Episode notes
"Kafan" (1936) is widely considered Munshi Premchand’s last and most famous short story. Moving away from his earlier idealistic portrayals of village life, "Kafan" is a brutal, cynical, and dark exploration of human psychology under the crushing weight of extreme poverty. It tells the story of two men who have been stripped of their dignity and humanity by a lifetime of hunger and social apathy.The Setting and The "Anti-Heroes"The story introduces us to Ghisu (the father) and Madhav (the son), two members of a lower-caste family sitting outside their hut on a cold, dark night. Inside the…
Transcript
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झोपड़ी के दरवाजे पर बाप और बेटा एक बुझती हुई आग के पास चुपचाप बैठे थे। अंदर बेटे की पत्नी बुधिया बच्चे के जन्म के दर्द से तड़प रही थी। उसके मुँह से ऐसी डरावनी आवाजें निकल रही थी कि सुनकर दिल कांप जाता था। ठंड की रात थी, चारों तरफ सन्नाटा था और पूरे गांव में अंधेरा छाया हुआ था। घिसु ने कहा लगता है वह नहीं बचेगी। पूरा दिन हो गया जा ज़रा देख तो आ माधव चिढ़कर बोला अगर उसे मरना ही है तो जल्दी क्यों नहीं मर जाती? मैं देखकर क्या करूँ? घिसु ने कहा तू कितना पत्थर दिल है बे, साल भर उसके साथ रहा और अब ऐसी बातें कर रहा है। माधव ने जवाब दिया, मुझसे उसका तड़पना और हाथ पांव मारना देखा नहीं जाता। ये दोनों बहुत गरीब थे और पूरे गांव में बदनाम थे। घीसु अगर 1 दिन काम करता तो 3 दिन आराम करता। माधव इतना आलसी था कि आधे घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता इसलिए उन्हें कोई मजदूरी पर नहीं रखता था। अगर घर में थोड़ा भी अनाज होता तो वे कसम खा लेते थे कि काम नहीं करेंगे। जब कई दिनों तक हम भूखे रहते तब घिसू। लकड़ियां काट लाता और माधव उन्हें बेच देता। जब तक पैसे रहते वे खाली घूमते रहते। गांव में काम की कमी नहीं थी पर इन दोनों को लोग तभी बुलाते थे जब कोई और ना मिले। उनका जीवन बहुत अजीब था। घर में मिट्टी के दो चार बर्तनों के अलावा कुछ नहीं था।
फटे कपड़ों में जैसे तैसे अपना शरीर ढकते थे। उन्हें दुनिया की कोई चिंता नहीं थी। उन पर बहुत कर्ज था, लोग उन्हें गालियां देते और मारते भी थे पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। लोग ये सोचकर भी उन्हें थोड़ा पैसा दे देते थे कि वापस तो मिलना नहीं है। वे दूसरों के खेतों से मटर या आलू चुरा लाते और भूनकर खा लेते। घेसू ने अपने 60 साल की उम्र ऐसे ही गुजार दी। और माधव भी अपने बाप के नक्शे कदम पर चल रहा था। उस समय भी दोनों आँख के पास बैठकर चुराए हुए आलू भून रहे थे। घेसू की पत्नी बहुत पहले मर चुकी थी। माधव की शादी पिछले साल हुई थी। क्नॉइस उस औरत के आने से घर में कुछ खाने पीने का इंतजाम होने लगा था। वह इन दोनों भी शर्मो का पेट भरती थी। उसके आने के बाद ये दोनों और भी आलसी हो गए थे और वही औरत दर्द से मर रही थी और ये दोनों इंतजार कर रहे थे। कि वह कब मरेगी ताकि वे चैन से सो सके। घिसू ने आलू छीलते हुए कहा जा जाकर देख उसकी क्या हालत है शायद किसी चुड़ैल का साया हो यहाँ तो हकीम भी ₹1 मांगता है। माधव को डर था कि अगर वह अंदर गया तो घिसु ज्यादा आलू खा जाएगा। उसने कहा मुझे वहाँ जाने से डर लगता है। घिसु ने कहा डर क्यों? मैं तो यही हूँ माधव बोला तो तुम ही जाकर देख लो ना घिसु बोला। जब मेरी पत्नी मरी थी तो मैं 3 दिन तक उसके पास से हटा नहीं था और फिर वह मुझसे शर्म करेगी।
मैंने आज तक उसका चेहरा नहीं देखा, आज उसका शरीर कैसे देखूं? उसे अपने शरीर का होश भी नहीं होगा, मुझे देखेगी तो शायद ठीक से तड़प भी ना पाए। माधव ने कहा मैं सोच रहा हूँ अगर बच्चा हो गया तो क्या होगा? घर में तेल गुड़ कुछ भी तो नहीं है घिसु बोला सब इंतजाम हो जाएगा, भगवान ने चाहा तो जो लोग आज एक पैसा नहीं दे रहे, कल वही खुद बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ बच्चे हुए। घर में कभी कुछ नहीं था पर भगवान ने किसी ना किसी तरह काम चला ही दिया। उस समय समाज में मेहनत करने वालों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी। जो लोग दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाते थे वे किसानों से ज्यादा अमीर थे। ऐसे में घिस्सु की सोच कोई हैरानी की बात नहीं थी। घिस्सु असल में किसानों से ज्यादा चालाक था। उसने कड़ी मेहनत करने के बजाय कामचोरों के साथ रहना बेहतर समझा। हाँ, वह इतना बड़ा आदमी तो नहीं बन पाया कि गांव का मुखिया बनता। इसलिए पूरा गांव उसे बुरा कहता था। फिर भी उसे इस बात का सुकून था कि भले ही वह गरीब है पर उसे किसानों की तरह दिन रात मरना तो नहीं पड़ता। कम से कम कोई उसका फायदा तो नहीं उठा सकता। दोनों गर्म गर्म आलू निकालकर खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था, उनसे इंतजार नहीं हो रहा था कि आलू ठंडे हो जाएं। कई बार उनकी जीभ जल गई। आलू इतना गर्म था कि मुँह में रखते ही जीभ और गला जलने लगता।
प्रवेब से जल्दी से निगल जाते क्योंकि पेट में जाकर वह ठंडा हो जाता। गर्म आलू निगलते वक्त उनकी आँखों से आंसू निकल आते थे। घिसू को 20 साल पहले की एक शादी याद आई। उस दावत में उसे जो खाना मिला था। वह आज भी नहीं भूला था। वह बोला वह खाना कभी नहीं भूलता। तब से आज तक वैसा भर पेट खाना नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पुड़ियां खिलाई थी। असली घी की पुड़ियां, चटनी, रायता, तीन तरह की सब्जियां, दही और मिठाई। क्या स्वाद था कोई रोकने वाला नहीं था। जो चाहिए मांगो और जितना चाहे खाओ। लोगों ने इतना खाया कि पानी पीने की जगह नहीं बची पर परोसने वाले थे कि गर्म गर्म कचोरियां थाली में डाले ही जा रहे थे। हमने मना भी किया पर वे मानते ही नहीं थे। खाना खाने के बाद पानी और इलायची भी मिली। पर मुझे पान की क्या सुध थी?
मुझसे तो खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। मैं सीधा जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। वह ठाकुर बहुत बड़े दिलवाला था। माधव ने मज़ा लेते हुए कहा। अब हमें ऐसा खाना कोई नहीं खिलाता घिसु ने कहा, अब कोई क्यों खिलाएगा, क्या ही खिलाएगा? अब तो सब कंजूसी करते हैं, कहते हैं शादी और मरने जीने पर कम खर्च करो। अरे गरीबों का पैसा लूट, लूट कर कहाँ रखोगे? जमा करने में तो कोई कमी नहीं करते, बस खर्च करने में कंजूसी दिखाते हैं। माधव ने पूछा तुमने 20 पुरिया खाई होंगी ने कहा 20 से तो ज्यादा ही खाई होंगी, माधव ने कहा मैं होता तो 50 खा जाता घी सुहासा। 50 से कम तो मैंने भी नहीं खाई होंगी। तू तो मेरा आधा भी नहीं है। आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं यहाँ के पास चद्दर ओढ़कर सो गए। वे ऐसे सो रहे थे जैसे दो बड़े सांप कुंडली मारकर पड़े हों और अंदर बुधिया। अभी तक दर्द से कराह रही थी। सुबह जब माधव ने अंदर जाकर देखा तो उसकी पत्नी मर चुकी थी। उसका शरीर ठंडा पड़ गया था, मुँह पर मक्खियां उड़ रही थी, आंखें खुली की खुली रह गई थीं और पूरा शरीर धूल से भरा था। उसके पेट में बच्चा भी मर गया था। माधव भागकर घिहसू के पास गया और दोनों ज़ोर ज़ोर से रोने और छाती पीटने लगे। शोर सुनकर पड़ोसी आए और उन्हें समझाने लगे, मगर ज्यादा रोने का समय नहीं था।
अब कफ़न। और लकड़ी का इंतजाम करना था। घर में एक पैसा भी नहीं था। दोनों रोते हुए गांव के जमींदार के पास गए। जमींदार उन दोनों से बहुत नफरत करते थे। वे कई बार उन्हें चोरी और काम न करने के लिए पिट चूके थे। जमींदार ने पूछा। क्या बात है घिसवा क्यों रो रहा है तू तो अब गांव में दिखता भी नहीं है, लगता है यहाँ रहना ही नहीं चाहता। घिसु ने जमींदार के पैरों में गिरकर रोते हुए कहा मालिक हम बड़ी मुसीबत में हैं। माधव की पत्नी रात को मर गई। वह रात भर तड़पती रही, हम उसके पास ही बैठे थे, जो हो सका हमने किया पर वह हमें छोड़ गई। अब घर में रोटी देने वाला कोई नहीं रहता, हम बर्बाद हो गए। आप ही हमारे मालिक हैं, अब आप ही उसका अंतिम संस्कार करवा सकते हैं। हमारे पास जो थोड़ा बहुत था, वह दवा में खर्च हो गया। अब आपकी दया होगी तभी उसका काम होगा। जमीदार साहब अच्छे इंसान थे पर वे घीसु को जानते थे। वे जानते थे कि घीसु कितना बड़ा कामचोर है। उनका मन हुआ कि उसे भगा दे और कहें कि काम के वक्त तू आता नहीं, वह पैसे मांगने आ गया है पर किसी की मौत पर गुस्सा करना ठीक नहीं था। उन्होंने मन मार कर ₹2 उसकी तरफ फेंक दिए। उन्होंने घीसो से एक बात तक नहीं की और ना ही उसकी तरफ देखा। जब बड़े जमींदार ने ₹2 दे दिए तो गांव के बाकी लोगों ने भी पैसे देना शुरू कर दिया।
घेसू गांव भर में शोर मचाने लगा कि जमींदार साहब ने मदद की है? 1 घंटे में उसके पास ₹5 जमा हो गए। कहीं से लकड़ी मिल गई और कहीं से अनाज दोपहर को खिसु और माधव बाजार से कफन खरीदने निकले गांव के लोग अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगे। बाजार पहुँचकर खिसु ने कहा, लकड़ी तो मिल गई क्यों? माधव माधव ने कहा। हाँ, लकड़ी बहुत है, अब बस कफन चाहिए। जिसु ने कहा तो चलो कोई सस्ता सा कफन ले लेते हैं। माधव ने हाँ में हाँ मिलाई हाँ और क्या लाश ले जाते जाते रात हो जाएगी अंधेरे में कफन कौन देखता है?
घिसु ने कहा, कैसा जेब्रिवाज है जीते जी जिसे शरीर ढकने को पुराना कपड़ा भी न मिला, उसे मरने पर नया कफन चाहिए। माधव ने कहा, कफन तो लाश के साथ जल ही जाता है। घिसु ने ठंडी सांस ली यही। ₹5 पहले मिल जाते तो शायद उसकी दवा हो जाती। दोनों के मन में एक ही बात चल रही थी। वे बाजार में इधर उधर घूमते रहे, शाम हो गई। फिर वे एक शराब की दुकान के सामने जा पहुंचे जैसे उनके कदम अपने आप वहाँ चले गए हों। घेसू दुकान के अंदर गया और बोला साहु जी एक बोतल शराब दे दो, साथ में तली हुई मशीन ली और दोनों मज़े से पीने लगे। थोड़ी देर में उन्हें नशा होने लगा। घेसू ने कहा, कफन खरीदने से क्या मिलता?
वह तो जल ही जाता। वह कफन लेकर थोड़े ऊपर जाती। माधव ने आसमान की तरफ देखा और कहा, यह दुनिया का दस्तूर है। लोग पंडितों को रुपए दे देते हैं पर कौन जानता है जो मरने के बाद वह पैसा मिलता है या नहीं? घेसु ने कहा अमीरों के पास पैसा है, वे जलाये, हमारे पास क्या है? माधव ने पूछा, लेकिन लोग पूछेंगे कि कफन कहाँ है? तो क्या कहेंगे? घेसु हंसकर बोला, कह देंगे कि पैसे गिर गए। बहुत ढूंढे पर मिले नहीं, लोग यकीन तो नहीं करेंगे पर दोबारा पैसे दे देंगे। माधव भी हंसने लगा। वह बोला, वह बेचारी बहुत अच्छी थी, मरते मरते भी हमें खूब खिला पिला गई। उन्होंने आधे से ज्यादा बॉटल पी ली। फिर घिसु ने दो किलो पूरियां चटनी, अचार और मांस मंगवाया। उन्होंने डेढ़ रुपया खर्च कर दिया और वे राजाओं की तरह बैठकर खा रहे थे। उन्हें न किसी का डर था और न बदनामी की चिंता घिसु ने कहा। हमारा दिल खुश है तो क्या उसे इसका पुण्य नहीं मिलेगा?
माधव ने कहा जरूर मिलेगा भगवान उसे स्वर्ग में ही रखना। आज जो खाना मिला वैसा कभी नहीं मिला था, तभी माधव ने पूछा। क्या हम भी 1 दिन मर कर वहीं जाएंगे जिसने कोई जवाब नहीं दिया? वह इस खुशी के समय मौत पर बातें करके अपना मूड खराब नहीं करना चाहता था। माधव ने पूछा अगर वह बुधिया वहाँ भगवान के पास हमसे पूछेगी? कि तुमने मुझे कफन क्यों नहीं दिया तो हम क्या कहेंगे? घेसु ने झिड़क कर कहा, कहेंगे तेरा सिर उसे कफन जरूर मिलेगा। माधव बोला पर वो पूछेगी तो जरूर घेसु ने कहा तुझे क्या लगता है मैं 60 साल से?
घास खोद रहा हूँ, मैं बेवकूफ नहीं हूँ, उसे कफन मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा। माधव को यकीन नहीं हुआ। उसने कहा पैसे तो हमने खाने पीने में उड़ा दिए, अब कफन कौन देगा? वो तो मेरी पत्नी थी, मुझसे ही हिसाब मांगेगी घेसो ने कहा। वही लोग दोबारा पैसे देंगे जिन्होंने पहले दिए थे बस इस बार पैसे हमारे हाथ में नहीं आएँगे, लोककफन खुद खरीद कर डाल देंगे। जैसे जैसे रात हो रही थी शराब खाने में भीड़ और शोर बढ़ता जा रहा था। कोई गा रहा था, कोई अपनी तारीफें कर रहा था तो कोई दोस्तों के गले मिल रहा था। वहाँ की हवा में ही नशा था। लोग अपनी जिंदगी की परेशानियां भूलने के लिए यहाँ आते थे। उन्हें कुछ देर के लिए होश नहीं रहता था कि वे जिंदा है या मर गए। बाप बेटे मज़े से शराब पी रहे थे। पेट भर खाने के बाद माधव ने बची हुई पुरियां एक भिखारी को दे दी। भिखारी बहुत भूखा था। जिंदगी में पहली बार माधव को किसी को कुछ देखकर बहुत खुशी और गर्व महसूस हुआ। घिसु भिखारी से बोला ले जा इसे खा और दुआ दे जिसकी कमाई से तू खा रहा है, वह तो मर गई पर तेरी दुआ उस तक जरूर पहुंचेगी दिल से दुआ देना। बहुत मेहनत की कमाई है। माधव ने आसमान की तरफ देखकर कहा वह स्वर्ग जाएगी और वहाँ की रानी बनेगी। घिस खुशी में झूमते हुए खड़ा हो गया और बोला हाँ वह पक्का स्वर्ग जाएगी।
उसने कभी किसी का बुरा नहीं किया। मरते मरते हमें पेट भर खाना खिला दी। अगर वह स्वर्ग नहीं जाएगी तो क्या वे अमीर लोग जाएंगे जो गरीबों को लूटते हैं और पाप धोने के लिए गंगा में नहाते हैं? तभी अचानक उनका मूड बदल गया और वे दुखी हो गए। माधव रोने लगा और बोला बेचारे ने पूरी जिंदगी बहुत दुख झेला। वो बहुत दर्द में मरी। वह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाकर रोने लगा। घिसू ने उसे समझाया रो मत खुश हो कि वो इस दुनिया की मुसीबतों और बंधनों से आज़ाद हो गई। वह किस्मत वाली थी जो इतनी जल्दी इस मायाजाल से छूट गई। फिर दोनों खड़े होकर गाना गाने लगे ठगनी क्या नैना चमका वे सब लोग उन्हें देख रहे थे। और वे दोनों अपने ही धुन में गा रहे थे। फिर वे नाचने लगे, कूदे गिरे और अजीब अजीब हरकतें करने लगे। आखिर में नशे में चूर होकर वे दोनों वही जमीन पर गिर पड़े।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
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