सुनकर खाना ढूँढने लगते थे। हम में सेलेब्रिटीज को देखकर सामान खरीदने के लिए तैयार हो जाते हैं। हम सब बड़े सपने देखते हैं पर वो अक्सर पूरे नहीं होते। सिर्फ इंटेन्शन सिर्फ सोचना ही काफी नहीं है। इसके लिए एक जादुई ट्रिक भी है। इसे इफ दिन वाला प्लान कहते हैं। यह दिमाग को पहले से तैयार करता है। मान लीजिए आपको वजन कम करना है तो अपने दिमाग में यह बिठा लीजिए की

अगर वेटर खाने के बाद मीठा पूछेगा तो मैं। मिंट चाय मंगाऊंगा दवाई याद रखने के लिए भी यही करें। अगर मैं सुबह ब्रश करूँगा तो मैं अपनी दवाई खाऊंगा। इससे काम पूरा होने के चांस बढ़ जाते हैं। यह कंप्यूटर के लिंक जैसा होता है। बस एक क्लिक और काम शुरू। दिमाग को बस एक इशारा चाहिए। एक चू इशारा मिलते ही वह काम खुद होने लगेगा। बुरी आदतों को छोड़ने का यह बेस्ट तरीका है बेस्ट मेथॅड है। क्या हम इन दिमागी चालों से बच सकते हैं? हाँ बस। चालाकी को पहचानना होगा, नोटिस करना होगा। धूप वाले दिन हम ज्यादा खुश होते हैं इसलिए हम फालतू सामान भी खरीद लेते हैं। पर अगर कोई बस मौसम की याद दिला दे तो हमारा दिमाग तुरंत संभल जाता है। याद आते ही हम सही फैसला लेते हैं। फिल्मों में चोरी छुपे सामान दिखाते हैं। प्रॉडक्ट प्लेसमेंट ताकि आपको वो सामान अच्छा लगने लगे। पर अगर कोई बहुत ज्यादा दिखावा करे तो लोग समझ जाते हैं कि यह एक चाल है। पकड़े जाने पर लोग वो सामान नहीं खरीदते। ज्यादा चालाकी अक्सर उल्टी पड़ जाती है। थके हुए होने पर हम गलत फैसले लेते हैं। देर रात आने वाले अड्वर्टाइज़्मन्ट्स इसीलिए चलाए जाते हैं तब हमारा दिमाग ना यानी नो नहीं कह पाता। नींद की कमी में हम किसी की बात भी मान लेते हैं। थकान में हम एनालिसिस पक्की जांच पड़ताल नहीं कर पाते।

जल्दबाजी भी एक दुश्मन है। जब हमारे पास टाइम कम होता है तो हम सामान की क्वालिटी नहीं देखते। हम बस देखते हैं कि किस्मे ज्यादा गिफ्ट्स हैं। बिना सोचे समझे हम आसान रास्ता चुनते हैं। आज की दुनिया बहुत तेज है। इन्फॉर्मेशन बहुत ज्यादा है। हमारा दिमाग अक्सर थका हुआ रहता है इसलिए प्रिसुवेशन की चालें हम पर काम कर जाती है क्योंकि हम गहराई से सोचने का टाइम नहीं निकालते। हमने देखा की बात मनवाना एक खेल है। बात कहने से ठीक पहले। सही काम करिए महंगी चॉकलेट के लिए पहले बड़ा नंबर लिखवाइए फ़्रेंच 1 के लिए फ़्रेंच गाना बजाइए। नया सामान देने से पहले पूछिए कि क्या आप साहसी हैं?

अड्वेंचरस हैं फेमस चीज़ के लिए पहले डरावनी फ़िल्म दिखाइए? प्यार बढ़ाने के लिए हाथ में गर्म चाय थमाइए मदद चाहिए तो साथ खड़े लोगों की फोटो दिखाइए। मेहनत के लिए दौड़ते हुए रनर की फोटो दिखाइए। याद रखिए जैसा कहो वैसा हथियार चाहिए। गाना बजाने से कोई मेहनती नहीं बनेगा। एड्वेंचर पूछने से कोई फेमस चीज़ नहीं खरीदेगा दिमाग का टेंशन सही जगह ले जाना ही असली बात है। हाँ यानी यस कहलवाने के छह तरीके हैं। ये तरीके लोगों को सही फैसला लेने में मदद करते हैं। ये हैं रेसिप्रोकेशन यानी लेन देन। दूसरा है लाइकिंग यानी पसंद। तीसरा है सोशल प्रूफ यानी देखा देखी चौथा है अथॉरिटी यानी पावर पांचवा है स्कार्सिटी यानी कमी और लास्ट है अपनी बात पर टिकना यानी कन्सिस्टेन्सी। अगर आप एक्स्पर्ट की तरह बात करेंगे तो लोग मानेंगे। लोग पावर यानी अथॉरिटी वाले की बात पर शक नहीं करते। वे सोचते हैं कि जानकार आदमी सही ही कहेगा, लोग उनका काम करते हैं जिनके वे कर्जदार होते हैं। इसे एहसान का बदला कहते हैं। रोल ऑफ़ रेसिप्रोकेशन। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि एहसान मत भूलिए। गिफ्ट देने से लोग सामान खरीदने को तैयार हो जाते हैं। कोष्टकों में फ्री सैम्पल्स इसी काम आते हैं, नेता भी डोनेशन लेकर काम करते हैं। असली बात ये है कि पहले आप कुछ दें गीव फर्स्ट।

बिना किसी लालच के पहले मदद करें। गिफ्ट में तीन खूबियाँ होनी चाहिए, वो काम का हो, मीनिंगफुल हो, दूसरा वो अचानक मिले अनएक्सपेक्टेड हो और तीसरा वो खास उसी के लिए हो। यानी कस्टमाइज़्ड एक वेटर ने चॉकलेट देकर टिप बढ़ा ली। जब उसने अचानक लौटकर दूसरी चॉकलेट दी तो टी 21% बढ़ गई। एक आतंकवादी ने शुगर फ्री बिस्कुट खा कर राज़ उगल दिए क्योंकि वो बिस्कुट उसके लिए कस्टमाइज़्ड थे। सी आई ने भी एक दवाई देकर सारे सीक्रेट्स जान लिए। इंसान का बदला चुकाना इंसान के। नेचर में है, दूसरा है लाइकिंग यानी पसंद। लोग उसकी बात मानते हैं जिन्हें भी पसंद करते हैं। पसंद बढ़ाने के दो आसान रास्ते हैं। पहला एक जैसा होना और दूसरा तारीफ करना। हम उन्हें पसंद करते हैं जो हमारे जैसे हैं सिमिलर हैं। एक जैसी टीम या एक जैसा शहर जुड़ाव बढ़ा देता है। अगर आप सामने वाले की नकल करेंगे मिमिक्री तो वो खुश होगा। सैलून में तारीफ करने से वेटर की टिप 37% बढ़ गई। झूठी तारीफ भी कभी कभी जादुई काम कर जाती है। सेल्स का पहला नियम याद रखिए कि सामने वाले को दिखाए कि आप उसे पसंद करते हैं। जब उसे लगेगा कि आप उसे पसंद करते हैं तो उसे आप पर भरोसा हो जाएगा। लोग तभी सुनते हैं जब उन्हें लगे कि आप उनका भला चाहते हैं। फिर देखा देखिए यानी सोशल प्रूफ। जॉन लेनन ने एक गाने में कहा था, मैं अकेला नहीं हूँ।

यही देखा देखी यानी सोशल प्रूफ का असली राज़ है। जब सभी करते हैं तो वो सही लगता है। इसे सही होना कहते हैं। वैलिडेशन भीड़ को देखकर हम फैसला लेते हैं, होटल में लिखिए कि। सबसे फेमस डिश तो लोग उसे 20% ज्यादा मांगेंगे। इससे काम आसान लगने लगता है। अगर पड़ोसी कर सकते हैं तो मैं भी फिर है। पावर यानी अथॉरिटी इसका बड़ा असर है। एक्स्पर्ट की बात पर कोई शक नहीं करता। इसे पावर का जादू कहते हैं। इंसान एक्स्पर्ट की बात बिना सोचे मानता है भरोसा यानी ट्रस्ट जीतने की एक जादुई ट्रिक है। पहले अपनी एक छोटी वीकनेस बताइए, फिर अपनी सबसे बड़ी ताकत बताइए, इससे लोग आपको ईमानदार मानेंगे। फिर निजाबेथ ने यही किया था। मैं कमजोर हूँ पर दिल राजा जैसा है फिर अगला है कमी यानी स्केट्रसिटी का खेल। जो चीज़ कम है वो कीमती है। खोने का डर सबसे बड़ा डर है। आईफोन की कमी लोगों को पागल कर देती है अभी नहीं लिया तो मौका हाथ से जाएगा। लोग खोने के डर से तुरंत खरीदते हैं। कमी बताने से चीज़ की इज्जत बढ़ जाती है। फिर है अपनी बात निभाना। यानी कन्सिस्टेन्सी लोग अपनी पुरानी बात पर टिकना चाहते हैं। इसे अपनी बात निभाना या कन्सिस्टेन्सी कहते हैं। पहले एक छोटा वादा करवाइए फिर बड़ी मदद मांगिए। लोग हाँ कहेंगे हॉस्पिटल में टाइम का वादा जरूर करवाएं। पुरानी बातों को याद दिलाना बहुत

असरदार है। इससे लोग अपनी बात से नहीं पलटते। बात मनवाने के तीन लेवल होते हैं थ्री स्टेजेस लेवल 1। मेलजोल बढ़ाना यानी असोसिएशन इसमें लेनदेन यानी रेसिप्रोसिटी और पसंद यानी लाइकिंग जरूरी है। दूसरा लेवल है शक दूर करना अनसर्टेनिटी इसमें भीड़ यानी सोशल प्रूफ और पावर दिखाइए। अथॉरिटी। फिर तीसरा लेवल है काम शुरू करवाना। अक्शॅन इसमें वादा यानी कन्सिस्टेन्सी और कमी यानी स्कार्सिटी दिखाइए। ये छः राज़ है अब एक सातवाँ सीक्रेट सुनिए एक सातवाँ राज़। इसे कहते हैं अपनापन यानी यूनिटी। यह पसंद से भी बहुत मजबूत है। लाइकिंग से भी स्ट्रांग है पसंद मतलब वह मेरे जैसा है अपनापन मतलब यूनिटी मतलब वह मेरा हिस्सा है ऐडेंटिटी इसमें जात, धर्म और परिवार आता है। खून का रिश्ता सबसे मजबूत है। हम अपनों के लिए जान दे सकते हैं। हम भाई, बहन जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। इससे अनजान लोगों में भी अपना पन आता है। लोग अपने देश के लिए अपने मदरलैंड के लिए लड़ते हैं क्योंकि वे देश को अपना परिवार मानते हैं। वारेन बफेट एक एक्सपर्ट है। वे अपनी रिपोर्ट में पहले गलती बताते हैं। इससे इन पर भरोसा बढ़ जाता है। ट्रस्ट फिर वे एक जादुई बात कहेंगे, जो सलाह मैं परिवार को दूंगा, वही सलाह मैं आपको दे रहा हूँ। परिवार यानी फैम्ली शब्द सुनते ही सब जाते हैं।

यही बात मनवाने का पहला तरीका है वरुण बफेट ने परिवार वाला राज़ अपनाया। उन्होंने लोगों को अपना महसूस कराया। जब दो लोग एक महसूस करें तो असर बढ़ जाता है। हम अपने जैसे दिखने वालों पर भरोसा करते हैं। चेहरा मिलता जुलता हो तो लोग वोट देते हैं। जगह का जुड़ाव भी बहुत असरदार होता है। बचपन में घर में जो रहे वो अपने हैं। साथ मिलकर काम करना बहुत जादुई है। जब लोग एक साथ नाचते या गाते हैं तो वे खुद को एक समझने लगते हैं यूनिटाइज़्ड। पुराने लोग पत्थर पर ऐसी तस्वीर बनाते थे। यह अपनेपन का बहुत पुराना तरीका है। साथ चलने या हिलने से प्यार बढ़ता है। एक जैसे काम करने से नफरत कम होती है। कनाडा में एक बहुत बड़ा टेस्ट हुआ। अलग अलग रंग के लोग साथ पानी पी रहे थे। नकल करने से उनके बीच नफरत कम हुई। पसंद बढ़ाना अब और भी आसान है। साथ ताल मिलाने से मदद बढ़ती है। एक टेस्ट में लोगों ने साथ में मेज थपथपाई। इसके बाद वे एक दूसरे की ज्यादा मदद करने लगे। यहाँ तक कि उन्होंने अपना समय कुर्बान कर दिया। फौज में भी सात कदम मिलाते हैं, मार्शिंग होती है। इससे टीम में जान आ जाती है। म्यूसिक सबको एक साथ जोड़ देता है। जर्मनी में 4 साल के बच्चों पर टेस्ट हुआ सात गाने वाले बच्चे, तीन गुना ज्यादा मददगार निकले म्यूसिक। दिल की भाषा है। इसमें दिमाग का कोई काम नहीं होता।

यह सब अपने आप होता है, इन्ट्यूटिव है, थिंकिंग भी दो तरह की होती है सिस्टम वॅन थिंकिंग और सिस्टम, दो सिस्टम वॅन, ये दिल की सोच होती है। यह बहुत तेज और एमोशनल होती है। दूसरे दिमाग की सोच है सिस्टम टू। यह धीरे धीरे और सोच समझ वाली है। एनालिटिकल म्यूसिक दिल की सोच यानी सिस्टम वॅन पर असर डालता है। अगर कोई बात सच नहीं लगती तो उसे गा कर सुनाइए। अड्वर्टाइज़्मन्ट्स के लिए एक बड़ा राज़ है अगर। समान इमोशनल है तो गाना चलाइए, जैसे चिप्स, परफ्यूम या कोई खाने की चीज़ पर अगर सामान महंगा और रेशनल है जैसे कंप्यूटर या कार की सेफ्टी तो पीछे बैकग्राउंड म्यूजिक मत चलाइए। वहाँ सिर्फ काम की पक्की बातें बताइए। गाना चलाने से कस्टमर का ध्यान भटक सकता है। सही मौके पर सही तरीका ही काम आता है। 45 मिनट में प्यार हो सकता है। एक अखबार ने यह जादुई बात छापी। इसमें बस 36 सवाल पूछने होते हैं। आप एक सवाल पूछिए फिर आपका साथी जवाब देगा। फिर साथ ही वही सवाल पूछेगा, आप उसका जवाब देंगे इसे बारी बारी करना। कहते हैं, टर्नटीकिंग धीरे धीरे बातें बहुत गहरी हो जाती हैं। इस अजनबियों में भी गहरा रिश्ता बन जाता है। सैकड़ों लोग इस तरीके से शादी कर चूके हैं। साथ मिलकर बात करना जादू जैसा है। जो हम खुद बनाते हैं, उससे प्यार हो जाता है। इसे आइकिया इफेक्ट कहते हैं।

अपनी बनाई चीज़ हमें सबसे कीमती लगती है। एक आदमी ने खुद एक पेड़ लगाया, एक दूसरा पेड़ खुद ही उगाया था। उसने अपने लगाए पेड़ को ज्यादा प्यार दिया। क्योंकि उसने उसमें अपनी मेहनत डाली थी। जब हम किसी के साथ मिलकर काम करें को क्रियेशन तो हम उस इंसान को भी पसंद करने लगते हैं। साथ काम करना हमें एक यूनिटी एक बना देता है। इन्फ्लुयेन्स यानी असर डालने से पहले। एक जरूरी बात मैं आपके साथ शेयर करता हूँ। क्या गलत तरीके से जीत हासिल करना सही है? लोग मुझसे अक्सर ये सवाल पूछते हैं क्या ये राज़ क्या ये सीक्रेट्स बुरे लोगों की मदद करेंगे? क्या वे कस्टमर को धोखा देंगे?

पुराने लोग कहते हैं कि बेमानी मत करिए। क्योंकि पकड़े जाने पर नाम यानी रेपुटेशन खराब होगा। नाम खराब होने से भारी नुकसान होता है। ये कंपनी का 41% पैसा डूब गया क्योंकि उन्होंने झूठ बोला था, फाइनैंशल मिसरेप्रजेंटेशन किया पर लोग सोचते हैं कि वे पकड़े नहीं जाएंगे। इसलिए वे गलत रास्ता चुनते हैं। अनइथिकल पाठ बेईमानी कंपनी के अंदर गांठ जैसी है। ट्यूमर्स जैसी यह कंपनी को अंदर से खा जाती है, भले ही बाहर किसी को पता ना चले। इसकी तीन बड़ी बीमारियां हैं। पहला पुअर परफॉरमेंस कर्मचारियों का खराब काम, दूसरा हाई टर्नओवर पुराने लोगों का काम छोड़ना तीसरा एम्प्लोयी फ्रॉड कंपनी के अंदर चोरी चाकरी पुअर एम्प्लोयी परफॉरमेंस यानी काम की जगह पर बहुत स्ट्रेस होता है। पर गलत काम का तनाव जो मोरल स्ट्रेस है वो सबसे बुरा है। जब कंपनी गलत काम करती है तो वर्कर थक जाते हैं, उनकी काम करने की हिम्मत खत्म हो जाती है। वे अपना जोश खो देते हैं। हमने इस पर एक बड़ा टेस्ट किया। एक टीम को झूठ बोलने को कहा गया। दूसरे टीम ने अपना काम ईमानदारी से किया। रिसाल्ट देखकर सब हैरान रह गए। झूठ बोलने वाले टीम का काम 20% गिर गया। उन्होंने बहुत जल्दी हार मान ली। एक सर्वे में भी यही दिखा। जहाँ का माहौल बेमानी वाला था, वहाँ के लोगों ने बहुत खराब काम

किया। उन्हें काम पर बहुत ज्यादा स्ट्रेस था। गलत माहौल काम करने की ताकत छीन लेता है। यही बेईमानी का पहला बड़ा नुकसान है। नौकरी छोड़ना बहुत महंगा है। नया वर्कर ढूँढना और सीखाना भारी पड़ता है। इसमें करोड़ों का नुकसान होता है। अच्छे लोग। बेईमान माहौल नहीं झेलते। अनेथिकल कल्चर कभी नहीं झेलते। उन्हें गलत काम का बहुत स्ट्रेस होता है, इसलिए वे जल्दी नौकरी छोड़ देते हैं। यही बेईमानी का दूसरा बड़ा झटका है। बेईमान कंपनी में सिर्फ बेईमान लोग बचते हैं। एक और जरूरी बात। जो दूसरों से झूठ बोलेंगे वो आपसे भी झूठ बोलेंगे। अच्छे लोग चले जाते हैं, चोर जमा हो जाते हैं, वे कंपनी का सामान और पैसा चुराते हैं। एक टेस्ट में ऐसे लोग 77% ज्यादा चोर निकले। यही बेईमानी का तीसरा और आखिरी झटका है। शुरुआती स्तर यानी प्रिसुवेशन थोड़े समय का होता है। इसे लंबे समय तक कैसे टिकाएं, सामने वाले से एक छोटा वादा करवाइए, एक छोटा कमिटमेंट जैसे अपना अपॉइंटमेंट कार्ड खुद भरवाइए। इससे लोग अपना वादा एयठीन परसेंट ज्यादा निभाते हैं। चुनाव में झंडा देखने से सोच बदल गई, लोगों ने उसी सोच पर वोट दिया। काम करने से बात दिमाग में बैठ जाती है। मैं एक बार एक बस में गया। वहाँ बड़े बड़े सपने दिखाए जा रहे थे। वो एक धोखा देने वाला बिज़नेस था। एक पिरामिड स्कीम बस में बहुत शोर

और हलचल थी। शोर में गहराई से सोचना मुश्किल होता है। जब हम सोच नहीं पाते तो जल्दी मान जाते हैं। बस में हर तरफ कामयाबी के पोस्टर थे। सीटों पर अमीर बनने की बातें लिखी थी। स्पीकर पर जीत वाला गाना बज रहा था। वहाँ के लोग महंगे कपड़े और चेक दिखा रहे थे। सबने सोचा मैं भी ये कर सकता हूँ वापस आने तक सबने हाँ कह दिया था। आज की लाइफ भी वैसी ही बस है। सब कुछ बहुत तेज और धक्का देने वाला है। हम अक्सर बिना सोचे फैसले ले लेते हैं पर हम खुद को बदल सकते हैं। अपने घर और ऑफिस को सही चीजों से सजाएं। ये चीजें हमें सही रास्ता दिखाएंगी। अगर आपको कुछ अच्छा लिखना है तो अपने सामने लोगों के चेहरे रखें। अगर आपको ऑफिस में जीतना है। तो दौड़ते हुए खिलाड़ी की फोटो लगाएं। बजट जैसा मुश्किल काम करना है तो सोचने वाले की फोटो देखें। सिर्फ फोटो बदलने से दिमाग का काम सुधर जाता है। डॉक्टरों को मनाना बहुत मुश्किल काम है। वे अपनी बात पर अड़े रहते हैं। हॉस्पिटल में हाथ धोना बहुत जरूरी है पर ज्यादातर डॉक्टर हाथ नहीं धोते थे। वहाँ एक बोर्ड पर लिखा था हाथ धोना आपको बचाएगा। इसका कोई असर नहीं हुआ। फिर दूसरे बोर्ड पर लिखा था हाथ धोना मरीज को बचाएगा। यह पढ़कर हाथ धोने वाले 45% बढ़ गए। सिर्फ एक शब्द ने एक डॉक्टर ने डॉक्टरों का टेंशन बदल दिया।

उन्हें अपनी जान से ज्यादा मरीजों की फिक्र हुई। एक और मजेदार बात सुनिए। दवा कंपनियां डॉक्टरों को महंगे तोहफे देती हैं। ज्यादातर डॉक्टर इसे गलत मानते हैं। पर जब उन्हें उनकी पुरानी मेहनत याद दिलाई गई। तो वे तोहफे लेने के लिए तैयार हो गए यानी अक्सेप्टबल हो गए। उन्हें लगा हमने बहुत त्याग किया है और फल चाहिए। हमारा अटेंशन जहाँ होता है हम वैसे ही बन जाते हैं। आखिरी बात हम कौन हैं, यह हमारे अटेंशन पर टिका है। कोई भी फैसला, कोई भी चॉइस लेने से ठीक पहले आपका मन जहाँ होगा फैसला वैसा ही होगा, चाहे कोई दूसरा आपको इशारा दे। क्यों दे या आप खुद अपने लिए सही माहौल चुने? सारा खेल उसे एक सही मौके का है उस एक मूवमेंट का। यही बात मनवाने का असली और जादुई तरीका है। इसके साथ ये किताब खत्म हुई और फिर मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में एक नई किताब के साथ मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस विथ रोहित?

धन्यवाद।

Transcript supplied by the publisher with the episode.

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  4. 14 Jun 2026 · 1 hr 5 min

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    In "Alchemy: The Surprising Power of Ideas That Don't Make Sense," Rory Sutherland, the Vice Chairman of Ogilvy, presents a provocative and counter-intuitive manifesto against the tyranny of logic. His central thesis is that while logic is an essential tool for building machines, it is often a catastrophic tool for understanding humans. In a world increasingly governed by data, spreadsheets, and "arithmocracy," Sutherland argues that the most transformative solutions to our problems are often "illogical" because human behavior is driven by an evolutionary "psycho-logic" rather than linear…

  5. 13 Jun 2026 · 2 hr 4 min

    The Prince (Hindi/हिंदी में)

    00:00:00 INTRODUCTIONReal truth vs. imaginary statesThe lion and the fox strategyBetter to be loved or fearedGame of fortune and the life of Nicolo Machiavelli00:08:42 DEDICATIONGifting experience to Lorenzo de’ MediciWhy a Prince needs a commoner’s perspectiveThe mountain and plain analogy00:10:42 CHAPTER I: HOW MANY KINDS OF PRINCIPALITIES THERE ARERepublics vs. PrincipalitiesHereditary vs. New territoriesMethods of acquisition (Fortune vs. Ability)00:11:46 CHAPTER II: CONCERNING HEREDITARY PRINCIPALITIESMaintaining ancestral customsWhy hereditary states are easier to holdExample of the…

  6. 12 Jun 2026 · 5 hr 7 min

    The Origin Of Species (Hindi/हिंदी में)

    00:00:00 ORIGIN OF SPECIES. A foundational overview of how natural selection preserves favored races in the struggle for life.00:02:12 INTRODUCTION. Darwin’s initial observations and the progress of opinion on species' origins.00:05:57 CHAPTER I. VARIATION UNDER DOMESTICATION. Covers causes of variability, the effects of habit, and the use or disuse of parts. Explores inheritance, the origin of domestic varieties (like pigeons), and the difference between methodical and unconscious selection.00:31:47 CHAPTER II. VARIATION UNDER NATURE. Focuses on individual differences and doubtful species.…

  7. 5 Jul 2026 · 5 hr 37 min

    Demian (Hindi/हिंदी में)

    Published in 1919 under the pseudonym "Emil Sinclair," Demian is far more than a standard coming-of-age story. It is a feverish, introspective, and philosophical exploration of the human soul. Written by Hermann Hesse during a period of deep personal crisis and psychoanalysis (under a disciple of Carl Jung), the novel serves as a guide for anyone struggling to reconcile societal expectations with their own inner truth.It is a Bildungsroman (a novel of education/formation) that moves away from the physical world of action and adventure, diving instead into the turbulent waters of the…

  8. 4 Jul 2026 · 1 hr 23 min

    How to Change Your Mind (Hindi/हिंदी में)

    In his 2018 masterpiece, How to Change Your Mind: What the New Science of Psychedelics Teaches Us About Consciousness, Dying, Addiction, Depression, and Transcendence, Michael Pollan performs a remarkable feat of cultural alchemy. He takes a subject long relegated to the fringes of "hippie" counterculture and places it firmly within the realm of rigorous science, clinical medicine, and profound philosophical inquiry. The book is structured as a "mental travelogue," blending meticulous historical research with cutting-edge neuroscience and Pollan’s own transformative experiences as a…

  9. 3 Jul 2026 · 1 hr 9 min

    On the Shortness of Life (Hindi/हिंदी में)

    Seneca was a Roman thinker and a leader in the Stoic school. He wrote a short work called On the Shortness of Life. It is a letter to a man named Paulinus. But it also feels like a letter to us. The claim is bold and simple: life is not too short; we just waste most of it. This line sounds sharp. Yet the essay is warm. It gives us a way to use time well.Seneca starts by naming the problem. People say there is not enough time. They rush. They groan. They blame fate. Seneca says the fault is ours. We “are not given a short life but make it so.” Many fill their days with work that is not their…

  10. 2 Jul 2026 · 50 min

    Enchiridion (Hindi/हिंदी में)

    Epictetus wrote a small book called Enchiridion—meaning “manual,” or a sort of practical guide. This little text has had a profound impact on modern thought and philosophy. When it was translated into everyday language, it quickly became popular, especially among those who thought for themselves, those who challenged the Church, and those who valued their own inner life. Montaigne owned a copy. Pascal disliked the pride of Stoic philosophers. Frederick the Great carried it with him to every battle. When Anthony, Earl of Shaftesbury, was gravely ill, this book gave him strength and courage,…

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