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Episode · SyllabuswithRohit

Computing Machinery and Intelligence By A.M. Turing (Hindi/हिंदी में)

3 Jun 2026 · 1 hr 28 min

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Episode notes

1. The Imitation GameTuring begins by bypassing the ambiguous question, "Can machines think?" because defining "machine" and "think" is too difficult and subjective. Instead, he proposes a practical substitute: The Imitation Game.In this game, there are three participants: a man (A), a woman (B), and an interrogator (C) who is separated from them. The interrogator’s goal is to determine which is the man and which is the woman. To complicate this, the man tries to deceive the interrogator, while the woman tries to help.Turing then modifies the game: What happens if a machine takes the place…

Transcript

Read the transcript · about 10,210 words, follows along as you listen

मैं एक सवाल पर बात करना चाहता हूँ क्या मशीनें सोच सकती हैं? कैन मशीन्स थिंक इस चर्चा की शुरुआत मशीन और सोच यानी थिंक जैसे शब्दों का मतलब समझाने से होनी चाहिए। हम इन शब्दों के डेफिनिशन वैसे ही रख सकते हैं जैसे लोग आम बोलचाल में इनका इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ये तरीका खतरनाक हो सकता है। अगर हम सिर्फ यह देखने लगे कि लोग इन शब्दों का इस्तेमाल कैसे करते हैं तो हमें इस सवाल का जवाब किसी सर्वे या। लोगों की राय में ढूंढना पड़ेगा, पर यह तो बेवकूफ़ होगी। इसलिए मैं इस मुश्किल सवाल की जगह

एक दूसरा सवाल रखूँगा जो इसी से जुड़ा है और इसे आसान शब्दों में समझा जा सकता है। इस नए सवाल को हम एक खेल के जरिए समझ सकते हैं जिसे हम नकल करने वाला खेल या इमिटेशन गेम कहते हैं। इसमें तीन लोग हिस्सा लेते हैं। एक आदमी ए, एक औरत बी और एक सवाल पूछने वाला इंटेरोगेटर यानी सी जो कोई भी हो सकता है। सवाल पूछने वाला एक अलग कमरे में बैठा होता है। उसका काम यह पता लगाना है कि बाहर बैठे दो लोगों में से कौन आदमी है और कौन औरत। वो उन्हें एक्स और वाय के नाम से जानता है और खेल के आखिर में उसे

बताना होता है कि एक्स सीए है और वाय ही बी है। या फिर एक्स ही बी है और वाय ही ए है? सवाल पूछने वाला यानी सी उनसे कुछ इस तरह के सवाल कर सकता है सी पूछ सकता है कि क्या एक्स मुझे बताएगा या बताएंगे कि उसके बाल कितने लंबे हैं? हाँ, मान लीजिए कि एक्स असल में वह आदमी है ए तो उसे जवाब देना ही होगा। इस खेल में आदमी का मकसद यह है कि वो सवाल पूछने वाले यानी सी को उलझा दे ताकि वो गलत पहचान करे। इसलिए उसका जवाब कुछ ऐसा हो सकता है। मेरे बाल छोटे कटे हुए हैं।

और सबसे लंबे बाल करीब नौ इंच के हैं ताकि आवाज सुनकर पहचान ना हो जाए। इसलिए जवाब लिखकर दिए जाने चाहिए। ये और भी अच्छा होगा अगर उन्हें टाइप किया जाए। सबसे बढ़िया तरीका तो यह है कि दोनों कमरों के बीच एक टाइप करने वाली मशीन लगी हो। या फिर कोई तीसरा बंदा कोई इंटरमीडियरी सवाल और जवाबों को दोहरा सकता है। इस खेल में जो तीसरा खिलाड़ी यानी औरत भी है, उसका काम सवाल पूछने वाले की मदद करना है। उसके लिए सबसे अच्छा यही रहेगा कि वो सच सच जवाब दे। वो अपने जवाब में यह भी कह सकती

है कि मैं ही औरत हूँ, इसकी बात मत सुनना, लेकिन इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि आदमी भी ऐसी ही बात नहीं कह सकता है। अब हम ये सवाल पूछते हैं। ये क्या होगा अगर इस खेल में आदमी यानी एक ही जगह कोई मशीन ले ले? क्या तब ये सवाल पूछने वाला उतनी ही बार गलती करेगा जितनी बार वो एक आदमी और एक औरत के बीच खेल खेलते हुए कर रहा था। यही सवाल हमारे पुराने सवाल की क्या? मशीनें सोच सकती हैं, इसकी जगह ले लेता है। अब इस नए तरीके पर थोड़ी चर्चा करते हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं कि इसका जवाब

क्या है? बल्कि यह भी है कि क्या यह नया सवाल वाकई जांच पड़ताल करने लायक है? हम फालतू की लंबी बहस में न पड़कर सीधा इसी बात पर गौर करेंगे। इस नए तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह इंसान के शरीर की ताकत और उसके दिमाग की ताकत के बीच उसके इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी के बीच एक साफ। लकीर खींच देता है। आज कोई भी इंजीनियर या केमिस्ट्री या दावा नहीं कर सकता कि वह इंसान की खाल जैसा कोई मटेरियल बना लेगा, जो बिल्कुल असली लगे। हो सकता है कि आगे चलकर कोई ऐसी खाल बना भी ले, लेकिन अगर ऐसी

चीज़ बन भी जाए तो भी। सोचने वाली मशीन यानी थिंकिंग मशीन को ऐसी बनावटी खाल पहनाने का कोई मतलब नहीं रह जाता। हमारे खेल का तरीका भी इसी बात को ध्यान में रखकर बनाया गया है जहाँ सवाल पूछने वाला यानी इंट्रोगेटर न तो खिलाड़ियों को देख सकता है, न छू सकता है। और न ही उसकी आवाज़ सुन सकता है। इस तरीके के और भी कई फायदे नीचे दिए गए कुछ सवालों और जवाबों से समझे जा सकते हैं। सवाल कि मुझे फोर्थब्रिज पर एक कविता लिखकर दिखाएं। जवाब है कि भाई मुझे इससे दूर ही

रखो। मुझे कविता लिखना कभी नहीं आया। सवाल कि 34,957 और 70,764 को जोड़िए। जवाब करीब 30 सेकंड रुकने के बाद जवाब दिया कि। 1,05,621 सवाल कि क्या आप किस खेलते हैं? जवाब हाँ, सवाल कि मेरे पास सिर्फ राजा है, आपके पास राजा और हाथी है, आपकी शाल है आप क्या चलेंगे? जवाब 15 सेकंड रुक कर हाथी को आरट पर ले जाऊंगा मेट, हो गई मात ये सवाल जवाब का तरीका इंसानी जिंदगी के लगभग हर हिस्से को परखने के लिए सही है। हम किसी मशीन को इसलिए कमजोर नहीं कहना चाहते। क्योंकि वो खूबसूरती के मुकाबले में नहीं चमक सकती, ठीक वैसे ही

जैसे हम किसी इंसान को इसलिए कमजोर नहीं कह सकते क्योंकि वो हवाई जहाज से दौड़ में हार गया। हमारे खेल के नियम इन कमियों को खेल से बाहर कर देते हैं। खिलाड़ी अपनी खूबसूरती। या बहादुरी की जितनी चाहे तारीफ करें, लेकिन सवाल पूछने वालाओं से असल में कुछ करके दिखाने को नहीं कह सकता। इस खेल पर एक ऊँगली उठाई जा सकती है कि इसमें मशीन के हारने की गुंजाइश बहुत ज्यादा है। अगर कोई इंसान मशीन होने का नाटक करे। तो वह बहुत बुरा खेल दिखाएगा। गिनती करने में उसकी सुस्ती और गलतियाँ उसे तुरंत पकड़वा देंगी

की ऐसा नहीं हो सकता की मशीनें कुछ ऐसा करें जिसे सोच ना कहा जाए थिंकिंग। लेकिन वो इंसान के सोचने के तरीके से बिल्कुल अलग हो। यह एक बहुत बड़ी और पक्की आपत्ति है। एक बड़ा ऑब्जेक्शन है, लेकिन हम सभी यह कह सकते हैं कि अगर कोई ऐसी मशीन बन जाए जो इस नकल करने वाले खेल को इस इमिटेशन गेम को अच्छे से खेल ले। तो हमें इस बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि नकल करने वाले खेल को खेलने के लिए मशीन को इंसान की नकल करने के बजाय कोई और ही तरीका अपनाना

चाहिए। ऐसा भी हो सकता है, लेकिन मुझे नहीं लगता। कि इससे कोई बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा। खैर, यहाँ हमारा मकसद खेल की बारीकियों को समझना नहीं है। हम तो बस यही मानकर चलेंगे कि सबसे अच्छा तरीका यही है कि मशीन वैसे ही जवाब देने की कोशिश करें जैसे एक आम आदमी नैचुरली देगा। हमारा पहला सवाल तब तक पूरी तरह साफ नहीं होगा जब तक हम यह ना बता दे की मशीन शब्द से हमारा असल में मतलब क्या है? ज़ाहिर है हम चाहेंगे कि हमारी मशीनों को बनाने में हर तरह की इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करने की

छूट हो। हम यह भी चाहते हैं कि अगर इंजीनियरों की टीम ऐसी मशीन बना दे, जिसके काम करने का तरीका खुद उन्हें भी ठीक से समझना आता हो, क्योंकि उन्होंने उसे बस एक्सपेरिमेंट्स या एक्सपीरियंस के आधार पर बनाया है, तो उसे भी शामिल किया जाए आखिर में। हम उन इंसानों को मशीन की गिनती से बाहर रखना चाहते हैं जो नैचुरली तौर पर पैदा हुए हैं। ऐसे डेफिनिशन बनाना मुश्किल है जो इन तीनों बातों पर खरे उतरे एग्ज़ैम्पल के तौर पर कोई जिक्र कर सकता है कि मशीन बनाने वाले

इंजीनियर सिर्फ एक ही सिक्स के हों। लेकिन यह बात सही नहीं बैठेगी क्योंकि यह मुमकिन है कि किसी इंसान की स्किन उसकी खाल के एक छोटे से हिस्से से पूरा का पूरा इंसान तैयार कर लिया जाए। अगर ऐसा किया जाता है तो यह बायोलोजी का एक बहुत बड़ा करिश्मा होगा। और इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। लेकिन हम इसे सोचने वाली मशीन यानी थिंकिंग मशीन बनाना नहीं कहेंगे। इसीलिए हमने जिर छोड़ दी कि हर तरह की टिकनी की इजाज़त दी जाए। हम ऐसा करने के लिए इसलिए भी

तैयार हैं। क्योंकि आजकल सोचने वाली मशीनों में जो इंट्रेस्ट जगी है, वो एक खास तरह की मशीन की वजह से है जिसे इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर या डिजिटल कंप्यूटर कहा जाता है। इसी बात को मानते हुए हम अपने खेल में सिर्फ डिजिटल कंप्यूटरों को ही हिस्सा लेने देंगे। पहली नजर में यह पाबंदी बहुत कड़ी लग सकती है। पर मैं यह दिखाने की कोशिश करूँगा कि असल में ऐसा नहीं है इसके लिए मुझे इन कंप्यूटरों की खासियत और उनके काम करने के तरीके के बारे में थोड़ा बताना होगा।

मशीनों को सिर्फ डिजिटल कंप्यूटर मानना तभी गलत होगा अगर मेरे सोच के उलट यह साबित हो जाए कि ये कंप्यूटर हमारे खेल में अच्छा परफॉरमेंस नहीं कर सकते। वैसे तो आज भी कई डिजिटल कंप्यूटर काम कर रहे हैं तो कोई पूछ सकता है। हम यह खेल अभी ही क्यों नहीं शुरू कर देते?

खेल की शर्तें पूरी करना आसान है। कई सवाल पूछने वालों को बुलाकर हम इसके स्टैटिस्टिक्स निकाल सकते हैं और देख सकते हैं कि कितनी बार सही पहचान हुई? इसका छोटा सा जवाब यह है। कि हम यह नहीं पूछ रहे हैं कि क्या आज के कंप्यूटर इस खेल में जीत जाएंगे? बल्कि हम यह पूछ रहे हैं कि क्या ऐसे कंप्यूटरों के बारे में सोचा जा सकता है जो इस खेल को अच्छी तरह खेल सके? लेकिन ये तो सिर्फ एक छोटा सा जवाब है। आगे चलकर हम इस सवाल को एक अलग नज़रिए से देखेंगे। डिजिटल कंप्यूटर के पीछे का ख्याल

ये है की ये मशीनें वो हर काम कर सके जो एक इंसान वाला कंप्यूटर कर सकता है एक ह्यूमन कंप्यूटर। यहाँ इंसान वाले कंप्यूटर का मतलब है कोई ऐसा शख्स जो सिर्फ पक्के नियमों का पालन कर रहा हो?

फिक्स्ड रूल्स का उसके पास अपनी मर्जी से नियमों को बदलने की कोई ताकत नहीं होती। हम मान सकते हैं कि ये नियम उसे एक किताब में दिए गए हैं एक बुक ऑफ रूल्स में। और जब भी उसे कोई नया काम सौंपा जाता है तो यह किताब बदल दी जाती है। उसके पास ढेर सारा कागज भी होता है जीस पर वो अपनी गिनती करता है, अपनी कैलकुलेशन्स करता है। हो सकता है वो जोड़ हटाने के लिए किसी छोटी मशीन की मदद ले। पर यह बात उतनी जरूरी नहीं है। अगर हम इसी बात को डेफिनिशन मान ले तो हम एक ही बात के गोल चक्कर में फंस जाएंगे।

इससे बचने के लिए हम देखते हैं कि कंप्यूटर आखिर ये काम करता कैसे है। मोटे तौर पर एक डिजिटल कंप्यूटर के तीन हिस्से होते हैं। पहला याद रखने की जगह यानी स्टोर यह जानकारी जमा करने का स्टोरेज है। दूसरा काम करने वाला हिस्सा यानी एग्ज़िक्यटिव यूनिट। यह वो हिस्सा है जो असल में गिनती करता है और तीसरा। देखरेख करने वाला हिस्सा यानी कंट्रोल। इसका काम यह देखना है कि सब कुछ सही तरीके से हो रहा है। स्टोर असल में जानकारी जमा करने की जगह है।

यह उस कागज की तरह है। जीस पर इंसान अपनी गिनती करता है या जीस पर उसके नियमों की किताब छपी होती है। अगर इंसान अपने दिमाग में कुछ याद रखकर हिसाब लगाता है तो स्टोर का एक हिस्सा उसकी मेमॅरि की तरह काम करता है। एग्ज़िक्यटिव यूनिट वो हिस्सा है जो असल में गिनती का काम पूरा करता है। ये काम हर मशीन में अलग अलग हो सकते हैं। आमतौर पर ये बड़ी बड़ी और लंबी गिनतियां कर सकती हैं जैसे 3540675445 को 7076345687 से मल्टीप्लाई करना, लेकिन कुछ मशीनों में ये सिर्फ जीरो लिखना

जैसे बहुत आसान काम ही करता है। हमने पहले कहा था कि कंप्यूटर को नियमों की ये किताब दी जाती है, लेकिन मशीन के अंदर इस किताब की जगह स्टोर का ही एक हिस्सा ले लेता है, जिसे हम काम करने का तरीका या निर्देशों की सूची या टेबल ऑफ इंस्ट्रक्शंस कहते हैं। अब कंट्रोल का काम यह देखना है कि इन इंस्ट्रक्शंस का पालन बिल्कुल सही तरीके से और सही ऑर्डर में हो रहा है। कंट्रोल को बनाया इस तरह जाता है कि सब कुछ रूल्स के मुताबिक ही हो। स्टोर में जो भी जानकारी होती है,

उसे छोटे छोटे हिस्सों या। पैकेट में बांट दिया जाता है। एग्ज़ैम्पल के तौर पर किसी मशीन में एक पैकेट डिजिट्स 10 अंकों का हो सकता है। स्टोर के हर हिस्से को एक नंबर दिया जाता है ताकि जानकारी को तरतीब से रखा जा सके। जैसे एक इन्स्ट्रक्शन। यह कह सकता है कि जगह नंबर 6809 में रखे नंबर को जगह नंबर 4302 वाले नंबर के 7+2 और जवाब को वापस उसी 4302 वाली जगह पर रख दो। ज़ाहिर है। मशीन के अंदर ये बातें इंग्लिश में नहीं लिखी होती। वहाँ ये किसी कोड के रूप में होती हैं जैसे कि 6809430217 यहाँ वॅन

सेवेन यानी 17 का मतलब है कि उन दो नम्बरों के साथ क्या करना है। इस मामले में इसका मतलब है नंबरों को जोड़ना। आप देखेंगे कि एक इन्स्ट्रक्शन 10 अंकों की जगह लेता है। इससे जानकारी का एक पैकेट बहुत आसानी से बन जाता है। देखरेख करने वाला हिस्सा यानी कंट्रोल इन इंस्ट्रक्शंस को उसी क्रम में मानता है, जिसमें वे रखे गए हैं। लेकिन कभी कभी उसे ऐसा इन्स्ट्रक्शन भी मिल सकता है कि अब जगह नंबर 5606 पर रखें। इंस्ट्रक्शन्स को मानो और वही से आगे बढ़ो या फिर ऐसा इन्स्ट्रक्शन की अगर जगह नंबर 4505 पर जीरो

लिखा है। तोगला इन्स्ट्रक्शन 6707 वाला मानो वरना सीधे चलते रहो। इस तरह के इंस्ट्रक्शंस बहुत जरूरी होते हैं। इनकी मदद से हम एक ही काम को तब तक बार बार दोहरा सकते हैं जब तक की कोई शर्त पूरी न हो जाए। ऐसा करने के लिए हमें बार बार नए इन्स्ट्रक्शन नहीं देने पड़ते बल्कि पुराने इन्स्ट्रक्शन ही बार बार इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसे घर के एक एग्ज़ैम्पल से समझते हैं। मान लीजिए एक माँ चाहती है कि उसका बेटा टॉमी स्कूल जाते समय हर सुबह। मोसी की दुकान पर जाके देखें कि

उसके जूते बन गए या नहीं। मा। उसे हर सुबह यह बात अलग से बोलकर याद दिला सकती है या फिर वो घर के बरामदे में एक नोटिस चिपका सकती है। टॉमी स्कूल जाते समय उस नोटिस को रोज़ देखेगा जो उसे मोसी के पास जाने को कहेगा। उस नोटिस में यह भी लिखा होगा कि अगर जूते मिल जाएं तो वापस आकर नोटिस को फाड़ देना। पढ़ने वालों को यह बात सच मान लेनी चाहिए कि डिजिटल कंप्यूटर बनाए जा सकते हैं। असल में ऐसे कंप्यूटर बनाए भी जा चूके हैं। क्नॉइस। ये ठीक उसी तरह काम कर सकते हैं जैसे एक इंसान हिसाब किताब करता

है। हमने जिन नियमों की किताब का जिक्र किया वो असल में एक इमेजिनेशन है। असल में कैलकुलेशन करने वाले इंसानों को याद रहता है कि उन्हें क्या करना है। अगर हम चाहते हैं कि मशीन किसी मुश्किल काम में इंसान की नकल करे तो हमें इंसान से पूछना होगा कि वो काम कैसे करता है? फिर उसके जवाब को इन्स्ट्रक्शन की एक सूची यानी इन्स्ट्रक्शन टेबल में बदलना होगा। ऐसे टेबल बनाने को ही हम काम करने का तरीका या। प्रोग्रामिंग कहते हैं, किसी मशीन को ए काम करने के लिए प्रोग्राम

करने का मतलब है कि उसमें ऐसी सूची डालना जिससे वो ए काम कर सके। डिजिटल कंप्यूटर का एक मजेदार रूप वो भी है जिसमें रैंडम एलिमेंट यानी इत्तफाक शामिल होता है। इनके इन्स्ट्रक्शन में डाई यानी पासा फेंकने ये ऐसे ही किसी बिजली की प्रक्रिया का इस्तेमाल होता है जैसे की इन्स्ट्रक्शन हो सकता है कि पासा फेंक को और जो नंबर आए उसे याद रखने की जगह नंबर 1000 में लिख दो। कुछ लोग ऐसी मशीन को फ्री व्हील वाली मशीन भी कहते हैं, लेकिन बाहर से देखकर ये पता नामुमकिन

नहीं है कि मशीन में कोई इत्तफाक वाला हिस्सा है या नहीं। ऐसा ही सर पाई के नंबरों का इस्तेमाल करके भी पैदा किया जा सकता है। ज्यादातर डिजिटल कंप्यूटरों में याद रखने की जगह कम होती है। पर हम ऐसी मशीन के बारे में भी सोच सकते हैं जिसमें याद रखने की जगह की कोई कमी ना हो। ज़ाहिर है एक बार में उस जगह का एक छोटा हिस्सा ही काम में लाया जा सकता है। उसे बनाने की भी एक हद होगी, लेकिन हम सोच सकते हैं कि जरूरत पड़ने पर उसमें और जगह बढ़ाई जा सकती है। ऐसी मशीनों को हम बेहिसाब याद

रखने वाली मशीन या इन्फिनिटी कैपेसिटी कंप्यूटर्स कहेंगे। डिजिटल कंप्यूटर का यह ख्याल काफी पुराना है। केम्ब्रिज के प्रोफेसर चार्ल्स बैबेज़ ने एयठीन 20 एयठ से एयठीन 39 के बीच एनालिटिकल इंजन नाम की एक मशीन बनाने की सोंची थी लेकिन वो कभी पूरी नहीं हो पाई। हालांकि बैबेज़ के पास सारे जरूरी थॉट्स थे। पर उस जमाने में ऐसी मशीन बहुत अट्रैक्टिव नहीं लग रही थी। उसकी रफ्तारी एक इंसान वाले कंप्यूटर से तो तेज होती, लेकिन आज की मैनचेस्टर मशीन जो खुद आज

के हिसाब से सुस्त है, उससे भी 100 टाइम्स कम होती। उसमें जानकारी याद रखने का तरीका पूरी तरह से मेकानिकल था, जिसमें व्हील्स और कार्ड्स का इस्तेमाल होना था की मशीन का पूरी तरह से मेकानिकल से बना होना हमें एक सुपरस्टीशन से दूर करने में मदद करेगा। अक्सर इस बात को बहुत बड़ा माना जाता है कि आज के डिजिटल कंप्यूटर इलेक्ट्रिकल्स से चलते हैं और हमारा नर्वस सिस्टम भी बिजली से चलता है, क्योंकि बेबीज़ की मशीन बिजली से नहीं चलती थी और असल में सारे डिजिटल कंप्यूटर एक ही जैसा

काम करते हैं तो हम देख सकते हैं। कि बिजली का इस्तेमाल होना कोई फंडमेंटल जरूरी बात नहीं है। हाँ, बिजली वहाँ काम आती है जहाँ सिग्नलों को बहुत तेजी से भेजना हो। इसलिए हम दोनों जगह मशीन और नशों में मौजूद है। लेकिन हमारे नसों के सिस्टम्स में चेमिकल्स का असर भी उतना ही जरूरी है जितना कि बिजली का। कुछ कंप्यूटरों में तो जानकारी याद रखने के लिए आवाज यानी अकूस्टिक का इस्तेमाल होता है। इसलिए बिजली का इस्तेमाल होना तो बस ऊपर ऊपर की एक जैसी दिखने वाली

बात है। अगर हमें बराबरी देखनी है तो हमें यह देखना चाहिए कि उनके काम करने का गणित मैथमैटिकल एनालॉजी एक जैसा है या नहीं। पिछले हिस्से में हमने जिन कंप्यूटरों की बात की, उन्हें हम साफ साफ। बदलाव वाली मशीनें या डिस्ट्रिक्ट एस्टेट मशीन्स कह सकते हैं। ये वो मशीनें हैं जो झटके यह क्लिक के साथ एक तय हालत से दूसरी पक्की हालत में पहुँच जाती हैं। इन हालातों के बीच इतना साफ फर्क होता है। क्यों उन्हें लेकर कोई कॅन्फ़्यूज़न नहीं होती? सच तो ये है कि दुनिया में ऐसी

कोई मशीन नहीं होती क्योंकि असल में हर चीज़ धीरे धीरे और लगातार चलती है। लेकिन कई मशीनों को साफ साफ बदलाव वाली मशीन में आकर समझना बहुत फायदेमंद रहता है। एग्ज़ैम्पल के तौर पर। बिजली के स्विच को ही ले लीजिए। यह मानना बहुत आसान है कि स्विच या तो ऑन होगा या ऑफ चालू या बंद। हालांकि इनके बीच की भी कुछ जगहें होती हैं, लेकिन हमारे काम के लिए हम उन्हें भूल सकते हैं एक और एग्ज़ैम्पल। एक ऐसे पहिये का है जो हर सेकंड एक बार क्लिक करके घूमता है, जिसे

बाहर लगे एक लिवर से रोका जा सकता है। इसके साथ एक बल्ब भी लगा है, जो पहिये की किसी एक खास जगह पर पहुंचते ही जल जाता है। इस मशीन को हम ऐसे समझ सकते हैं। की पहिए की जगह के हिसाब से मशीन की अंदरूनी हालत क्यू वन, क्यू टू या क्यू थ्री हो सकती है। बाहर से मिलने वाला सिग्नल आई जीरो या आई वन हो सकता है यानी लिवर की जगह किसी भी पल मशीन की हालत इस बात पर टिक्की होती है। कि उसकी पिछली हालत क्या थी और उसे बाहर से क्या सिग्नल मिला? इन मशीनों की खासियत यह है कि अगर

हमें इनकी शुरुआती हालत और बाहर से मिलने वाले इशारों का पता हो तो हम यह बता सकते हैं कि फ्यूचर में ये मशीनें क्या करेंगी? यह बात। लपलके के उस पुराने ख्याल जैसी है कि अगर हमें इस यूनिवर्स के हर छोटे से छोटे पार्टिकल की जगह और रफ्तार पता हो तो हम फ्यूचर की बात हर बात बता सकते हैं, लेकिन यूनिवर्स के मामले में फ्यूचर बताना बहुत मुश्किल है। क्योंकि वहाँ शुरुआती हालत में मामूली सी गलती भी आगे चलकर बहुत बड़ा उलटफेर कर सकती है। जैसे कि एक छोटे से इलेक्ट्रॉन का

अपनी जगह से रत्ती भर खिसकना भी यह तय कर सकता है कि 1 साल बाद कोई आदमी बर्फीले तूफान में मारा जाएगा या बच जाएगा। पर हमारी साफ साफ बदलाव वाली मशीनों यानी डिस्ट्रिक्ट स्टेट मशीन्स में ऐसा नहीं होता। अगर हमें मशीन की अभी की हालत का सही अंदाजा है तो हम यह भी सही सही बता सकते हैं कि आगे चलकर वो क्या करेगी? जैसा कि हमने बताया, डिजिटल कंप्यूटर भी साफ साफ बदलाव वाली मशीनों की गिनती में आते हैं, लेकिन ऐसी एक मशीन कितनी अलग अलग हालातों यानी स्टेटस में रह सकती

है, वह गिनती बहुत ही बड़ी होती है। कंप्यूटर के पास याद रखने की वैसी ही जगह होती है जैसे हिसाब करने वाले इंसान के पास कागज का ढेर होता है। उस कागज पर जो कुछ भी लिखा जा सकता है वो सब कंप्यूटर की इस जगह में भी भरा जा सकता है। समझने के लिए मान लेते हैं कि हम सिर्फ जीरो से नाइन तक के नंबर्स का ही इस्तेमाल कर रहे हैं और हाथ की लिखावट के फर्क को भूल जाते हैं। मान लीजिए कि कंप्यूटर को 100 कागज दिए गए हैं। हर कागज पर 50 लाइनें हैं और हर लाइन में 30 नंबर लिखे जा सकते

हैं। यह लगभग तीन मैनचेस्टर मशीनों को एक साथ मिलाने जैसा है। इन स्टेटस की गिनती के एक खास मैथमैटिकल हिसाब को मशीन की याद रखने की ताकत या स्टोरेज कैपेसिटी कहा जाता है। इस हिसाब से मैनचेस्टर मशीन की याद रखने की ताकत करीब 1,65,000 है और हमारे पहिये वाली मशीन की सिर्फ 1.6 अगर दो मशीनों को जोड़ दिया जाए तो उनकी ताकत भी जुड़ जाती है। इसी वजह से हम कह सकते हैं कि मैनचेस्टर मशीन के। अलग अलग हिस्सों जैसे मैग्नेटिक ट्रैक और ट्यूब्स को मिलाकर को याद रखने की ताकत 1,74,380 बनती

है। अगर हमें ऐसी किसी मशीन के नियमों की सूची मिल जाए तो हम पहले से बता सकते हैं कि वो क्या करेगी? और इस बात का पता खुद एक डिजिटल कंप्यूटर भी लगा सकता है। बस शर्त यह है कि कंप्यूटर यह काम बहुत तेजी से करे तो वो किसी भी साफ साफ बदलाव वाली मशीन की नकल कर सकता है, फिर नकल करने वाले खेल यानी इमिटेशन गेम में। एक तरफ वो असली मशीन होगी और दूसरी तरफ उसकी नकल करने वाला कंप्यूटर और सवाल पूछने वाला उन दोनों में फर्क नहीं कर पाएगा। हाँ, इसके लिए कंप्यूटर के पास

याद रखने की काफी जगह होनी चाहिए और उसकी स्पीड भी अच्छी होनी चाहिए। इसके अलावा उसे हर नई मशीन की नकल करने के लिए नए सिरे से प्रोग्राम देने होंगे। डिजिटल कंप्यूटर की यह खास खूबी कि वे किसी भी साफ साफ बदलाव वाली मशीन यानी डिस्ट्रिक्ट स्टेट मशीन की नकल कर सकते हैं। उन्हें। सब काम करने वाली मशीन यानी यूनिवर्सल मशीन्स बनाती हैं। ऐसी मशीनों के होने का बड़ा फायदा यह है कि अगर स्पीड की बात छोड़ दें तो अलग अलग कामों के लिए नई नई मशीनें बनाने की कोई जरूरत नहीं है।

ये सारे काम एक ही डिजिटल कंप्यूटर से किए जा सकते हैं। बस हर काम के लिए उसे सही प्रोग्रामिंग देने होंगे। इस तरह देखा जाए तो सभी डिजिटल कंप्यूटर एक मायने में एक जैसे ही हैं। अब हम उस बात पर वापस आते हैं जो हमने पहले छड़ी थी। तब यह सुझाव दिया गया था कि क्या मशीनें सोच सकती हैं? इस सवाल को बदलकर यह पूछा जाए कि क्या हम ऐसे डिजिटल कंप्यूटर के बारे में सोच सकते हैं जो नकल करने वाले खेल में बढ़िया काम करें?

अगर हम चाहे तो इससे थोड़ा और। बढ़ा करके पूछ सकते हैं कि क्या ऐसी साफ साफ बदलाव वाली मशीनें हैं जो इस खेल में जीत सके? लेकिन यूनिवर्सल होने की खूबी की वजह से ये दोनों सवाल असल में एक ही बात की ओर इशारा करते हैं कि क्या यह पॉसिबल है?

कि हम किसी एक डिजिटल कंप्यूटर को ले, उसकी याद रखने की ताकत बढ़ा दे, उसकी काम करने की रफ्तार बढ़ा दे और उसे सही तरीके से काम सीखा दे। तो क्या वो नकल करने वाले खेल में एक आदमी का मुकाबला कर पाएगा? अब जबकि हमने सारी फंडामेंटल बातें साफ कर ली हैं, तो हम अपनी असली बहस यानी क्या मशीनें सोच सकती हैं? इस पर आने के लिए तैयार हैं। हम पुराने सवाल को पूरी तरह से नहीं छोड़ सकते। क्योंकि इस पर सबकी राय अलग अलग हो सकती है और हमें कम से कम उन्हें सुनना तो चाहिए ही। बहस शुरू करने से पहले अगर मैं

अपनी खुद की राय बता दूं तो आपके लिए आगे की बात समझना आसान हो जाएगा। पक्के और सही सवाल की बात करें। तो मेरा मानना है कि अगले 50 सालों यानी करीब साल 2000 में ऐसी सोचने वाली मशीनें ऐसी थिंकिंग मशीन्स आ जाएंगी, जिनकी याद रखने की ताकत यानी स्टोरेज कैपेसिटी बहुत ज्यादा होंगी। वे नकल करने वाले खेल इतने बढ़िया तरीके से खेलेंगे कि। 5 मिनट के सवाल जवाब के बाद एक आदमी, एक आम आदमी सिर्फ 70% बार ही से पहचान कर पाएगा? पुराना सवाल की क्या मशीनें सोच

सकती हैं? मुझे इतना बेमतलब लगता है कि उस पर बहस करना ही बेकार है। फिर भी मुझे यकीन है कि इस सदी के खत्म होते होते पढ़े लिखे लोगों की सोच और शब्दों के मायने इतने बदल जाएंगे कि हम बिना किसी डर के कह सकेंगे की मशीनें सोच रही है। मेरा यह भी मानना है कि अपने इन बातों को छिपाने से कोई फायदा नहीं है। अक्सर लोग सोचते हैं कि वैज्ञानिक सिर्फ के सबूतों पर चलते हैं और कोई भी कंजेक्चर कोई भी अंदाजा नहीं लगाते पर ये आशुतोष गलत है। जब तक हम यह साफ रखे कि क्या

साबित हो चुका है और क्या हमारा सिर्फ एक अंदाजा है तब तक कोई नुकसान नहीं है। अंदाजा लगाना भी बहुत जरूरी है क्योंकि यही आगे की खोज आगे की रिसर्च का नया रास्ता दिखाता है। अब मैं उन विचारों पर गौर करूँगा जो मेरी ओपिनियन के खिलाफ़ है। पहला दी थियोलॉजिकल ऑब्जेक्शन। सोचना इंसान की इम्मोटल सोल का काम है। भगवान ने हर मर्दर औरत को एक इम्मोटल सुलख अमर आत्मा दी है, लेकिन किसी दूसरे जानवर या मशीन को नहीं। इसलिए कोई जानवर या मशीन सोच नहीं

सकती। मैं इस बात का कोई भी हिस्सा नहीं मानता, लेकिन मैं थिएलॉजिकल टर्म्स मैं मजहब के हिसाब से ही इसका जवाब देने की कोशिश करूँगा। अगर जानवरों को भी इंसानों की गिनती में रखा जाए तो? मुझे यह तर्क शायद थोड़ा ज्यादा सही लगता क्योंकि मेरे हिसाब से जानवर और बेजान चीजों के बीच का फर्क। इंसान और जानवरों के बीच के फर्क से कहीं ज्यादा बड़ा है। इस पुराने ख्याल का मनमाना पन तब और साफ हो जाता है जब हम यह देखेंगे। किसी दूसरे धर्म के लोग इसे कैसे देखेंगे?

जैसे इसाई लोग इस मुस्लिम विचार के बारे में क्या सोचेंगे? की औरतों के पास आत्मा नहीं होती। पर चलिए इस बात को छोड़ते हैं और असल मु्द्दे पर वापस आते हैं। मुझे लगता है कि ऊपर दिया गया तर्क सर्वशक्तिमान यानी अलमाइटी भगवान की ताकत पर एक बड़ी पाबंदी लगाता है। यह तो सब मानते हैं कि कुछ चीजें ऐसी हैं जो वो भी नहीं कर सकता जैसे कि एक को दो के बराबर बनाना, लेकिन क्या हमें यह नहीं मानना चाहिए कि अगर वो सही समझे तो एक हाथी को भी सोल देने के लिए आजाद है?

हम उम्मीद कर सकते हैं कि वो ऐसी ताकत तभी दिखाएगा जब हाथी के शरीर में कुछ ऐसा बदलाव हो, कुछ ऐसा म्यूटेशन हो जिससे उसका दिमाग सोल की जरूरतों को पूरा करने के काबिल हो जाए। ठीक ऐसा ही तर्क मशीनों के लिए भी दिया जा सकता है। हो सकता है यह बात गले उतारना थोड़ा मुश्किल लगे, लेकिन इसका मतलब सिर्फ इतना है कि हमें लगता है कि भगवान मशीनों को आत्मा देने के लिए हालात सही नहीं समझेगा। ऐसी मशीनें बनाने की कोशिश करके हम भगवान की आत्मा बनाने वाली ताकत को।

बेअदबी से छीन नहीं रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे बच्चे पैदा करने में हम ऐसा नहीं करते, बल्कि हम तो दोनों ही मामलों में उसकी मर्जी का एक इन्स्ट्रुमेंट मात्र है, जो उसकी बनाई हुई आत्मा के रहने के लिए घर तैयार कर रहे हैं। खैर। या तो बस एक अंदाजा है, मैं मजहबी दलीलों से बहुत प्रभावित नहीं होता, चाहे वो किसी भी चीज़ के पक्ष में क्यों न दी जाए। इतिहास में ऐसी दलीलें अक्सर कमजोर साबित हुई हैं। गालिलों के जमाने में धर्मग्रंथों की बातों का हवाला देकर यह कहा

जाता था। कि सूरज एक जगह रुका रहा और पूरा दिन नहीं ढला और उसने धरती को ऐसी बुनियाद रखी कि वो कभी नहीं हिल सकती। उस वक्त इन बातों को कॉपरनिकस की थ्योरी को गलत साबित करने के लिए काफी माना गया था। लेकिन आज की जानकारी के हिसाब से ऐसी दलीलें बेमानी लगती हैं। जब हमारे पास सही जानकारी नहीं थी तब ये बातें बहुत असरदार लगती थीं। दूसरा है दी हेड्स। इन दी सैंड ऑब्जेक्शन शुत्र मुर्गी जैसा बर्ताव इस एथराज का कहना है कि। मशीनों के सोचने का अंजाम बहुत

भयानक होगा। चलिए यही दुआ करें और यही मानें कि वो ऐसा कभी नहीं कर सकेंगी। यह बात अक्सर इतने साफ तौर पर नहीं कही जाती, लेकिन इसमें से ज्यादातर लोग जो इस बारे में सोचते हैं, उन पर इसका असर जरूर होता है। हम ये मानना पसंद करते हैं कि इंसान बाकी सब चीजों से किसी ना किसी तरह बेहतर है। हमारे लिए सबसे अच्छा यही होगा कि हम खुद को सबसे ऊपर साबित कर सकें क्योंकि तब हमारा यह ऊंचा ओहदा खोने का कोई डर नहीं रहेगा। मज़हबीतलीलों का फेमस होना भी इसी

एहसास से जुड़ा है। पढ़े लिखे लोगों में यह भावना और भी मजबूत होती है क्योंकि वे सोचने की ताकत को दूसरों से कहीं ज्यादा कीमती मानते हैं और इसी के दम पर खुद को सबसे ऊपर समझते हैं। मुझे नहीं लगता कि इस दलील में इतनी जान है कि इसका कोई जवाब दिया जाए। इसके लिए तो बस दिलासा देना ही ठीक रहेगा और शायद यह दिलासा आत्मा के दूसरे शरीर में जाने जैसे बातों में ढूंढा जा सकता है। तीसरा एतराज है। मैथ्स से जुड़ा दी मैथमेटिकल ऑब्जेक्शन मैथेमेटिक्स के कुछ ऐसे

रिज़ल्ट्स हैं, जिनसे पता चलता है कि मशीनों की अपनी एक सीमा होती है। यानी वे हर काम नहीं कर सकते। इनमे सबसे फेमस है का थियोरेम जो 1931 में आएगा। यह बताता है कि किसी भी पक्के नियम वाले सिस्टम में ऐसी बातें कही जा सकती हैं जिन्हें उस सिस्टम के अंदर रहते हुए ना तो सही साबित किया जा सकता है और ना ही गलत। इसी तरह के कुछ और रिजल्ट्स चर्च क्लीन और खुद मैंने यानी ड्युरिंग 1937 भी दिए हैं। मेरा वाला नतीजा यानी टूरिंग्स रिसाल्ट यहाँ समझने के लिए सबसे आसान है क्योंकि यह सीधे तौर पर

मशीनों की बात करता है। ये उन डिजिटल कंप्यूटरों के बारे में है जिनके पास याद रखने की बेहिसाब जगह है। इनफिनिट कैपेसिटी? ये नियम कहता है कि कुछ ऐसी चीजें हैं जो ऐसी मशीन कभी नहीं कर सकती। अगर उसे नकल करने वाले खेल में बिठाया जाए तो कुछ सवाल ऐसे होंगे जिनका वो या तो जवाब गलत देगी या फिर जवाब दे ही नहीं पाएगी, चाहे उसे कितना भी समय क्यों ना दिया जाए। बेशक ऐसे कई सवाल हो सकते हैं और यह भी मुमकिन है कि जो सवाल एक मशीन के लिए मुश्किल हो, उसका जवाब दूसरी मशीन आसानी से दे दे।

यहाँ हम सिर्फ हाँ या ना वाले सवालों की बात कर रहे हैं न कि पिकासो की पैंटिंग के बारे में आप क्या सोचते हैं? जैसे भारी सवालों की मशीनें जीस तरह के सवालों पर फैल हो जाती हैं वो कुछ इस तरह के होते हैं कि अगर हम एक मशीन को इस खास तरीके से बनाएं तो क्या वो मशीन को भी किसी सवाल का जवाब हाँ में देगी?

जब सवाल में जीस मशीन का जिक्र है वो सवाल सुनने वाली मशीन से ही मिलती जुलती हो तो जवाब या तो गलत आएगा या फिर आएगा ही नहीं। मैतेमेटिक्स का यही नतीजा कहता है कि मशीनों में यह एक ऐसी कमी है जो इंसान के दिमाग में नहीं होती। इस मैथेमेटिक्स वाली दलील का छोटा सा जवाब यह है कि भले ही यह मान लिया जाए कि किसी खास मशीन की अपनी कुछ सीमाएं होती हैं, लेकिन यह बात बिना किसी सबूत के कह दी गई है कि इंसान के दिमाग की ऐसी कोई सीमा नहीं होती। पर मुझे नहीं लगता किस बात को इतनी आसानी से नकारा जा सकता है।

जब इन मशीनों से कोई ऐसा मुश्किल सवाल पूछा जाता है जिसका वो साफ जवाब देती है तो हमें पता होता है कि वो जवाब गलत ही होगा। इससे हमें खुद के बड़ा होने का एहसास फीलिंग ऑफ सुपीरियरिटी होती है कि क्या यह एहसास झूठा है? बेशक यह एहसास बिल्कुल असली है, पर मुझे नहीं लगता कि इसे बहुत ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए। हम खुद भी अक्सर सवालों के इतने गलत जवाब देते हैं कि मशीनों के इस गिनती की कमी पर बहुत ज्यादा खुश होना। हमारे लिए सही नहीं होगा। इसके अलावा हमारी यह जीत सिर्फ

उसी एक मशीन के मुकाबले है जिसे हमने उस छोटे से खेल में हरा दिया है। सारी मशीनों को एक साथ हरा देने का तो सवाल यह पैदा नहीं होता अगर ब्रीफ में कहें। तो कुछ इंसान कैसे मशीन से ज्यादा होशियार हो सकते हैं, पर फिर कोई दूसरी मशीन उन इंसानों से भी ज्यादा होशियार हो सकती है और यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा जो लोग मैथेमेटिक्स वाली दलील को मानते हैं, वे शायद इस नकल करने वाले खेल इस इमिटेशन गेम को चर्चा का। बेस मानने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन जो लोग पहले की दो

आपत्तियों को मानते हैं उन्हें शायद किसी भी तरह के खेल या नियम में कोई इन्ट्रेस्ट नहीं होगी। चौथा है दी आर्गुमेंट फ्रम कान्शस्नस होश और एहसास वाली दलील। इस दलील को प्रोफेसर जेफरसन ने 1949 में बहुत अच्छे से समझाया था। उनका कहना था, जब तक कोई मशीन अपने मन के ख्यालों और इमोशन्स की वजह से कोई कविता ना लिख ले या कोई धुन न बना ले, तब तक हम यह नहीं मान सकते कि। मशीन दिमाग के बराबर है। यानी वो न सिर्फ उसे लिखे बल्कि उसे यह होश भी हो कि उसने यह लिखा है।

कोई भी मशीन अपनी कामयाबी पर खुशी या अपनी गड़बड़ी पर दुख महसूस नहीं कर सकती। उसे न तो तारीफ से अच्छा महसूस हो सकता है। ना अपनी गलतियों पर अफसोस और ना ही अपनी मन चाहे चीज़ ना मिलने पर गुस्सा या उदासी। यह दलील हमारी इस खेल के तरीके को ही गलत बताती है। अगर इस बात को बहुत गहराई से देखें तो किसी मशीन के सोचने का पता लगाने का इकलौता तरीका यह होगा। कि आप खुद वो मशीन बन जाए और महसूस करें कि आप सोच रहे हैं। फिर आप दुनिया को अपनी अन्य सांसों के बारे में बता सकते हैं।

लेकिन ज़ाहिर है ये कोई भी आपकी बात पर ध्यान नहीं देगा। इसी तरह इस सोच के हिसाब से यह जानने का भी कोई तरीका नहीं है। कि सामने वाला इंसान सोच रहा है या नहीं, जब तक कि आप खुद वह इंसान न बन जाए। असल में यह सिर्फ मैं ही सोचता हूँ वाली सोच है। हो सकता है कि यह बात तर्क के हिसाब से बिल्कुल सही लगे। पर इससे दूसरों से बातचीत करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसमें यह मानेगा कि सिर्फ मैं सोचता हूँ, पर बी नहीं, जबकि बी यह मानेगा कि सिर्फ मैं सोचता हूँ

पर ए नहीं। इस बात पर लगातार झगड़ने के बजाय समाज में हम आम तौर पर यह मानकर चलते हैं कि हर कोई सोचता है मुझे पूरा यकीन है कि प्रोफेसर जेफरसन इतनी कट्टर सोच स्लीपशिष्ट नहीं रखते होंगे कि सिर्फ अपने ही होश को सच माने शायद वो नकल करने वाले खेल को एक टेस्ट के तौर पर मानने को तैयार हो जाए। असल में। इस खेल को तीसरे खिलाड़ी बी को हटाकर अक्सर मौखिक परीक्षा या वीवा वोचे के नाम पर इस्तेमाल किया जाता है। इसका मकसद यह पता लगाना होता है कि क्या कोई छात्र वाकई किसी बात को समझता है या उसने उसे बस?

रटू तोते की तरह याद कर लिया है। चलिए ऐसे ही एक परीक्षा का हिस्सा सुनते हैं। सवाल पूछने वाला यानी इंट्रोगेटर कहता है आपकी कविता की पहली लाइन है कि क्या मैं तुम्हारी तुलना गर्मी के 1 दिन से करूँ? क्या इसकी जगह?

बाहर का दिन या स्प्रिंग का दिन कहना ज्यादा अच्छा नहीं रहेगा। जवाब देने वाला यानी विटनेस कहता है नहीं, उससे कविता की लय, स्कैन या रिदम बिगड़ जाएगी। सवाल पूछने वाला कहता है सर्दियों का दिन विंटर्स डे कैसा रहेगा? उसकी लय तो बिल्कुल सही बैठेगी। जवाब देने वाला कहेगा कि लय तो सही होगी पर कोई भी अपनी तुलना सर्दियों के उदास और ठंडे दिन से करवाना पसंद नहीं करेगा। सवाल पूछने वाला कहेगा क्या आपको मिस्टर पिकविक को देखकर क्रिसमस की याद आती है? जवाब देने वाला कहेगा हाँ, एक तरह

से सवाल पूछने वाला कहेगा पर क्रिसमस भी तो सर्दियों का ही 1 दिन है और मुझे नहीं लगता कि मिस्टर पिकवी को इस तुलना से कोई बुरा लगेगा। जवाब देने वाला कहेगा कि मुझे लगता है आप मजाक कर रहे हैं। सर्दियों के दिन से मतलब एक आम कड़ाके की ठंड वाले दिन से है ना कि क्रिसमस जैसे किसी खास और खुशी वाले दिन से और इसी तरह बातें आगे बढ़ती है। अब प्रोफेसर जेफरसन क्या कहेंगे अगर कविता लिखने वाली कोई मशीन इस? मौखिक परीक्षा इस विवाह वोचे में ऐसी समझदारी भरे जवाब दे पाए तो मैं नहीं जानता कि वो इन जवाबों

को मशीन का सिर्फ बनावटी, सारा या आर्टिफिशली सिग्नलिंग मानेंगे या नहीं। लेकिन अगर जवाब ऊपर दिए गए एग्ज़ैम्पल की तरह सही और देर तक टिकने वाला हो तो मुझे नहीं लगता कि वो इसे कोई सस्ता जुगाड़ कहेंगे। मेरे हिसाब से सस्ता जुगाड़ जैसी बात उन मशीनों के लिए कही जा सकती है जिनमें किसी इंसान की पड़ी हुई कविता की रिकॉर्डिंग भर दी गई हो। और उसे बस बटन दबाकर समय समय पर चालू कर दिया जाता हो तो मुझे लगता है कि जो लोग होश यानी कॉन्सेस्नेस वाली दलील देते हैं,

उनमें से ज्यादातर को मनाया जा सकता है। वे इस बात को मान लेंगे कि खुद को ही दुनिया में अकेला सच मानना यानी सॉलिड सेजम ठीक नहीं है और वे हमारे इस खेल यानी टेस्ट को स्वीकार कर लेंगे। मैं यह नहीं जानना चाहता कि होश में कोई रहस्य या राज़ नहीं है। एग्ज़ैम्पल के तौर पर। इससे दिमाग के किसी एक खास हिस्से में ढूंढने की कोशिश करना अपने आप में एक पहेली है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि जीस सवाल पर हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं उसका जवाब देने के लिए इन रहस्यों को

पहले सुलझाना कोई बहुत जरूरी है। फिर पांचवा है आर्गुमेंट्स फ्रम। वेरियस डिसेबिलिटीज़, अपंगता या कमियों से जुड़ी दलीलें। ये दलीलें कुछ इस तरह के होती हैं। मैं मान लेता हूँ कि आप मशीन से वो सब करवा लेंगे जो आपने बताया, लेकिन आप मशीन से कभी एक्स काम नहीं करवा पाएंगे। यहाँ एक्स का मतलब है वो। ढेर सारी बातें जो लोग कहते हैं कि मशीन कभी नहीं कर सकेगी जैसे कि दयालु होना, चतुर होना, खूबसूरत होना, मिलनसार होना, खुद से पहल करना, मजाक समझना, सही और

गलत में फर्क करना, गलतियाँ करना, प्यार में पड़ना। मलाई स्ट्रॉबेरी का मज़ा लेना या किसी को अपने प्यार में डालना, अपने एक्सपीरियंस से सीखना, शब्दों का सही इस्तेमाल करना, अपने खुद के बारे में सोचना, इंसान की तरह अलग अलग तरह के बर्ताव करना या कुछ बिलकुल नया कर दिखाना। आमतौर पर इन बातों के पीछे कोई ठोस सबूत नहीं दिया जाता। मुझे लगता है कि ये बातें एक्सपीरियंस के आधार पर अंदाजा लगाने यानी साइंटिफिक इंडक्शन की वजह से कहीं जाती हैं।

एक इंसान अपनी जिंदगी में हजारों मशीनें देखता है, जो वो देखता है उसी से वो कुछ आम नतीजे निकाल लेता है। जैसे कि मशीनें बदसूरत होती हैं। हर मशीन बस एक ही छोटे काम के लिए बनी होती है। ज़रा सा अलग काम पड़ने पर वे बेकार हो जाती हैं और उनका बर्ताव हमेशा ही एक जैसा होता है। ज़ाहिर है वो मान लेते हैं कि दुनिया की हर मशीन ऐसे ही होगी। मशीनों की ये बहुत सी कमियां उनके याद रखने की कम ताकत स्मॉल स्टोरेज कैपेसिटी की वजह से होती हैं। मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि याद रखने की ताकत वाली बात हर तरह की

मशीन पर लागू होती है। यह हमें मैतेमेटिक्स की बारीकियों में जाने की जरूरत नहीं है। कुछ साल पहले जब डिजिटल कंप्यूटरों के बारे में बहुत कम सुना गया था, तब अगर कोई उनकी खूबियों के बारे में बताता तो लोगों को आसानी से यकीन नहीं होता था। यह भी इसी वजह से था। क्योंकि लोगों ने वैसी मशीनें पहले कभी देखी नहीं थी। एक्सपीरियंस ये अंदाजा हम अक्सर बिना सोचे समझे लगा लेते हैं। जैसे जब कोई बच्चा आग से जल जाता है तो वो आग से डरने लगता है और उसे दूर रहता है। इसे ही हम अनुभव से सीखना या

साइंटिफिक इंडक्शन कह सकते हैं। लेकिन इंसानों के तौर तरीकों को समझने के लिए सिर्फ पुराने एक्सपीरियंस काफी नहीं होते। सही नतीजे पर पहुंचने के लिए हमें बहुत गहराई से सोचना होगा, वरना हम भी उन्हीं अंग्रेज बच्चों की तरह हो जाएंगे जो सोचते हैं कि पूरी दुनिया सिर्फ इंग्लिश ही बोलती है और। दूसरी लैंगुएज सीखना बेवकूफ़ है। मलाई और स्ट्रॉबेरी का मज़ा न ले पाना शायद आपको एक हल्की फुलकी या मज़ा की बात लग रही होगी। मुमकिन है कि हम कोई ऐसी मशीन बना ले जो इस लज़ीज़ खाने का मज़ा ले

सके। पर ऐसी कोशिश करना बेवकूफ़ होगी। इस कमी की असली बात यह है कि इसकी वजह से मशीन और इंसान के बीच वैसे दोस्ती नहीं हो पाती जैसे दो इंसानों के बीच होती है। यह दवा की मशीनें कभी गलती नहीं कर सकती। बड़ा अजीब है, मन करता है कि पलट कर पूश हूँ। तो क्या यह कोई बुरी बात है? लेकिन चलिए हम थोड़ा प्यार से इस बात को समझने की कोशिश करते हैं कि इसका असली मतलब क्या है। मुझे लगता है कि इस बात को नकल करने वाले खेल के जरिए समझाया जा सकता है। कहा जाता है कि सवाल पूछने वाला

यानी इंटेरोगेटर। हिसाब किताब यानी अर्थ में ठिके, कुछ सवाल पूछकर मशीन को इंसान से अलग पहचान लेगा। मशीन अपनी पक्की और एकदम सही गिनती की वजह से पकड़ी जाएगी। इसका जवाब बहुत सीधा है। खेल के लिए तैयार की गई मशीन प्रोग्राम्ड मशीन। हिसाब के सवालों के हमेशा सही जवाब देने की कोशिश नहीं करेगी। वो जानबूझकर ऐसी गलतियाँ करेंगी जिससे सवाल पूछने वाला उलझन में पड़ जाए। मुझे लगता है कि हम दो तरह की गलतियों के बीच उलझन हो रही है। पहली है काम करने की गड़बड़ी। एरर्स ऑफ़ फंक्शनिंग और दूसरी है।

एरर्स ऑफ़ कंक्लूषन यानी नतीजे की गलती काम करने की गड़बड़ी तब होती है जब मशीन का कोई पुर्ज़ा खराब हो जाए या बिजली का तार ढीला हो जाए, जिससे मशीन वैसा काम न कर सके जैसा उसे करना चाहिए। किताबों वाली बहस में हम ऐसी गड़बड़ी को भूल जाते हैं और सिर्फ ख्याली मशीनों की बात करते हैं। नियम के हिसाब से ऐसी ख्याली मशीनें कभी खराब नहीं होती। इस मायने में हम कह सकते हैं कि मशीनें कभी गलती नहीं करतीं। नतीजे की गलती तब होती है जब मशीन जो बाहर लिखकर दे रही है उसका कोई गलत मतलब निकले जैसे मशीन टाइप

करदे की जीरो, इक्वल्स वॅन ऐसा कहने का कोई कारण नहीं है की मशीन इस तरह की गलती नहीं कर सकती। हो सकता है मशीन बार बार। जीरो इक्वल्स वॅन ही टाइप करती रहे। या फिर अगर मशीन अपने पुराने तजुर्बे से सीखने का तरीका अपनाती है तो हमें यह मानकर चलना चाहिए कि कभी कभी उसके नतीजे गलत भी निकल सकते हैं। रही बात इस दावे की की मशीन खुद के बारे में नहीं सोच सकती। तो इसका जवाब तभी दिया जा सकता है जब हम पहले यह देख सके कि क्या मशीन वाकई किसी भी चीज़ के बारे

में सोच सकती है? फिर भी मशीन किस बारे में काम कर रही है? सब्जेक्ट मैटर? यह बात उन लोगों के लिए जरूर मायने रखती है जो मशीन चलाते हैं। एग्ज़ैम्पल के तौर पर अगर मशीन मैतेमेटिक्स का कोई सवाल हल कर रही है तो हम कह सकते हैं कि उस समय वही सवाल मशीन के काम का मेन मुद्दा है। इस हिसाब से मशीन यकीनन अपने बारे में भी सोच सकती है। वह अपना खुद का काम करने का तरीका यानी प्रोग्रामिंग बनाने में मदद कर सकती है। ये अपनी बनावट में बदलाव का असर पहले से बता सकती है।

अपने ही काम के नतीजों को देखकर वह खुद को बेहतर बनाने के लिए अपने प्रोग्राम्स बदल सकती है या कोई ख्याली पुलाव नहीं है। बल्कि आने वाले समय में ऐसा होना बिल्कुल मुमकिन है। यह कहने की मशीन अलग अलग तरह के काम नहीं कर सकती। असल में यह कहने का एक तरीका है कि उसके पास याद रखने की जगह कम है। स्टोरेज कैपेसिटी कम है कुछ समय पहले तक। 1000 नंबर्स को भी याद रखने वाली जगह मिलना बहुत मुश्किल था। हम यहाँ जिन क्रिटिसिज्म की बात कर रहे हैं, वे असल में होश और एहसास यानी कॉन्सेस्नेस वाली दलील

का ये दूसरा बदला हुआ रूप है। आमतौर पर अगर कोई कहता है कि मशीन यह काम कर सकती है और उसे करने का तरीका बताता है तो लोग ज्यादा प्रभावित नहीं होते। उन्हें लगता है कि मशीन का काम करने का तरीका जो कि मशीन ही होगा बहुत ही मामूली है। फिर छठा ऐतराज है लेडी लवलेस का ऐतराज उनका ऑब्जेक्शन बेबीज़ की पुरानी मशीन एनालिटिकल इंजन के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी हमें लेडी लव लेस की लिखी यादों यानी एयठीन 42 में जो उन्होंने लिखा उसे मिलती है। उन्होंने लिखा था, इस मशीन का खुद

से कुछ भी नया शुरू करने का कोई दावा नहीं है। ये सिर्फ वही कर सकती है जो हम इसे करने का ऑर्डर देते हैं। इस बात को हार्टी 1949 ने भी बताया और साथ में यह जोड़ा कि इसका मतलब यह नहीं कि ऐसी बिजली वाली मशीनें नहीं बनाई जा सकती जो खुद से सोचे थिंक फॉर इटसेल्फ या जिनमें सीखने का हुनर हो। क्या ऐसा करना मुमकिन है या नहीं? यह एक बहुत ही रोमांचक सवाल है लेकिन उस जमाने की मशीनों में ऐसी कोई खूबी नहीं थी। मैं इस बारे में हार्टी से पूरी तरह सहमत हूँ।

गौर करने वाली बात यह है कि हार्टी यह नहीं कह रहे थे। कि उन मशीनों में यह खूबी नहीं थी बल्कि यह कह रहे हैं कि लेडी लव लेस के पास उस वक्त ऐसे कोई सबूत नहीं थे जिससे वो इस बात पर यकीन कर पाती। मुमकिन है कि उन मशीनों में यह खूबी एक मायने में पहले से रही हो। मान लीजिए किसी मशीन में ये खूबी है का एनालिटिकल इंजन एक सब काम करने वाली मशीन थी एक यूनिवर्सल डिजिटल कंप्यूटर। इसलिए अगर उसकी स्पीड और याद रखने की जगह काफी होती और उसे सही तरीके से काम सिखाया जाता, सही तरीके से प्रोग्रामिंग की जाती।

तो वो उस दूसरी मशीन की नकल कर सकती थी। शायद ये ख्याल लेडी लवली या बैबिश के दिमाग में नहीं आया होगा और वैसे भी उनके लिए यह जरूरी नहीं था कि वे उस समय मशीन के बारे में इतने बड़े बड़े दावे करें। इस पूरे सवाल पर हम तब दोबारा बात करेंगे जब हम सीखने वाली मशीन यानी लर्निंग मशीन्स के बारे में चर्चा करेंगे। लेडी लव के ऐतराज का ही एक बदला हुआ रूप यह कहता है कि मशीन कभी भी वाकई कुछ नया नहीं कर सकती। इसका जवाब तो इस पुरानी कहावत में दिया जा सकता है कि दुनिया में

कुछ भी नया नहीं होता। भला कौन दावे से कह सकता है कि उसका किया हुआ कोई नया का कोई ओरिजिनल वर्क उन बीजों का नतीजा नहीं है जो पढ़ाई लिखाई ने उसके दिमाग में पहले से बोयत है। या फिर वो काम सिर्फ पुराने नियमों को ही नए तरीके से इस्तेमाल करने जैसा न हो? इसी ऐतराज का एक और रुपया है की मशीन कभी हमें हैरान नहीं कर सकती। कभी सरप्राइज़ नहीं कर सकती। ये बात एक सीधी चुनौती है और इसका जवाब भी सीधा है। सच तो यह है कि मशीनें मुझे अक्सर हैरान करती रहती हैं। ऐसा ज्यादातर इसलिए होता है

क्योंकि मैं पहले से यह पूरा हिसाब नहीं लगाता कि मशीन आगे क्या करने वाली है या फिर अगर मैं हिसाब लगाता भी हूँ तो वो बहुत जल्दबाजी में और कच्चे अंदाज में होता है। जिसमें गलती की गुंजाइश रहती है। शायद मैं खुद से कहूं कि मुझे लगता है कि यहाँ का वोल्टेज भी उतना ही होगा जितना वहाँ का है। चलो यही मान कर चलते हैं। ज़ाहिर है, मैं अक्सर गलत होता हूँ और नतीजा मेरे लिए एक हैरानी भरा होता है क्योंकि जब तक मेरा एक्स्पेरमेन्ट खत्म होता है मैं अपने उन पुराने कच्चे अंदाजों

यानी असम्प्शन्स को भूल चुका होता हूँ। मेरी इन आदतों के लिए कोई मुझे डांट सकता है, लेकिन इस बात पर शक नहीं कर सकता की मुझे मशीन के काम से वाकई हैरानी हुई है। मुझे उम्मीद नहीं है कि मेरे इस जवाब से मेरे क्रिटिक्स चुप हो जाएंगे। वे शायद यह कहेंगे कि मुझे होने वाली हैरानी मेरे खुद के दिमाग की उपज है और इसमें मशीन का कोई कमाल नहीं है। यह बात हमें फिर से होश और एहसास यानी कान्शस्नस वाली पुरानी बहस पर ले जाती है। लेकिन यह एक बात गौर करने वाली है।

चाहे कोई इंसान हमें हैरान करे या कोई किताब या मशीन, उस हैरानी को महसूस करने के लिए हमारे दिमाग को उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है। फिलॉसोफर और मैथेमेटिशियन अक्सर एक बड़ी गलती करते हैं। वे यह मान लेती हैं कि जैसे ही हमें कोई बात पता चलती है, उस बात से निकलने वाले सारे कोन्सक्वेन्सेस सारे नतीजे भी हमारे दिमाग में उसे पला जाते हैं। कई बार यह सोच काम आती है पर। हम अक्सर भूल जाते हैं कि यह सच नहीं है। इसी गलत सोच की वजह से लोग यह मान लेते हैं कि जानकारी और पुराने नियमों से नतीजे निकालने में कोई

खास बात नहीं है। सातवाँ दलील है। आर्गुमेंट्स फ्रम कंटिन्यूयिटी इन दी नर्वस सिस्टम नसों के तंत्र की दलील हमारा नर्वस सिस्टम यकीनन कोई साफ साफ बदलाव वाली मशीन नहीं है। कोई डिस्ट्रिक्ट स्टेट मशीन नहीं है। नसों में होने वाली एक बहुत छोटी सी हलचल भी। आगे चलकर बहुत बड़ा असर डाल सकती है। कुछ लोग दलील दे सकते हैं कि इसी वजह से एक डिजिटल कंप्यूटर कभी भी इंसान के नशों वाले तंत्र की नकल नहीं कर पाएगा। यह सच है कि झटके से काम करने वाली मशीन और लगातार काम करने वाली मशीन डिस्ट्रिक्ट स्टेट मशीन

और कंटिन्युवस मशीन में फर्क होता है। लेकिन अगर हम अपने नकल करने वाले खेल की शर्तों को देखें तो सवाल पूछने वाला यानी इंटेरोगेटर इस फर्क का कोई फायदा नहीं उठा पाएगा। इसे एक दूसरे मशीन के एग्ज़ैम्पल से समझते हैं जो। लगातार काम करती है, जो डिफ्रेन्शियल एनालाइजर है। ऐसी कुछ मशीनें अपना जवाब टाइप करके देती है, इसलिए वे हमारे खेल में हिस्सा ले सकते हैं। एक डिजिटल कंप्यूटर शायद यह पक्का ना बता पाए कि वो दूसरी मशीन बिल्कुल क्या जवाब देगी। पर वो उसके जैसा मिलता जुलता जवाब

देने के काबिल जरूर होगा। एग्ज़ैम्पल के तौर पर अगर पाई की कीमत पूछी जाए जो करीब 3.1416 होती है तो कंप्यूटर अंदाज़े से 3.12 3.13 3.14, 3.15 या 3.16 में से कोई एक जवाब दे सकता है। एसएमएस सवाल पूछने वाले के लिए यह पहचानना नामुमकिन जैसा हो जाएगा कि जवाब कंप्यूटर ने दिया है या उस दूसरी मशीन ने। आठवीं दलील है दी आर्गुमेंट फ्रम। इनफार्मेलिटी ऑफ़ बेहेवियर बर्ताव में ढील की तली इंसान हर हालात में क्या करेगा?

इसके लिए नियमों की कोई ऐसी किताब बनाना मुमकिन नहीं है जो हर छोटी बड़ी बात का जवाब दे सके। एग्ज़ैम्पल के तौर पर। एक रूल हो सकता है कि लाल बत्ती होने पर रुकना है और हरी बत्ती होने पर चलना है। लेकिन क्या होगा अगर किसी खराबी की वजह से दोनों बत्तियां एक साथ चल जाएं?

शायद कोई यह फैसला करे की रुकना ही सबसे सुरक्षित है, पर इस फैसले से भी आगे चलकर कोई और मुश्किल खड़ी हो सकती है। हर मुमकिन मौके के लिए रहने सहने के नियम यानी रूल्स ऑफ कन्डक्ट बनाना, यहाँ तक कि ट्रैफिक लाइट जैसी छोटी चीज़ के लिए भी नामुमकिन लगता है। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। यहाँ से यह दलील दी जाती है कि हम मशीन नहीं हो सकते। दलील कुछ इस तरह काम करती है। अगर हर इंसान के पास अपनी जिंदगी चलाने के लिए पक्के नियमों की एक लिस्ट होती तो वो एक मशीन से

बेहतर नहीं होता। पर चुकी ऐसे कोई पक्के नियम नहीं हैं। इसलिए इंसान मशीन नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि यहाँ रहने सहने के नियम रूल्स ऑफ़ कंडक्ट और काम करने के तरीके लॉज़ ऑफ़ बेहेवियर के बीच थोड़ी उलझन हो रही है। रहने सहने के नियम से मेरा मतलब है वो बातें जिनका हमें होश यानेकॉन्सेस्नस होता है और जिन्हें हम मानते हैं जैसे लाल बत्ती देखकर रुक जाओ। वहीं काम करने के तरीके से मेरा मतलब है कुदरत के वो नियम लॉज़ ऑफ नेचर जो इंसान के शरीर पर लागू

होते हैं। जैसे अगर आप किसी को सिकोटी काटेंगे, पिंच करेंगे तो वो चिल्लाएगा। अगर हम अपनी दलील में रहने सहने के नियम की जगह काम करने के तरीके शब्द का इस्तेमाल करें तो बात बदल जाती है। हम मानते हैं कि अगर कोई चीज़ कुदरत के नियमों से चलती है तो वो एक तरह की मशीन है, भले ही वो झटके से काम करने वाली मशीन न हो और इसके उलट। अगर कोई मशीन है तो वो नियमों से ही चलेगी, लेकिन हम इतने दावे से यह नहीं कह सकते कि इंसान के काम करने के कोई पक्के नियम नहीं हैं। इन नियमों को ढूंढने का इकलौता

तरीका विज्ञान है, साइंटिफिक ऑब्ज़र्वेशन है और हम कभी भी ऐसी हालत में नहीं होते। जहाँ हम कह सकें कि हमने बहुत ढूंढ लिया। अब ऐसे कोई नियम नहीं बचे हैं। हम यह और भी मजबूती से दिखा सकते हैं कि ऐसी कोई भी बात कहना गलत क्यों होगा? मान लीजिए कि अगर ऐसे पक्के नियम होते तो हमें यकीन होता है कि हम उन्हें ढूंढ लेंगे। तब तो किसी साफ साफ बदलाव वाली मशीन किसी डिस्ट्रिक्ट स्टेट मशीन को देखकर और उसे पढ़ाकर हम यह बता पाते कि वो आगे क्या करेगी?

और यह काम हम एक ठीक ठाक समय में मान लीजिए, 1000 साल में कर लेते लेकिन ऐसा होता नहीं है। मैंने मैनचेस्टर कंप्यूटर पर एक छोटा सा काम करने का तरीका बनाया। एक प्रोग्राम जिसमें याद रखने की सिर्फ 1000 जगहें हैं, 1000 स्टोरेज यूनिट्स हैं। इसमें जब मशीन को 16 डिजिट्स वाला कोई नंबर दिया जाता है। तो वो दो सेकंड के अंदर एक दूसरा नंबर जवाब में देती है। मैं किसी को भी चुनौती दे सकता हूँ कि वो इन जवाबों को देखकर यह अंदाजा लगा ले कि किसी नए नंबर के लिए मशीन क्या जवाब देगी।

नोबीन अल्लील है दी आर्गुमेंट फ्रम। एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शन छठी इंद्री वाली दलील मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि पढ़ने वाले एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शन इ एस पी यानी छठी इंद्री के बारे में जानते होंगे और इसके चारों हिस्सों का मतलब भी उन्हें पता होगा जैसे टेलीपैथी। यानी एक दूसरे के मन की बात जान लेना, दिव्य दृष्टि, भविष्य देख लेना और मन की ताकत से चीजें हिलाना, ये हैरान करने वाली बातें हमारे पुराने साइंटिफिक थॉट्स को झुठलाती हुई लगती हैं। हम कितनी अच्छे से चाहते हैं कि

इन्हें गलत साबित कर सकें। लेकिन बदकिस्मती से कम से कम टेलीपैथी के पक्ष में इतने स्टैटिस्टिकल एविडन्स मौजूद हैं कि उन्हें झूठ लाना नामुमकिन है। नई सच्चाइयों को अपने पुराने ख्यालों में फिट करना बहुत मुश्किल है। एक बार अगर आपने इन्हें मान लिया। तो भूतों और सायों पर यकीन करना कोई बड़ी बात नहीं रह जाएगी। ये ख्याल कि हमारा शरीर सिर्फ विज्ञान के जाने माने नियमों से चलता है, सबसे पहले खत्म होने वाली बातों में से एक होगा। मेरे हिसाब से यह दलील काफी मजबूत

है। इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि कई साइंटिफिक थियरीज छठे इंद्री की परवाह किए बिना भी असल जिंदगी में बहुत अच्छा काम करते हैं। सच तो यह है कि अगर हम इसके बारे में भूल भी जाएं तो भी हमारा काम मज़े में चल जाता है। पर यह तो बस खुद को तसल्ली देने वाली बात है। दरिया है। सोचना शायद ऐसी ही चीज़ है जहाँ छठ इंद्र यानी ईएसपी का बहुत बड़ा हाथ हो सकता है। ईएसपी के आधार पर एक खास दलील कुछ ऐसी हो सकती है ये मान लीजिए हम नकल करने वाला खेल खेल रहे हैं।

इसमें एक तरफ ऐसा आदमी है जो मन की बात पढ़ना जानता है और दूसरी तरफ एक डिजिटल कंप्यूटर है। सवाल पूछने वाला ऐसा सवाल करता है कि मेरे दाहिने हाथ वाले ताश के पत्ते का रंग क्या है? बाद में अपनी दिमागी ताकत यानी टेलीपैथी से। 400 में से 130 बार सही जवाब दे देता है। मशीन सिर्फ अंदाजा लगाती है और शायद 104 बार ही सही हो पाती है। इस तरह सवाल पूछने वाला तुरंत पहचान लेगा कि मशीन कौन सी है?

लेकिन यह एक मजेदार बात और हो सकती है। मान लीजिए डिजिटल कंप्यूटर के अंदर किस्मत से नंबर चुनने का एक तरीका लगा है। रैंडम नंबर जेनरेटर मशीन अपना जवाब चुनने के लिए उसी का इस्तेमाल करेगी। पर तब मुमकिन है कि सवाल पूछने वाले के मन की ताकत उस मशीन पर असर डाल दे। हो सकता है इस दिमागी ताकत की वजह से मशीनों में से ज्यादा बार का ही जवाब दे दे और सवाल पूछने वाला फिर से उसे पहचान ना पाए। दूसरी तरफ यह भी तो हो सकता है कि सवाल पूछने वाला खुद अपनी दिव्य दृष्टि से बिना कुछ पूछे ही सही

जवाब जान ले। छठ इंद्री यानी ए एस पी के होने पर कुछ भी मुमकिन है। अगर हम टेलीपैथी को सच मानते हैं तो हमें अपना यह टेस्ट और भी खड़ा करना होगा। यह हालात कुछ वैसे ही होंगे जैसे सवाल पूछने वाला, खुद से बात कर रहा हो और बाहर खड़ा कोई खिलाड़ी। दीवार पर कान लगाकर उसे सुन रहा हो। इसका एक ही हल है कि खिलाड़ियों को ऐसी जगह रखा जाए जहाँ मन की बातें बाहर न जा सकें। टेलीपैथी प्रूफ रो। इससे हमारी सारी शर्तें पूरी हो जाएंगी। शायद पढ़ने वालों को अब तक ये लग

रहा होगा कि मेरे पास अपनी बात को सही साबित करने के लिए कोई बहुत पक्का या मजबूत सबूत नहीं है और यह सच भी है। अगर मेरे पास कोई पक्का सबूत होता तो मैं दूसरों की दलीलों में कमियां निकालने में इतनी मेहनत नहीं करता। अब मेरे पास जो भी थोड़ा बहुत सबूत है, मैं उसे आपके सामने रखूँगा। चलिए एक पल के लिए लेडी लव लेस के उसी एतराज पर वापस चलते हैं। उन्होंने कहा था कि मशीन सिर्फ वही कर सकती है जो हम उसे करने का ऑर्डर देते हैं। हम कह सकते हैं कि। एक इंसान मशीन के अंदर कोई ख्याल

डालता है इंजेक्शन ऐडिया मशीन उस पर थोड़ी हलचल करती है और फिर शांत हो जाती है। ठीक वैसे ही जैसे पियानो के तार पर चोट करने से आवाज आती है और फिर सन्नाटा छा जाता है। इसे समझने के लिए एक और एग्ज़ैम्पल लेते हैं। मान लीजिए एक ईंधन का एक ढेर है, एटोमिक पाइल है। अगर यह ढेर छोटा है तो बाहर से आने वाला एक न्यूट्रॉन थोड़ी हलचल मचाएगा और फिर वो हलचल खुद ब खुद शांत हो जाएगी। लेकिन अगर ढेर काफी बड़ा हो। तो बाहर से आने वाला एक छोटा सा कण भी ऐसी हलचल पैदा करेगा, जो बढ़ती ही जाएगी और पूरे ढेर को

दहका देगी। क्या इंसानी दिमाग और मशीनों के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है? लगता है कि इंसानी दिमाग के मामले में यह बात सही है। ज्यादातर दिमाग शांत होते हैं सब क्रिटिकल यानी अगर ऐसे दिमाग को कोई एक ख्याल दिया जाए तो बदले में औसतन एक नया ख्याल भी पैदा नहीं होता, लेकिन कुछ दिमाग ऐसे होते हैं जो खुद ब खुद बढ़ते हैं, सुपर क्रिटिकल होते हैं। उन्हें अगर एक छोटा सा ख्याल दिया जाए। तो उसे वो सैकड़ों ख्यालों में बदलकर और पूरी की पूरी थ्योरी खड़ी कर देते हैं। जानवरों के दिमाग तो बिल्कुल शांत

ही होते हैं। अब इसी एग्ज़ैम्पल को ध्यान में रखकर हम पूछते हैं कि क्या ऐसी मशीन बनाई जा सकती है जो खुद ब खुद बढ़ने वाली हो? यानी सुपर क्रिटिकल हो। यहाँ प्याज के छिलकों वाली एग्ज़ैम्पल भी ग्राम की है। जब हम दिमाग के काम करने के तरीके पर गौर करते हैं तो हमें कुछ ऐसे काम मिलते हैं जिन्हें मशीनी तरीके यानी मेकानिकल टर्म से

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