Episode notes
"Existentialism Is a Humanism" is a seminal text based on a public lecture delivered by Jean-Paul Sartre in 1945. At its core, the work serves as a powerful defense of existentialist thought against critics who viewed it as a philosophy of despair, passivity, or moral chaos. Sartre argues that far from being a gloomy outlook, existentialism is a doctrine of action and human dignity that places the ultimate responsibility for existence squarely on the individual's shoulders.Existence Precedes EssenceThe foundational principle of Sartre’s argument is the idea that existence precedes essence.…
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एक्सिस्टेंशियलिस्म इस ए ह्यूमनिस्म याने जीने का नजरिया ही इंसानियत है। आप पहले दुनिया में आए फिर आपने खुद को बनाया, मैं यहाँ इस नए सोचने के तरीके का साथ देने आया हूँ। बहुत से लोग इस पर तरह तरह के इलज़ाम लगा रहे हैं इसलिए मुझे इसका बचाव करना बहुत जरूरी लगता है। पहला इलज़ाम ये है कि ये सोच लोगों को उदास कर देती है। लोग कहते हैं कि ये सबको चुपचाप बैठने का न्योता देती है। उन्हें लगता है कि इस सोच में कोई उम्मीद नहीं बची है। अगर हमें लगेगा कि किसी मुश्किल
का कोई हल नहीं है तो हम कोई भी काम करना बिल्कुल छोड़ देंगे। ऐसे में सान बस बैठकर गहरी बातें करता रहेगा, फिलॉसोफी करेगा। लेकिन याद रखिए बस बैठकर सोचना एक बड़ा शौक, एक लग्ज़री है। कम्युनिस्ट लोग कहते हैं कि ये सिर्फ अमीरों की फालतू बातें हैं। उनका मानना है कि इससे दुनिया में कोई बदलाव नहीं आएगा। दूसरी तरफ से लोग हमें एक और वजह से बुरा कहते हैं। वो कहते हैं कि हम सिर्फ गन्दी और घटिया चीजें दिखाते हैं। हम इंसान की बुराइ और उसकी। कमियों पर ध्यान देते हैं।
हम दुनिया की सुंदर और अच्छी बातों को भूल जाते हैं। एक ऐथोलिक सोचने वाले ने कहा कि हम बच्चे की मुस्कान भूल गए। हम सिर्फ अंधेरा दिखाते हैं और रौशनी को छोड़ देते हैं। एक और बड़ा इलज़ाम हम पर ये लगाया जाता है। की हम इंसान को सबसे अलग थलग कर देते हैं, उससे आइसोलेटेड कर देते हैं। हम मिलजुल कर रहने की बात बिल्कुल नहीं करते। लोग कहते हैं कि हम बस खुद के बारे में सोचते हैं। हम सिर्फ इस बात पर रुके हैं कि मैं सोचता हूँ आई थिंक। ये वो पल होता है जब इंसान सिर्फ
अपने आप में खोया रहता है। इस जगह पर खड़े होकर दूसरे लोगों से जुड़ना नामुमकिन है। जब हम सिर्फ अपनी सोच में रहेंगे तो दूसरों तक कैसे पहुँचेंगे? हमारी अपनी ईगो दूसरे लोगों तक कभी नहीं पहुँच सकती। दरअसल। लोग समझते हैं कि ये सोच हमें अकेला कर देती है। उन्हें लगता है कि हम सिर्फ अपनी छोटी दुनिया में बंद हैं। इसी वजह से वो हमें गलत समझते हैं और हम से नाराज हैं। लेकिन सच तो ये है कि ये सोच इंसान को जिम्मेदार बनाती है। मैं आपको समझाऊंगा कि ये दुख की नहीं बल्कि हिम्मत की करेज की बात
है। कृष्ण धर्म को मानने वाले भी हम पर गुस्सा है। वो कहते हैं कि हम इंसानी कामों को सीरियस नहीं लेते। वो कहते हैं कि हम भगवान के बनायनी हम नहीं मानते। हम पुरानी और। पक्की बातों को भी नहीं मानते तो फिर इंसान के पास सिर्फ अपनी मर्जी बचती है। ऐसे में तो हर कोई अपनी मनमानी करने लगेगा। फिर आप किसी को भी गलत नहीं बोल पाएंगे। आज मैं इन सभी इलज़ामों का जवाब दूंगा इसलिए मैंने इसका नाम इंसानियत वाली सोच यानी हुमानिज्म रखा है। कई लोग यह नाम सुनकर हैरान हो
सकते हैं, पर हम देखेंगे कि इसका असली मतलब क्या है? यह एक ऐसी सोच है जिससे जीना मुमकिन होता है। इसमें हर सच और हर काम इंसान से जुड़ा है। हम पर सबसे बड़ा इलज़ाम यही है। कि हम जिंदगी का सिर्फ बुरा हिस्सा दिखाते हैं। अभी हाल ही में मैंने एक लेडी के बारे में सुना। गुस्से में उनके मुँह से कोई गंदा शब्द निकल गया तो वो तुरंत बोली लगता है मैं भी ऐसी ही एक्सिस्टेंशियलिस्ट हो रही हूँ। मतलब लोग हमारी सोच को गंदगी से जोड़तें हैं। वो हमें बहुत ही बुरा और डरावना
समझते हैं। हैरानी की बात है कि वो पुरानी गंदी कहानियों पढ़ लेते हैं, लेकिन हमारी बातें सुनते ही उनका जी मिछिलाने लगता है। दुनिया में बहुत सी दुखी करने वाली कहावतें मशहूर हैं। जैसे अपना भला तो जग भला या नीच को इज्जत दो तो सिर चढ़े। ये पुरानी बातें कहती हैं कि हमें सिस्टम से नहीं लड़ना चाहिए। अपनी जगत से ऊपर उठने की कोशिश मत करो। कहते हैं कि बिना पुरानी परंपरा के कुछ मत करो। पुरानी बातें सिखाती हैं कि इंसान तो हमेशा बुरा ही रहेगा इसलिए इंसानों को काबू में रखना बहुत
जरूरी है। नहीं तो पूरी दुनिया में अफरा तफरी मच जाएगी। जो लोग ऐसी डरावनी बातें और कहावतें बोलते हैं, वही लोग कहते हैं कि हमारी सोच बहुत उदास है और मुझे लगता है कि उन्हें हमारी उदासी से चिढ़ नहीं है। उन्हें तो हमारी अच्छी बातों से डर लग रहा है। हमारी सोच में सबसे ज्यादा डराने वाली बात क्या है?
वो ये है कि इंसान को खुद फैसला करना पड़ता है। चलिए अब इसे ज़रा आसान तरीके से समझते हैं। आखिर ये जीने का नया नजरिया है क्या? ये एग्ज़िस्टन्शियलिस्म क्या है? आजकल बहुत लोग इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उससे मतलब पूछो तो वो चकरा जाएंगे। ये आजकल एक नया फॅशन बन गया है एक नया ट्रेंड। अब इसका कोई असली मतलब नहीं बचा। लोग बस मज़े के लिए इसे कहीं भी जोड़ देते हैं। असल में ये कोई मजाक वाली बात नहीं है। ये बहुत गंभीर और गहराई वाली बात
है। इसे समझना थोड़ा मेहनत का काम है, लेकिन मैं इसे आपके लिए बहुत आसान बना दूंगा। इस सोच को मानने वाले दो तरह के लोग हैं। पहले वो जो भगवान को मानते हैं। दूसरे वो जो भगवान को नहीं मानते। मैं खुद दूसरी तरफ वाला इंसान हूँ यानी ये मैं भगवान को नहीं मानता, लेकिन दोनों ही एक बात पर राजी हैं। इंसान पहले पैदा होता है उसकी पहचान बाद में बनती है। चलिए देखते हैं इसका क्या मतलब है?
मान लीजिए कोई वर्कर, कोई कारीगर एक चाकू बनाता है। बनाने से पहले उसके दिमाग में एक ऐडिया था। उसे पता था चाकू का क्या काम होगा? वो जानता था कि उसे कैसे बनाना है तो चाकू बनने से पहले उसका मकसद तय था। चीजों के मामले में मकसद पहले आता है। जीस बात में कारीगर को पता है वो क्या और क्यों बना रहा है? जब हम भगवान को बनाने वाला मानते हैं तो हम उन्हें एक बड़ा कारीगर समझते हैं। जैसे कारीगर को चाकू बनाने से पहले सब पता होता है। उसे पता होता है कि चाकू का क्या काम होगा।
उसे पता होता है कि उसे कैसे बनाना है। वैसे ही लोग सोचते हैं कि भगवान ने इंसान को बनाया। भगवान के दिमाग में इंसान का एक नक्शा पहले से था यानी पैदा होने से पहले ही इंसान का मतलब तय था। पुराने जमाने के कुछ बड़े लोग भगवान को नहीं मानते थे लेकिन वो फिर भी एक पुरानी बात पर अड़े रहे। वो मानते थे की हर इंसान का एक पक्का स्वभाव होता है एक फिक्स्ड नेचर, चाहे वो जंगल में रहे या शहर में इंसान का मतलब सबके लिए एक जैसा ही है। उनके हिसाब से पहचान पहले आती है और इंसान का जन्म बाद में होता
है। लेकिन मेरी ये नई सोच एऌतेन्तिअलिस्म् कुछ और कहती है, अगर भगवान नहीं है तो ये चीज़ सबसे अलग है। वो चीज़ है इंसान। इंसान के मामले में जन्म पहले आता है उसकी पहचान बाद में बनती है। इसका मतलब है कि पहले इंसान दुनिया में आता है, वो खुद से मिलता है और इस दुनिया में खड़ा होता है। इसके बाद ही वो अपनी पहचान बनाता है। शुरू में इंसान कुछ भी नहीं होता। वो बाद में वैसा ही बनता है जैसा वो खुद को बनाएगा क्योंकि कोई भगवान नहीं है। इसलिए पहले से कोई नक्शा भी नहीं है।
इंसान बस है, इंसान वो नहीं है जो वो बस सोचता है। इंसान वो है जो वो बनने का पक्का इरादा करता है। इंसान वही है। जो वो खुद को बनाता है। यही मेरी सोच का सबसे पहला नियम है। लोग इसे बुरा कहते हैं पर ये तो गर्व की बात है। ये बात इंसान को एक पत्थर से बहुत बड़ा बनाती है। इंसान को घास फूसिया गोभी नहीं है। इंसान के पास अपना एक सपना होता है। वो जानता है कि वो अपने कल की तरफ बढ़ रहा है। इंसान तब तक कुछ नहीं है जब तक वो कुछ बन ना जाए। वो अपनी पसंद से ही अपनी असली पहचान बनाता है।
मान लीजिए मैं कोई पार्टी जॉइन करना चाहता हूँ या मैं कोई किताब लिखना या शादी करना चाहता हूँ। ये सिर्फ मेरी ऊपर की मर्जी नहीं होती। इसके पीछे मेरी पुरानी और गहरी सोच होती है। इंसान का जन्म पहले होता है, उसकी पहचान बाद में बनती है। इसका मतलब है कि इंसान खुद का जिम्मेदार है, वो रेस्पोंसिबल है। ये सोच आपको खुद का मालिक बना देती है। खुद का ओनर अब आपकी जिंदगी का सारा बोझ सारी रिस्पांसिबिलिटी आपके कंधों पर है पर एक बात बहुत जरूरी है। आप सिर्फ अपने लिए जिम्मेदार नहीं
है, आप दुनिया के सभी लोगों के लिए जिम्मेदार हैं। जब हम अपने लिए कुछ चुनते हैं तो हम सबके लिए एक। एग्ज़ैम्पल पेश करते हैं। हम कभी भी कोई बुरा रास्ता नहीं चुनते। हम हमेशा वही चुनते हैं जो हमें बेहतर लगे और जो हमारे लिए अच्छा है वो सबके लिए अच्छा है। चलिए इसे एक आसान एग्ज़ैम्पल से समझते हैं। मान लीजिए मैं एक मजदूर हूँ, एक वर्कर हूँ। मैं किसी एक खास ग्रुप में जुड़ जाता हूँ। मेरे इस काम से सबको एक मैसेज आता है। मैं सबको दिखा रहा हूँ कि यही रास्ता सही है।
मैं सिर्फ अपने लिए नहीं सबके लिए फैसला कर रहा हूँ या फिर मान लीजिए मैं शादी करने का फैसला करता हूँ। भले ही मेरी पसंद या मेरा प्यार हो, पर इस फैसले से मैं एक बात पक्की कर रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि शादी करना सबके लिए अच्छा है। मैं खुद को बनाते समय पूरी इंसानियत को पूरी ह्यूमेनिटी को बना रहा हूँ। मेरा हर काम पूरी दुनिया के लिए एक रास्ता है। अब हम कुछ बड़े शब्दों का मतलब समझेंगे। ये शब्द हैं बेचैनी, अकेलापन और निराशा। आप देखेंगे कि इनका मतलब बहुत आसान है।
सबसे पहले बात करते हैं बेचैनी की। हम मानते हैं कि हर इंसान बेचैन है, एन्शियस है। इसका मतलब यह है कि जब कोई इंसान पूरी समझ के साथ कोई काम शुरू करता है तो वह सिर्फ अपने लिए रास्ता नहीं चुनता। वह पूरी दुनिया के लिए एक कानून बना रहा होता है। उस समय उसे एक बहुत भारी जिम्मेदारी महसूस होती है। बहुत से लोग ऐसे हैं जो फिकर नहीं दिखाते, जो आंग्ज़ाइटी नहीं दिखाते, लेकिन सच तो ये है कि वो डर कर भाग रहे हैं। वो अपनी बेचैनी को छिपा रहे हैं। कई लोग सोचते हैं कि उनके काम से
किसी और को कोई फर्क नहीं पड़ेगा अगर आप उनसे पूछें। अगर सब ऐसा करे तो तो वो कंधे उसे आकर कहेंगे। सब ऐसा नहीं करते, पर हमें हमेशा खुद से एक सवाल पूछना चाहिए। अगर हर कोई वही करे जो मैं कर रहा हूँ तो दुनिया का क्या हाल होगा?
इस सोच से भागना खुद को धोखा देना है। जो इंसान झूठ बोलकर खुद को दिलासा देता है, उसका मान अंदर से कभी शांत नहीं रहता। उसका झूठ ही उसकी बेचैनी को दिखाता है। इसे अब्राहम वाली बेचैनी भी कहते हैं। ये कहानी सुनिए एक फरिश्ते ने अब्राहम से कहा। तुम्हें अपने बेटे की कुर्बानी देनी होगी। अब्राहम के सामने एक बहुत बड़ी मुश्किल थी। क्या वो सच में एक फ़रिश्ता ही था? क्या मैं सच में वही अब्राहम हूँ जिसे हुक्म मिला है? इसका पक्का सबूत कहाँ है?
एक बीमार औरत थी जिससे अजीब बातें दिखती थी। वह कहती थी कि उसे फ़ोन पर ऑर्डर मिलते हैं। डॉक्टर ने पूछा तुमसे कौन बात करता है? उसने जवाब दिया वह कहता है कि वह भगवान है। अब सवाल ये है कि सबूत क्या है? अगर मुझे कोई फरिश्ता दिखाई दे तो क्या गारंटी है कि वह फरिश्ता ही है?
अगर कोई आवाज़ सुनाई दे? तो वह कहाँ से आई? क्या वह स्वर्ग से आई या नरक से या फिर वह मेरे अपने दिमाग की उपज है? कौन साबित करेगा कि वह आवाज़ मेरे लिए ही है? कौन साबित करेगा कि मैं ही सही आदमी हूँ? मैं जो चुन रहा हूँ क्या सबके लिए सही है? इसका कोई पक्का सबूत कभी नहीं मिलेगा। इसका कोई निशान भी नहीं मिलेगा। अगर कोई आवाज सुनाई दे तो फैसला मेरा है। क्या वह आवाज किसी फरिश्ते की है? यह बात सिर्फ मैं ही तय कर सकता हूँ। अगर मैं किसी काम को सही कहता हूँ
तो यह मेरा चुना हुआ रास्ता है। बुरा मत मानिए, मैं कोई अब्राहम नहीं हूँ लेकिन मुझे भी हर पल बड़े काम करने हैं। हमारा हर काम एक एग्ज़ैम्पल बनता है। ऐसा सोचिए कि पूरी दुनिया हमें देख रही है। लोग आपको देख कर अपना रास्ता चुनेंगे। हर इंसान को खुद से एक बात पूछनी चाहिए। क्या मुझ में इतना हक है कि मैं फैसला लूँ?
क्या दुनिया को मेरे जैसा ही काम करना चाहिए? जो यह नहीं पूछता वह बस अपनी बेचैनी छिपा रहा है। यह बेचैनी आपको काम करने से नहीं रोकती, यह वैसी ही है। जो जिम्मेदार लोग महसूस करते हैं, एक फौजी लीडर की एग्ज़ैम्पल लीजिए। वह हमले का बड़ा फैसला लेता है। वह जानता है कि उसके सिपाही मारे जा सकते हैं, भले ही उसे ऊपर से हुक्म मिला हो, पर उस हुक्म का मतलब तो वही निकालता है। उसके एक फैसले पर 20 लोगों की जान होती है। ऐसा बड़ा काम करते वक्त डर तो लगेगा ही।
हर बड़े लीडर को यह डर लगता है। यह डर उन्हें काम करने से रोकता नहीं है बल्कि किसी डर की वजह से वो सही काम कर पाते हैं। उन्हें पता है कि रास्ते बहुत सारे हैं, पर उन्हें उनमें से कोई एक चुनना ही होगा। जो रास्ता वो चुनेंगे, वही सबसे खास बन जाएगा। हम इस बेचैनी की बात कर रहे हैं। यह डर हमें और ज्यादा जिम्मेदार बनाता है। यह हमें दूसरों लोगों से जोड़ता है। यह हमें काम करने से पीछे नहीं खींचता, बल्कि यह तो सही काम करने की शर्त है। अब बात करते हैं अकेलापन की।
इसका सीधा मतलब है कि भगवान नहीं है। हमें सच के साथ जीना सीखना होगा। कुछ लोग कहते हैं कि भगवान को हटा दो पर वो चाहते हैं कि पुराने नियम बचे रहे। वे कहते हैं चोरी मत करो, सच बोलो। वो चाहते हैं की ये बातें पहले से तय हो, लेकिन हमारी सोच ज़रा अलग है। अगर भगवान नहीं है तो कोई नियम भी नहीं है। आसमान में ऐसा कुछ नहीं लिखा जो हमें रास्ता दिखाएं। एक बड़े लेखक ने बहुत सही बात कही थी अगर भगवान नहीं है। तो सब कुछ जायज है। यही हमारी सोच की शुरुआत है। इंसान अब इस दुनिया में बिलकुल
अकेला है। उसके पास अब छिपने के लिए कोई बहाना नहीं है। हम यह नहीं कह सकते कि मेरा नेचर ऐसा है। इंसान पूरी तरह से आजाद है। इंसान खुद ही अपनी आजादी है। हमें आजाद रहने की सजा मिली है। सजा इसलिए क्योंकि हमने खुद को नहीं बनाया पर आजाद इसलिए क्योंकि हम दुनिया में आ चूके हैं। अब हम जो भी करेंगे उसके जिम्मेदार हम होंगे। आप अपनी भावनाओं को, अपने पेशेंट्स को। दोष नहीं दे सकते। यह नहीं कह सकते कि मैं गुस्से में बह गया था। आप अपने हर काम के लिए खुद जिम्मेदार हैं।
अगर आपको कोई इशारा भी मिलता है तो उसका मतलब भी आप ही तय करते हैं। आप खुद चुनते हैं कि उस इशारे को कैसे समझे हर इंसान को हर पल। खुद को बनाना पड़ता है। जैसे एक लेखक ने लिखा इंसान ही इंसान का कल है। इसका मतलब है कि हमारा कल हमारा फ्यूचर अभी खाली है। वो फ्यूचर कैसा होगा? यह हमें खुद तय करना है। फिलहाल हम इस दुनिया में। अपनी राह खुद बना रहे हैं। चलिए एक एग्ज़ैम्पल से बात समझते हैं। मेरा एक स्टूडेंट बहुत परेशान था। उसके पापा उसकी माँ से झगड़ते थे,
उसका बड़ा भाई जंग में मारा गया। वह भाई की मौत का बदला लेना चाहता था। उसकी बेचारी माँ घर में बिल्कुल अकेली थी। उसका बेटा ही उसकी आखिरी उम्मीद था। अब उस लड़के के पास दो रास्ते थे। पहला वो देश के लिए लड़ने चला जाए, दूसरा वो अपनी माँ के पास रुक जाए। उसे पता था कि माँ बस उसके लिए जीती है। अगर वो गया तो शायद माँ मर जाए। वहाँ रुकने से माँ की मदद पक्की थी। लेकिन जंग पड़ जाना एक रिस्क था। हो सकता है वो रास्ते में ही पकड़ा जाए या शायद उसे लड़ने का मौका ही न मिले।
वो दो तरह की बातों में फंसा था। एक तरफ अपनों के लिए प्यार था, दूसरी तरफ देश के लिए ड्यूटी इनमें से किसे चुनना सही होगा? क्या? धर्म उसकी कोई मदद करेगा? बिलकुल नहीं। धर्म कहता है कि सबका भला करो पर वो ये नहीं बताता कि किसका भला पहले करे, देश के अनजान लोगों का या अपनी माँ का कौन सा काम ज्यादा जरूरी है, इसका जवाब किसी किताब में नहीं लिखा है। एक पुराना नियम कहता है कि इंसान को कभी जरिया मत समझो, उसे कभी मीन्स मत समझो। लेकिन यहाँ ये नियम भी फेल है। अगर वो माँ के पास रुकता है तो
फौजी उसके लिए जरिया बन जाएंगे। अगर वो फौज में भर्ती होता तो माउस के लिए जरिया बन जाएगी। जब कोई रास्ता साफ न हो। तो लोग कहते हैं कि अपने दिल की सुनो, उस लड़के ने भी यही सोचा। उसने कहा जो मेरा दिल कहेगा वहीं करूँगा। अगर माँ के लिए प्यार ज्यादा है तो रुकूंगा। अगर देश के लिए तड़प ज्यादा है तो जाऊंगा, लेकिन दिलवाले प्यार को नापते कैसे हैं? प्यार कितना गहरा है?
यह काम से पता चलता है। अगर वो रुक गया तभी पता चलेगा कि प्यार था सिर्फ बोलने से कुछ साबित नहीं होता। हमारा काम ही बताता है कि हम कौन हैं बिना कुछ किये हम अपनी भावना नहीं नाप सकते। सच्ची फीलिंग और दिखावे में फर्क करना मुश्किल है। आप जो काम करते हैं वही आपकी पहचान बनती है इसलिए फीलिंग्स को रास्ता दिखाने वाला नहीं मान सकते, ना ही कोई पुरानी किताब आपको तरीका सिखाएगी। आप कहेंगे की उस लड़के ने मुझसे सलाह मांगी पर किसी से सलाह मांगना भी एक चुनाव है। सोचिए।
अगर आप किसी पुजारी के पास जाते हैं, तो आप पहले से जानते हैं कि वह क्या कहेगा? सलाहकार को चुनना ही आपका पहला फैसला है। आपने उसे चुना क्योंकि आपको उसकी सोच पसंद थी। मैंने उस लड़के को बस एक ही जवाब दिया, तुम मैं जाद हो इसलिए खुद रास्ता बनाओ। दुनिया में कोई पक का नियम काम नहीं आएगा। भगवान की तरफ से भी कोई पक का इशारा नहीं मिलता। कुछ लोग कहते हैं कि इशारे मिलते हैं पर उन इशारों का मतलब हम खुद निकालते हैं। जेल में मुझे एक बहुत अनोखा आदमी
मिला। उसकी जिंदगी में बहुत सारी नाकामी आई थी। बचपन में उसके पापा गुजर गए और वह गरीब था। स्कूल में उसे हमेशा नीचा दिखाया जाता था। फिर उसका दिल टूटा और वह प्यार में हार गया। आखिर में वह एक जरूरी परीक्षा में फैल हो गया। वह चाहता तो दुखी होकर हार मान लेता और उसने इन सब बातों को एक इशारा माना। उसने सोचा कि उसे दुनियादारी वाले काम नहीं करने उसने अपना पूरा जीवन धर्म को सौंप दिया। रिलिजन को इस इशारे का मतलब उसने अकेले ही तय किया। वह चाहता तो कोई और काम भी चुन
सकता था। अपनी नाकामी का मतलब निकालना उसकी खुद की जिम्मेदारी थी। यही है इस। अकेलापन का असली मतलब हम खुद चुनते हैं कि हमें क्या और कैसा बनना है और यही भारी आज़ादी हमें बेचैन करती है। अब निराशा की बात करते हैं। इसका मतलब बहुत सीधा है। हमें बस उस पर भरोसा करना चाहिए जो हमारे बस में है। या फिर जिसकी होने की पक्की उम्मीद है?
जब हम कुछ चाहते हैं तो उम्मीद का खेल होता है। मान लीजिए मेरा दोस्त ट्रैन से आ रहा है, मैं मानता हूँ कि ट्रैन सही समय पर आएगी या रास्ते में उसका अक्सीडेंट नहीं होगा। मैं बस उन्हीं इन बातों पर भरोसा करता हूँ जिनका मेरे काम से सीधा नाता है। जो मेरे हाथ में नहीं है, उसकी फ़िक्र छोड़ दो कोई भगवान नहीं है जो दुनिया को मेरी मर्जी के हिसाब से चलाएगा। एक पुराने ज्ञानी डेकर्ट ने कहा था दुनिया को जीतने से अच्छा खुद को जीतो। इसका मतलब है बिना फालतू उम्मीद के काम करो।
कुछ लोग मुझसे कहते हैं तुम्हें दूसरों की मदद पर भरोसा करना चाहिए। रूस और चीन के लोग तुम्हारी मदद करेंगे। तुम्हारी मौत के बाद भी लोग क्रांति करेंगे। वो कहते हैं कि ऐसा भरोसा करना ही सही है। पर मेरा जवाब थोड़ा अलग है। मैं अपने साथियों पर भरोसा करूँगा क्योंकि हम एक ही मकसद के लिए जुड़े हैं। मैं अपनी टीम पर भरोसा कर सकता हूँ, पर मैं उन लोगों पर भरोसा नहीं कर सकता जिन्हें मैं बिल्कुल जानता नहीं। इंसान अजाद है, इसलिए उसका कोई पक्का स्वभाव नहीं है। मुझे नहीं पता रूस की क्रांति
कहाँ जाएगी। मैं आज उसे देखकर खुश हो सकता हूँ पर मैं नहीं कह सकता कि वो हमेशा सक्सेस होगी। मुझे सिर्फ वो देखना चाहिए जो मेरे सामने है। कल मेरे मरने के बाद शायद लोग आलसी हो जाएं। हो सकता है वो किसी बुरे राजा को चुन लें। अगर ऐसा हुआ तो सब बेकार हो जाएगा। दुनिया वैसे ही बनेगी जैसा लोग उसे बनाएंगे। तो क्या मैं हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाऊं?
नहीं, बिलकुल नहीं। मुझे अपना काम पूरी हिम्मत से करना चाहिए। पुराने लोग कहते थे। काम करने के लिए झूठी उम्मीद नहीं चाहिए। मैं किसी ग्रुप का हिस्सा जरूर बनूँगा पर मैं किसी धोखे में नहीं रहूंगा। मैं बस वो करूँगा जो मेरे बस में है। उसके आगे मैं किसी और चीज़ पर भरोसा नहीं करूँगा। कुछ लोग बस हाथ पर हाथ धर कर बैठते हैं। वो कहते हैं। जो मैं नहीं कर सकता वो दूसरे करें। इसे आलस या सुस्ती कहते हैं? मेरी बात इसके बिल्कुल उलट है। मैं कहता हूँ कि काम ही असलियत है।
इंसान वही है जो वो अपने लिए चुनता है। इंसान अपने किए हुए कामों का जोड़ है। उसकी जिंदगी ही उसकी असली पहचान है। बहुत से लोग इस बात से डर जाते हैं क्योंकि वो अपनी कमियों को छिपाना चाहते हैं। दुखी होने पर वो अक्सर बहाने बनाते हैं। वो कहते हैं, हालात मेरे खिलाफ़ थे, मैं तो बहुत कुछ बन सकता था पर मुझे कभी सच्चा प्यार नहीं मिला क्योंकि कोई मेरे लायक ही नहीं मिला। मैंने कोई अच्छी किताब नहीं लिखी क्योंकि मेरे पास खाली वक्त नहीं था। मेरे पास बहुत टैलेंट छिपा पड़ा
है। लोग मुझे मेरे कामों से नापते हैं, जो गलत है। पर कड़वा सच तो यही है के बिना जताए कोई प्यार नहीं होता। प्यार वही है जो आपके कामों में दिखे। टैलेंट वही है जो कला में दिखे। एक महान लेखक वही है जिसने महान किताबें लिखीं। अगर उसने नहीं लिखीं तो उसमें कोई टैलेंट नहीं है। इंसान अपनी जिंदगी की तस्वीर खुद बनाता है। उस तस्वीर के बाहर कुछ भी नहीं होता। हो सकता है यह बात सुनने में बुरी लगे। खासकर उन लोगों को जो नाकाम रहे हैं, जो अनसक्सेसफुल रहे हैं।
पर सच तो यही है कि सिर्फ असलियत पर भरोसा करें। सपने और उम्मीदें अक्सर धोखा देती हैं। इनसे अपनी कोई पहचान नहीं बनती। इंसान अपने कामों की एक सीरीज है। एक लड़ी है, आप वहीं हैं। जो आप आज जी रहे हैं आपका हर छोटा काम ही आपको पूरा करता है। लोग हम पर एक बड़ा इलज़ाम लगाते हैं। वो कहते हैं कि हमारी सोच बहुत उदास है पर असल में उन्हें हमारी सख्ती से डर लगता है। हमारी स्ट्रिक्टनेस से जब हम अपनी कहानियों में कमजोर और। बुरे लोग दिखाते हैं तो लोग हमसे बहुत ज्यादा नाराज हो जाते हैं।
अगर हम कहें कि वो तो पैदा ही बुरा हुआ था, ये हालात ने उसे बुरा बना दिया तो लोग बहुत खुश और शांत हो जाएंगे। वो कहेंगे देखा हमारी कोई गलती नहीं है, हम तो ऐसे ही हैं, हम कुछ नहीं कर सकते। पर हमारी सोच कुछ और कहती है। हम कहते हैं कि अगर कोई डरपोक है तो वो अपने डरपोक हरकत के लिए खुद जिम्मेदार है। वो अपने दिल या दिमाग की वजह से ऐसा नहीं है। वो अपनी बनावट की वजह से ऐसा नहीं है। उसने खुद ऐसे काम किए जिससे वो डरपोक बना। कोई भी इंसान पैदाइशी डरपोक नहीं
होता। शरीर कमजोर हो सकता है पर वो कोई काम नहीं है। डरपोक वो है जिसने हार मान लेने का काम किया। लोग इस बात से बहुत ज्यादा डरते हैं। उन्हें लगता है कि वो डरपोक होने के कसूरवार हैं, गिलटी हैं। लोग तो बस ये चाहते हैं कि वो या तो हीरो पैदा हो या फिर डरपोक पैदा हो जाएं। वो सोचते हैं कि अगर डरपोक पैदा हुए तो मज़ा है। फिर वो पूरी जिंदगी डरपोक बनकर आराम से रह सकते हैं। वो कह सकते हैं कि मैं तो कुछ बदल ही नहीं सकता, वैसे ही हीरो भी बस खा पीकर हीरो बना रहेगा। पर हम कहते हैं कि इंसान खुद को
बनाता है। डरपोक इंसान खुद को डरपोक बनाता है। हीरो इंसान खुद को हीरो बनाता है। एक डरपोक के पास हमेशा मौका होता है। वो अपनी डरपोक वाली आदत को छोड़ सकता है और एक हीरो भी हीरो बने रहना बंद कर सकता है। सब कुछ इस बात पर टिका है कि आप क्या चुनते हैं? आपका पूरा जीवन आपके फैसलों, आपके चॉइसेस का मिल है। हमने अभी सोच पर लगे कई इज़ाम हटा दिए हैं। आपने देखा की ये बस चुप बैठने की बात नहीं है, ये इंसान को उसके काम से पहचानती है। यह कोई दुख भरी बात नहीं है। ये तो सबसे ज्यादा उम्मीद वाली
सोच है क्योंकि आपकी किस्मत आपके अपने हाथ में है। काम करना ही जिंदगी जीने का असली रास्ता है। लोग कहते हैं कि हम इंसान को अकेला छोड़ देते हैं पर यह उनकी गलतफहमी है। हम किसी भी बड़ी थियरी पर भरोसा नहीं करते। हम सिर्फ पक्के सच से बात शुरू करते हैं। सबसे बड़ा सच यही है की मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ आई थिंक देर्फोर आई ऍम। यह बात समझना हर किसी के लिए बहुत आसान है। इसके बिना बाकी सब चीजें बस अंधा जाए। हमारी सोच इंसान को पूरी इज्जत देती है।
हम इंसान को कोई सामान नहीं समझते। इंसान कोई पत्थर, कुर्सी या मेज़ नहीं है। इंसान के पास अपनी एक अलग दुनिया और सोच है जब मैं कहता हूँ कि मैं सोचता हूँ तो मैं अकेला नहीं हूँ। मुझे अपने साथ साथ दूसरे लोग भी दिखाई देते हैं। मेरी पहचान के लिए दूसरे लोग बहुत जरूरी हैं। मैं अच्छा हूँ या बुरा, यह दूसरों के बिना पता नहीं चलेगा। हमें दूसरों की नजरों में ही अपने आप को दिखाई देते हैं। हम सब एक दूसरे की आज़ादी से जुड़े हुए हैं। इससे जुड़ी हुई दुनिया में हमें
फैसला लेना है। हमें ही तय करना है कि हम और दूसरे लोग कौन हैं? हर इंसान का नेचर एक जैसा नहीं होता पर सबकी जिंदगी की हालत एक जैसी है। हालत का मतलब है कुछ पक्की रुकावटें, कुछ लिमिटेशंस। ये रुकावटें दुनिया के हर इंसान के लिए हैं। पुराने जमाने में कोई गुलाम पैदा होता था, कोई बहुत बड़ा राजा या जमींदार बनता था। आज कोई मजदूर बनकर पैदा होता है लेकिन कुछ चीजें कभी भी नहीं बदलती। सबको मेहनत करनी पड़ती है। सबको एक न 1 दिन मरना ही है। ये बातें हर जगह एक जैसी नजर आती हैं।
इंसान इन्हें खुद अपनी जिंदगी में जीता है। हम अपनी मर्जी से इन हालातों से लड़ते हैं। हम सबका मकसद एक जैसा हो सकता है। हम इन रूकावटों से आगे निकलना चाहते हैं। कोई भी इंसान हमारे लिए पराया नहीं है। एक यूरोप का आदमी चीन के आदमी को समझ सकता है। हम भारतीय अफ्रीका के लोगों को भी समझ सकते हैं क्योंकि हम सब एक ही मुश्किल से गुजर रहे हैं। यह भाईचारा पहले से बना बनाया नहीं मिलता। हम इसे अपनी पसंद से रोज़ बनाते हैं। जब हम दूसरों को समझते हैं तब यह बनता है।
इस सोच यानी एग्ज़िस्टन्शियलिज्म की सबसे जरूरी बात क्या है? वह है हमारी पूरी आजादी फ्री कमिटमेंट इंसान जब खुद को बनाता है तो वह पूरी दुनिया को एक रास्ता दिखाता है। यह बात हर जमाने के लोग समझ सकते हैं। हमारा हर छोटा काम बहुत बड़ा होता है, चाहे वह सांस लेना हो या खाना खाना हमारा होना और हमारा चुनना एक ही बात है। हम पहले दुनिया में आते हैं फिर अपनी पहचान खुद चुनते हैं, लेकिन लोग अब भी हम पर सवाल उठाते हैं। वो कहते हैं। तब तो कुछ भी करो क्या फर्क पड़ता है?
वो हमें गलत समझते हैं। वो कहते हैं कि हम सब बिगाड़ रहे हैं। वो कहते हैं कि हम किसी को बुरा नहीं कह सकते क्योंकि हर किसी की अपनी पसंद है, लेकिन यह बात बिल्कुल गलत है। सच तो यह है कि आपको चुनना ही पड़ेगा। आप चुनने से बच नहीं सकते। अगर आप कुछ नहीं चुनते तो यह भी एक तरह का चुनाव ही है। आप अपनी मनमानी नहीं कर सकते। एक असली हालत की एग्ज़ैम्पल लीजिए, जैसे कि शादी करना या बच्चे पैदा करना। आपको इस पर अपना फैसला लेना ही होगा। आप जो भी चुनेंगे, उसकी पूरी जिम्मेदारी आपकी होगी।
आपका फैसला पूरी दुनिया के लिए एक एग्ज़ैम्पल बनेगा। हम किसी पुराने नियम को नहीं देखते, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम मजाक कर रहे हैं। सही रास्ता चुनना एक कला की तरह है एक आर्ट की तरह, जैसे एक कलाकार, एक आर्टिस्ट अपनी पैंटिंग बनाता है। वह अपने समझ से एक सुंदर तस्वीर तैयार करता है, वैसे ही हमें अपनी जिंदगी की तस्वीर बनानी है। मैं यहाँ एक बात साफ करना चाहता हूँ। मैं ये नहीं कह रहा कि जिंदगी बस एक खेल है। मैं बस एक पैंटिंग से कंपेर कर रहा हूँ।
जब कोई कलाकार पैंटिंग बनाता है तो कोई उसे रोकता नहीं। कोई नहीं कहता कि उसे पुराने नियम मानने चाहिए क्योंकि पहले से कोई तय तस्वीर नहीं होती। कलाकार जब पेंटिंग बनाता है तभी वह बनती है। पेंटिंग कैसी होगी ये बनने के बाद ही पता चलता है। उसे पहले कोई नहीं बता सकता कि वह कैसे दिखेगी। सही और गलत का मामला भी बिल्कुल ऐसा ही है। दोनों में ही हमें कुछ नया बनाना पड़ता है। हम पहले से तय नहीं कर सकते कि क्या करना चाहिए, जैसे उसे स्टूडेंट की बात याद कीजिए।
कोई भी बड़ी किताब उसकी मदद नहीं कर सकी। उसे अपना नियम खुद ही बनाना पड़ा। अगर वह अपनी माँ के साथ रुकने का फैसला लेता तो वह उसकी अपनी पसंद होती। अगर वह लड़ने चला जाता तो वह भी उसकी अपनी पसंद होती। इंसान बना बनाया पैदा नहीं होता। इंसान अपनी सोच खुद चुनता है, वही चुनाव उसे एक पहचान देता है। हालात हमें चुनने पर मजबूर कर देते हैं। हम अपने वादों से ही पहचाने जाते हैं। इसलिए हमें गैरज़िम्मेदार कहना बिल्कुल गलत है। लोग कहते हैं, तुम दूसरों को गलत
नहीं कह सकते। यह बात आंधी सच है और आंधी झूठ। जब कोई दिल से कुछ चुन लेता है तो वह उसे बदलना नहीं चाहता। इंसान का नेचर कभी नहीं बदलता, बस दुनिया के सिचुएशन्स बदलते रहते हैं। पहले लोग गुलामी के खिलाफ़ लड़ते थे, आज लोग पॉलिटिक्स में अलग रास्ते चुनते हैं, पर फैसला करने की चुनौती वही है, फिर भी हम दूसरों को परख सकते हैं। हम देख सकते हैं कि कौन सच बोल रहा है। जो इंसान बहाने बनाता है वह गलत है। कुछ लोग कहते हैं मैं मजबूर था। वो कहते हैं, मेरे गुस्से ने यह
करवाया। यह खुद को धोखा देना है। इंसान के पास छिपने के लिए कोई बहाना नहीं है। अगर आप झूठ बोलते हैं तो यह एक गलती है। सच्चा इंसान अपनी आज़ादी को समझता है। आज़ादी ही हर सही काम की फाउंडेशन है। जब हम खुद के लिए आज़ादी चुनते हैं तो हम दूसरों के लिए भी वही चाहते हैं। मेरी आज़ादी मेरी फ्रीडम दूसरों पर टिक्की है, दूसरों की आज़ादी मेरी आज़ादी पर टिक्की है। हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। बिना सब के आजाद हुए कोई आजाद नहीं रह सकता। इंसान की असली पहचान उसकी आजादी
है, पर जब हम कोई बड़ा वादा करते हैं तो हमें दूसरों की आजादी का भी ख्याल रखना है। मैं तब तक पूरी तरह आजाद नहीं हो सकता। जब तक मैं सबको आजाद ना देखूं, इंसान पहली दुनिया में आता है, फिर खुद को बनाता है। वह हर हाल में अपनी आजादी को ही चुनेगा। जो लोग अपनी इस आजादी से डरते हैं, मैं उन्हें डरपोक कहता हूँ, वो बहाने बनाते हैं कि वो मजबूर थे। वो कहते हैं, मेरी तो किस्मत ही ऐसी थी। कुछ लोग खुद को बहुत बड़ा और जरूरी समझते हैं जैसे कि उनके बिना दुनिया रुक जाएगी। मैं ऐसे लोगों को घटिया मानता हूँ
क्योंकि वो खुद को बहुत बड़ा धोखा दे रहे हैं। सही और गलत के नियम हमेशा बदलते रहते हैं, पर आज़ादी सहने का तरीका एक ही है। पुराने और बाहरी नियम काम के वक्त फेल हो जाते हैं। उस स्टूडेंट की कहानी फिर से याद करिए। वह अपनी माँ के पास रुके या देश के लिए लड़ने जाए। कोई भी बड़ा नियम उसे सही रास्ता नहीं दिखा सकता। उसे अपना फैसला खुद ही बनाना पड़ा, बस यह देखना जरूरी है। कि फैसला आज़ादी से लिया गया। चलिए दो अलग कहानियों से इसे समझते हैं। एक कहानी मैगी नाम की लड़की की है।
वो एक लड़के से बहुत प्यार करती थी पर उस लड़के की सगाई किसी और से हो चुकी थी। मैगी ने अपने प्यार की कुर्बानी दे दी। उसने दूसरों के भले के लिए अपना सुख छोड़ दिया, दूसरी कहानी की है। वह मानती थी कि प्यार ही सबसे बड़ी चीज़ है। उसने समाज के पुराने नियमों की परवाह नहीं की। वह अपने प्यार और खुशी के लिए लड़ गई। उसने वही किया जो उसका दिल चाहता था। अब आप कहेंगे कि ये दोनों तो अलग है पर मेरे हिसाब से ये दोनों लड़कियां सही है। मैं गिने मजबूरी में नहीं, अपनी
मर्जी से छोड़ा सेंसवेरिया ने लालच में नहीं अपनी पसंद से चुना। दोनों के काम के पीछे उनकी अपनी आजादी थी। आप अपनी जिंदगी में कुछ भी चुन सकते हैं। बस शर्त यह है कि वह फैसला आपका अपना हो। तीसरा इलज़ाम यह है कि हमारी बातें हल्की हैं। लोग कहते हैं तुम खुद अपने नियम चुनते हो, इसलिए तुम्हारी बातों में कोई वजन नहीं है। मैं बस यही कह सकता हूँ कि मुझे दुख है। पर अगर भगवान नहीं है तो किसी न किसी को तो नियम बनाने होंगे। हमें असलियत को मानना ही होगा।
जिंदगी जीने से पहले कुछ भी नहीं होती। जिंदगी का पहले से कोई मतलब नहीं है। आप इसे जैसा जिएंगे, यह वैसे ही बनेगी। इसका मतलब निकालना आपके हाथ में है। इसी से हम सब मिलकर समाज बना सकते हैं। लोग मुझसे पूछते हैं तुमने तो इस नाम का मजाक उड़ाया था, फिर अब तुम इसे इंसानियत इसे ह्यूमनिज्म क्यों कहते हो?
असल में इस शब्द के दो अलग मतलब है। पहला मतलब है इंसान को सबसे महान मानना सबसे सुप्रीम। जैसे कोई हवाई जहाज में बैठकर कहे कि इंसान कितना महान है? यह बात बहुत अजीब है, भले ही मैंने जहाज नहीं बनाया, पर मैं खुद को बड़ा समझने लगता हूँ। दूसरों के काम पर खुद गर्व करना बेकार है। इंसान को कोई बनी बनाई चीज़ नहीं मानना चाहिए। इंसान अभी भी खुद को बना रहा है। हमें इंसानियत की पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसी पूजा अक्सर बुरा रास्ता दिखाती है। हमें वैसी सोच बिल्कुल नहीं चाहिए।
इंसानियत का एक और मतलब भी है इंसान हमेशा खुद से बाहर निकलता है। वह खुद को आगे बढ़ाता रहता है। वह बड़े सपनों के पीछे भागता है तभी उसका असली होना उसका एक्सिस्टेंस पक्का होता है। इंसान अपनी सीमाओं से आगे बढ़ता है। यह उसके जीने का असली तरीका है। हमारे लिए सिर्फ इंसानों की दुनिया ही है। इंसान अपने अंदर बंद होकर नहीं रहता। वह हमेशा इस दुनिया से जुड़ा रहता है। इसे ही हम इंसानियत वाली सोच कहते हैं। यह सोच कहती है कि इंसान ही सब है, उसका कानून बनाने वाला कोई और
नहीं। वह खुद ही अपने नियम बनाता है। वह अकेला है और उसे खुद फैसले लेने हैं। जब वह खुद को आजाद करने की सोचता है तभी वह एक असली इंसान बन पाता है। लोग हम पर फालतू में गुस्सा करते हैं। हमारा मकसद किसी को उदास करना नहीं है। इसाई लोग कहते हैं कि हम नास्तिक हैं। वो कहते हैं कि हम बस दुख बांटते हैं पर हमारी सोच तो बस सच दिखाती है। सच यह है कि सब कुछ हमारे हाथ में है। मान लो अगर भगवान होते भी तो भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। असली प्रॉब्लम भगवान के होने का नहीं है।
इंसान को खुद को फिर से ढूंढना होगा। उसे समझना होगा कि वह खुद ही अपना मालिक है। कोई भी उसे खुद से नहीं बचा सकता, चाहे भगवान का सबूत ही क्यों न मिल जाए। इस मायने में हमारी सोच बहुत हिम्मत वाली है, बहुत ऑप्टिमिस्टिक है। यह सिर्फ काम करने की बात सिखाती है। जो लोग कहते हैं कि इसमें उम्मीद नहीं है, होप नहीं है वो बस। खुद को ही दो घर दे रहे हैं आज के लिए बस इतना ही और फिर मिलेंगे आपसे। एक नए एपिसोड में एक नए टॉपिक के साथ मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे इसलिए बस विथ रोहित
धन्यवाद।
Transcript supplied by the publisher with the episode.
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