Episode notes
In his influential work, The Status Syndrome, Sir Michael Marmot challenges the conventional wisdom that health is primarily a matter of genetics or personal choices. Instead, he argues that our position on the social hierarchy is the single most important factor in determining how long we live and what diseases we suffer from. This is not just about the difference between the very rich and the very poor. It is about a "social gradient" where, at every step down the ladder, health worsens and life expectancy drops.The Social Gradient and the Whitehall StudiesThe foundation of Marmot's theory…
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दुनिया के अमीर देशों में राज़ हेल्त बहुत अच्छी है। अब मलेरिया जैसी बीमारियां खत्म हो चुकी हैं। बच्चे भी यह पैदा होते ही नहीं मरते। यह जीने के लिए बहुत अच्छा समय है, लेकिन एक बात बहुत अजीब है। समाज में आपकी जगह कहाँ है, आपका स्टेटस कहाँ है?
यह तय करता है कि आप कब बीमार होंगे, आप कितना लंबा जीएंगे, यह भी आपके स्टेटस पर ही निर्भर करता है। ऊपर और नीचे वालों के बीच का यह फर्क बढ़ता ही जा रहा है। सोशल हेरेरिक यानी समाज की हैसियत का मतलब क्या है?
मान लीजिए आप गरीब नहीं हैं, आपके पास नौकरी है और पक्का घर है। आपके बच्चे भूखे नहीं सोते, आपको पीने का साफ पानी और अच्छा खाना मिलता है लेकिन फिर भी। समाज में कुछ लोग आप से ऊपर है। उनके पास ज्यादा पैसा, बड़ा घर या बड़ी नौकरी हो सकती है। लोग उनकी ज्यादा इज्जत करते हैं, उनका स्टेटस आपसे ऊपर है। वहीं कुछ लोग आपसे नीचे भी है। वे एकदम गरीब नहीं हैं पर उनका स्टेटस आपसे कम है। रिसर्च में एक हैरान करने वाली बात पता चली है। समाज की इस सीढ़ी पर इस लैंडर पर
आप जीतने ऊपर होंगे। आपकी सेहत उतनी ही अच्छी होगी। इसे ही मैं स्टेटर सिंड्रोम कहता हूँ। यह बात बहुत चौंकाने वाली है। अच्छे नौकरी वाले लोग उन लोगों से पहले क्यों मर जाते हैं, जो उनसे थोड़ा ज्यादा पढ़े लिखे हैं?
क्या पांच कमरों के घर में रहना चार कमरों से बेहतर है? क्या डिग्री ज्यादा होने से उम्र लंबी हो जाती है? इस किताब में मैं आपको इसका जवाब दूंगा। जब इंसान के पास बुनियादी यानी बेसिक जरूरतें पूरी हो जाती हैं तो एक और चीज़ बहुत जरूरी हो जाती है। पहली अपनी ज़िन्दगी पर आपका कितना कंट्रोल है?
दूसरी आपको समाज और लोगों के बीच कितनी पार्टीसिपेशन मिलती है? हेल्त और लंबी उम्र के लिए ये दोनों चीजें बहुत जरूरी हैं। जब हमें अपनी जिंदगी पर कंट्रोल नहीं मिलता तो हेल्त बिगड़ने लगती है। यही स्टेटस सिन्ड्रोम की असली वजह है। इसे समझने में मुझे 25 इयर्स की रिसर्च लगी। आज के जमाने में लोग हेल्त के लिए मशीनों की बात करते हैं, लेकिन असली बात हमारा काम और रहने का तरीका है। अमेरिका के वाशिंगटन शहर का एग्ज़ैम्पल लीजिए, वहाँ के मेट्रो ट्रैन में एक छोटा सा सफर करिए,
जैसे जैसे आप अमीर इलाके से गरीब इलाके की तरफ जाएंगे। लोगों की उम्र कम होती जाएगी। एक एंड और दूसरे एंड के लोगों की उम्र में 20 साल का फर्क है। ये सिर्फ अमेरिका की बात नहीं है। ब्रिटेन, जापान और रूस हर जगह यही हाल है। लोग सोचते थे कि ये सिर्फ अमीरी गरीबी का मामला है। लेकिन यह उससे कहीं ज्यादा गहरा है। यह समाज में उच्च नीच का असर है। हाइरार्की का यह किताब सिर्फ उन गरीबों के बारे में नहीं है। यह हम सब के बारे में है। हम इस सीढ़ी पर कहीं भी हों, ऊपर वाले हमसे ज्यादा हेल्ती हैं और
नीचे वाले कम। मैं यहाँ सिर्फ गरीबी की बात नहीं कर रहा। दुनिया में बहुत लोग सच में बहुत गरीब हैं। उनके पास खाना और दवा नहीं है लेकिन ये किताब उन लोगों के बारे में है जो गरीब नहीं है, फिर भी बीमार है हार्ट डिजीज और स्ट्रेस यानी दिल की बिमारी और मानसिक तनाव को। लोग अमीरों की बिमारी मानते थे। वे सोचते थे कि बड़ी जिम्मेदारी और काम के बोझ से ऐसा होता है, लेकिन यह सच नहीं है। सच तो यह है कि समाज में आपका स्टेटस जितना कम होगा, इन बीमारियों का खतरा उतना ही ज्यादा
होगा। ये सब हमारे ब्रेन की वजह से होता है। जब हमें समाज में नीचा महसूस होता है तो उसका बुरा असर हमारे शरीर पर पड़ता है। इससे हम बीमार हो जाते हैं। ज्यादातर लोग इस बात को समझते हैं कि जिंदगी की परेशानियां बीमार कर सकती हैं, लेकिन वैज्ञानिक और बड़े अवसर इस पर ध्यान नहीं देते। मेरा मकसद यही सोच को बदलना है। अगर हमें अपनी जिंदगी पर कंट्रोल मिले तो हम सब एक बेहतर और हेल्थी समाज बना सकते हैं। कुछ लोग कहेंगे कि गरीब इसलिए बीमार है क्योंकि वे सिगरेट पीते हैं या भूरा खाना खाते हैं।
कुछ कहेंगे कि उन्हें अच्छी दवा नहीं मिलती लेकिन असली वजह कुछ और है। समाज को चलाने का हमारा तरीका ही गलत है। जब तक सबको बराबरी और अपनी जिंदगी जीने का मौका नहीं मिलेगा, यह स्टेटस सिंड्रोम खत्म नहीं होगा। इसे बदलना हमारे हाथ में है। मैं एक डॉक्टर हूँ। शुरू में मुझे शरीर के विज्ञान में यानी साइंस में मज़ा आता था। फिर मैं असली मरीजों से मिला। मैंने देखा कि लोगों को सिर्फ शरीर की बिमारी नहीं है, उन्हें अपनी ज़िन्दगी से भी परेशानी है।
पागलखाने में काम करते हुए मुझे चिंता हुई मरीजों के पास घर नहीं था। उनके घर का माहौल खराब था। उन्हें ठीक करके वापस उसी दुख में भेजने का क्या फायदा? क्या हमें बाहर की दुनिया नहीं बदलनी चाहिए?
दिल और सांस के मरीज अस्पताल आते थे। हम उन्हें ठीक करके घर भेजते। तीन महीने बाद वे फिर बीमार होकर आ जाते। एक बार से दूसरी बात जुड़ी है। बिमारी की वजह ढूंढ़ते हुए मैं समाज तक पहुँच गया। समाज की बनावट ही तय करती है कि कौन बीमार होगा। अगर हमें सबकी सेहत सुधारनी है तो समाज को सुधारना होगा। फेमस इकोनॉमिस्ट अमृत्य सेन भी यही कहते हैं अगर किसी देश के लोग सवस्थ हैं, हेल्ती हैं तो वह देश सक्सेसफुल है, हेल्त से पता चलता है कि समाज अपने लोगों का ख्याल रख रहा है या नहीं?
एक इंटरेस्टिंग कहानी सुनाता हूँ आपको 1970 के दशक में। डेनियल पैट्रिक नाम के एक नेता थे। उन्होंने देखा कि सोवियत यूनियन में मौतें तेजी से बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि यह समाज की बिमारी है। यह सिस्टम जल्द ही गिर जाएगा। लेकिन उन पर लोग हंसे पर 9 साल बाद ठीक वैसा ही हुआ। सोवियत यूनियन में लोगों का अपनी जिंदगी पर कंट्रोल नहीं था। वे समाज के कामों में पार्टिसिपेशन नहीं ले पा रहे थे। जब लोगों का अपनी जिंदगी पर कंट्रोल नहीं चलता तो हेल्त बिगड़ने लगती है।
इसी से स्टेटस सिंड्रोम पैदा होता है। अमीर और गरीब देशों के बीच बहुत फर्क है, लेकिन मेरी रिसर्च आम लोगों पर है। अमर्त्य सेन कहते हैं कि विकास का मतलब है आजादी अपनी मर्जी से जीने की आजादी। जब लोगों के पास अपनी जिंदगी पर कंट्रोल नहीं होता तो बीमारियां फैलती हैं। कुछ लोग कहेंगे कि अमीर भी तो जल्दी मरते हैं जैसे प्रिंसेस डायना या विन्स्टन शर्ट शील जो खूब पीते थे पर लम्बा जिए, लेकिन ये सिर्फ एक्सेप्शन है, ज्यादातर पीने वाले जल्दी मरते हैं। मैं यहाँ एवरेज और आम लोगों की
बात कर रहा हूँ। अमीर देशों में लोग अब 70 से 80 साल जीते हैं, लेकिन उसी देश में कुछ लोग कम जीते हैं। अफ्रीका में एवरेज उमर सिर्फ 4050 साल है। हम अपनी पूरी पोटेंशिअल का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। स्टेटस विंड्रोम हमें पीछे खींच रहा है। ये किताब सिर्फ पैसों के बारे में नहीं है। पैसा जरूरी है पर सब कुछ नहीं। सबसे जरूरी है आपकी जगह, आपका स्टेटस, आप दूसरों के मुकाबले कहाँ खड़े हैं?
आपकी रिलेटिव पोज़ीशन क्या है? यह आपकी हेल्थ के लिए काफी जरूरी है। आपका स्टेटस आपके दिमाग पर असर डालता है। इससे आपकी बॉडी में स्ट्रेस पैदा होता है। यही स्ट्रेस बीमारियों का रास्ता खोलता है। अमेरिका के बारे में लोग कहते हैं कि वहाँ सब बराबर है पर यह सच नहीं है। वहाँ भी क्लास दिस्तिन्च्तिओन्स् यानी उच्च नीच बहुत ज्यादा है। एक मशहूर नाटक है लाबोहिम। इसमें दो प्रेमी हैं रुडोल्फ़ो और मिमी। दोनों ही बहुत गरीब हैं। रुडोल्फ़ो एक पढ़ा लिखा कवि है, वह अपनी मर्जी से गरीबी में जी
रहा है। वहीं मिमी एक बेचारी मजदूर हैं। मेमी को टीबी की बिमारी हो जाती है और वह मर जाती है। सवाल ये है कि रुडोल्फो क्यों नहीं मरा? रुडोल्फो के पास पढ़ाई थी और अपनी ज़िन्दगी पर कंट्रोल था। मेमी के पास ना पैसा था ना साथ देने वाला कोई और ना अपनी ज़िन्दगी पर कंट्रोल। सिर्फ प्यार किसी की जान नहीं बचा सकता। गरीबी का दुख प्यार से बड़ा हो जाता है। हमारी हेल्त और हमारी जिंदगी अलग अलग नहीं है। हम सोचते हैं कि हेल्त सिर्फ खान पान या एक सर साई से बनती है, लेकिन सच तो यह है कि समाज में
हमारी इज्जत, हमारा स्टेटस और हमारे रिश्ते तय करते हैं कि हम कब मरेंगे? इसे समझने के लिए एक परेड की कल्पना करिए। इमेजिनेशन करिए मान लीजिए सब लोग अपनी पढ़ाई के हिसाब से लाइन में खड़े हैं। जो सबसे कम पढ़े हैं वो सबसे आगे हैं। जैसे जैसे परेड आगे बढ़ती है। हम देखते हैं कि ज्यादा पढ़े लिखे लोगों के चेहरे पर एक अलग चमक है। जितनी ज्यादा पढ़ाई, उतनी लंबी उम्र। ये सिर्फ सबसे ऊपर और सबसे नीचे वालों की बात नहीं है। हर एक कदम जो आप पढ़ाई में ऊपर
चढ़ते हैं, आपकी हेल्त थोड़ी और अच्छी हो जाती है इसे। सोशल ग्रेडियंट कहते हैं, यही बात पैसों के साथ भी सच है। अमेरिका में एक रिसर्च हुई। इसमें पता चला कि सबसे गरीब घर के लोगों के मरने का खतरा सबसे अमीर लोगों से फोर टाइम्स ज्यादा होता है। जो लोग सबसे अमीर से सिर्फ एक पायदान नीचे हैं, उनके मरने का खतरा भी 34% ज्यादा होता है। ये सिर्फ गरीबी की समस्या नहीं है। यह इन इक्वलिटी यानी गैर बराबरी की समस्या है। ये हम सबको इफेक्ट करती है। अगर हम समाज की सीढ़ी में बीच में
हैं तो हमारी हेल्त सबसे ऊपर वालों से खराब होगी। एक और कहानी सुनिए। 1911 में कैप्टन स्कॉट साउथ पोल की यात्रा पर गए। उनके साथ चार और लोग थे। उनमें से एक थे सीमेन। इवांस इवांस सबसे मजबूत थे और लोअर क्लास से थे। लेकिन उस कड़कड़ाती ठंड में सबसे पहले इवांस मरे क्यों? क्योंकि इवांस का अपनी ज़िन्दगी पर कोई कंट्रोल नहीं था। वो सिर्फ हुक्म मानने वाले थे। जब चीजें खराब हुईं तो उनके दिमाग ने साथ छोड़ दिया। स्ट्रेस ने उनके शरीर को तोड़ दिया।
हमें एक और एग्ज़ैम्पल लीजिए हॉलीवुड का, यहाँ तो सबके पास बहुत पैसा है पर यहाँ भी एक नेचुरल एक्स्पेरमेन्ट हुआ। जो ऐक्टर ऑस्कर जीतते हैं, वे दूसरे ऐक्टर से लगभग 4 साल ज्यादा जीते हैं। सोचिए सिर्फ एक ही नाम जीतने से उम्र 4 साल बढ़ गई, यह पैसा नहीं? क्योंकि जो नहीं जीते उनके पास भी बहुत पैसा था। यह है इज्जत स्टेटस और खुद पर गर्व। सेल्फ स्टीम ऑस्कर जीतने से मिलने वाली इज्जत इंसान के दिल की बिमारी के खतरे को लगभग खत्म कर देती है। लेकिन यह बात स्क्रिप्ट राइटर्स
पर लागू नहीं होती। वे ऑस्कर जीते या नहीं जीते? उनकी उम्र नहीं बढ़ती। शायद इसलिए क्योंकि वे इज्जत के लिए नहीं सिर्फ पैसों के लिए लिखते हैं। कौन कौन सी बीमारियां इस हाइरार्की को मानती हैं इस सीढ़ी को इसका जवाब है लगभग सब। अब समाज में जितना नीचे होंगे खतरा उतना ही ज्यादा होगा। दिल की बिमारी, स्ट्रोक, फेफड़ों की बिमारी, किडनी डिजीज और यहाँ तक कि सुसाइड भी इसी सीढ़ी के हिसाब से चलती है। 25 साल पहले जब मैंने अपनी रिसर्च शुरू की तो मेरी सासुमा ने मुझसे एक सवाल पूछा।
जब मैंने उन्हें बताया कि मैं क्या जांच रहा हूँ तो वे थोड़ा अनकम्फ़र्टेबल हो गईं। मैं यह देख रहा था कि ऑफिस की चपरासी को बड़े साहब के मुकाबले हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा क्यों होता है? उस जमाने में सब यही मानते थे कि बड़े साहब को ज्यादा स्ट्रेस होती है। इसलिए उन्हें ही हार्ट अटैक आना चाहिए। अखबारों में भी यही छपता था, लेकिन मेरी रिसर्च ने दिखाया कि पुरानी सोच गलत थी। अब हाइरार्की अब सीढ़ी पर नीचे रहने वालों को दिल की बिमारी का खतरा ज्यादा है।
पर घबराइए मत, एक अच्छी खबर भी है। सबकी हेल्त सुधर सकती है। ब्रिटेन के आंकड़ों को देखिए 1970 के मुकाबले 1919 में हर क्लास के लोगों की उमर उनकी लाइफ एक्सपेक्टिंग से बढ़ी है। एक मजदूर यानी अनस्किल्ड मैन्युअल की उमर भी 20 सालों में काफी सुधर गई। यहाँ तक कि 1919 के एक साधारण मजदूर की उम्र 1970 के एक अमीर डॉक्टर ये इंजीनियर से भी ज्यादा थी। इसका मतलब है कि हेल्त सिर्फ हमारे शरीर पर निर्भर नहीं है अगर समाज के हालात सुधरे। तो सबकी उमर लंबी हो सकती है,
लेकिन एक बुरी खबर भी है। अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। 1970 में ऊपर और नीचे वालों के बीच उमर का फर्क 5.5 इयर्स था। 1919 तक यह बढ़कर 9.5 इयर्स हो गया। अब सवाल यह है कि टीबी और दिल की बिमारी में क्या कनेक्शन है? टीबी एक बैक्टीरिया से होती है एक कीटाणु से, लेकिन 100 साल पहले भी गरीब लोग टीबी से ज्यादा मरते थे। इस बैक्टीरिया की दवा आने से बहुत पहले ही टीबी से मौतें। 80% तक कम हो गई थी। ये इसलिए हुआ क्योंकि लोगों के रहने के हालात और खाना सुधर रहा था।
आज दिल की बिमारी के लिए हम स्मोकिंग या गलत खाने को दोष देते हैं, लेकिन असली सवाल ये है कि हाइरार्की में नीचे रहने वाले लोग ज्यादा स्मोकिंग क्यों करते हैं? या वे खराब खाना क्यों खाते हैं?
वजह है बेबसी हेल्पलस्स्नेस जब इंसान को लगता है कि उसकी जिंदगी पर उसका कंट्रोल नहीं है तो वह इस स्ट्रेस में रहता है। यही हेल्पलस्नेस यही बेबसी हमारे शरीर को बीमारियों के लिए कमजोर बना देती है। बैक्टीरिया स्मोकिंग तो सिर्फ जरिया है असली बिमारी तो समाज की ये उच्च नीच है ये हैरारे की हमें सिर्फ कीटाणुओं से नहीं, इस हेल्पलस्स्नेस से भी लड़ना होगा। हमें ये समझना होगा कि एक इंसान का बीमार होना और एक पूरे ग्रुप का बीमार होना। दो अलग बातें हैं।
हम पूछ सकते हैं कि फलाना क्यों बीमार हुआ? पर ज्यादा जरूरी? सवाल है कि कम पढ़े लिखे लोग ज्यादा पढ़े लिखे लोगों से ज्यादा बीमार क्यों होते हैं? एक इंसान की बिमारी की वजह उसकी अपनी हो सकती है। पर एक पूरे ग्रुप की बिमारी की वजह समाज के हालात होते है। सोशल कंडीशन्स डॉक्टर जेफ्री रोज़ अपनी हेल्त का बहुत ख्याल रखते थे। वे फिट थे और सिगरेट नहीं पीते थे। इंग्लैंड के हिसाब से उनका खतरा बहुत कम था, पर अगर उनकी। कंपॅरिज़न चीन या जापान के लोगों
से करें तो उनका खतरा ज्यादा था क्योंकि इंग्लैंड में दिल की बिमारी का रेट बहुत ज्यादा है। एक कम खतरे वाला अंग्रेज भी एक एवरेज जापानी से ज्यादा खतरे में होता है। सड़क हादसों को ही देख लीजिए हर साल करीब करीब एक जीतने ही हादसे होते हैं। मरने वाले लोग अलग होते हैं पर हादसों का नंबर, उनका रेट वैसा ही रहता है। आदमी औरतों के मुकाबले ढ़ाई गुना से ज्यादा हादसों में मरते हैं। इसे सिर्फ किस्मत या बुरी घड़ी नहीं कह सकते। ये एक फिक्स्ड पैटर्न है, एक तय पैटर्न है जो समाज में दिखता है।
शिकागो और इंग्लैंड में एक स्टडी हुई। दोनों जगह जवान लड़के एक दूसरे को ज्यादा मारते हैं। यह जवान लड़कों का एक जैसा नेचर हो सकता है, पर शिकागो में मर्डर होने का रेट इंग्लैंड से 30 टाइम्स ज्यादा है। वजह है शिकागो के समाज के हालात। सोशल एनवायरनमेंट वहाँ का माहौल लड़कों के अंदर के गुस्से को हिंसा में बदल देता है। आपकी सेहत पर दो चीजों का असर पड़ता है। पहला आप अंदर से कैसे हैं आपके जीन्स?
दूसरा, आपके आसपास का माहौल, आपके आसपास का एनवायरनमेंट कैसा है? अगर आपके माता पिता 100 साल जिए तो आपकी उम्र लंबी होने का चांस है, पर अगर आप बहुत खराब माहौल में रह रहे हैं तो वह चांस कम हो जाएगा। इंसान अपने माहौल के हिसाब से ही रेस्पॉन्ड करता है। शेक्सपियर ने एक बार कहा था कि हमारी किस्मत तारों में नहीं। बल्कि हमारे खुद के अंदर है। क्या हम अपनी स्टेटस लेकर पैदा होते हैं या ऐसे खुद हासिल करते हैं? सच तो ये है कि समाज की सीढ़ी ये हाइरार्की पर हम जहाँ खड़े होते हैं उसका हमारी सेहत पर काफी गहरा
असर पड़ता है। मेरी जिंदगी ब्रिटिश सरकारी नौकरी की रिसर्च ने बदल दी। मैंने पिछले 30 सालों से सरकारी कर्मचारियों की हेल्त पर नजर रखी है। इसे व्हाइट हॉल स्टडी कहते हैं। यहाँ हाईरर की ऊंच नीच बहुत साफ है, इसलिए इसे समझना आसान है। इस स्टडी में एक हैरान करने वाली बात पता चली। सबसे नीचे के पदों पर काम करने वाले लोगों के मरने का खतरा सबसे बड़े अफसरों के मुकाबले चार गुना ज्यादा था। लोग अक्सर कहते हैं कि गरीब लोग इसलिए बीमार होते हैं क्योंकि वे बुरा बर्ताव करते हैं।
जैसे सिगरेट पीना, कसरत न करना या खराब खाना खाना। वे इसे अपनी मर्जी फ्रीव्हील का नाम देते हैं। पर हमने जब इसकी गहराई से रिसर्च की तो हकीकत कुछ और ही निकली। अगर हम सिगरेट, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसी चीजों को अलग कर दें। तो भी सेहत का यह फर्क बना रहता है। ये सब चीजें मिलकर सेहत के फर्क को सिर्फ 30% वजह ही बता पाती हैं। बाकी 70% फरक की वजह कुछ और है। कुछ लोग सोचते हैं कि शायद सबको एक जैसा डॉक्टर मिले तो फरक खत्म हो जाएगा। लेकिन व्हाइट हॉल स्टडी में सबको एक जैसी हेल्त सर्विस मिलती थी,
फिर भी सेहत का यह अंतर कम नहीं हुआ। इसका मतलब है कि इलाज से ज्यादा जरूरी वह एनवायरनमेंट है, जिसमें हम जीते हैं। क्या हमारी सेहत सिर्फ हमारे जीन्स पर टिक्की है? कुछ लोग कहते हैं कि अमीर हो ना उनके खून में है। वे कहते हैं कि गरीब अपने जीन्स की वजह से बीमार है, लेकिन यह सच नहीं है। जीन जरूरी है पर एनवायरनमेंट भी उतना ही जरूरी है। लंबाई और समाज की हैसियत, हाइट और स्टेटस का गहरा रिश्ता है। ब्रिटेन में एक फेमस टीवी शो आया था उसमें। तीन लोग अपनी लम्बाई के हिसाब से खड़े थे।
सबसे लंबा आदमी बोला मैं ऊंची क्लास का हूँ, मैं इन दोनों को नीचे देखता हूँ, बीच वाला बोला मैं मिडिल क्लास का हूँ, मैं उससे ऊपर देखता हूँ और इससे नीचे सबसे छोटा आदमी बोला मैं अपनी औकात अपना प्लेस जानता हूँ। ये सिर्फ मजाक नहीं है, ये सच है। बड़े असर नीचे वालों से पांच सेंटीमीटर दो इंचेस ज्यादा लंबे होते हैं। क्या लंबा होने से प्रमोशन मिलती है या बड़े अफसर बनने पर लंबाई बढ़ जाती है?
नहीं, असली वजह कुछ और है। इस एनवायरनमेंट में हम पलते हैं। वही सब तय करता है। लंबा होना बायोलॉजिकल फिटनेस की निशानी है। लंबे लोगों को दिल की बिमारी कम होती है। छह फुट लंबे लोगों को हार्ट अटैक का खतरा 40% कम हो जाता है। मेरे अपने परिवार की एक कहानी सुनिए। मेरे दादा के नौ बच्चे थे। मेरे चाचाओं की लंबाई अलग अलग थी, बड़े भाई सबसे छोटे थे क्योंकि तब परिवार गरीब था, उन्हें बचपन में अच्छा खाना नहीं मिला। जैसे जैसे परिवार की कमाई बढ़ी, छोटे भाइयों की लंबाई बढ़ती गई।
सबसे छोटा भाई फिर से थोड़ा छोटा रह गया। क्योंकि उसके पैदा होने से पहले ही पिता की मौत हो गई थी। परिवार फिर से तंगी में आ गया था। यही बात पूरे देश पर भी लागू होती है। पिछले 150 सालों में इंसानों की एवरेज लम्बाई बढ़ी है। जर्मन लोग पहले अमेरिकियों से छोटे थे, वे अमेरिकियों से लंबे हैं। हमारे जीन्स इतनी जल्दी नहीं बदल सकते। यह सब अच्छे खाने और अच्छे एनवायरनमेंट का कमाल है। अब बात करते हैं इन्टेलिजेन्स की। बड़े अफसरों का दिमाग तेज होता
है, पर क्या वे ऐसा दिमाग लेकर पैदा हुए थे? रिसर्च कहती है कि 1950 के बाद से सबका बड़ा है। आज के बच्चे अपने माँ बाप से 20 पॉइंट्स ज्यादा होशियार हैं। जिन और एनवायरनमेंट मिलकर काम करते हैं। जो बच्चा मेस में अच्छा है, उसे वैसा ही माहौल मिलता है। इससे वह और होशियार हो जाता है। इसलिए समाज की उच्च नीच ये हैरैरी की सिर्फ। जीन का खेल नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि मलाई हमेशा ऊपर आती है। मतलब हेल्ती लोग तरक्की करके ऊपर पहुँच जाते हैं और बीमार लोग नीचे
रह जाते हैं। इसे हेल्त रिलेटेड सोशल मोबिलिटी कहते हैं। रिसर्च कहती है कि ऐसा होता तो है पर बहुत कम। असल में आपकी आज का स्टेटस ये आपकी हेल्त को तय करता है। अगर एक गरीब घर का लड़का मेहनत करके बड़ा अवसर बनता है तो उसकी हेल्त सुधर जाती है। ये उसकी कामयाबी और सोशल कंडीशन्स की वजह से होता है। एडम स्मिथ कहते थे कि नेसेसिटी जरूरत सिर्फ रोटी नहीं है, जरूरत वह चीज़ है जो समाज में इज्जत यानी डीसेंसी दिलाए जैसे पुराने जमाने में बिना शर्ट के बाहर जाना बुरा माना जाता था।
जूते न हों। तो गरीब आदमी शर्मिंदा महसूस करता था। समाज के ये कायदे तय करते हैं कि आपके पास क्या होना चाहिए? एक पुरानी कहावत है, अगर गरीब आदमी मुर्गा खा रहा है तो समझिए या तो आदमी बीमार है या फिर मुर्गा समाज अपने खास लोगों को पैसा। स्टेटस और पावर देता है। ये तीनों चीजें हमारी सेहत यानी हमारी हेल्त से जुड़ी हैं। लोग सोचते हैं कि पैसा ही सब कुछ है, पर क्या बैंक बैलेंस शरीर को ठीक रखता है?
क्या पैसा सिर्फ अच्छे डॉक्टर खरीदने के काम आता है? रिसर्च कहती है कि अगर सब के पास बराबर पैसा हो तब भी हेल्त की ऊँच नीच हैरार की रहेंगी। स्टेटस सिंड्रोम सिर्फ पैसे से खत्म नहीं होता, गरीब के लिए उसकी गरीबी ही सबसे बड़ी बिमारी है। गरीब देशों में पैसा बेसिक नीड्स पूरी करने के काम आता है। जैसे साफ पानी, घर और खाना एक बार पेट भर जाए तो स्टेटस ज्यादा जरूरी हो जाती है। तभी हम मायने रखता है कि आप दूसरों के मुकाबले कहाँ खड़े हैं। आपकी रिलेटिव इन्कम क्या है?
पैसा तो सिर्फ एक स्कोर बन जाता है जिससे सक्सेस नापी जाती है। 100 साल पहले अमीर देशों में भी गरीब बच्चे बहुत मरते थे। 1900 में इंग्लैंड के न्यूयॉर्क शहर में चार में से एक बच्चा 1 साल का होने से पहले मर जाता था। आज 100 में से शायद ही एक बच्चा मरता है। पुराने जमाने में कोयला खानों में काम करने वाले बहुत दुख में रहते थे। एक ही बिस्तर पर तीन लोग बारी बारी से सोते थे। वे हफ्ते में सिर्फ एक बार मांस खाते थे। घर में नमी, ठंड और गंदगी रहती थी। इसी वजह से बच्चों की मौत और बड़ों को टीबी जैसी बीमारियां
होती थी। आज के गरीब आदमी 100 साल पहले के अमीर आदमी से बेहतर हालात में है। पुराने जमाने के अमीरों के बच्चे भी आज के गरीबों के मुकाबले ज्यादा मरते थे। मतलब साफ है कि अगर समाज तरक्की करता है तो गरीब बच्चों के बचने का चांस भी बढ़ जाता है। अमीर देशों में अब पैसे का सहस से वह रिश्ता नहीं रहा। अमेरिका दुनिया का सबसे अमीर देश है, पर लंबी उम्र के मामले में वह 20 सिक्स्थ नंबर पर आता है। ग्रीस जैसे देशों में अमेरिका से आधा पैसा है, फिर भी वहाँ लोग
ज्यादा जीते हैं। एक बार मटेरियल कंडीशन्स पूरी हो जाएं तो ज्यादा पैसा बेहतर हेल्त की गारंटी नहीं देता। अमेरिका में रहने वाले काले लोगों की कहानी दीजिए। उनके पास दुनिया के हिसाब से अच्छा पैसा है पर वे कोस्टा रिका जैसे गरीब देश के लोगों से भी कम जीते हैं। न्यूयॉर्क के हार्ली में रहने वाले तीन में से दो काले लड़के 65 की उम्र तक नहीं पहुँच पाते। उनकी मौत की वजह गंदगी नहीं बल्कि दिल की बिमारी, खूनखराबा और एचआइवी एड्स हैं। मनी कम होना ही असली गरीबी नहीं है।
पैटिन नाम की एक महिला की कहानी सुनिए। वह एक दुकान पर कैशियर है, उसके पास घर है, पानी है और खाना भी है, पर वह अपने बच्चों को बाहर खेलने नहीं भेज सकती। बाहर बहुत मार पिट और गंदगी रहती है। पैटी के पास बच्चों को स्विमिंग ले जाने के पैसे नहीं हैं। वह अपने बच्चों को वह जूते नहीं दिला पाती जो दूसरे बच्चों के पास है। वह खुद को अकेला महसूस करती है। स्ट्रेस दूर करने के लिए वह सिर्फ सिगरेट पीती है। नर्स कहती है कि सिगरेट मत पियो। यह हेल्त के लिए बुरा है।
पर पेटी की असली बिमारी सिगरेट नहीं बल्कि लैक ऑफ़ कंट्रोल है, उसकी बेबसी है। वह समाज के सोशल पार्टिसिपेशन से कटी हुई है। उसे समाज में दूसरों के बराबर होने का मौका नहीं मिलता। यही बेबसी उसे बीमार बना रही है। कभी कभी हमें ऐसी बात पता चलती है। जो हमारी दुनिया बदल देती है। समर्थ सेन की एक किताब ने मेरे साथ ये किया। उन्होंने लिखा कि हर इंसान बराबरी चाहता है पर हर कोई अलग चीज़ की बराबरी चाहता है। कोई कहता है कि सबको बराबर पैसे मिले।
दूसरा कहता है कि सबको अपनी मर्जी की आज़ादी मिले, फ्रीडम मिले। ये दोनों अपनी अपनी जगह बराबरी की ही बात कर रहे हैं। बस उनकी सोच अलग अलग है। अमृत सिंह ने एक नया तरीका दिया। इसे कैपेबिलिटीज़ का तरीका कहते हैं। काबिलियत का गरीबी का मतलब सिर्फ कम पैसे होना नहीं है, असली गरीबी का मतलब है। अपने जिंदगी को ढंग से जीने की ताकत न होना, पैसा अपने आप में सब कुछ नहीं है। पैसा तो बस एक जरिया है। असली मकसद तो अपनी मर्जी की जिंदगी जीना है। इसे आजादी या फ्रीडम भी कह सकते
हैं। अगर आपके पास पैसे हैं पर आप समाज में। सोशल पार्टिसिपेशन नहीं बढ़ा सकते तो वो पैसा बेकार है यूरोप में लोगों से एक सवाल पूछा गया गरीब कौन है? लोगों ने जो जवाब दिया वे बहुत इंटरेस्टिंग थे। उन्होंने रोटी कपड़ा नहीं बल्कि कुछ और ही चीजें गिनाई। अगर आप ये काम नहीं कर सकते तो आप गरीब हैं। घर की पुरानी चीजें ठीक कराने का पैसा न होना घर को थोड़ा सजाने के पैसे न होना नौकरी के इंटरव्यू के लिए अच्छे कपड़े न होना, कभी कभार दोस्तों को चाय नाश्ते पर घर न
बुला पाना, साल में एक बार कहीं घूमने न जा पाना। बच्चों के लिए भी कुछ जरूरी चीजें बताई गई। खिलौने और साइकिल का न होना स्कूल की पिकनिक पर ना जा पाना, दोस्तों को घर पर बुलाकर खिला पिलाना पाना। अगर आप अपने बच्चों को नए जूते नहीं दिला सकते तो आप खुद को गरीब समझेंगे। भले ही आपके पास खाने के लिए रोटी हो, इसे रिलेटिव गरीबी रिलेटिव पॉवर्टी कहते हैं। यानी दूसरों के मुकाबले खुद को कम समझना यही सोच इंसान को स्ट्रेस देती है, तनाव देती है। एक इंटरेस्टिंग रिसर्च स्वीडन में
हुई। वहाँ देखा गया कि। पीएचडी करने वाले लोग ज्यादा लंबा जीते हैं। वे उन लोगों से भी ज्यादा जीते हैं जो सिर्फ कॉलेज गए थे। पढ़ाई का उम्र से क्या रिश्ता? ज्यादा पढ़ाई से इंसान को अपनी जिंदगी पर ज्यादा कंट्रोल मिलता है, उसे समाज में ज्यादा स्टेटस मिलती है। यही स्टेटस, यही इज्जत और कंट्रोल? उसे हेल्ती रखता है। अमीर दोषों में जहाँ इनेक्वलिटी ज्यादा है, जहाँ उच्च नीचे ज्यादा है, वहाँ मौतें भी ज्यादा होती हैं। ये सिर्फ इसलिए नहीं कि वहाँ लोग गरीब हैं बल्कि इसलिए कि वहाँ
समाज में मेलजोल कम है। वहाँ। सीढ़ियों वहाँ हाइजैरीस बहुत ऊंची और नुकीली हैं। जॉन कैनेथ गॉलब्रिथ ने एक बड़ी बात कही थी। उन्होंने पूछा, क्या भूख से तड़पना ज्यादा बुरा है या पड़ोसी की नई कार देखकर जलन महसूस करना? मेरे एक दोस्त ने मेरी रिसर्च की कंपॅरिज़न पर हुई एक रिसर्च से कर दी। अखबारों ने मजाक उड़ाया, सरकारी अफसरों को बंदर बना दिया पर इसमें एक गहरा लेसन भी था। नीचे वाले बंदर सिगरेट नहीं पीते, वे बर्गर या पिज़्ज़ा भी नहीं खाते।
वे डॉक्टर के पास से जाना भी नहीं भूलते। फिर भी जो बंदर अपनी हेररकी में नीचे होते हैं, वे ज्यादा बीमार पड़ते हैं। उनकी हेल्त ऊपर वाले बंदरों से यानी बबों से खराब होती है। मतलब हेल्त का खराब होना सिर्फ बुरी आदतों का फल नहीं है यह। समाज की सीढ़ी में यह हाइजार्की में नीचे होने का नतीजा है। अगर सीढ़ी हमेशा रहेंगी तो उच्च नीच भी हमेशा रहेंगी और सेहत का यह फर्क भी बना रहेगा। क्या यह सब हमारे नेचर में है? क्या इसे बदला नहीं जा सकता?
मेरा जवाब है, इसे बदला जा सकता है। स्टेटस सिंड्रोम सिर्फ शरीर का बायोलोजी नहीं है। यह समाज और बायोलोजी दोनों का मेल है। पोंछ नीच शायद हमेशा रहे पर उसके नतीजे बदले जा सकते हैं। अमरती सेन कहते हैं कि हमें देखना चाहिए कि इंसान क्या कर सकता है यानी उसकी कैपेबिलिटीज क्या है? अगर समाज के हालात अच्छे हैं तो सबकी सेहत अच्छी होगी। सेहत ये बताती है कि हमारा समाज कैसा है। हैपीनेस पर हुई रिसर्च भी यही कहती है। पिछले 3040 सालों में देश शमीर
हुए पर लोग ज्यादा खुश नहीं हुए। अमेरिका और जापान में पैसा बहुत बढ़ा, पर हैपीनेस पर खुशी वहीं की वहीं रही पैसे से खुशी तभी मिलती है जब आप अपने साले या पड़ोसी से ज्यादा कमाते हैं। अगर सबकी कमाई बढ़ जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें बस दूसरों से ऊपर देखना है। एकेडमी के लोगों को ही देख लीजिए, उन्हें कार की परवाह नहीं है, पर उन्हें इस बात की बहुत परवाह होती है कि दूसरे उनके काम की कितनी इज्जत कर रहे हैं। इंसान के अंदर एक खास तरह का पक्षपार्थिक सेल्फ एनहांसमेंट
बायस होता है। अमेरिका के कॉलेज स्टूडेंट्स से पूछा गया कि वे दूसरों से कितने बेहतर हैं? ज़्यादातर ने कहा कि वे एवरेज से बहुत बेहतर हैं। बेटर थान एवरेज। वहीं जापान के स्टूडेंट्स ने खुद को सबके बराबर बताया। हम हमेशा खुद को दूसरों से ऊपर दिखाने की कोशिश करते हैं। यह कॉम्पिटिशन ही उच्च नीच यानी हेरार्की पैदा करता है। इंसानी नेचर पुराने जमाने से ऐसे ही रही है पुराने जमाने में ताकतवर मर्द को। ज्यादा इज्जत, ज्यादा स्टेटस मिलती थी।
उसे अच्छे रीसोर्सेस और पार्ट्नर्स मिलते थे। इसी चक्कर में समाज में हाईलेरिटीज यानी सीढ़ियों बनती गई। मर्द हमेशा एक दूसरे से आगे निकलने की कॉम्पिटिशन में रहते हैं। वे पावर दिखाना चाहते हैं। वहीं औरतें। मिलजुलकर काम करना पसंद करती हैं पर औरतों की सेहत पर भी इस स्टेटस का असर पड़ता है। मर्दों ने शायद यह ऊँच नीच बनाई हो पर औरतें भी इसमें फंसी हुई हैं। औरतों को भी समाज में पीछे छूट जाने का दुख बीमार करता है। समाज की यह सीढ़ी यह हाइरेड की हर जगह एक जैसी नहीं होती।
बंदरों में भी फर्क होता है। एक तरह के बंदर का बड़ा साहब अकेले सब खा जाता है लेकिन चिंपैंजी मिलजुलकर खाना बांटते हैं। मतलब नीचे होने का दुख हर समाज में अलग होता है। पुराने जमाने में लोग जिराफ का शिकार करते थे। जिराफ बड़ा होता है, उसे अकेला आदमी नहीं मार सकता। शिकारी आपस में को ऑपरेशन करते थे। जब शिकार मिलता तो सब बांटकर खाते थे क्योंकि तब फ्रिज नहीं थे तो दूसरे को खिलाना ही सबसे अच्छा था। आज आप खिलाइए कल वो खिलाएगा। इसे रेसिप्रोसिटी यानी मेलजोल कहते हैं।
लेकिन जैसे ही खेती शुरू हुई, उंच नीच ये हैरारची बढ़ गई। कुछ लोगों ने अनाज जमा कर लिया और वे अमीर हो गए, उनकी स्टेटस बढ़ गई, समाज में दरारें पड़ने लगीं। मर्दों में इज्जत यानी स्टेटस पाने की भूख हमेशा से रही है। वे दूसरों से आगे निकलना चाहते हैं। एक इंटरेस्टिंग बात ये है कि स्टेटस सिर्फ पैसे से नहीं मिलती जेनरोसिटी यानी दानपुण्य और दया से भी मिलती है। अगर कोई अमीर आदमी दान करता है तो वह सबको अपनी ताकत अपनी पावर दिखा रहा होता है।
वह बताता है कि उसके पास इतना है कि वह बांट सकता है। यह दूसरों का दिल जीतने का एक तरीका है। लोगों को अपने स्टेटस की बहुत चिंता रहती है। एक एक्स्पेरमेन्ट हुआ। लोगों से पूछा गया क्या आप 1,00,000 कमाना चाहेंगे? अगर सब 80,000 कमा रहे हो, ये आप 2,00,000 कमाना चाहेंगे, अगर सब 2,50,000 कमा रहे हो। ज्यादातर लोगों ने पहला रास्ता चुना। वे चाहते हैं कि वे दूसरों से ऊपर रहे, भले ही पैसे थोड़े कम हो इसे। स्टेटस एन्क्साइटी कहते हैं, हैसियत की चिंता यही चिंता समाज में गुस्सा और मारपीट पैदा करती
है। शिकागो के गरीब इलाकों में लड़के एक दूसरे को जान से मार देते हैं। क्यों सिर्फ रिस्पेक्ट के लिए, इज्जत के लिए अगर किसी ने उन्हें गलत तरीके से देख लिया? तो वे इसे अपमान समझते हैं। अमरनाथ सेन कहते हैं कि किसी देश की तरक्की का अंदाजा वहाँ के लोगों की जिंदगी से लगाना चाहिए। हमें सिर्फ अच्छा खाना पीना ही नहीं चाहिए। हमें अपनी जिंदगी पर खुद का फैसला लेने का हक भी चाहिए। ऑटोनोमी चाहिए। अगर भूकंप आए और आपके पास उसे रोकने का बटन हो तो वह भूकंप आपके लिए स्ट्रेस नहीं होगा लेकिन अगर
वो बटन सिर्फ बड़े लोगों के पास हो, बड़े लोग उसे जब चाहे रोक दें और छोटे लोग कुछ न कर पाएं तब छोटे लोगों की हेल्त पर इसका बुरा असर पड़ेगा। हमारी जिंदगी में ताकत यानी पावर का यही खेल चलता है। समाज में हमारी जगह ऊंची है या नीची? इसी से तय होता है कि हमारी जिंदगी पर हमारा कितना कंट्रोल है, जिसका कंट्रोल जितना कम उसकी सेहत उतनी ही खराब। 22 जून 1919 सिक्स की बात है। फुटबॉल के मैच में हॉलैंड और फ्रांस की टीमें आमने सामने थीं। हॉलैंड की 60% पॉपुलेशन टीवी पर मैच दिख रही थी।
मैच बहुत रोमांचक था। आखिर में मामला पेनल्टी शूटआउट तक पहुँच गया। एक फुटबॉल प्रेमी के लिए यह। मूवमेंट बहुत ही बेचैनी भरा होता है। आप प्रार्थना करते हैं या फिर चिल्लाते हैं? उस दिन हॉलैंड में 41 मर्दों को दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। आम दिनों के मुकाबले मौत का यह आंकड़ा 50% ज्यादा था। हैरानी की बात ये है कि औरतों की मौत का आंकड़ा नहीं बढ़ा क्यों? क्योंकि औरतों के लिए फुटबॉल का मैच इतना बड़ा स्ट्रेस नहीं था, उन्हें मर्दों का निक्कर पहनकर
गेंद के पीछे भागना बेकार लगता था। स्ट्रेस वही है, जिसे आप महसूस करें। इतिहास में भी ऐसे कई एग्ज़ैम्पल्स हैं। अट्ठारहवीं सदी के मशहूर डॉक्टर जॉन हंटर को दिल की बिमारी थी। वह कहते थे कि मेरी जान उस बदमाश के हाथ में है जो मुझे गुस्सा दिला दे। 1 दिन अस्पताल की मीटिंग में उन्हें बहुत गुस्सा आया और वहीं उनकी मौत हो गई। अचानक आने वाले स्ट्रेस तो खतरनाक हैं। लेकिन जो स्ट्रेस हर रोज़ धीरे धीरे हमें मारता है, वह और भी बुरा है इसे समझने के लिए मारिया और रिकी कहानी को समझते हैं।
मारिया ये कपड़ा फॅक्टरी में काम करती है। उसे डर है कि फॅक्टरी कभी भी बंद हो सकती है उसकी। तनख्वाह बहुत कम है। 1 दिन पुलिस उसकी कार उठा ले गई। कार छुड़ाने के लिए $200 चाहिए जो उसके पास नहीं है। कार के बिना वह काम पर नहीं जा सकती। काम नहीं तो पैसे नहीं मारिया को लगता है कि उसकी जिंदगी पर उसका कोई नहीं है। वह बेबस में महसूस करती है। अगर रिक्की बात करें तो रिक उसी फैक्टरी का मालिक है, उसे भी चिंता है कि धंधा मंदा चल रहा है। वह फैक्टरी बंद करने का खुद का
फैसला ले सकता है। उसे पता है कि अगर फैक्टरी बंद हुई तो वह बाहर से सामान मंगाकर बेच लेगा। उसके पास पैसे हैं, स्टेटस है, और दोस्तों के साथ है अगर उसकी कार पुलिस ले जाए तो वह एक फ़ोन घुमाएगा और पैसे दे देगा उसके लिए यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। रिक और मारिया दोनों को अपनी अपनी जगह टेंशन है, लेकिन रिक के पास पावर है। वह चीजों को बदल सकता है। मारिया के पास कोई रास्ता नहीं है, वह सिर्फ किस्मत के भरोसे है। यही बेबसी मारिया को बीमार बना रही है। जब हमें लगता है कि हम अपनी
जिंदगी की मुश्किलें हल नहीं कर सकते तो हमारा शरीर जवाब देने लगता है। स्ट्रेस को कम करने वाली पांच मेन चीजें हैं पहला खुद का फैसला लेना यानी कंट्रोल, दूसरा आने वाली मुश्किल का अंदाजा होना प्रेडिक्टेबिलिटी तीसरा लोगों का साथ मिलना सोशल सपोर्ट चौथा अपनी इज्जत का। बना रहना यानी स्टेटस और पांचवा मन बहलाने का जरिया होना। यानी आउटलेट्स, अमीर और ऊंचे पद वाले लोगों के पास ये पांचों चीजें होती हैं, लेकिन समाज में नीचे खड़े लोगों के पास इनमें से
कुछ भी नहीं होता। यही वजह है कि स्टेटस एंड रूम उन्हें। जल्दी बीमार कर देता है। स्ट्रेस क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि यह सिर्फ सोचने का तरीका है, पर क्या हम इसे नाप सकते हैं? अगर स्ट्रेस बिमारी की असली वजह है तो हमें इसे गहराई से समझना होगा। मारिया जैसी औरत के लिए जिसकी नौकरी चली गई, यह सिर्फ सोच नहीं है। यह उसकी कड़वी सच्चाई है। शरीर में स्ट्रेस कैसे घुसती है, इसे समझने के लिए जानवरों को देखते हैं। ज़ेब्रा और शेर की कहानी देखिए जब शेर ज़ेब्रा के पीछे पड़ता है।
तो दोनों के शरीर में एक जैसा बदलाव होता है। उस समय शरीर अपनी पूरी एनर्जी मसल्स को दे देता है। शरीर जानता है कि यह खाना पचाने या ग्रोथ का समय नहीं है। उस पल में बच्चा पैदा करना या बिमारी से लड़ना भी जरूरी नहीं है। शरीर का पूरा ध्यान सिर्फ जान बचाने पर होता है, इसे लड़ो या भागो?
फाइट और फ्लाइट वाला रिएक्शन कहते हैं। इसमें हमारे शरीर के दो बड़े सिस्टम काम करते हैं। पहला है नसों का सिस्टम जब आप जोश में होते हैं। तो दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। जब आप योगा करते हैं तो शरीर आराम बोर्ड में चला जाता है तो पेट में गुड़गुड़ होती है क्योंकि शरीर खाना पचा रहा होता है। दूसरा सिस्टम दिमाग से जुड़ा है। जब दिमाग को खतरा महसूस होता है तो वह। कॉटेज़ोल नाम का हार्मोन निकालता है। यह हार्मोन थोड़े समय के लिए तो
ठीक है पर अगर यह बहुत ज्यादा निकले तो पेट के पास चर्बी जमा होने लगती है। वेलिफेट इससे शुगर यानी डायबिटीज़ की बिमारी भी हो सकती है। हम इंसान शेर से नहीं भागते। पर हमारे लिए ऑफिस की मीटिंग या लोगों के सामने बोलना भी किसी शेर से कम नहीं है। उस समय भी हमारा शरीर वैसा ही महसूस करता है जैसे शेर के सामने जीबरा। थोड़े समय का तनाव एक्यूट स्ट्रेस शरीर के लिए अच्छा है। मुसीबत तब शुरू होती है जब ये तनाव जब ये स्ट्रेस लंबे समय तक बना रहे। इसे क्रोनिक स्ट्रेस कहते हैं।
जब आप रोज़ रोज़ अपने स्टेटस को लेकर परेशान रहते हैं तो शरीर थक जाता है, नसों में गंदगी जमा होने लगती है और दिल की बिमारी का खतरा बढ़ जाता है। बंदरों पर हुई एक रिसर्च में यही देखा गया। जो बंदर अपनी हेरारकी में नीचे थे, अपनी डोली में नीचे थे, उनके दिल की नसें। उनकी आर्टरीज जल्दी बंद होने लगीं। ये उनके खाने की वजह से नहीं था। ये उनके नीचे होने के स्ट्रेस की वजह से था। यही हाल व्हाइट हॉल स्टडी में सरकारी दफ्तरों में काम करने वालों का भी मिला।
सीढ़ी पर आप जीतने नीचे होंगे। पेट की चर्बी और ब्लड प्रेशर उतना ही ज्यादा होगा। इसे मेटाबोलिक सिंड्रोम कहते हैं, तो बात सिर्फ। गोलियां खाने की नहीं है। हमें उस चाबू को उस वीप को रोकना होगा जो हमें स्ट्रेस दे रहा है। यानी हमें अपने समाज और काम करने के माहौल को हमारे सोशल एनवायरनमेंट को सुधारना होगा, ताकि सबको अपनी जिंदगी पर कंट्रोल मिल सके। काम हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा है। ज्यादातर लोग खाली बैठने के बजाय काम करना पसंद करते हैं, लेकिन काम आपकी हेल्त के लिए अच्छा है
या बुरा, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप क्या काम करते हैं। काम हमें सिर्फ पैसा नहीं देता। यह हमें एक पहचान भी देता है। एक ऐडेंटिटी। जब आप किसी से मिलते हैं तो आप बताते हैं कि आप डॉक्टर हैं, मास्टर हैं या ड्राइवर यह समाज में आपकी स्टेटस को तय करता है। एक बड़े अफसर की स्टेटस सड़क साफ करने वाले से ज्यादा होती है और यही चीज़ हमारी हेल्त पर असर डालती है। अक्सर लोग कहते हैं कि बड़े साहब को बहुत काम है, इसलिए उन्हें बहुत टेंशन है, लेकिन असलियत कुछ
और है। टेंशन या स्ट्रेस का मतलब सिर्फ बहुत सारा काम होना नहीं है। असली टेंशन असली स्ट्रेस तब होती है जब आपके पास काम तो बहुत हो पर उसे करने का कोई कंट्रोल ना हो। नयजेल और मजूरी की कहानी सुनिए नयजेल एक बड़ा सरकारी अफसर है, उसके पास 2000 लोग काम करते हैं। उसके पास काम का बहुत बोझ है। वह कहता है काम बहुत है, बहुत स्ट्रेस है पर मुझे इसमें मज़ा आता है। क्यों?
क्योंकि नाइजर के पास खुद का फैसला लेने की ताकत है। उसके पास कंट्रोल है। वह तय कर सकता है कि काम कैसे करना है। अब मजूरी को देखिए। वो सिर्फ टाइपिंग का काम करती है। उसके पास नाइजर जितना काम नहीं है लेकिन उसके पास कोई भी फैसला। लेने का हक नहीं है। उसे ऑफिस में बात करने तक की मनाही है। वह कहती है, यह काम मेरी आत्मा को मार रहा है। मजूरी जैसा काम करने वालों को दिल की बिमारी और डिप्रेशन का खतरा ज्यादा होता है। रिसर्च कहती है कि जिन लोगों का
अपने काम पर कंट्रोल कम होता है। उन्हें हार्ट अटैक आने का चांस बढ़ जाता है। ये सिर्फ गरीब लोगों के साथ नहीं होता। एक ही लेवल पर काम करने वाले दो लोगों में से जिसका कंट्रोल कम होगा, वह ज्यादा बीमार पड़ेगा। जापान की कंपनियों ने इस चीज़ को बहुत अच्छे से समझा है। जापान की फैक्ट्रियों में कार्य बेहतर और जल्दी बनती हैं। वहाँ के मैनेजर अपने वर्कर को इज्जत देते हैं, वर्कर को ट्रेनिंग दी जाती है और उनसे सलाह ली जाती है। वहाँ वर्कर और मैनेजर दोनों एक जैसी यूनिफॉर्म पहनते हैं।
इसका नतीजा ये है कि वहाँ के वर्कर कम बीमार पड़ते हैं और काम भी ज्यादा अच्छा होता है। इसे कहते हैं को ऑपरेशन यानी मिलजुलकर काम करना कंट्रोल सिर्फ ऑफिस तक नहीं रहता। घर के हालात भी हेल्त पर असर डालते हैं। हमने अपनी। व्हाइट हॉल टू स्टडी में एक बात दिखी जिन्हें घर पर अपने कंट्रोल चलाने का मौका नहीं मिलता, उन्हें दुखी रहने की बिमारी होने का यानी डिप्रेशन होने का खतरा ज्यादा है। खासकर उन औरतों के लिए यह बात बहुत जरूरी है अगर ऑफिस के काम
में उन्हें खुशी नहीं मिलती। तो वे चाहती हैं कि कम से कम घर पर उनकी चले। अगर वहाँ भी उन्हें कोई नहीं पूछता तो वे जल्दी बीमार पड़ने लगती हैं। औरतों के लिए घर का कंट्रोल दिल की बिमारी से भी जुड़ा है। नौकरी का चला जाना भी कंट्रोल छीनने जैसा है। मारिया के पति पॉल की नौकरी उसकी मर्जी के बिना गई मारिया को भी डर है कि उसकी नौकरी चली जाएगी। पॉल को पता नहीं था कि ऐसा होगा। उसके समाज में स्टेटस भी कम हो गई। स्ट्रेस दूर करने के लिए वह शराब पीने लगा।
ज्यादातर नीचे के पदों पर रहने वालों की नौकरी जल्दी जाती है। ये एक बड़ी है। 1930 में जब नौकरियां गईं तो लोग दाने दाने को मोहताज हो गए। एक्स्ट्रीम पावर टी आई, लेकिन 1980 के समय में ऐसा नहीं था। सरकार पैसे तो दे रही थी फिर भी बेरोजगार लोग बीमार पड़ रहे थे। वैज्ञानिक और नेताओं के बीच इस पर बड़ी बहस हुई। कुछ ने कहा बीमार होने की वजह से नौकरी छोड़ती है। कुछ बोले नौकरी जाने के दुःख से इंसान बीमार होता है। सच्चाई ये है की नौकरी जाने से इंसान की समाज में जगह खत्म हो जाती है।
वह खुद को बेकार समझने लगता है। मारिया की नौकरी अभी गई नहीं है, पर उसे डर है कि कभी भी उसे निकाला जा सकता है। यह अन्सर्टन्टी यह अनिश्चितता ही उसे बीमार कर रही है। अभी उसके पैसे कम नहीं हुए पर उसकी सोच उसकी एक्सपेक्टेशन्स बदल गई है। सिर्फ नौकरी जाने का डर ही हेल्त बिगाडने के लिए काफी है। काम करने के तरीके को भी समझना होगा। हम समाज में मिलजुल कर रहते हैं, हम मेहनत करते हैं और बदले में इनाम चाहते हैं। ये इनाम सिर्फ पैसा नहीं है। इसमें इज्जत यानी स्टेटस और करियर
ऑपर्च्युनिटीज़ भी आते हैं। अगर आप मेहनत बहुत ज्यादा करते हैं और बदले में आपको इज्जत यानी स्टेटस और पैसा कम मिलता है तो आपको दिल की बिमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। एक अच्छा समाज वही है जहाँ सबकी मेहनत की कदर हो और सबको अपनी जिंदगी पर। कंट्रोल मिले जो सिर्फ कॉर्नरोड की एक मशहूर कहानी है। इसमें एक अमीर जवान लड़का रिकॉर्ड है। वह एक टापू पर अकेला फंस जाता है। वह इतना अकेला था कि उसे खुद पर से भरोसा उठ गया। आखिर में उसने खुद को गोली मार ली।
डॉक्टर कहेंगे कि यह सुसाइड थी आत्महत्या पर असल में उसे अकेलापन ने मारा था। क्या अकेलापन क्या आइसोलेशन सच में जान ले सकता है? हाँ बिलकुल, यह सिर्फ मन का दुख नहीं है, यह हमारे शरीर को भी मार कर देता है। हमारे शरीर के अंदर बीमारियों से लड़ने की ताकत होती है। आइसोलेशन इसी ताकत को कमजोर कर देता है। जब शरीर कमजोर होता है तो कीटाणु हमला कर देते हैं। स्ट्रेस होने पर मर्द अक्सर या तो लड़ते हैं या भाग जाते हैं, इसे लड़ो या भागो। कहते हैं फाइट और फ्लाइट।
पर औरतें ऐसा नहीं करती। औरतों का तरीका है ख्याल रखना और दोस्त बनना ज़रा 1,00,000 साल पहले की सोचिए एक माँ के साथ उसका छोटा बच्चा है। अगर सामने कोई खूंखार जानवर आ जाए तो माँ क्या करेगी? क्या वह बच्चे को छोड़कर भाग जाएगी? बिल्कुल नहीं। वह बच्चे को सीने से लगाएगी, फिर वह दूसरी औरतों के साथ मिलकर घूँट बनाएगी। साथ रहने से सबको सुरक्षा मिलती है। ख्याल रखने और प्यार करने से शरीर में एक हार्मोन निकलता है जिसे ऑक्सीटोसिन कहते हैं। यह हार्मोन हमें सुकून और शांति देता है।
औरतों में हार्मोन ज्यादा बनता है इसलिए कोआपरेशन उनकी सेहत के लिए बहुत अच्छा है। समाज का इसलिए मतलब है कि मिलकर काम करना। बंदर एक दूसरे का शरीर साफ करके ग्रूमिंग करके अपना प्यार दिखाते हैं। पर इंसानों के पास भाषा है, हम बातें करते हैं और गॉसिप लड़ाते हैं। यह गॉसिप ही हमें आपस में जोड़ती है। इससे हमें अकेलापन महसूस नहीं होता। बिमारी कैसे होती है इसे समझना जरूरी है। नेपोलियन की एक कहानी है। कहते हैं कि वह एक युद्ध हार गया क्योंकि उसे जुकाम था।
पर क्या सिर्फ जुकाम से कोई हारता है? नहीं। हार की वजह हालात भी थे। बिमारी के लिए दो चीजें चाहिए एजेंट यानी कीटाणु जैसे टीबी का बैक्टीरिया, दूसरा शरीर की ताकत यानी होस्ट रेसिस्टेंस। यानी कीटाणु से लड़ने की क्षमता। 100 साल पहले गरीब लोग टीबी से ज्यादा मरते थे। कीटाणु यानी बैक्टीरिया तो सबको लगता था पर गरीबों के पास लड़ने की ताकत कम थी। उनकी गरीबी और अकेलापन ही उनकी मौत की असली वजह थी। एक कहानी है लाइब्रेरी ऑफ़ बैबल की। वहाँ किताबों का ढेर लगा है, पर असली बात है उन्हें ऑर्गनाइज़
करना, उन्हें सजाना डॉक्टर भी बीमारियों को अलग अलग सजाते हैं। मेडिकल की पढ़ाई में हर अंग अलग है। दिल का इलाज अलग किडनी का अलग पर बीमारियों की जड़ एक हो सकती है। जैसे मान लीजिए तीन मरीज हैं, एक को बुखार और स्पॉट्स हैं, दूसरे को पेट में बहुत दर्द है, तीसरे को पीलिया हो गया है। डॉक्टर कहेंगे तीनों की बीमारियां अलग है। इलाज के लिए यह सोचना ठीक है पर प्रिवेंशन के लिए तीनों एक है। तीनों को बिमारी कंटेमिनेटेड फुड यानी गंदा खाना खाने से हुई है।
मतलब रूट कॉस गंदा खाना ही है। कुछ लोग बार बार बीमार पड़ते हैं, उनकी फाइलें बहुत मोटी हो जाती हैं। हेन्स सेली ने इस पर एक रिसर्च की। उन्होंने देखा कि बीमार होना एक जैसा है, चाहे बैक्टीरिया कोई भी हो। बीमार होने पर शरीर स्ट्रेस में आता है, स्ट्रेस लड़ने की ताकत कम करती है। इससे इंसान को कई बीमारियां घेर लेती हैं। औरतों का स्ट्रेस झेलने का तरीका अलग है। मृद अक्सर लड़ते या भागते हैं। फाइट और फ्लाइट पर औरतें ख्याल रखती हैं। वे औरों को दोस्त बनाती हैं,
मुसीबत में अपने बच्चों को बचाती हैं, फिर वे दूसरों के साथ मिल जाती हैं। साथ रहने से उनकी ताकत बढ़ती है। इसे ख्याल रखना और दोस्त बनाना कहते हैं। यह मेलजोल, यह सोशल सपोर्ट सेहत के लिए अच्छा है। शादी भी एक तरह का साथ है। शादीशुदा लोग कुवारों से ज्यादा लंबा जीते हैं। शादी शरीर को बीमारियों से बसाती है। यह मर्द और औरत दोनों के लिए सच है। साथ रहने से लड़ने की ताकत बढ़ती है जब घर पर सोशल सपोर्ट होता है, मेल जोल होता है। तो दिल के बिमारी का खतरा भी कम हो जाता है पर हाइरार्की यहाँ भी
असर डालती है। समाज में नीचे होने से मेलजोल कम होता है। आइसोलेशन यानी अकेलापन इंसान को कमजोर बनाता है। कम पढ़े लिखे लोग जल्दी बीमार पड़ते हैं। क्योंकि उनके पास खुद का फैसला लेने की ताकत कम है। उनकी मदद करने वाले लोग भी कम होते हैं। यही स्टेटस सिंड्रोम की कहानी है। नथान, डेट्रॉयट और एडिलेड की कहानी भी सुनी है। एडिलेड 14 साल से शादी का इंतजार कर रही थी। उसे डर था कि इस इंतजार से उसे जुकाम हो जाएगा। उसे लगता था कि अकेलापन उसे बीमार कर देगा।
एक डॉक्टर शीलन कुहे ने इस पर रिसर्च की। उन्होंने लोगों की नाक में जुकाम का वायरस डाला। सबको एक जैसा वायरस दिया गया पर सब बीमार नहीं हुए। कुछ लोग जुकाम से बच गए। डॉक्टर ने देखा कि किनके कितने दोस्त थे, जिनके पास बहुत सारे रिश्ते थे, सोशल रिलेशनशिप ज्यादा थे, वे कम बीमार पड़े। जिनके पास सिर्फ एक से तीन रिश्ते थे, वे तीन गुना ज्यादा बीमार हुए। मतलब सोशल टाइज़ मेलजोल। हमें बीमारियों से बचाता है। आइसोलेशन यानी अकेलापन सिर्फ जुकाम नहीं देता।
ये जान भी ले सकता है। रिक और मारिया की कहानी भी याद कीजिए। फॅक्टरी बंद होने पर रिक के पास उसकी पत्नी और दोस्त है। पर मारिया के पास कोई सहारा नहीं था। उसका पति। खुद दुखी था और शराब पीता था। समाज की सीढ़ी पर आप जीतने नीचे होंगे, साथ देने वाले लोग उतने कम होंगे। मुझे पद वाले लोगों के पास दोस्त और क्लब्स ज्यादा होते हैं, नीचे वालों के पास सिर्फ परिवार होता है, कभी कभी परिवार भी साथ देने के बजाय। बोझ बन जाता है। अब बात करते हैं गुस्से की। हॉस्पिलिटी कुछ शहर बहुत गुस्से
वाले होते हैं, जैसे न्यूयॉर्क किया फिलाडेल्फ़िया वहाँ लोग एक दूसरे पर कम भरोसा करते हैं। सिएटल जैसे शहर शांत और फ्रेंड्ली होते हैं। जहाँ लोग एक दूसरे पर भरोसा करते हैं, वहाँ सबकी सेहत अच्छी रहती है। इसे सोशल कैपिटल कहते हैं। जब समाज में सोशल टाइज़ बढ़ता है यानी मेलजोल तो बीमारियां कम होती हैं। पुराने जमाने के एक वैज्ञानिक एमिल दुरखिम ने इस पर बड़ी बात कही। उन्होंने देखा कि जहाँ लोग समाज से जुड़े थे, वहाँ आत्महत्या यानी सुसाइड कम थी।
जब लोग एक दूसरे का साथ देते हैं तो दुख झेलना आसान होता है। एक और बात दूसरे विश्व युद्ध यानी वर्ल्ड वॉर टू के समय इंग्लैंड में लोगों की उम्र बढ़ गई। ऐसा इसलिए हुआ। जो की मुसीबत में सब एक साथ आ गए थे, लोग एक दूसरे की मदद कर रहे थे। मान लीजिए आपके घर में बेटा तेज गाना बजा रहा है। अमेरिका या लंदन में पड़ोसी पुलिस को फ़ोन कर देगा पर जापान के टोक्यो में नजारा अलग है। वहाँ पड़ोसी बड़े प्यार से आकर आपको समझाएगा, वह कहेगा कि यह मयवाकू है यानी पूरे मोहल्ले के लिए शर्म की बात है।
जापान में लोग खुद से ज्यादा समाज का सोचते हैं। यही मेलजुल कर रहने की जिम्मेदारी उन्हें हेल्ती रखती है। जापान इस दुनिया में हेल्त का राजा है। अमेरिका सबसे अमीर है, फिर भी सेहत में पीछे है जापानी मृद औसतन 77.5 इयर्स तक जीते हैं अमेरिकी मृद सिर्फ 73.9 साल ही जी पाते हैं। जापान की औरतें तो 84.7 साल तक की लंबी उम्र जीती हैं। अमेरिकी औरतों की उम्र सिर्फ 79.5 इयर्स है एक और हैरान करने वाली बात है 15 साल के अमेरिकी लड़के के मरने का डर 15% है। जापानी लड़के के लिए यह डर सिर्फ
9% है। मतलब अमेरिकी लड़के के लिए खतरा 60% ज्यादा है। लोग पूछते हैं कि जापानी लोग इतने फिट हुए हैं? यह उनके जीन का कमाल नहीं है। 40 साल पहले उनकी उम्र काफी कम थी। इतने कम समय में जीन्स नहीं बदलते। वे दवाइयों पर भी ज्यादा पैसा नहीं खर्च करते। अमेरिका के लोग डॉक्टर पर जापान से दोगुना पैसा खर्च करते हैं, फिर भी जापान के लोग ज्यादा हेल्ती हैं। हैरानी की बात ये है कि जापान के लोग खूब सिगरेट पीते हैं। वहाँ आधे से ज्यादा मर्द सिगरेट पीते हैं।
उनका खान पान भी अब बदल रहा है, फिर भी उनके यहाँ दिल की बिमारी कम हो रही है। वजह है उनका आपस में गहरा मेलजुल उनका सोशल कोहीश़न। जापान में क्राइम भी बहुत कम है। अमेरिका में 1,00,000 लोगों में से 700 जेल में है। जापान में यह गिनती सिर्फ 48 है। 48। वहाँ लोग एक दूसरे पर बहुत भरोसा करते हैं। अगर कोई बड़ा अफसर कोई गलती करता है तो वह टीवी पर आकर सबके सामने माफी मांगता है। वह कहता है कि उसने सबका नाम खराब किया। जापान में नौकरियां अक्सर जिंदगी भर के लिए होती हैं। वहाँ मालिक अपने वर्कर को परिवार
का हिस्सा मानता है। अमेरिका में कंपनियां सिर्फ अपना प्रॉफिट देखती हैं। मंदी आने पर वे वर्करों को काम से निकाल देती हैं। जापान में मेरी गरीबी का फर्क भी बहुत कम है। अमेरिका में अमीर 20% लोग देश का 46% पैसा ले जाते हैं। जापान में यही अमीर लोग सिर्फ। 35% पैसा ही रखते हैं। वहाँ पैसा सबसे ज्यादा बराबरी से बंटा है। जब जापानी लोग अपना देश छोड़कर अमेरिका गए तो उनकी हेल्त धीरे धीरे बिगड़ने लगी। इसे निहान शॉन स्टडी में देखा गया। जो लोग अमेरिका जाकर अकेले रहने लगे, उन्हें दिल की बिमारी ज्यादा
हुई। पर जो लोग अपनी कम्यूनिटी से जुड़े रहे, वे दिल की बिमारी से बच गए। साफ है कि अकेलापन जहर है और साथ रहना दवा। भारत के केरल राज्य में एक बीड़ी फॅक्टरी है। वहाँ मजदूर दिन भर बीड़ी बनाते हैं। पर वहाँ एक बहुत अनोखी बात होती है। मज़दूरों के बीच एक आदमी न्यूसपेपर पढ़ता है। वह न्यूसपेपर ज़ोर ज़ोर से सबको सुनाता है। बाकी मजदूर अपना काम करते रहते हैं। रोज़ एक ही काम करना कितना बोरिंग होता है, इंसान का दिमाग थक जाता है। केरल में मज़दूरों का मन लगाने के
लिए यह तरीका निकाला गया। इससे मज़दूरों को दुनिया की खबरें भी मिल जाती हैं। ये दिखाता है कि वहाँ के लोग एक दूसरे का कितना ख्याल रखते हैं। वहाँ लोगों की कमाई बहुत कम है, पर वहाँ बच्चों की मौत का आंकड़ा बहुत कम है। केरल में 1000 में से सिर्फ 17 बच्चे मरते हैं। 17। वहीं भारत के अमीर राज्यों में यह संख्या यह नंबर 65 है। एडम स्मिथ कहते थे कि कुछ चीजें इज्जत के लिए जरूरी होती हैं नेसेसरी से जैसे फ्रिज, टी वी या कार। अगर ये चीजें आपके पास नहीं है तो
आप समाज में शर्मिंदा महसूस करते हैं। हमारे स्टडी में पता चला कि जिनके पास ये चीजें ज्यादा थी उनकी हेल्त भी अच्छी थी। कार होना सिर्फ एक इशारा नहीं है, यह आपको खुद पर गर्व महसूस कराता है, आपका सेल्फ स्टिम अच्छा रखता है। इसे दुनिया पर भरोसा भी कह सकते हैं। ओंटोलॉजिकल सिक्योरिटी जब आपको लगता है कि समाज आपके लिए काम कर रहा है तो आप सेफ महसूस करते हैं। एक रिसर्च में देखा गया कि पैसों और दिमाग की शक्ति यानी आईक्यू के बीच गहरा रिश्ता है। जैसे जैसे घर की इनकम बढ़ती है,
बच्चों के टेस्ट स्कोर्स अच्छे होते जाते हैं। ये सिर्फ पैसों की बात नहीं है। इसमें अच्छा खाना यानी नुट्रिशन खेलकूद और सीखने के मौके शामिल हैं। अगर किसी गरीब बच्चे को एक अच्छे और पढ़े लिखे परिवार में गोद दे दिया जाए अडॉप्शन? तो उसका 12 पॉइंट तक बढ़ सकता है। यही नहीं उसके क्राइम करने का खतरा भी आधा हो जाता है। इसका मतलब है कि अच्छा एनवायरनमेंट अच्छा माहौल किस्मत बदल सकता है। डॉक्टर जॉन बाल्बी ने एक बहुत जरूरी बात कही थी। उन्होंने अटैचमेंट की थ्योरी दी।
इसका मतलब है माँ और बच्चे का गहरा रिश्ता। अगर बचपन में बच्चे को अपनी माँ का प्यार और साथ मिले तो वह आगे चलकर मजबूत बनता है। जो बच्चे बचपन में अकेले रह जाते हैं, वे बड़े होकर चिड़चिड़े और गुस्सेल यानी एग्रेसिव हो जाते हैं। जेल में बंद ज्यादातर कैदियों के बचपन में यही कमी देखी गई है। बंदरों पर हुई एक इंटरेस्टिंग कहानी है कुछ बंदर जन्म से ही बहुत डरपोक और घबराने वाले होते हैं। हाई रिएक्टर्स वे समाज में सबसे नीचे रह जाते हैं, लेकिन अगर इन डरपोक बंदरों को।
सुपर मम यानी बहुत प्यार देने वाली माँ के पास छोड़ दिया जाए तो चमत्कार हो जाता है। वेबंदर न सिर्फ निडर बनते हैं बल्कि अपनी टोली के लीडर बन जाते हैं। यानी एक अच्छी माँ और अच्छा एनवायरनमेंट जन्म से मिली कमजोरी को भी। जेनेटिक वीकनेस को भी दूर कर सकता है। हम बंदर तो नहीं है पर हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। बंदरों पर हुई रिसर्च से एक बात साफ है। बचपन के एक्सपीरियंस ज़िन्दगी भर साथ रहते हैं। माँ बाप हमारे लिए समाज का पहला चेहरा होते हैं। अगर समाज माँ बाप को परेशान करेगा
तो उसका बुरा असर सीधे बच्चों पर पड़ेगा। बचपन का असर तीन तरीकों से होता है पहला तरीका है जो बचपन में हुआ वह छाप छोड़ देता है। दूसरा तरीका है अच्छी और बुरी चीजें उम्र भर जमा होती रहती हैं। तीसरा तरीका है बचपन तय करता है कि आप बड़े होकर कहाँ पहुँचेंगे, आपका बचपन ही आपके फ्यूचर का रास्ता बनाता है। डेविड बार्कर ने एक बड़ी खोज की। उन्होंने बताया कि माँ के पेट का माहौल बहुत जरूरी है। अगर बच्चा पैदा होते समय बहुत कम वजन का है तो 50 साल बाद उसे शुगर
का खतरा ज्यादा होगा। डायबिटीज़ का उसे दिल की बिमारी होने का चांस भी बढ़ जाता है। एक बार। वैज्ञानिक के बीच बड़ी बहस हुई। कुछ ने कहा बचपन सबसे जरूरी है। कुछ ने कहा बड़े होने के बाद के हालात जरूरी है। सच्चाई ये है कि दोनों ही जरूरी है। अगर बचपन में तंगी थी और बड़े होकर भी मुश्किलें रहे तो बिमारी का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। चूहों पर हुई एक रिसर्च बहुत कुछ सिखाती है। अगर चूहा अपनी माँ के प्यार और दुलार में पलता है तो वह बड़ा होकर कॉन्फिडेंट बनता है।
निडर उसका शरीर स्ट्रेस को अच्छे से झेल पाता है, पर अगर माँ खुद परेशान है और बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाती। तो ये बच्चे जिंदगी भर डरे सहमे यानी में रहते हैं। इंसानों में भी यही देखा गया। अनाथ आश्रम यानी ओर्फेनेज में रहने वाले बच्चे अक्सर परेशान रहते हैं। उनकी दिमागी बनावट उनकी न्यूरोबायोलॉजी तक बदल जाती है। वे बच्चे औरों पर भरोसा नहीं कर पाते। एक और जरूरी बात सामने आई है। सिर्फ सिंगल मदर होना कोई बुरी बात नहीं है। असली समस्या गरीबी और पढ़ाई की
कमी है। अगर माँ पढ़ी लिखी है और उसके पास पैसे हैं तो उसके बच्चे और बच्चों जैसे ही हेल्दी होते हैं। पर अगर माँ गरीब और हेल्पलेस है तो उसके बच्चों को मुश्किलें ज्यादा आती हैं। डिवोर्स यानी तलाक का भी बच्चों पर गहरा असर पड़ता है। जो लड़कियां बचपन में माँ बाप का झगड़ा देखती हैं, उन्हें बड़ी होकर डिप्रेशन ज्यादा होता है। ये सिर्फ माँ बाप के अलग होने का दुख नहीं है। यह उस एनवायरनमेंट का असर है, जो उन्हें घर में मिला। समाज में नीचे होने का मतलब है जिंदगी पर कम कंट्रोल और लोगों के
साथ कम मजूर यानी सोशल पार्टीसिपेशन।
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