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Episode · SyllabuswithRohit

The Elephant in the Brain

9 Jun 2026 · 1 hr 29 min

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Episode notes

Most of us believe we are the masters of our own minds. We assume that when we speak, act, or make a purchase, we understand exactly why we are doing it. In The Elephant in the Brain, Kevin Simler and Robin Hanson argue that this is a convenient delusion. Our brains are not designed to be transparent tools of truth; they are designed to help us navigate social hierarchies. To do this effectively, the brain hides our true, selfish motives from our conscious awareness so that we can more convincingly deceive others.The "Elephant" represents these hidden, self-interested drives—for power,…

Transcript

Read the transcript · about 9,740 words, follows along as you listen

सिमर और हेनसन की यह किताब बहुत कमाल की है। यह बताती है कि हम जो भी करते हैं अक्सर दिखावे के लिए करते हैं। शो ऑफ के लिए हम ऐसे फैसले लेते हैं, ऐसे डिसीजंस लेते हैं जिससे हम दुनिया की नजरों में अच्छे दिखें। भले ही वो फैसला वो डिसीजन हमारे लिए असल में सही हो या न हो, यह किताब आपके देखने का नजरिया पूरी तरह बदल लेगी। ये आपके दिमाग के उन राज्यों को उन सीक्रेट्स को खोलेगी जिन्हें आपका दिमाग खुदा आपसे छुपाता है। एलिफेंट इन दी रूम यानी कमरे कहाँ

थी? इसका मतलब है कि कोई ऐसी बड़ी बात या समस्या जिसे सब जानते हैं, लेकिन कोई उस पर बात नहीं करना चाहता। एलिफेंट इन दी ब्रेन यानी दिमाग कहाँ थी? यानी हमारे दिमाग का वो सच जिसे हम खुद भी मानना नहीं चाहते। रॉबिन नाम के एक आदमी ने इस हाथी को पहली बार पहचाना। उन्होंने देखा कि लोग जरूरत से ज्यादा दवाइयां खाते हैं, यहाँ तक कि मुफ्त इलाज मिलने पर भी लोग। हेल्ती नहीं होते। लोग डॉक्टर के पास सिर्फ ठीक होने के लिए नहीं जाते। असल में डॉक्टर के पास जाना एक

रिचुअल की तरह है। एक रस्म की तरह जैसे माँ बच्चे की चोट पर किस करती है, उसकी से चोट ठीक नहीं होती। लेकिन बच्चे को सुकून मिलता है की माँ साथ है, माँ भी ये दिखाना चाहती है की वो बच्चे का ख्याल रखती है। हम इस देशों में इलाज भी ऐसा ही है। ये बस परवाह करने का दिखावा है। कॉन्स्पिकवस केयरिंग। हम अपनों को यह दिखाना चाहते हैं कि हम उनकी कितनी फिकर करते हैं। इसलिए हम महंगे इलाज पर पैसा खर्च करते हैं। केविन ने इस हाथी को ऑफिस में देखा। ऑफिस में लोग सिर्फ काम नहीं करते, वे बंदरों की तरह अपने

ग्रुप में अपनी। जगह अपना स्टेटस बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हम इसे बिज़नेस की बातें कहकर छुपाते हैं। कोई कर्मचारी अपने साथी की शिकायत सीधे नहीं करता। वह कहता है कि साथी को काम की समझ नहीं है। असल में वह अपनी इज्जत, अपना स्टेटस बचा रहा होता है। हम इंसान एक सोशल अनिमल है, एक सामाजिक जानवर हैं। हम हमेशा दूसरों से आगे निकलना चाहते हैं लेकिन हमारा दिमाग इस सच को इस ट्रुथ को हमसे छुपाता है। हम खुद को यकीन दिलाते हैं कि हम बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, बहुत

नेक। बहुत गुड काम यह किताब बताएंगे कि हम झूठ क्यों बोलते हैं। हम अपने दोस्तों, दुश्मनों और खुद से भी सच क्यों छुपाते हैं? ये हमारे दिमाग के असली मकसद हिडन मोटिव्स को समझने का एक नया तरीका है। ने कहा कि हम सब सोशल क्रिएचर्स हैं। सामाजिक प्राणी इमर्सन ने कहा कि इंसान अकेले में सच्चा होता है। दूसरा व्यक्ति आते ही वो दिखावा वो हिपोक्रिसी शुरू कर देता है इस किताब की। मेन बातें क्या है?

कोर ऐडिया हम इंसान छुपा हुआ मकसद रखते हैं। हमारा दिमाग बनाया ही ऐसे गया है। दिमाग अपने फायदे के लिए काम करता है पर वह दूसरों के सामने स्वार्थी यानी सेल्फिश नहीं दिखना चाहता। इसीलिए वह हमसे भी सच छुपाता है। गंदे इरादों को छुपाना इससे आसान हो जाता है। खुद को धोखा देना एक चाहल है, हम बुरा बनकर भी अच्छा दिखना चाहते हैं। बहुत कम लोग इस धोखेबाजी को मानते हैं। जब तक हम बचेंगे, सच नहीं जान पाएंगे। हमें हाथी का सामना करना होगा तभी हम असली बात समझ पाएंगे। हाथी क्या है?

ये एलीफैंट, ये हमारे दिमाग का सेल्फिशनेस है, स्वार्थ है पर ये सिर्फ स्वार्थ नहीं है। इसमें इज्जत यानी स्टेटस और ताकत यानी पावर भी है। हम आगे बढ़ने के लिए झूठ बोलते हैं। हम अपने असली मकसद को छुपाते हैं। लोग इसे अनदेखा करना पसंद करते हैं। इंसान का बेहेवियर वैसा नहीं जैसा दिखता है। पुराने जमाने के लोग भी यह जानते थे। अच्छे कामों में भी छुपा हुआ लालच होता है। दिमाग दूसरों को धोखा देने के लिए बना है पर इसके लिए वह पहले खुद को धोखा देता है। लोग महंगी चीजें इन जरूरत के लिए

नहीं खरीदते। वे अपनी अमीरी अपना वेल्थ का टशन दिखाना चाहते हैं। स्कूल, हॉस्पिटल और मंदिर के भी एजेंडाज़ हैं। हमारी हँसी और आँखों के इशारे यानी बॉडी लैंग्वेज बहुत कुछ कहते हैं, हमारा दिमाग ही नहीं चलाता है, हम नहीं, दिमाग बहुत चालाक है। वह हमें अच्छी कहानियों सुनाकर गंदे इरादे छुपाता है। इंसान बंदरों का ही बदला हुआ रूप है। बंदर भी ताकत और टशन के लिए लड़ते हैं। स्कूल और हॉस्पिटल अपने काम में अक्सर फैल होते हैं क्योंकि उनके असली मकसद कुछ और होते हैं। स्कूल सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं

है। वहाँ ग्रेड और ठप्पा पाना जरूरी है प्रूडेंशियल हार्ट सिर्फ ब्यूटी के लिए नहीं है, यह बड़े लोगों से जुड़ने का तरीका है। धर्म यानी रिलिजन सिर्फ भगवान पर यकीन नहीं है। ये समाज को जोड़ने का दिखावा है। हमारी संस्थाओं, हमारे इन्स्टिट्यूशन्स बहुत पैसा बर्बाद करती हैं और वो रुपए सिर्फ दिखावे में जलते हैं। शोइंग ऑफ में अगर सच जान ले तो रिफॉर्म कर सकते हैं। इससे हमारी जिंदगी और बेहतर होगी, लेकिन एक चेतावनी है सच जानना कभी कभी डरावना हो सकता है। खुद को धोखा देना कभी कभी फायदे

का होता है। ये आपको बुरा दिखने से बचाता है पर हम आपको सच दिखाना चाहते हैं। जैसे फ़िल्म मेट्रिक्स में दो गोलियां थी, नीली गोली, ब्लू पील मतलब पुरानी झूठी दुनिया, लाल गोली यानी रेड पील मतलब? कड़वा सच हम लाल गोली रेड बिल को चुनते हैं। इंसान के उलझा हुई ज़िन्दगी को समझने से पहले चलिए जानवरों को देखते हैं इंसान भी एक तरह का जानवर ही है। हम जानवरों और थपेड़ों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। जानवरों को समझना आसान है क्योंकि हम उनके बारे में पहले से कुछ नहीं सोचते।

ये हमारे लिए एक प्रैक्टिस की तरह है। हम जानवरों के दो अजीब बेहेवियर को देखेंगे। ऊपर से देखने में वे बहुत सीधे लगते हैं, लेकिन गहराई में जाने पर पता चलता है कि। मामला बहुत उलझा हुआ है। जानवर हमारी तरह माइंड गेम्स नहीं चलते, दिमाग की चालें नहीं चलती, फिर भी उनके काम करने का तरीका काफी गहरा होता है। बंदरों और चिंपैंजी के शरीर पर बहुत घने बाल होते हैं अगर वे सफाई न करें। तो बालों में धूल और कीड़े भर जाते हैं। बंदर अपनी आंधी बॉडी खुद साफ कर

सकते हैं। पर अपने पीठ और सिर को वे खुद साफ नहीं कर पाते। इसके लिए उन्हें दोस्तों की मदद चाहिए होती है। इसे सोशल ग्रूमिंग कहते हैं। एक बंदर अपनी पीठ आगे करके बैठता है। दूसरा बंदर उसके बालों को ध्यान से देखता है। वह उंगलियों से कचरा और कीड़े निकालता है। यह काम बहुत ध्यान और मेहनत वाला है। अगर हम उस बंदर से पूछे की वह क्या कर रहा है तो वह शायद कहेगा मैं अपने दोस्त के पीठ साफ कर रहा हूँ। वह यह भी कह सकता है आज मैं उसकी पीठ साफ करूँगा तो कल वह मेरी

करेगा ऊपर से देखने में। यह सिर्फ सफाई का काम लगता है, पर सच कुछ और ही है। इसके पीछे कुछ हैरान करने वाली बातें हैं। बंदर सफाई के लिए जरूरत से कहीं ज्यादा समय खर्च करते हैं। कुछ बंदर अपने दिन का 17% हिस्सा सफाई में बिताते हैं। यह बहुत ज्यादा है। बंदर अपनी खुद की सफाई कम करते हैं और दूसरों की ज्यादा। अगर मकसद सिर्फ सफाई होता तो वे खुद को ज्यादा साफ करते। बड़े शरीर वाले बंदरों के बाल ज्यादा होते हैं, पर वे सफाई में छोटे शरीर वालों से ज्यादा समय नहीं बिताते तो फिर असली बात क्या

है? एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ये सिर्फ सफाई नहीं राजनीति है। पॉलिटिक्स एक दूसरे की सफाई करके बंदर दोस्त और साथ ही यानी। अलायंसेस बनाते हैं। यह दोस्ती उन्हें दूसरी मुश्किलों में काम आती है। सफाई करने वाला कहता है मैं अपना कीमती समय तुम्हें दे रहा हूँ। सफाई करवाने वाला कहता है मुझे तुम पर भरोसा है। सात समय बिताने से उनकी टीम मजबूत होती है। दुश्मन कभी। एक दूसरे की सफाई नहीं कर सकते। यही वजह है कि है स्टेटस वाले बंदरों की सफाई ज्यादा होती है।

छोटे बंदर बड़े बंदरों की सफाई करते हैं ताकि उन्हें फायदा मिल सके। बदले में उन्हें खाना मिलता है या लड़ाई में बड़े बंदर का साथ मिलता है। ग्रुप जितना बड़ा होगा उतनी ही ज्यादा पॉलिटिक्स होगी। इसलिए बड़े ग्रुप वाले बंदर सफाई में ज्यादा समय बिताते हैं। बंदरों को ये सब पता नहीं होता। वे बस अपनी नेचुरल इन्स्टिंक्ट पर चलते हैं। उन्हें एक दूसरे की सफाई करने में मज़ा आता है। अब एक चिड़िया की बात करते हैं जिसका नाम अरेबियन बैब्लर है। यह रेगिस्तान में रहने वाली एक

छोटी भूरी चिड़िया है। ये चिड़िया तीन से 20 के ग्रुप में रहती हैं। 3 टु 20 के ग्रुप में ये मिलकर अपने थपेड़ों और झाड़ियों की रक्षा करती हैं। ग्रुप से बाहर निकाली गई चिड़िया की जान को बहुत खतरा होता है। इन चिड़ियों की जिंदगी बहुत ही इंटरेस्टिंग है। इनमे स्टेटस यानी रुतबे का बहुत ख्याल रखा जाता है। ग्रुप का सबसे बड़ा चिड़िया जो अल्फा है, वो छोटे वालों पर हुक्म चलाता है। ये चिड़िया एक दूसरे की बहुत मदद करती हैं। ये एक दूसरे को खाना खिलाती हैं

और दुश्मनों से लड़ती हैं। जब बाकी चिड़िया खाना ढूंढ रही होती हैं तो एक चिड़िया गांड बनकर ऊपर बैठती है। वह दुश्मनों पर नजर रखती है। पहली नजर में यह बहुत नेक काम लगता है। इलेक्ट्रोइज़्म गार्ड बनने वाली चिड़िया खुद खाना नहीं खा पाती, वह अपनी जान जोखिम में डालती है पर यह काम उतना सेल्फ्लेस नहीं है, उतना निस्वार्थ नहीं है जितना दिखता है। ये चिड़िया मदद करने के लिए एक दूसरे से कॉम्पिटिशन करती हैं। कभी कभी बड़ा चिड़िया छोटे चिड़िया के मुँह में जबरदस्ती खाना ठोंस देता है।

जब कोई छोटी चिड़िया गार्ड की नौकरी कर रही होती है तो बड़ी चिड़िया उसे भगाकर खुद वहाँ बैठ जाता है। अगर मकसद से सिर्फ मदद करना है तो वो एक दूसरे से लड़ क्यों रहे हैं? सच तो ये है कि मदद करने से उन्हें प्रेस्टिज मिलती है, उन्हें इज्जत मिलती है। जिसकी इज्जत ज्यादा होती है, जिसकी स्टेटस ज्यादा होती है, उसे दो बड़े फायदे मिलते हैं। पहला उसे फीमेल के साथ रहने का ज्यादा मौका मिलता है। दूसरा उसे ग्रुप से बाहर निकाले जाने का खतरा कम होता है। मदद करके चिड़िया यह दिखाती है कि

वह कितनी ताकतवर है, कितनी फिट है। जो चिड़िया ज्यादा मदद करती है, उसका स्टेटस बढ़ जाता है। इसलिए वे दूसरों की मदद करने के लिए लड़ते हैं। जो ऊपर से त्याग दिखता है, जो ऊपर से सैक्रिफ़ाइस दिखता है वह असल में अपना फायदा है। वो सेल्फ इन्ट्रेस्ट है। इन एग्ज़ैम्पल से हमें क्या सीख मिली?

जानवरों का काम हमेशा वैसा नहीं होता जैसा दिखता है। ऊपर का कारण कुछ और होता है और असली मकसद हिडन मोटिव्स कुछ और इंसानों के साथ भी ऐसा ही है। वोट देना या आर्ट बनाना इतना सीधा काम नहीं है। जानवरों में ये मकसद छुपे हुए नहीं होते। वे बस अपने नेचर के हिसाब से काम करते हैं। वे कोई दिमागी खेल नहीं खेल रहे। इंसानों के मामले में ये बात थोड़ी अलग है। हम अपना सच इसलिए छुपाते हैं क्योंकि दूसरे हमें जॅज करते हैं। जब हमें पता होता है कि कोई हमें देख रहा है तो हम खुद को धोखा

देने लगते हैं, सेल्फ डिसेप्शन करने लगते हैं ताकि हम दूसरों को बेहतर ढंग से उल्लू बना सकें। हमें अपनी सोच को और गहराई से देखना होगा। हमें यह समझना होगा कि हमारा दिमाग हमारा ब्रेन किस काम के लिए बना है। इसके लिए हमें एवोल्यूशन के बारे में यानी विकास के बारे में समझना होगा। इंसान एक बहुत ही अजीब किस्म का जीव है। हमारे शरीर पर बाल नहीं है, हम दो पैरों पर चलते हैं, हम नाचते हैं और गाना गाते हैं। हमारे बच्चे बहुत कमजोर पैदा होते हैं पर हमारा सबसे खास गुण हमारा

दिमाग है। इंसान का दिमाग हमारा ब्रेन शरीर के हिसाब से बहुत बड़ा है। इसीलिए हम बहुत समझदार हैं, हम इंटेलीजेंट हैं। पर हमारा दिमाग इतना बड़ा और तेज क्यों हुआ? वैज्ञानिक अक्सर वही सच ढूंढ़ते हैं जो अच्छा लगे। हम खुद को बहुत नेक बहुत गुण दिखाना चाहते हैं। हम सोचते हैं कि दिमाग दूसरों की मदद के लिए बढ़ा। इसे मिलकर काम करना कहते हैं, कोआपरेशन जैसे। साथ शिकार करना या आग जलाना पर एक दूसरा सच भी है जो थोड़ा कड़वा है। शायद हमारा दिमाग कॉम्पिटिशन की वजह से बढ़ा।

यह कॉम्पिटिशन नेचर से नहीं आपस में था। एक इंसान का दूसरे इंसान से कॉम्पिटिशन, इसमें का फायदा और। दूसरे का नुकसान होता है। हमें खेलकूद में कॉम्पिटिशन पसंद है पर असल जिंदगी का कॉम्पिटिशन हमें बुरा लगता है, जैसे प्यार के लिए लड़ना या ऑफिस की पॉलिटिक्स हम इन बातों को छुपाना चाहते हैं पर सच समझने के लिए इन्हें देखना जरूरी है। कैलिफोर्निया में दुनिया के सबसे ऊंचे पेड़ मिलते हैं। इन्हें रेड वुड कहते हैं, ये पेड़ 380 फुट तक ऊंचे हो सकते हैं।

इतना ऊंचा बढ़ने में बहुत ताकत लगती है। ये पेड़ इतने ऊंचे क्यों होते हैं सिर्फ? सनलाइट पानी के लिए सिर्फ सूरज की रौशनी पाने के लिए जंगल में बहुत भीड़ होती है। नीचे रहने वालों को रौशनी नहीं मिलती इसलिए ये पेड़ एक दूसरे से मुकाबला करते हैं। अगर वे ऊंचे नहीं बढ़ेंगे तो मर जाएंगे। इंसान का दिमाग भी उस पेड़ जैसा है। हमारा मुकाबला दूसरी स्पीशीज़ दूसरी प्रजातियां से नहीं था। हमारा असली मुकाबला हमारा असली कॉम्पिटिशन खुद इंसानों से था।

इसे सोशल ब्रेन हाइपोथीसिस कहते हैं। दिमाग की रेस हम चलाके और पॉलिटिक्स के लिए समझदार बने। इंसान पुराने समय में छोटे ग्रुप में रहता था। वहाँ उसे खाना, प्यार और इज्जत चाहिए थी। ये चीजें पाने के लिए दिमाग लड़ाना पड़ता था। दूसरों से बेहतर दिखने की यह रेस आज भी जारी है। चलिए इस मुकाबले के तीन मेन खेलों को समझते हैं। नेचर में सबसे जरूरी काम बच्चे पैदा करना है। प्यार के बाजार में बहुत कॉम्पिटिशन है। हर कोई सबसे अच्छा पार्टनर चाहता है इसलिए हम खुद का

अड्वर्टाइज़्मन्ट करते हैं। जैसे मोर अपने पंख फैलाकर खुद को अच्छा दिखाता है, वैसे ही इंसान आर्ट। म्यूसिक और चुटकुलों का इस्तेमाल करता है। ये सब दिखाने के तरीके हैं कि हमारे पास अच्छे जीन्स हैं, अच्छे गुण हैं, दूसरा सोशल स्टेटस, समाज में इज्जत यानी आपका रुतबा। जिसका रुतबा बढ़ा, जिसका स्टेटस बढ़ा उसे उतनी ज्यादा सुविधा मिलेंगे। स्टेटस पाने के दो तरीके होते हैं पहला डॉमिनेंस और दूसरा प्रेस्टिज। डॉमिनेंस यानी धौंस ज़माना ताकत से दूसरों को डराना।

जैसे कोई गुंडा दूसरा है इज्जत कम आना यानी प्रेस्टिज। अपने स्किल से अपने हुनर से लोगों का दिल जीतना प्रेस्टिज एक तरह की नीलामी जैसा है। अगर आप मजेदार, समझदार और अच्छे हैं तो लोग आप से जुड़ना चाहेंगे। आपकी कीमत बढ़ जाएगी। हर कोई अपनी यह कीमत बढ़ाने में लगा है। भले ही इसके लिए उसे अपने दोस्त से जलन ही क्यों न हो और तीसरा है राजनीति यानी पॉलिटिक्स। हम ग्रुप में रहकर अपनी ताकत बढ़ाते हैं। किसे अपना दोस्त बनाना है और किसे धोखा देना है? ये सब दिमाग का बहुत कॉम्प्लेक्स

काम है। ये पॉलिटिक्स है। हम हमेशा ऐसे ग्रुप से जुड़ना चाहते हैं जो जीत रहा हो। यह सब बातें सुनने में शायद बुरी लगे, पर यही इंसान होने का असली सच है। हमारा दिमाग बनाया ही ऐसे गया है ताकि हम दूसरों को पछाड़ कर उनसे कंपीट करके आगे बढ़ सकें। हैरिस टोडेल ने कहा था कि इंसान एक पोलिटिकल अनिमल है, एक राजनीतिक जानवर है पर सिर्फ हम ही ऐसे नहीं हैं। चिंपेनजिस भी पोलिटिकल अनिमल है, वे इंसानों की तरह ही पावर के लिए लड़ते हैं। बंदरों में सिर्फ स्ट्रांग होना

काफी नहीं है। आपको टीम बनाना आना चाहिए। एक अकेला बंदर ज्यादा दिन राज़ नहीं कर सकता। उसे दोस्तों और साथियों की जरूरत होती है। जब दो बंदर मिलकर किसी तीसरे को हराते हैं तो वह पॉलिटिक्स है। राजनीति इंसान दुनिया में सबसे ज्यादा राजनीति करने वाला जीव है। हम हर जगह टीम बनाते हैं। सरकार में इसे पार्टियां कहते हैं। ऑफिस में इसे टीम कहते हैं। स्कूल में इसे दोस्तों का ग्रुप कहते हैं। यहाँ तक कि जेल में भी गैंग्स होते हैं। राजनीति सिर्फ लड़ाई झगड़ा नहीं है, इसमें हाथ मिलाना और।

गले मिलना भी शामिल है। राजनीति के दो तरीके होते हैं पहला डराना यानी इंटिमिडेशन अपने ताकत से दूसरों को दबाना। दूसरा है दिल जीतना यानी चार अच्छे व्यवहार और हुनर से लोगों को अपना बनाना इज्जत पाने के लिए। लोग अच्छे कपड़े पहनते हैं, वे गाना गाते हैं या शायरी सुनाते हैं। वे दूसरों को खुश करके अपना साथी बनाते हैं। हम हमेशा दूसरों को जज करते रहते हैं, परखते रहते हैं। हम देखना चाहते हैं कि कौन अच्छा दोस्त बनेगा। इसके लिए हम इशारों यानी सिग्नल्स का इस्तेमाल करते हैं।

एक ऑनेस्ट सिग्नल वह है जिसे नकल करना मुश्किल हो, जैसे शेर की दहाड़ उसके बड़े शरीर का सबूत है। एक चूहा वैसी आवाज नहीं निकाल सकता। इंसानों में भी काम बातों से ज्यादा सच बोलते हैं। किसी को थैंक यू कहना सस्ता है पर उसे पैसे बढ़ाकर देना एक सच्चा इशारा है। एक अच्छा सिग्नल है। सच्चे दोस्त मुश्किल समय में हॉस्पिटल आकर अपना साथ अपना लॉयल्टी को साबित करते हैं। कभी कभी हम जानबूझकर उल्टा इशारा देते हैं। जैसे पक्के दोस्त एक दूसरे को गाली देते हैं, वैसा इसलिए कर

पाते हैं क्योंकि उन्हें अपनी दोस्ती पर पूरा भरोसा होता है। एक नया दोस्त ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा। रेड वुड के पेड़ सूरज की रौशनी के लिए बहुत ऊंचे बढ़ते हैं अगर सब पेड़ छोटे रहने का फैसला कर लें। तो सबका फायदा होगा उनकी ऊर्जा, उनकी एनर्जी बचेगी पर ऐसा नहीं होता। अगर एक पेड़ भी ऊँचा बढ़ा तो बाकी सब यानी शैडो में मर जाएंगे। इसलिए सब ऊँचा बढ़ने की रेस में लग जाते हैं। यह मुकाबला यह कॉम्पिटिशन बहुत सारा रीसोर्सेस को बर्बाद करता

है। इंसान भी अक्सर ऐसे ही बेकार की रेस में लगे रहते हैं। पर हम थपेड़ों से अलग है। हम नियम बनाकर हम नॉर्म से इस बर्बादी को रोक सकते हैं। हम मिलजुलकर इस मुकाबले को कम कर सकते हैं। मान लीजिए आप। फ़िल्म की टिकट के लिए लाइन में खड़े हैं। अचानक कुछ लोग आपके आगे घुस जाते हैं, आपको तुरंत गुस्सा आता है, दिल तेज धड़कने लगता है, चेहरा लाल हो जाता है, आप सोचते हैं चाहे मैं इनसे लड़ूं या छोड़ दूं, आगे घुसने से आपकी जिंदगी नहीं बदल जाएगी। बस 1 मिनट की तो बात है। पर आपको लगता है उन्होंने धोखा

दिया? आप खुद को दमने नहीं देना चाहते। इन्हीं कायदों को हम नियम कहते हैं, नॉर्म्स ये समाज में रहने के तरीके हैं, ये रूल्स हैं। ये छोटे भी हो सकते हैं जैसे पार्टी में क्या पहने? ये बड़े भी हो सकते हैं जैसे देश के कानून। हम नियम इसलिए बनाते हैं ताकि सबका भला हो। इससे बेकार का मुकाबला बेकार का कॉम्पिटिशन कम होता है और सब मिलकर काम कर पाते हैं। को ऑपरेशन होता है। इंसान हमेशा से ऐसे नहीं थे। खेती शुरू होने से पहले हम शिकारी थे। हम 20 से 50 लोगों के छोटे ग्रुप में रहते थे।

हमारे इन्सेस्टर्स एक दूसरे पर बहुत डिपेंडेंट थे। अकेले रहने का मतलब था मौत। सब मिलकर खाना ढूंढ़ते और बांटते थे, बीमार होने पर एक दूसरे का ख्याल रखते थे। उस समय कोई राजा या बड़ा बॉस नहीं था। सब बराबर थे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यही थी की सबको बराबर मानना ये एगेलिटेरियनिस्म अगर कोई खुद को बड़ा समझता या धांस जमाता बुली करता तो बाकी सब उसे टोकते थे। वे टशन दिखाने वालों पर पैनी नजर रखते थे। इंसानों ने ही सबसे पहले नियम बनाए। इसका सबसे बड़ा कारण था हथियार यानी वेपन्स हथियारों ने खेल पूरी

तरह बदल दिया। एक पत्थर या भाले से कमजोर इंसान भी ताकतवर को मार सकता था और सिर्फ शरीर की ताकत काम नहीं आती थी। दूर से हमला करने वाले हथियारों से 5-6 लोग मिलकर एक बड़े गुंडे को आसानी से रोक सकते थे। जब से इंसानों ने हथियार चलाना सीखा, ताकत से ज्यादा राजनीति जरूरी हो गई अब। अकेला शेर नहीं बल्कि अच्छी टीम जीतने लगी। नियम तो ये काम करते हैं जब सबको सजा का डर हो। अगर कोई नियम तोड़ता है तो पूरा ग्रुप मिलकर उसे रोकता है। यह इंसानों की अश्लील ताकत है।

हम नियम पालन करने के लिए दो और तरीके अपनाते हैं गॉसिप। यानी गपशप और इज्जत यानी रेपुटेशन गॉसिप यानी गपशप। इसको अक्सर बुरा कहा जाता है पर यह समाज के लिए बहुत जरूरी है। पीठ पीछे बात करना एक हथियार है। यह बड़े गुंडों को काबू में रखती है। मान लीजिए। ऑफिस में कोई बहुत बदतमीज है, कोई अकेला उससे लड़ना नहीं चाहता, क्योंकि लड़ने में खुद का नुकसान है। तब लोग आपस में गॉसिप करते हैं। वे सब मिलकर उस बदतमीज को बाहर निकालते हैं। गॉसिप से इंसान की रेपुटेशन घटती

है। रेपुटेशन जाने का डर सबको सुधार देता है। जब सीधी सजा देना मुश्किल हो तब रेपुटेशन तब इज्जत काम आती है। गलत काम करने वाले को रोकना मुश्किल है। रोकने वाले को खुद खतरा होता है तो लोग एक और नियम लगाते हैं। एक मेतानोर जो बुराइ को न रोके उसे भी सजा दो। इसे नियम का नियम कहते हैं। इससे लोग डर के मारे भी नियम बचाते हैं। समाज में अच्छे नागरिक ऐसे ही बनते हैं। अपनी तारीफ करना लोगों को खटकता है और खुद को दिखाना भी बहुत जरूरी है। अगर आप अपना हुनर नहीं दिखाएंगे

अपनी स्किल तो कोई आपको अपना दोस्त क्यों बनाएगा? हमें अच्छे साथी और ये स्टेटस चाहिए, इसलिए हम चोरी छुपे अपना शो ऑफ करते हैं, दिखावा करते हैं। हम चाहते हैं लोग हमारी इज्जत करें पर हम घमंडी नहीं दिखना चाहते। बड़े लोगों से जुड़ना सबको पसंद है। इससे समाज में स्टेटस बढ़ती है पर चमचागिरी करना बहुत बुरा माना जाता है। हम चाहते हैं लोग हमें खुद पसंद करें। पैसे या लालच देकर इज्जत पाना गलत है, पर फिर भी लोग चुपके से यह करते हैं। वे बड़े लोगों का साथ पाने के लिए तड़पते हैं।

हम अपने सेल्फिश इरादे अपने स्वार्थी इरादे छुपाते हैं। हम हमेशा खुद को नेक खुद को प्रो सोशल दिखाते हैं। अगर कोई पूछे आप डॉक्टर क्यों बनना चाहते हैं? आप कहेंगे बीमारों की सेवा के लिए उनकी सर्विस के लिए आप कभी नहीं कहेंगे कि मजेदार नौकरी और पैसे के लिए हम हमेशा अपने साफ इरादे ही बताते हैं। नेक वाले निमू ने समाज में लड़ाई तो कम की पर हमारा दिमाग हमारा ब्रेन और छलाक हो गया। अब हम नियम तोड़ते हैं पर किसी को पता नहीं चलता। यही चोरी का, चीटिंग का असली खेल है।

सब चोरी करते हैं, इसे मानना ही सही है। हम बड़े नियम मानते हैं जिसे चोरी या मर्डर नहीं करना पर छोटे नियम हम तोड़ देते हैं। इसे ऑफिस का सामान घर लाना। या झूठ बोलना चोरी करने से काम आसान होता है। तैराक यानी स्विमर्स अक्सर पूल में पेशाब करते हैं क्योंकि बाहर जाने में आलस आता है। हमारे पूर्वज भी चोर थे, चीटर्स थे। हमारा दिमाग चोरों को पकड़ने में माहिर है। पर दिमाग चोरी छुपाने में भी माहिर है। हम तब डरते हैं जब कोई देख ले। तेज रौशनी में हम कम चोरी करते हैं।

शर्म का डर हमें रोकता है। अगर हम पकड़े गए तो स्टेटस जाएगी एक राजा नंगा घूम रहा था। ठगों ने कहा कपड़े जादूई हैं। सिर्फ होशियार लोगों को ही दिखेंगे। सबने कहा वाह क्या कपड़े हैं राजा और प्रजा डर गए थे, सबको पता था राजा नंगा है पर कोई बोल नहीं रहा था। सबको डर था कि दूसरे बेवकूफ समझेंगे। इसे कामन नॉलेज कहते हैं। यानी जो सबको पता है और सबको पता है कि सबको पता है सड़क पर शराब पीना माना है, पर लोग बोतल कागज़ में लपेटते हैं। पुलिस को पता है अंदर क्या है पर

वे कुछ नहीं कहते क्योंकि यह बात खुली नहीं है, कामन नहीं है। कागज का थैला पुलिस को बहाना देता है, वे कह सकते हैं हमें नहीं दिखा चोरी के लिए बहाना जरूरी है प्रीटेक्स्ट जरूरी है राजा हेनरी को अपनी पत्नी छोड़नी थी, उसने बहाना बनाया कि शादी गलत थी बहाना झूठा था पर काम कर गया। होटल कहते हैं कि पानी बचाइए, असल में वे अपने पैसे बचाते हैं पर सीधा बोलेंगे तो बुरा लगेगा। इसलिए वे बहाना ढूंढ़ते हैं। हम बॉडी लैंगुएज में बात करते हैं। आँख मारना एक ही सारा है, इसका

मतलब सिर्फ दोस्त समझते हैं ये बात ऑन रिकॉर्ड नहीं आती हम। हुकिंग अब जैसे शब्द चुनते हैं ताकि सेट्टिंग जैसे ताकि बड़े लोग बात ना समझे। ये सब चोरी करने के तरीके हैं। हम सच छुपाकर अपना काम निकालते हैं। नियमों के बीच ग्रेरियास होती हैं। कुछ धुंधली जगहें चोर इसी जगह का फायदा उठाते हैं। जैसे टीवी पर कुछ गंदे शब्द माना है पर कलाकार उन्हें घूमा फिरा कर कह देते हैं। हम भी ऑफिस में काम चोरी करते हैं। हम चुपके से फ़्लर्ट भी करते हैं।

हम बड़े सितारों के सीक्रेट्स देखते हैं। स्टीव जॉब्स बहुत गुस्से वाले थे। हम भी वैसे ही हैं, बस छोटे लेवल पर हम अपनी तारीफ सीधे नहीं करते। हम अपना स्टेटस के लिए महंगी चीजें खरीदते हैं, हम दूसरों का काम बिगाडने की कोशिश करते हैं। हम अपने फायदे के लिए पॉलिटिक्स करते हैं पर हम ये सब खुलेआम नहीं करते। हम अपने स्वार्थ को अच्छे इरादों में छुपाते हैं। नियमों को तोड़ने के लिए तेज दिमाग चाहिए। पकड़ने वाले और चोर के बीच एक रेस है, इसी वजह से हमारा दिमाग, हमारा ब्रेन इतना बड़ा हुआ।

सांप और फूल भी धोखा देते हैं। धोखा देना इंसान का नेचर है। इससे हमें बिना मेहनत के फायदे मिलते हैं, पर हम खुद को भी धोखा देते हैं। हम सेल्फ डिसेप्शन करते हैं, हमारा दिमाग सच को इग्नोर कर देता है। हम अपनी गंदी यादों को भुला देते हैं। बीमार लोग अपनी रिपोर्ट को अच्छा याद रखते हैं। सिगरेट पीने वाले उसकी बीमारियों को नहीं सुनना चाहते। पुरानी सोच कहती है कि यह खुद को बचाना है या डिफेंस है। हम दुख से बचने के लिए सच छुपाते हैं। फ्रॉड ने कहा था कि यह एक तोहफा है पर यह बहुत बेकार तरीका है।

यह सर्दी में थर्मामीटर को गर्म करने जैसा है। थर्मामीटर गर्म होगा पर कमरा ठंडा ही रहेगा। झूठे नक्शे से जनरल कभी जंग नहीं जीतता। नई सोच कहती है, नया स्कूल ऑफ़ थॉट कि यह मैनिपुलेशन है। यह दूसरों को उल्लू बनाने की स्ट्रेटेजी है। इंसान हमेशा दूसरों के साथ दिमागी खेल खेलता है। एक खेल है चिकन गेंहू दो गाड़ियां आमने सामने तेज आती हैं जो पहले मुड़ेगा वो हार जाएगा। अगर आप अपना स्टीयरिंग बाहर फेंक दें तो सामने वाला डरकर रास्ता छोड़ देगा जानबूझकर।

अनजान बनना एक ताकत है। अगर आप कुछ नहीं जानते तो कोई दबाव नहीं डाल पाएगा। दूसरों को धोखा देने के लिए खुद को धोखा देना सेल्फ डिसेप्शन जरूरी है। यही दिमाग का सबसे बड़ा और जीत वाला खेल है। हम अपने झूठी बातों पर यकीन क्यों करते हैं?

झूठ बोलना बहुत मुश्किल काम है। झूठ बोलने में दिमाग बहुत थक जाता है। पुराने झूठ याद रखने पड़ते हैं। अगर आप सच बोलेंगे तो कुछ याद नहीं रखना पड़ेगा। पकड़े जाने का डर भी बहुत होता है। झूठ बोलते समय हमारा शरीर साथ नहीं देता, दिल तेज धड़कता है और पसीना आता है, आवाज़ कांपती है और चेहरा लाल हो जाता है। दूसरों को यकीन दिलाने का बेस्ट तरीका है खुद यकीन करना। अगर आप खुद मान लेंगे तो दूसरे भी मानेंगे। दूसरे लोग बेवकूफ नहीं हैं। वे आपकी आँखों और चेहरों को गौर

से देखते हैं इसलिए दिमाग सच को खुद से भी छुपा लेता है। खुद को धोखा देने के चार तरीके हैं फोर मेथड्स पहला पागल आदमी दी मेड वह कहता है मैं यह काम करके रहूंगा। इससे दुश्मन डरकर पीछे हट जाता है। खिलाड़ी अपनी थकान छुपाने के लिए यह करते हैं। दूसरा है दी लॉयलिस्ट वफादार साथी दोस्ती निभाने के लिए हम गलत बात मान लेते हैं। दोस्त की गलत कहानी पर भी यकीन कर लेते हैं। यह वफादार यह। लॉयल्टी दिखाने का एक तरीका है? तीसरा है उत्साह बढ़ाने वाला दी

चीयरलीडर? हम खुद को बहुत अच्छा समझते हैं ताकि दूसरे भी हमें वैसा ही समझे जैसे कोई नेता अपनी जीत का पक्का भरोसा दिखाता है। चौथा है धोखेबाज दी चीटर। हम अपने असली इरादों को, अपने असली मोटिव्स को खुद से छुपाते हैं ताकि पकड़े जाने पर मासूम दिख सके। इनोसेंट हमारा दिमाग कोई एक अकेला इंसान नहीं है। दिमाग बहुत सारे हिस्सों की टीम है। इसे दिमाग की कमेटी कह सकते हैं। एक हिस्सा सच जानता है तो दूसरा हिस्सा झूठ। इसीलिए हम खुद से झूठ बोल पाते

हैं जैसे मरने से सबको डर लगता है, चाहे हम स्वर्ग पर कितना भी यकीन करें दिमाग का पुराना हिस्सा असली सच जानता है हम एक साथ ज्ञानी और अज्ञानी। बन सकते हैं। दिमाग का एक बड़ा खेल है, जिसे सेल्फ डिस्क्रिप्शन या खुद को छुपाना कहते हैं। या हम दूसरों को उल्लू बनाने के लिए करते हैं। हम बुरी बातों पर कम ध्यान देते हैं। इससे हमारा स्टेटस हमारी इज्जत बची रहती है। दिमाग की एक टीम की तरह देखिए। इसमें बहुत सारे छोटे हिस्से आपस में बात करते हैं, दिमागी हिस्से

आपस में सच छुपाते हैं। अगर हमें किसी पर भारी पड़ना है तो दिमाग का एक हिस्सा इस राज़ को छुपा लेता है। हमें पता भी नहीं चलता कि हम स्टेटस दिखा रहे हैं पर दिमाग अपना काम चुपके से कर देता है। दिमाग अपने मय को अपने ईगो को बसा कर रखता है। वह नहीं चाहता कि गंदी बातें बाहर निकले। हम बुरी बातों को दिल के कोने में दबा देते हैं। हम अच्छी बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। जब आप कोई अच्छा काम करते हैं तो दिमाग बहुत खुशी महसूस कराता है। वह कहता है यह बात सबको बताओ और

जब आप कोई गलती करते हैं तो दिमाग को बहुत शर्म आती है। वह कहता है इसे छुपा लो, यहाँ मत देखो। हमारा दिमाग सोशल गेम्स यानी सामाजिक खेल जीतने के लिए बना है। सबसे ज्यादा हम अपने असली इरादों को अपने असली मोटिव्स को छुपाते हैं ताकि दूसरे हमें पकड़ ना सकें। जेपी मॉर्गन का कहना था। कि इंसान के पास हर काम के दो कारण होते हैं एक अच्छा कारण और एक असली कारण। डेविड होम ने कहा कि दिमाग की सोच यानी रीजन्स पैशन्स की गुलाम है। दिमाग की सोच भावनाओं की गुलाम है।

हम अपने को लेकर हमेशा अंधे रहते हैं। हम खुद नहीं जानते कि हम कोई काम क्यों कर रहे हैं पर हम दूसरों के सामने जानने का दिखावा करते हैं, शो ऑफ करते हैं। मुझे कोक पीनी थी। 1960 में एक बहुत बड़ा एक्स्पेरमेन्ट हुआ। इसमें ऐसे मरीज़ थे जिनका दिमाग बीच से कटा था। दिमाग के दो हिस्से दो हेमेस्फेरेस आपस में बात नहीं कर सकते थे। वैज्ञानिक ने दिमाग के एक हिस्से को कुछ काम दिया फिर दूसरे हिस्से से पूछा तुमने ऐसा क्यों किया? मरीज़ की दाँई आंख ने बर्फ़ देखी,

बायीं आंख ने मुर्गी देखी। मरीज ने बर्फ़ हटाने वाला फावड़ा चुना पर जब पूछा गया क्यों चुना तो दिमाग ने तुरंत एक बहाना बना दिया। उसने कहा मुर्गी का घर साफ करना है। दिमाग को असली सच पता नहीं था पर उसने नकली कारण काउंटर फिट रीसन दे दिया। दिमाग कहानियों बनाने में एक स्पर्ट है। इन्हें रेशनेलाइजेशन यानी बहाना बनाना कहते हैं, यह जानबूझकर बोला गया झूठ नहीं है। दिमाग को खुद लगता है कि वह सच बोल रहा है। असली इरादा असली मोटिव वह है जो काम कराता है। रीसन वह कहानी है जो हम बताते

हैं। कुछ मरीजों का हाथ काम नहीं करता, पैरालाइज्ड थे। परवेश से मानने से इंकार कर देते हैं। वे कहते हैं, अभी हाथ हिलाने का मन नहीं है, वे खुद को भी धोखा देते हैं। सेल्फ डिसेप्शन हम भी हर दिन ऐसे ही बहाने बनाते हैं। दिमाग का एक खास हिस्सा होता है। इसे कहानी बनाने वाले कहते हैं, इंटरप्रेटर मॉड्यूल। इसका काम हमारी हरकतों का मतलब निकालना है, चाहे सच पाता हो या नहीं। यह कहानी जरूर बनाएगा वैज्ञानिक से प्रेस। सेक्रेटरी कहते हैं, प्रेस सेक्रेटरी किसी नेता के प्रवक्ता

जैसा है, किसी नेता के स्पोक्स्पर्सन जैसा स्पोक्स्पर्सन खुद कोई बड़े फैसले नहीं लेता। वह बस सरकार के कामों को सही साबित करता है। भले ही सरकार की नीती कितनी ही बुरी हो, वह कभी नहीं कहेगा। ये मुझसे गलती हो गई। हमारा दिमाग भी बिल्कुल ऐसा ही काम करता है। दिमाग फैसले पहले लेता है, बहाने बाद में बनाता है। प्रेस सेक्रेटरी गंदे सिगरेट्स छुपाने में माहिर होते हैं। उन्हें असली सच पता ही नहीं होता। ताकि वह दूसरों के सामने झूठ न बोल सके। इसे जानबूझकर अनजान बनना कहते हैं

स्ट्रैटेजिक इग्नोरेंस हम खुद को दिमाग का मालिक समझते हैं, पर असल में हम सिर्फ एक स्पोक्स पर्सन हैं। हम फैसले नहीं लेते, बस उनका बचाव करते हैं। आप अपने दिमाग के राजा नहीं हैं, आप बस राजा के फैसलों की तारीफ करते हैं? वैज्ञानिक ने इसे साबित करने के लिए एक्सपेरिमेंट्स किये। लोगों को तीन एक जैसे वाशिंग पाउडर दिए। सबका पाउडर एक था, बस डब्बे अलग थे। लोगों ने पीले और नीले डिब्बे को सबसे अच्छा बताया पर उन्होंने बहाना सफाई का बनाया।

उनका प्रेस सेक्रेटरी नकली कारण बना रहा था। एक और एक्सपेरिमेन्ट में फोटो बदल दी गई। लोगों ने जीस लड़की को नहीं चुना, उसकी तारीफ की। उन्होंने बहाने बनाया कि वह क्यों सुंदर है। उन्हें पता भी नहीं चला कि वे गलत हैं। हमारा प्रेस सेक्रेटरी दुनिया को चकमा देने में एक्स्पर्ट है। हम अपने दिमाग के लिए अजनबी ही रहते हैं स्ट्रेंजर से। वैज्ञानिक ने लैब में दिमाग की चोरी पकड़ ली। अब हमें इसे असली लाइफ में देखना है। लंडन नाम के एक 3 साल के बच्चे को देखिए।

रात के 8:00 बज गए हैं और उसे सोना है। उसकी मम्मी पूछती हैं, क्या तुम्हें टॉयलेट जाना है? लन्दन ना बोलता है और सो जाता है। 5 मिनट बाद वह चिल्लाता है, मम्मी पॉटी आई है, वो ऐसा बार बार करता है। असल में उसे पॉटी नहीं आई है। वो बस अभी सोना नहीं चाहता। वह पॉटी शब्द को एक बहाने की तरह ही यूज़ कर रहा है। यह एक नकली कारण है। बड़े लोग इस काम में और भी एक्सपर्ट होते हैं। बड़ों का प्रेस सेक्रेटरी बहुत चालाक होता है। वे ऐसे बहाने बनाते हैं जो सच लगते हैं, उन्हें पकड़ना नामुमकिन जैसा है।

रोबिन अपनी जिंदगी का एक उदाहरण देते हैं। वह कहते हैं कि उन्हें दुनिया में ज्ञान फैलाना है। पर जब कोई उनकी बात बिना नाम लिए बताता है तो उन्हें बुरा लगता है। अगर मकसद से ज्ञान फैलाना होता तो उन्हें खुशी होनी चाहिए थी पर असल में उन्हें अपनी इज्जत की ज्यादा फिक्र थी। कैविन को पेट की एक बिमारी थी। पहले वह किसी को इसके बारे में नहीं बताते थे। उन्होंने बहाना बनाया कि वह प्राइवेट पर्सन है। पर जब उन्होंने अच्छी डाइट शुरू की तो वह सबको बताने लगे। अब उन्हें अपनी अच्छी डाइट पर टशन

दिखाना था। उनकी प्राइवेसी अब मायने नहीं रखती थी। हम अक्सर आंधी अधूरी सच्चाई बताते हैं। हम अपने अच्छे मकसद को चुनकर बताते हैं और गंदे इरादों को छुपा लेते हैं। कुछ और एग्ज़ैम्पल सुनिए मम्मी पापा बच्चों को जल्दी सुलाते हैं। वे कहते हैं, यह बच्चे की हेल्त के लिए अच्छा है, पर असली बात ये है की उन्हें एक 2 घंटे शांति चाहिए। हम किसी काम को मना करने के लिए बहाने बनाते हैं। हम कहते हैं मेरी तबियत ठीक नहीं है या मैं बीज़ी हूँ पर सच ये होता है कि मेरा मन नहीं है। लोग इंटरनेट से फिल्मों या गाने

चोरी करते हैं। वे कहते हैं, बड़ी कंपनियां वैसे भी बहुत पैसा कमाती है। पर वे दुकान से सीढ़ी चोरी करने की हिम्मत नहीं करते क्योंकि इंटरनेट पर उन्हें पकड़े जाने का डर नहीं होता। हम हमेशा अपने अच्छे इरादों को बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं और अपने सेल्फिश इरादों को दबा देते हैं। अभी तक हमने सिर्फ थियरी पढ़ी। अब हम देखेंगे की। समाज में यह सब कैसे होता है? बच्चे स्कूल में हजारों घंटे बोलकर बात करना सीखते हैं। वे सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना

सीखते हैं। वे अपने विचार बताना और दूसरों को समझना सीखते हैं, पर उन्हें शरीर के इशारे। बॉडी लैंगुएज समझना नहीं सिखाया जाता लोग कहते हैं 19% बातें नॉनवर्बल होती हैं, यह बात पूरी तरह सच नहीं है, पर बॉडी लैंगुएज हमारे लिए बहुत जरूरी है। शरीर हमारे इमोशन्स के बारे में बहुत कुछ बताता है जैसे शांति और चिंता, खुशी और बोरियत, स्टेटस और लॉयल्टी ये भी शरीर से पता चलती है। हम प्यार और दोस्त भी शरीर के इशारों से ही ढूंढ़ते हैं। इसमें चेहरे के हावभाव? यानी फेशियल, एक्सप्रेशंस और

आँखों का व्यवहार आता है। आवाज़ का टोन और बैठने का तरीका भी इसमें शामिल है। स्टडी कहती है कि जो बच्चे चेहरे पढ़ते हैं वे ज्यादा पॉपुलर हैं पर फिर भी यह बात स्कूल में नहीं पढ़ाई जाती। हम बिना सोचे समझे अपने शरीर से बातें करते हैं। हम चेहरे से इशारे करते हैं और सही मौके पर हंसते हैं। हम आँखों से संपर्क बनाते हैं और तोड़ते हैं। ये सब अपने आप होता है आटोमेटिक। ये हमारे दिमाग की सोच के बाहर होता है। हमें ये सब अपने आप होना ही पसंद है।

सोच समझ कर किया गया इशारा नकली लगता है। ऐसे कोई दुकानदार जबरदस्ती आपका कंधा थपथपाये हमें दूसरों के शरीर के इशारे भी पूरी तरह समझ नहीं आते। हमें बस एक फीलिंग होती है कि कोई हमें पसंद नहीं करता। पर हम पक्का रीसन बता नहीं पाते कि ऐसा क्यों लग रहा है?

ने भी इस पर गौर किया था। हम दूसरों के इशारे बिना सोचे ही समझ लेते हैं। हम इन इशारों को लेकर हम इन सिग्नल्स को लेकर अंधी चु हैं। दिमाग की सोच बहुत धीमी है। हमारी कोन्सेअस्नेस काफी स्लो है। दुश्मन के हमले पर शरीर को तुरंत भागना होगा। देर हुई तो जान भी जा सकती है। हम एक साथ बहुत सारी चीजों पर ध्यान नहीं दे सकते पर हमारा प्रेस सेक्रेटरी शरीर के सच कुछ छुपाता है। हम जानबूझकर शरीर के इशारों यानी बॉडी लैंगुएज को अनदेखा करते हैं क्योंकि शरीर हमारे स्वार्थी और गंदे मोटे इसको खोल देता है।

हमारा असली जानवर वाला स्वभाव बाहर आ जाता है। सिग्नल वह है जिससे हम दूसरों का व्यवहार बदलते हैं। जैसे मोर पंख फैलाकर अपनी सेहत दिखाता है। संकेत यानी क्यों वह जानकारी है जो हम छुपाना चाहते हैं। जैसे झूठ बोलते समय हथेलियों पर पसीना आना या घबराहट में अपनी गर्दन रगड़ना बॉडी लैंगुएज बातों से ज्यादा सच्चे होते हैं। बातों का कोई खास आधार नहीं होता। शुक्रिया को थैंक यू या कुछ भी कह सकते हैं पर बॉडी लैंगुएज का सीधा मतलब होता है सीधा फंक्शन होता

है। इंट्रेस्ट होने पर हम आँखें फाड़ कर देखते हैं। बोर होने पर हम अपने नजरें हटा लेते हैं। बातों से झूठ बोलना आसान है, पर शरीर से झूठ बोलना बहुत मुश्किल है। ऑनेस्ट सिग्नल वह है जिसे नकली बनाना महंगा हो जैसे मजबूत कुवाला गहरी आवाज़ निकालता है। कमजोर कुआला वैसी आवाज़ नहीं निकाल सकता। इंसान लाखों सालों से बच्चे पैदा कर रहे हैं। बात करना सीखने से पहले ही हम यह जानते थे। प्यार के खेल में शरीर के इशारे बहुत जरूरी हैं। फ्लर्ट करना और लुभाना फ्लर्टिंग

और सिडक्शन बिना बोले होता है। हर समाज में शर्म यानी मोडस्टी का नियम होता है। हम खुले आम प्यार का इजहार नहीं करते। हम अपनी निजी बातें प्राइवेट लाइफ छुपा कर रखते हैं। लोग एक दूसरे के पार्टनर पर नजर रखते हैं इसलिए हम चुपके से फ्लर्ट करना जानते हैं। एग्ज़ैम्पल है एलिसन और बेन एक बार बार में मिले। वे एक दूसरे को पसंद करते हैं। वे बिना बोले अपना मोटिव कैसे बताएंगे? वे आँखों से बातें करते हैं, देर तक देखना मतलब मुझे तुम पसंद हो आँखों के इशारे दूसरों को आसानी

से नहीं देखते। बातचीत से ज्यादा शरीर का करीब आना मायने रखता है। वे एक दूसरे की तरफ बैठने लगते हैं। वे धीरे धीरे एक दूसरे को छूने लगते हैं। कंधे या हाथ को छूना भरोसे का संकेत है। डांस करना भी शरीर के तालमेल का एक तरीका है। कभी कभी हम जानबूझकर। भाव खाते हैं। हम अपने असली इरादे अपने असली इंटेंशन्स को छुपाते हैं। जलन भी इंसानों में हर जगह मिलती है। पार्टनर का हाथ पकड़ना एक ही शारा है। यह दूसरों को बताता है कि यह मेरा पार्टनर है। पसीने की खुशबू फिर मोस भी प्यार

में काम आती है, ये हमारे दिमाग को सिग्नल्स भेजती है, हमें पता भी नहीं चलता और हम खिंचे चले जाते हैं। पॉलिटिक्स में भी शरीर के इशारे काम आते हैं। भरोसा और वफादारी ट्रस्ट और लॉयल्टी। शरीर से दिखती है। इससे हम अपनी टीम मजबूत बनाते हैं पर हमें खुद नहीं पता होता कि हम क्या कर रहे हैं। बंदर एक दूसरे के बाल साफ करते हैं। इससे उनकी दोस्ती और टीम मजबूत होती है। इंसान भी एक दूसरे के बाल संवारते या गले मिलते हैं। हाथ मिलाना या कंधा थपथपाना भी वफादारी यानी लॉयल्टी का संकेत

है। जब हम डरे होते हैं तो हाथ जोड़कर बैठते हैं। हम खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। दोस्तों के बीच हम हाथ फैलाकर बैठते हैं, बिना कोट पहने बैठना मतलब? मैं तुम्हारे लिए खुला हूँ आँखों से भी हम राजनीति यानी पॉलिटिक्स करते हैं। खतरा दिखने पर हम आँखें सिकोड़ लेते हैं, नैरोआइस करते हैं। मुश्किल समय में हम अपने नेता को देखते हैं। मीटिंग खत्म करना भी बॉस का एक इशारा होता है। हाथ मिलाना मतलब हम दोनों बराबर हैं। पुराने जमाने में लोग हाथ चूमते

थे, इसका मतलब था मैं आपके नीचे हूँ, मैं सबोर्डिनेट हूँ। राजा अपनी ताकत दिखाने के लिए हाथ चुम्वाते थे। जब हम किसी की बुराइ करते हैं तो हम धीरे बोलते हैं। और पीछे मुड़कर देखते हैं। यह शरीर का इशारा है कि बात सीक्रेट है। मैं तुम पर भरोसा करके यह बता रहा हूँ। इंसान की हर हरकत स्टेटस की ओर इशारा करती है। कोई भी काम बिना किसी मोटिव के नहीं होता। जब यह बात समझ आती है तो हँसी भी आती है पर साथ ही डर भी लगता है। हमारे सारे छुपे हुए खेल खुल जाते

हैं, हम सब अपनी स्टेटस को लेकर पागल रहते हैं। हम इसे पाने और दिखाने के लिए मेहनत करते हैं। शरीर के इशारों यानी सिग्नल्स में भी। यही इज्जत दिखती है पर हम खुद इन इशारों को नहीं समझते है। स्टेटस वाले लोग कम घबराते हैं, उन्हें पता है की कोई उन पर हमला नहीं करेगा। इसलिए उनका शरीर बहुत रिलेक्स्ड रहता है। वे साफ बोलते हैं और आराम से चलते हैं। वे खुलकर बैठते हैं। लो स्टेटस वाले लोग हमेशा डरे रहते हैं, वे खतरे को भांपने के लिए इधर उधर देखते हैं। वे रुक रुक कर बोलते हैं और संभल

कर चलते हैं। उनका शरीर खुद को बचाने जैसा रहता है। डिफेंसिव पोस्चर में। बड़े स्टेटस वाले लोग चाहते हैं कि सब उन्हें देखें। जब आप ताकतवर होते हैं तो आप छुपना नहीं चाहते। इसे मुझे देखो लुक ऐट मी वाली चाल कहते हैं ये एक ऑनेस्ट सिग्नल है। जहरीले मेंढक भी चमकते रंगों से खुद को दिखाते हैं। वे डरावने नहीं दिखते पर वे बहुत खतरनाक होते हैं। इंसान वे चमकते कपड़े और महंगे गहने पहनते हैं। महंगे जूते पहनकर ज़ोर से चलना भी एक इशारा है। इसका मतलब है मुझे दिखने में डर नहीं लगता क्योंकि मैं बहुत

पावरफुल हूँ। स्टेटस का खेल मिलजुल कर तय होता है। कोवार्डिनेशन से बड़े स्टेटस वाला इंसान ज्यादा जगह घेरता है। वह बातचीत में अपनी बात मनवाता है। कम स्टेटस वाला इंसान उसे जगह देता है। वह बड़े इंसान की चाल से अपनी चाल मिलाता है। जब दो लोगों के बीच स्टेटस साफ नहीं होती तब कोवार्डिनेशन बिगड़ जाता है। वहाँ अजीब सी घबराहट होने लगती है ऑकवार्डनेस जैसे ऑफिस के किसी दुश्मन के सामने बैठना आपको समझ नहीं आता कि कैसे बैठें यह का बोलें? हम दूसरों की स्टेटस देखकर अपनी

आवाज भी बदल देते हैं। एक स्टडी में लैरी किंग के इंटरव्यू देखे गए। वह बड़े मेहमानों के सामने अपनी आवाज बदल देते थे। छोटे मेहमान लैरी किंग की आवाज से तालमेल बिठाते थे। चुनाव में भी वही जीतता है जिसकी आवाज। ज्यादा असरदार होती है। इंसानों में स्टेटस दो तरह की होती है पहला डॉमिनेंस और दूसरा प्रेस्टिज, घौंस और हुनर। डॉमिनेंस यह ताकत और डर से आती है जैसे कोई बड़ा गुंडा। इसके सामने लोग डर के मारे झुकते हैं। दूसरा है प्रेस्टिज यानी हुनर।

ये अच्छे काम और इज्जत से मिलती है जैसे कोई महान वैज्ञानिक या कलाकार लोग इनके करीब जाना चाहते हैं। इन दोनों में आंख मिलाने का तरीका अलग है। डॉमिनेंस में आंख मिलाना एक चैलेंज है। बड़ा आदमी किसी को भी घूस सकता है पर छोटे आदमी को अपनी आंखें झुकानी पड़ती हैं। वह चोरी छुपे ही बड़े आदमी को देखता है। हुनर यानी प्रेस्टिज में आंख मिलाना एक तोहफा है। यहाँ बड़े आदमी को सब ध्यान से देखते हैं। वह सबकी नजरों का केंद्र होता है। एक बड़ा बॉस धौंस और हुनर दोनों दिखा सकता है।

जब वह बोलता है या बोलती है तो सब उसे गौर से देखते हैं। जब वह चुप होती है तो सब डर से आंखें चुराते हैं। वैज्ञानिक ने आंख मिलाने का एक रेश्यो निकाला है इसे। देखने वाला हिसाब कहते हैं विज़ुअल डॉमिनेंस रेशियो अगर आप बात करते और सुनते वक्त बराबर आंख मिलाते हैं, तो आपका हिसाब एक होगा। यह बड़े डॉमिनेंस की निशानी है। अगर आप बात करते वक्त कम आँखें मिलाते हैं तो आपका हिसाब। कम होगा 0.6 यह छोटे स्टेटस की निशानी है। बड़े अफसर बात करते वक्त ज्यादा आँखें मिलाते हैं छोटे कर्मचारी

बात करते वक्त आँखें चुराते हैं। हमारा दिमाग ये सब अपने आप कर लेता है। हम इन इशारों को क्यों नहीं समझते? प्यार, पॉलिटिक्स और स्टेटस में बहुत से नियम होते हैं हमारे सेल्फिश मोटिव्स हमारे स्वार्थी इरादे दूसरों के लिए बुरे हो सकते हैं इसलिए हम चुपके से अपना काम निकालते हैं। बॉडी लैंगुएज बहुत उलझे हुए होते हैं। हम इशारों में वो बातें कह देते हैं जो बोल नहीं सकते, कोई नहीं कहता। मैं यहाँ सबसे बड़ा हूँ पर वह सोफे पर फेल कर यह दिखा देता है।

कोई नहीं कहता। मैं तुम्हें पसंद करता हूँ, पर वह मुस्कराकर और छूकर यह बता देता है। पकड़े जाने पर वह इसे सिर्फ दोस्ती कह सकता है। इसे प्लाज़िबल डिनायबिलिटी याने मू करने का बहाना कहते हैं। शरीर के सारे पकड़े नहीं जाते, इसलिए हम इनका इस्तेमाल पॉलिटिक्स में करते हैं। पीटर ऑफिस में अपने दुश्मन को इग्नोर करता है। पर पूछने पर वह इसे पॉलिटिक्स मानने से मना कर देता है। हमारा प्रेस सेक्रेटरी इन इरादों को छुपाता है। वह खुद नहीं जानना चाहता कि हम

क्या खेल रहे हैं। इससे झूठ बोलना और भी आसान हो जाता है जब कोई हमारे इन इशारों को पकड़ लेता है। तब हमें बहुत अजीब लगता है। हम अनकम्फर्टेबल हो जाते हैं, क्योंकि हमारे पास छुपाने के लिए कुछ न कुछ जरूर होता है। इंसान बहुत ही अजीब होते हैं। बहुत ही स्ट्रेंज हँसना हमारे सबसे अजीब कामों में से एक है। हम अचानक तेज आवाज निकालने लगते हैं, हमारा शरीर हमारी बॉडी हिलने लगती है, चेहरा अजीब बन जाता है पर हमें इसमें बहुत मज़ा आता है। बहुत प्लेज़र हम हंसने के मौके

ढूंढ़ते हैं। हम दोस्तों को हँसी के आधार पर चुनते हैं हंसना यानी लाफ्टर। सबके अंदर पहले से होता है। बच्चा पैदा होते ही हँसना जानता है, वो बोलना सीखने से पहले हँसता है। अंधे और बहरे बच्चे भी हँसते हैं। पूरी दुनिया में हँसी एक जैसी लगती है। इसका कोई ट्रांसलेशन नहीं चाहिए। हँसना हमारे कंट्रोल में नहीं होता। दिमाग से अपने आप करता है यह साँस लेने या पलक झपकने जैसा है। हँसी एक सोशल बेहेवियर है। हम दोस्तों से जुड़ने के लिए हँसते हैं।

हम दुश्मनों का मजाक उड़ाने के लिए हँसते हैं, पर हम खुद नहीं जानते हम क्यों हँस रहे हैं। पुराने लोगों ने हँसी के अलग कारण बताए। पहला दूसरों को निशा दिखाना सुपीरियरिटी थ्योरी, दूसरा मन का तनाव यानी टेंशन दूर करना, यानी रिलीफ थ्योरी और तीसरा जब कुछ अनएक्सपेक्टेड हो जाए यानी इन कंग्रूटी थ्योरी। पर ये सब पूरी तरह सच नहीं है। हँसिए एक गहरा सोशल ट्रुथ है। रॉबर्ट प्रोविन ने इंसानों को करीब से देखा। लोग अकेले में बहुत कम हंसते हैं।

दोस्तों के 730 टाइम्स ज्यादा हँसी आती है हँसी एक आवाज है एक साउंड। जैसे कुत्ता भौंकता है या चिड़िया गाती है। यह दूसरों को मैसेज देने के लिए है। हैरानी की बात है कि बोलने वाला ज्यादा हंसता है, सुनने वाला इंसान कम हंसता है, बंदर भी हमारी तरह ही हंसते हैं, चिंपैंजी और गोरिल्ला भी हँसी मजाक करते हैं। वे गुदगुदी करने पर हंसते हैं। वे एक दूसरे के साथ खेलते वक्त हंसते हैं। इससे पता चलता है कि हँसी बहुत पुरानी है। हँसी का असली मतलब है खेल प्ले

हँसी बताती है कि हम सीरियस नहीं हैं ने एक बच्चे के साथ यह देखा। अगर आप डरावना चेहरा बनाकर हसेंगे तो बच्चा भी हसेगा पर बिना हसे डरावना चेहरा बनाएंगे तो वो रोएगा। हँसी एक सिग्नल है यह कहती है कि डरो मत हम बस खेल रहे हैं जैसे कुत्ते खेलने के लिए झुक जाते हैं। बंदर खेलने के लिए अपना मुँह खोलते हैं, वैसे ही इंसान हंसकर अपना इरादा अपना इंटेंट बताते हैं। हँसी एक भरोसा दिलाने का तरीका है। जब कुछ डरावना लगे पर वह सच न हो तब हमें हँसी आती है जैसे।

कोई जोकर सीढ़ियों से गिर जाए, हमें पता है उसे चोट नहीं लगी, पर अगर आपकी दादी गिर जाए तो हँसी नहीं आएगी, वहाँ सच में खतरा होता है। हँसी का मतलब है कि सब ठीक है, इसीलिए हम गंदे विषयों पर टबू टॉपिक्स पर मजाक करते हैं। हम पॉलिटिक्स और रिलिजन पर हंसते हैं। हँसी हमें मुश्किल बातों में हराम देती है पर हमारा दिमाग इस सच को छुपाता है ताकि हम मज़े से अपना खेल जारी रखें। हँसी का असली मतलब हम नहीं जानते। दिमाग से हमसे छुपा कर रखता है ताकि दूसरों को पता न चले। हँसी एक जासूस की तरह है।

ये हमारे रिश्तों की पोल खोलती है। छोटे बच्चे गंदी बातों पर हंसते हैं। वे देखना चाहते हैं कि नियम क्या है? मम्मी पापा गुस्सा करेंगे या हंसेंगे? बड़े होने पर नियम बदल जाते हैं। अब हम धर्म और राजनीति पर हंसते हैं। हँसी के लिए थोड़ा खतरा जरूरी है। जैसे रोलर कोस्टर में मज़ा आता है, वैसे ही नियमों के साथ खेलने में मज़ा आता है। अगर खतरा बहुत बड़ा है तो हँसी नहीं आएगी। पर अगर खतरा कम है तो हम हँसते हैं। हमारी हँसी बताती है कि हम नियम को कितना मानते हैं। अगर हम किसी मजाक पर हँसते हैं तो

मतलब हम उस नियम को सीरियस नहीं लेते। हम अपनों के दुख पर नहीं हँसते। प्रजनबियों के गिरने पर हँसी आती है। इसे साइकोलॉजिकल डिस्टेंस यानी मनोवैज्ञानिक दूरी कहते हैं। दुख वो है जब मेरी ऊँगली काटे हँसी वो है जब आप नाले में गिरे दुश्मन को चोट लगे तो मज़ा आता है दोस्त को चोट लगे। तो दुख होता है, हमारी हसीबत आती है कि हम किसे आप न मानते हैं। दोस्तों की खिंचाई प्यार बढ़ाती है वहाँ हँसी का मतलब है हम दोस्त हैं पर अंजान की खिंचाई बुली बन

जाती है। हँसी यहाँ एक बहाना बन जाती है। एक एक्स्क्यूस मैं तो बस मजाक कर रहा था दिमाग ये सब अपने आप करता है, वह रिश्तों को नापने का काम करता है। हँसी हमारे दिल का असली हाल बता देती है। हँसी कभी खुद को समझाना नहीं चाहती। वह तो बस बचना चाहती है। आँख मारना तभी काम करता है जब वो राज़ हो। मान लीजिए 114 साल का बच्चा सिक्स के बारे में सीख रहा है। बड़े लोग इस बारे में खुलकर बात नहीं करते, पर वे इस पर मजाक जरूर करते हैं। बच्चा मजाक सुनकर ही बहुत कुछ समझ जाता है।

हँसी वो हदें दिखाती है जो लैंगुएज नहीं दिखा पाती। हँसी से हम सोशल वर्ल्ड की सीमाओं को समझते हैं। इस सामाजिक दुनिया की सीमाओं को लैंगुएज बहुत साफ होती है। इसलिए उसमें डर लगता है पर हँसी में बचने का मौका मिलता है। हँसी सच्ची होती है क्योंकि यह अपने आप आती है, हँसी में ही सच होता है। हँसी से मुकर जाना बहुत आसान है। अगर कोई टोके तो हम कह सकते हैं। यह तो बस मजाक था। हमारा दिमाग असली मतलब छुपा कर रखता है। इससे हम कड़वा सच भी मजाक में कह देते हैं।

सच कहना है तो लोगों को हसाइए वरना वो आपको मार देंगे। लैंग्वेज की शुरुआत एक बड़ा राज़ है। हम अपनी जिंदगी का 20% हिस्सा बातें करने में बिताते हैं। बातचीत का मेन काम इन्फॉर्मेशन शेयरिंग है जानकारी बांटना हम सवाल पूछते हैं, हुक्म देते हैं और किस्से सुनाते हैं। यह ऊँगली से इशारा करने जैसा है प्वाइंटिंग जैसा। लैंग्वेज की वजह से ही इंसान तरक्की कर पाया पर हमारे एंसेस्टर्स ने लैंग्वेज का इस्तेमाल सिर्फ विज्ञान के लिए नहीं किया। उन्होंने इसका इस्तेमाल जिंदा

रहने के लिए किया। सर्वाइवल के लिए सुनना बहुत सस्ता काम है। इससे हम दूसरों के एक्सपीरियंस से मुफ्त में सीखते हैं। अगर कोई दोस्त शेर देख ले तो उसकी एक आवाज आपकी जान बचा सकती है पर बोलने की अपनी ये कीमत होती है। पहला जानकारी पर आपका अकेला हक खत्म हो जाता है। दूसरा जानकारी इकट्ठा करने में बहुत मेहनत लगती है तो फिर लोग बोलने के लिए इतने उतावले क्यों रहते हैं?

बोलने वाले को क्या फायदा मिलता है? कुछ लोग कहते हैं कि यह अदला बदली है रेसिप्रोसिटी यानी। मैं तुम्हें कुछ बताऊँगा तुम मुझे कुछ बताना पर इसमें कुछ पजल्स हैं। लोग बातों का हिसाब नहीं रखते। हम चुप रहने वाले दोस्तों से नाराज नहीं होते, हम शून्य से ज्यादा बोलने के लिए बेताब रहते हैं। हम अक्सर दूसरों की बात काटकर खुद बोलना चाहते हैं। सुनने के लिए कान बंदरों जैसे ही हैं, पर बोलने के लिए हमारा मुँह और गला बहुत बदल गया है। इससे पता चलता है कि बोलने में

सुनने से ज्यादा फायदा है। हम अपनी जानकारी दूसरों को देकर अपनी इज्जत, अपना रुतबा, अपना स्टेटस बढ़ाना चाहते हैं। मिलर और डेसाले एक नई बात बताते हैं, बातचीत सिर्फ जानकारी सिर्फ इन्फॉर्मेशन बांटना नहीं है। बोलना फ़िल्म में खुद को दिखाने का तरीका है। शोइंग ऑफ है बोलने वाला अपनी बातों से दूसरों को इम्प्रेस करना चाहता है। इससे समाज में उसकी इज्जत, उसका सोशल स्टेटस बढ़ता है। मिलर कहते हैं, हम पार्टनर को इम्प्रेस करते हैं। डेशाले कहते हैं, हम नए साथी बनाना चाहते हैं।

पार्टनर भी एक तरह का खास साथी ही होता है। मान लीजिए आपके पास एक जादुई बैग है, इसमें बहुत सारे औजार भरे हुए हैं। आप दूसरों को इन औज़ारों की कॉपी दे सकते हैं। जानकारी बांटना भी औज़ार देने जैसा है। जब आप किसी से मिलते हैं तो दो बातें हो सकती हैं। या तो आप सिर्फ औज़ारों का सौदा करना चाहते हैं या न्यूट्रिड या फिर आप उसे अपना पक्का साथी बनाना चाहते हैं। सौदा यानी ट्रेड करने वाले को सिर्फ नए औजार से मतलब है पर साथी बनाने वाले को आपके पूरे बैग से

मतलब है। वह देखना चाहता है कि आपके बैग में क्या क्या है। बातचीत में भी ऐसा ही होता है। हम दूसरों को परखते हैं, बोलने वाला दिखाना चाहता है कि उसका बैग भरा है। आप बहुत सारी बातें जानते हो सकते हैं या बहुत समझदार हो सकते हैं। सुनने वाले को आपके बैग की क्वालिटी देखनी है। अगर आप के पास बहुत जानकारी है तो आप अच्छे साथी बनेंगे। लोग आपके औज़ारों से ज्यादा आपके बैग के दीवाने हैं। हर बात के दो मतलब होते हैं पहला है असली बात जैसे यह नई खबर है, दूसरा है छुपा हुआ मतलब जैसे मैं

वह इंसान हूँ जिसे सब पता है। कभी कभी छुपा हुआ मतलब ज्यादा जरूरी होता है। ऑफिस के इंटरव्यू में ऐसा ही होता है। वहाँ आपकी जानकारी से ज्यादा आपकी अक्ल देखी जाती है। हर बातचीत एक छोटा इंटरव्यू है। हम दोस्त, लवर या लीडर बनने के लिए अप्लाई करते हैं। दिखने में यह जानकारी बांटना है। पर अंदर से यह शो ऑफ है। प्यार के खेल में बातें करना बहुत जरूरी है। बचा होने से पहले कपल लाखों शब्द बोलते हैं। हम बातों से अपने पार्टनर को समझते हैं। शेक्सपियर की कविताएं उनकी काबिलियत दिखाती हैं।

नेताओं के लिए भी बोलना एक बड़ी ताकत है। हम हमेशा समझदार बोलने वाले को ही अपना नेता चुनते हैं। अच्छा लैंगुएज को परिंदों के सुंदर पंख कहा गया है। सादा बोलना उतना इम्प्रेस नहीं करता। यह बैग वाली बात पुरानी पहेलियों को सुलझाती है। लोग सुनने से ज्यादा बोलना क्यों चाहते हैं क्योंकि बोलने से आप अपने बैग के औजार दिखाते हैं? इसमें कोई उधारी नहीं होती। बोलना अपने आप में एक इनाम है पर बातचीत में। मु्द्दे की बात क्यों जरूरी है? क्योंकि रटी रटाई बातें सुनना

बहुत आसान है। मु्द्दे की बात यानी रिलेवन्स करना आपकी असली अक्ल को दिखाता है। लोग चाहते हैं कि आपके पास बैग में पूरा शोरूम हो। हम जानकारी देने वाले की इज्जत करते हैं, हम उन्हें अपना साथी बनाना चाहते हैं। प्रेस्टीज या रुतबे का मतलब है इस साथी के तौर पर आपकी कीमत अच्छा बोलना आपके प्रेस्टीज को बढ़ाता है। बड़े लोगों के साथ रहने से भी आपकी? इज्जत बढ़ती है। पुराने जमाने में यह सब आमने सामने होता था। आजकल टीवी और इंटरनेट से भी यह खेल चलता है।

खबरें और पढ़ाई न्यूज़ और रिसर्च में भी यही मोटिव यही मकसद छुपे हैं। हम मोबाइल पर दिनभर खबरें देखते हैं। हम कहते हैं यह समाज के लिए जरूरी है, पर सच ये है कि हम स्मार्ट दिखना चाहते हैं। खबरें पढ़कर हम दोस्तों पर स्टेटस जमाते हैं, हमें फर्क नहीं पड़ता। खबर कितनी सच्ची है हमें बस चर्चा में बने रहना है। हम उन बातों को पहले जानना चाहते हैं ताकि कन्वर्सेशन में बातचीत में हम पीछे न रहें। हम चाहते हैं कि लोग हमें ज्ञानी समझें। कॉलेज के लोग भी अपना नाम चाहते

हैं अपना प्रेस्टिज वह कहते हैं, हम दुनिया बदल रहे हैं। पर वे भी स्टेटस के पीछे भागते हैं। वे बड़े कॉलेज में काम करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनका नाम बड़े जनरल में छपे पैसे देने वाले भी नामी लोगों को चुनते हैं। स्टूडेंट्स भी नामी प्रोफेसर को पसंद करते हैं, चाहे वे उनकी रिसर्च कभी ना पढ़ें। असली बात से ज्यादा नाम जरूरी है। सब बड़े लोगों के साथ जुड़ना चाहते हैं। रिसर्च को चेक करने वाले भी भेदभाव करते हैं। वे नामी लोगों के काम को जल्दी

मान लेते हैं, नए लोगों के काम पर ज्यादा सवाल उठाते हैं। वे देखते हैं कि। लेखक कितना काबिल लगता है? समाज के फायदे पर कोई बात नहीं करता।

Transcript supplied by the publisher with the episode.

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