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Episode · SyllabuswithRohit

Bloodstream Sermon (Hindi/हिंदी में)

2 Jun 2026 · 47 min

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Episode notes

Everything in this world comes directly from the mind. That is why every Buddha speaks from mind to mind, without definitions. You ask with your mind, and I answer with mine. Through endless ages, whatever you do and wherever you are, that is your real mind. That is the true Buddha. You will never find a Buddha outside of this mind. To search elsewhere for enlightenment is impossible.Your true self nature is the mind. It is beyond cause and effect. Trying to grab a Buddha outside the mind is like trying to grab space. Space has a name, but it has no shape. You cannot hold it. Similarly, the…

Transcript

Read the transcript · about 5,310 words, follows along as you listen

जो कुछ भी हमें दुनिया में दिखाई देता है, वो सब मन से ही निकलता है। माइंड से ही सब निकलता है इसलिए जीतने भी बुद्ध हुए हैं, वो मन से मन की बात करते हैं किसी। डेफिनिशन किसी परिभाषा में नहीं उलझते। अगर वो परिभाषा नहीं बचाते तो मन से तो माइंड से उनका मतलब क्या है? तुम पूछते हो?

क्या ये तुम्हारा मन है? मैं जवाब देता हूँ, हाँ ये मेरा मन है, अगर मेरा मन न होता तो मैं जवाब कैसे देता? अगर तुम्हारा मन न होता तो तुम सवाल कैसे पूछते? जो सवाल पूछता है वो तुम्हारा मन है?

न जाने कितने जन्मो से तुम जो भी करते हो, जहाँ भी रहते हो, वही तुम्हारा असली मन है, वही असली बुद्ध है, ये मन ही बुद्ध है, इसका मतलब भी यही है। इस मन के बाहर तुम्हें कभी कोई बुद्ध नहीं मिलेगा। मन से बाहर जाकर अगर तुम बुद्ध या ज्ञान एनलाइटनमेंट या मोक्ष या निर्वाण ढूंढना चाहो तो ये मुमकिन नहीं है। ये पॉसिबल नहीं है। तुम्हारी असली पहचान तुम्हारे सेल्फ नेचर और जो कारण अकारण से परे है, जो कॉज और इफेक्ट से परे है, वही मन है, तुम्हारा मन ही

निर्वाण है अगर तुम सोचते हो। कि मन से बाहर बुद्ध या ज्ञान कहीं मिलेगा तो ऐसी कोई जगह है ही नहीं। बुद्ध या ज्ञान को ढूंढना ऐसे ही है जैसे कोई खाली जगह को पकड़ना, चाहे कोई स्पेस को पकड़ना चाहे। खाली जगह का नाम है लेकिन उसका कोई रूप नहीं है, न तो उसे उठा सकते हो, न ही नीचे रख सकते हो, न ही उसे पकड़ सकते हो। मन के बाहर तुम्हें कभी बुद्ध नहीं दिखेगा। बुद्ध भी मन का ही हिस्सा है। तो मन के बाहर बुद्ध को क्यों ढूंढ रहे हो?

जो बुद्ध हुए हैं वो बस इसी मन की बात करते हैं। मन ही बुद्ध है और बुद्ध ही मन है, मन के बाहर कोई बुद्ध नहीं। और बुद्ध के बाहर कोई मन नहीं। अगर तुम सोचते हो कि मन के बाहर कोई बुद्ध है तो वो कहाँ है, कोई बुद्ध मन के बाहर नहीं है, तो फिर उसकी कल्पना क्यों करना, उसे इमेजिन क्यों करना?

जब तक तुम खुद को धोखा देते रहोगे, तब तक असली मन नहीं जान सकते। जब तक किसी निर्जीव चीज़ किसी लाइफलेस फॉर्म में उलझे रहोगे तब तक आज़ाद नहीं हो सकते। अगर तुम। मुझ पर यकीन नहीं करते तो खुद को धोखा देने से भी खुश नहीं होगा। ये बुद्ध की गलती नहीं है, लोग धोखे में रहते हैं। उन्हें पता ही नहीं कि उनका खुद का मन ही बुद्ध है। अगर पता होता तो मन के बाहर। बुद्ध को कभी ढूंढ़ते ही नहीं बुद्ध बुद्ध को नहीं बचाते। अगर तुम अपने मन से बुद्ध को ढूंढोगे तो बुद्ध को देख नहीं

पाओगे। जब तक तुम कहीं और बुद्ध ढूंढ़ते रहोगे तब तक। कभी ये नहीं जान पाओगे कि तुम्हारा खुद का मन ही बुद्ध है। बुद्ध को पूजने के लिए बुद्ध का सहारा मत लो और बुद्ध को बुलवाने के लिए मन का सहारा मत लो। बुद्ध लोग न तो धार्मिक किताबें पढ़ते हैं। न ही किसी नियम को मानते हैं, न ही तोड़ते हैं। बुद्ध लोग न तो अच्छा करते हैं, न बुरा करते हैं। बुद्ध को ढूंढना है तो अपनी असली पहचान को देखो। जिसने अपनी पहचान देख ली, वही बुद्ध है। अगर पहचान नहीं देखी तो पूजा पाठ, किताबें पढ़ना, दान करना, नियम

मानना ये सब बेकार है। पूजा करने से अच्छा कर्म मिलता है। किताबें पढ़ने से याददाश्त अच्छी होती है। नियम मानने से अच्छा जन्म मिलता है। दान देने से आने वाले वक्त में सुख मिलता है, लेकिन बुध नहीं मिलता। अगर तुम्हें खुद समझ नहीं आता तो किसी सच्चे गुरु किसी सच्चे टीचर को ढूंढो। ताकि जीवन, मृत्यु लाइफ और डेथ का सच समझ सको, लेकिन अगर वो गुरु खुद अपनी पहचान नहीं जानता तो वो असली गुरु नहीं है, चाहे उसे कितनी भी धार्मिक किताबें याद हो। अगर उसने अपनी पहचान नहीं देखी तो वो जनम मृत्यु के चक्र से बाहर

नहीं निकल सकता, वो भी दुनिया में ही फंसा रहेगा। बहुत पहले एक भिक्षु, एक मोंक गुड स्टार था। जिससे पूरी धार्मिक किताबें आती थीं, लेकिन उसने भी अपनी पहचान नहीं देखी। इसलिए वो जनम मृत्यु के चक्कर से नहीं बच पाया। अगर गुड स्टार का ये हाल था तो आजकल जो लोग थोड़ा बहुत पाठ पढ़ते हैं। और सोचते हैं कि वही धर्म है, वो मूर्ख है। जब तक तुम अपना मन नहीं देखते, कितना भी पढ़ो, कोई फायदा नहीं। बुद्ध को ढूंढना है तो बस अपनी पहचान को देखो क्नॉइस। तुम्हारी असली पहचान ही बुद्ध है और बुद्ध वही है जो आजाद है, जिसे

कोई चिंता नहीं है, कोई योजना नहीं। अगर तुम अपनी पहचान नहीं देख पाते और बाहर बाहर घूमते रहते हो तो बुद्ध कभी नहीं मिलेगा। असल में ढूंढने जैसा कुछ है ही नहीं, लेकिन ये समझ पाने के लिए तुम्हें गुरु की जरूरत है और खुद को समझाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। जिंदगी और मौत की बात बहुत जरूरी है। बेकार में मत भटको खुद को धोखा देने से कोई फायदा नहीं। अगर तुम्हारे पास पहाड़ जितना सोना, चांदी हो या गंगा के किनारे जीतने, बालू के दाने उतने नौकर हों तो वो सब तब तक दिखेंगे।

जब तक आंखें खुली हैं, लेकिन जब आंखें बंद हो जाए तो फिर तब तुम्हें समझ जाना चाहिए कि जो कुछ भी दिखाई देता है वो सब सपना या माया जैसा ही है। अगर जल्दी कोई सच्चा गुरु नहीं मिला तो ये जिंदगी बेकार चली जाएगी। सच है, तुम्हारे अंदर बुद्ध स्वभाव है, लेकिन बिना गुरु के मदद के तुम इसे जान नहीं सकते। करोड़ों में कोई एक ही बिना गुरु के खुद समझ पाता है। अगर कभी कभी किसी के भाग्य से वो बात खुद समझ आ जाती है जो बुद्ध ने बताई थी तो उसे गुरु की जरूरत

नहीं पड़ती। ऐसे लोग खुद से ही सब समझ जाते हैं जो किसी भी पढ़ाई से ऊपर है। लेकिन अगर तुम इतने भाग्यशाली नहीं हो तो मेहनत से पढ़ाई करो और सीखने से समझ पाओगे। जो लोग समझते नहीं और सोचते हैं कि बिना पढ़े सीखे सब समझ जाएंगे वो उन भ्रमित उन। डिलूडेड लोगों जैसे हैं जिन्हें सफेद और काली में फर्क ही नहीं पता। ऐसे लोग झूठ बोलते हैं कि वे बुद्ध का धर्म बता रहे हैं, लेकिन असल में वो बुद्ध का अपमान करते हैं और धर्म को बिगाड़ते हैं। वो ऐसे बोलते हैं जैसे बारिश बरसा रहे हों, लेकिन उनकी बातें बुद्धि

की नहीं, राक्षसों की बातें होती हैं। डेविल्स की बातें उनके गुरु राक्षसों के राजा होते हैं और उनके शिष्य भी राक्षसों जैसे होते हैं। ऐसे भ्रमित लोग जब इनकी बात मान लेते हैं तो और गहरे जनम मृत्यु में फंस जाते हैं, सी ऑफ़ बर्थ और डेथ में फंस जाते हैं। जब तक लोग अपनी असली पहचान नहीं देख लेते। वो खुद को बुद्ध नहीं कह सकते। ऐसे लोग झूठे हैं जो दूसरों को धोखे में डालते हैं और राक्षसों की दुनिया में ले जाते हैं। जब तक अपनी पहचान नहीं देखी, चाहे जितनी धार्मिक किताबें पढ़ लो।

वो भी राक्षसों की बात नहीं है। उनका झुकाव राक्षस की तरफ है। मारा की तरफ बुद्ध की तरफ नहीं। जिन्हें सफेद और काले में फर्क नहीं पता वो जनम मृत्यु से कैसे निकल सकते हैं? जिसने अपनी पहचान देख ली, वही बुद्ध है। जिसने नहीं देखी वो आम इंसान है, लेकिन अगर अपने बुद्ध स्वभाव को अपने आम स्वभाव से अलग ढूंढना चाहो। अपने बुद्ध नेचर को अपने मोर्टल नेचर से अलग ढूंढना चाहो तो कहाँ मिलेंगे हमारा आम स्वभाव, हमारा मोर्टल नेचर ही हमारा बुद्ध स्वभाव है, इसके बाहर कोई बुद्ध नहीं है।

बुद्ध हमारी पहचान है। इसके अलावा कोई बुद्ध नहीं और बुद्ध के अलावा कोई पहचान नहीं। अगर मैं अपनी पहचान नहीं देख पाऊँ तो क्या पूजा पाठ, किताबें पढ़ना? दान करना, नियम मानना, भक्ति करना, अच्छे काम करना, इनसे ज्ञान मिल सकता है या इनसे एनलाइटनमेंट मिल सकती है। नहीं नहीं मिल सकता, क्यों नहीं अगर कुछ भी हासिल किया तो वो शर्तों पर टिका है। वो कर्म है, उसका फल मिलेगा, वो जनम ऋतु का चक्कर चलाएगा और जब तक जनम ऋतु में फंसे रहेंगे तब तक ज्ञान नहीं मिलेगा, एनलाइटनमेंट

नहीं मिलेगा। ज्ञान पाने के लिए अपनी पहचान देखनी पड़ती है। जब तक पहचान नहीं देखी कारण नतीजे यानी कॉज और इफेक्ट की सारी बातें बेकार हैं। बुद्ध बेकार बातें नहीं करते। बुद्ध कर्म से आजाद है। कारण नतीजे कौजौर इफेक्ट से भी आजाद है। कहना कि बुद्ध को कुछ मिला ये भी बुद्ध का अपमान है। बुद्ध को क्या मिल सकता है, यहाँ तक कि मन ताकत समझ?

या कोई नजरिया? ये भी बुद्ध के लिए नहीं टिकता माइंड पावर अंडरस्टैंडिंग या कोई क्यूँ भी बुद्ध के लिए नहीं टिकता बुद्ध एक तरफ़ा नहीं है, वॅन साइडेड नहीं है। उसके मन की असलियत। खाली है, न शुद्ध, न शुद्ध। वह अभ्यास या सिद्धि से भी परे है। कारण नतीजे से भी बाहर है। बुद्ध न तो नियम मानता है, न छे बुरे करता है, न ही मेहनती है, न आलसी। बुद्ध खुश करता ही नहीं। यहाँ तक कि वो अपने मन को भी बुद्ध पर टिका नहीं सकता। बुद्ध बुद्ध नहीं है। बुद्ध के बारे में सोचना भी मत अगर तुम मेरी बात नहीं समझते।

तो अपने मन को कभी नहीं जान पाओगे। जो लोग अपनी पहचान नहीं देखते और सोचते हैं कि बिना सोचे रहते हैं, थॉट में रहते हैं, वो झूठे और मूर्ख हैं, वो खाली जगह में गिर जाते हैं। वो नशे में जैसे होते हैं, उन्हें अच्छा, बुरा गुड और ईविल समझ में नहीं आता। अगर तुम ऐसी साधना करना चाहते हो, ऐसी प्रैक्टिस करना चाहते हो तो पहले अपनी पहचान देखो तभी सोच विचार खत्म कर सकते हो। अपनी पहचान देखे बिना ज्ञान पाना मुमकिन नहीं है। कुछ लोग बुरे बुरे काम भी करते हैं और कहते हैं कि कर्म है ही

नहीं। वो गलत सोचते हैं कि सब कुछ खाली है। इसलिए बुरा करना भी गलत नहीं। ऐसे लोग घोर अंधेरे वाले नरक में चले जाते हैं। एंडलेस डार्कनेस वाले हेल्त में जहाँ से कभी निकल नहीं सकते जो समझदार होते हैं, वो ऐसी सोच नहीं रखते। अगर हमारा हर काम और हालात जब भी हो वही मन है, वही मैएंड है तो जब किसी का शरीर मर जाता है, तब वो मन वो मैएंड क्यों नहीं देखता मन?

मैएंड हमेशा रहता है, बस तुम उसे देख नहीं पाते। अगर मन है तो मुझे दिखता क्यों नहीं? क्या तुम सपने देखते हो? हाँ देखता हूँ जब तुम सपना देखते हो। वो तुम ही हो हाँ, वो मैं ही हूँ और जो तुम कर रहे हो या बोल रहे हो वो तुम से अलग है क्या नहीं अलग नहीं है। अगर ऐसा नहीं है, तो यह शरीर। तुम्हारा असली शरीर है और यही असली शरीर तुम्हारा मन है और ये मन न जाने कितने जन्मो से कभी बदला नहीं ये कभी जिया नहीं, कभी मरा नहीं, कभी आया नहीं, कभी गया नहीं। ना कभी बढ़ा ना कभी घटा। ये न शुद्ध है, ना शुद्ध, ना

अच्छा है, ना बुरा, ना ये बीता हुआ है, ना आने वाला ना ये सच्चा है, ना झूठा, ना ये पुरुष है ना महिला। ना ये भिक्षु की तरह दिखता है, ना किसी आम आदमी की तरह। ना ये कोई बुजुर्ग है, ना कोई नया, ना ये ज्ञानी है, ना मूर्ख, ना ये बुद्ध है, ना हम इंसान, ना इसे कुछ हासिल करना है। ना इस पर कोई कर्म असर करता है। इसमें कोई ताकत नहीं, कोई रूप नहीं। ये जगह जैसा है ना इसे पकड़ सकते हो ना खो सकते हो। इसके रास्ते में पहाड़, नदी या चट्टान भी रोक नहीं सकते। इसकी ताकत कभी रुकती नहीं।

ये पांच स्कन्द फाइव स्कन्द्स की पहाड़ी भी पार कर सकती है और संसार की नदी भी। कोई भी कर्म इस असली शरीर को रोक नहीं सकता, लेकिन ये मन? बहुत बारीक है, देखना मुश्किल है। ये वो मन नहीं है जो इंद्रियों से जुड़ा है। हर कोई इस मन को देखना चाहता है और जो लोग इसके सहारे अपने हाथ पांव चलाते हैं। वो गंगा के बालू जीतने हैं लेकिन जब उनसे पूछो तो समझ नहीं पाते वो कठपुतली जैसे हैं। पपेट जैसे मन उन्हीं का है लेकिन देख नहीं पाते क्यों नहीं देख पाते? बंदन ने कहा, लोग भ्रम में हैं।

लोग डिलूडेड हैं इसलिए जब वो कुछ करते हैं तो जन्म मरण की नदी में गिर जाते हैं और जब बाहर निकलना चाहते हैं तो और गहराई में फंस जाते हैं। सब सिर्फ इसलिए कि वह अपनी असली पहचान नहीं देख पाते। अगर लोग भ्रम में नहीं होते तो वो उस चीज़ के बारे में सवाल ही क्यों करते जो सामने है?

कोई भी अपने हाथ पांव की हरकतों को नहीं समझता। बुद्ध गलत नहीं थे। भ्रमित लोग नहीं जानते की वो कौन है? इतनी मुश्किल बात सिर्फ बुद्ध जानते हैं कोई और नहीं सिर्फ समझदार लोग इस मन को जानते हैं इस मन को जिसे धर्म स्वभाव मुक्ति भी कहते हैं, ना जीवन इसे रोक सकता है ना मौत। कुछ भी नहीं रोक सकता। इसे अजेय तथागत अनस्टोपबल तथागत समझ से परे पवित्र आत्मा अमर और महान ज्ञानी भी कहते हैं। नाम बदल सकते हैं। असली रूप नहीं, बुद्ध भी अलग अलग होते हैं पर कोई भी अपने मन से

बाहर नहीं जाता। मन की क्षमता बेइंतहा है और इसकी बातें कभी खत्म नहीं होती। आँखों से चीजें देखना, कानों से आवाज सुनना। नाक से खुशबू सूंघना, जुबान से स्वाद लेना हर हरकत ये हालत ये सब तुम्हारा मन ही है हर पल जहाँ भाषा नहीं पहुंचती वही तुम्हारा मन है। सूत्र में लिखा है, तथागत के रूप अनगिनत हैं और उसकी समझ भी अनगिनत है। हर तरह की चीजें मन की वजह से हैं। चीजों को पहचानने की ताकत भी मन की है, लेकिन मन का कोई रूप नहीं। और उसकी समझ की कोई सीमा नहीं।

इसीलिए कहा गया तथागत के रूप अनगिनत है और उसके समझ में अनगिनत ये जो हमारा चार तत्वों वाला शरीर है, वो मुश्किलें देता है। क्नॉइस यह शरीर जन्म और मृत्यु झेलता है लेकिन असली शरीर बिना अस्तित्व के भी रहता है क्योंकि तथागत का असली शरीर कभी बदलता नहीं। सूत्र में लिखा है। लोगों को समझना चाहिए कि बुद्ध स्वभाव हमेशा से उन में है। कश्यप ने बस अपनी असली पहचान पहचानी थी। हमारी पहचान ही मन है और मन ही हमारी पहचान है। यही। पहचान सभी बुद्ध के मन जैसी है।

बीते और आने वाले बुद्ध बस इसी मन को वह आगे बढ़ाते हैं। इस मन के बाहर कहीं भी बुद्ध नहीं है, लेकिन लोग ये नहीं समझते कि उनका खुद का मन ही बुद्ध है। वो बाहर ही ढूंढ़ते रहते हैं, कभी पूजा करते हैं, कभी बुद्ध को बुलाते हैं, कभी सोचते हैं बुद्ध कहाँ है? ऐसी गलतफहमी में मत पड़ो, बस अपने मन को जानो, अपने मन के बाहर कोई और बुद्ध नहीं है। सूत्र में लिखा है, जीस चीज़ का रूप है, वो माया है, फिर ये भी लिखा है जहाँ भी हो वहीं बुद्ध है, तुम्हारा मन ही बुद्ध है।

बुद्ध को पूजने के लिए बुद्ध का सहारा मत लो। अगर कोई बुद्ध या बुद्ध सत्व अचानक सामने आ जाए तो भी उसे सम्मान देने की जरूरत नहीं। हमारा मन खाली है, उसमें ऐसा कोई रूप नहीं है। जो लोग बाहरी रूप को पकड़ते हैं वो राक्षस बन जाते हैं। वो राह से भटक जाते हैं। मन से निकली माया को क्यों पूछना जो पूछते हैं वो जानते नहीं और जो जानते हैं वो पूजते नहीं, पूजा करोगे तो राक्षसों के झांसे में आ जाओगे। मैं इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मुझे डर है कि तुम जान नहीं रहे। बुद्ध की असली पहचान में ऐसा कोई

रूप नहीं है। ये हमेशा याद रखना चाहे कुछ भी अनोखा दिखाई दे, न उसे अपना हो। न उससे डरो और अपने मन को शुद्ध ही समझो। ऐसे किसी चीज़ के लिए मन में कोई जगह नहीं। अगर कोई आत्मा, भूत या देवता भी दिखे तो न तो सम्मान करो, न डर दिखाओ। तुम्हारा मन असल में खाली है, हर रूप माया है, रूप को पकड़ कर मत बैठो अगर तुम किसी बुद्ध धर्म या बोधित सत्व की कल्पना करते हो और उनका सम्मान करते हो। तो खुद को आम इंसानों की गिनती में डाल देते हो। अगर सीधा समझना है तो किसी भी रूप

को मत पकड़ो, बस ऐसे ही सफलता मिलेंगे। मेरे पास इससे ज्यादा कोई सलाह नहीं है। सूत्र में लिखा है। हर रूप माया है, इनका कोई ठिकाना नहीं, कोई स्थाई रूप नहीं, ये हमेशा बदलते रहते हैं। रूप को मत पकड़ो तो बुद्ध के साथ तुम्हारा मन एक हो जायेगा। सूत्र में लिखा है जो हर रूप से परे है। वही बुद्ध है पर हमें बुद्ध और बोधित तत्व की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए? रक्ष सौर भूत के पास रूप बदलने की ताकत होती है। वो बोध तत्व का रूप भी ले सकते हैं। लेकिन ये सब झूठा है।

इनमें से कोई भी असली बुद्ध नहीं है। बुद्ध तुम्हारा खुद का मन है, अपनी पूजा को गलत जगह मत लगाओ। बुद्ध का मतलब है जागरूक अवेयर, अद्भुत मिरकुलसली अवेयर। जवाब देना, चीजें महसूस करना, भौंहें हिलाना, पलकों को झपकाना, हाथ पांव चलाना ये सब तुम्हारी जागरूकता है। तुम्हारी अवेयरनेस है और यही जागरूकता यही अवेयरनेस माइंड है। मन है और मन ही बुद्ध है। बुद्ध ही रास्ता है और यही रास्ता है जिन पर जिन शब्द सबके लिए एक पहेली है, अपनी असली पहचान देखना

ही जिन है। जब तक अपनी पहचान नहीं देखी वो जिन नहीं है, अगर हजारों सूत्र और शास्त्र समझा भी सकते हो, लेकिन अपनी पहचान नहीं देखी तो तुम्हारी बातें हम इंसान जैसी हैं। मोर्टल्स जैसी हैं। बुद्ध जैसी नहीं, सच्चा रास्ता ट्रू वे बहुत ऊंचा है। इसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। लिखी बातें किस काम की?

लेकिन जिसने अपनी पहचान देख ली वो रास्ता पा लेता है इवन। अगर उसे पढ़ना लिखना भी ना आए, जिसने अपनी पहचान देख ली, वही बुद्ध है और बुद्ध का शरीर अंदर से शुद्ध है। जो कुछ कहता है वो उसके मन की बात होती है, जो असल में खाली है। इसलिए? बुध शब्दों में नहीं मिलता और न ही 12 भाग वाले ग्रंथों में मिलता है। रास्ता शुरू से ही परफेक्ट है। इसमें कुछ जोड़ने की जरूरत नहीं। रास्ते का कोई रूप या आवाज़ नहीं। ये बहुत बारीक है। समझना मुश्किल है जैसे पानी पीने पर खुद पता चलता है कि पानी गर्म

है या ठंडा, लेकिन किसी और को बता नहीं सकते। जो बात सिर्फ तथागत जानता है। वो इंसान और देवता भी नहीं जानते। आम इंसान की समझ आम मोर्टल्स की अवेयरनेस कम पड़ जाती है। जब तक वो रूप से चिपके रहते हैं वो ये नहीं जान पाते कि उनका मन उनका मैएंड। खाली है, एम्प्टी है और चीजों के रूप को पकड़ कर ही रास्ता खो देते हैं। अगर पता है कि सब कुछ मन से है तो उसमें मत उलझो अगर उलझ गए तो अनजान हो गए। लेकिन जब अपनी पहचान देख लेते हो तो पूरी किताब सिर्फ बातें ही रह जाती हैं।

हजारों सूत्र और शास्त्र मिलकर भी बस एक साफ मन बनते हैं। समझ तो वह दोहरी लाइन से भी आ जाती है। फिर? सिद्धांत किस काम के आखिरी सच शब्दों से परे है? सिद्धांत तो डॉक्टर आयन तो शब्द ही है रास्ता नहीं रास्ता तो बिना शब्दों के है, शब्द भी माया है। ये भी वैसे ही हैं जैसे सपने में महल, बगीचे या झील दीखते हैं। इन चीजों में कभी खुशी मत मानो ये सब फिर से जन्म लेने का जाल है। मौत के वक्त ये बात याद रखना। रूप में मत रचना सब बंधन टूट जाएंगे अगर एक पल भी सूखे तो राक्षसों के जाल में फंस जाओगे।

तुम्हारा असली शरीर एक दम शुद्ध और मजबूत है, लेकिन भ्रम की वजह से तुम इसे नहीं जानते। और इसी वजह से बेकार का कर्म झेलते हो। जहाँ भी कोई खुशी है वहीं बंधन है लेकिन जब अपने असली शरीर और मन को जान लेते हो तो किसी बंधन में नहीं फंसते। जो भी व्यक्ति असली सुख छोड़कर आम चीजों में ही उलझा रहता है, वो आम इंसान है, वो मोर्टल है, बुध वो है जो अच्छे बुरे में भी अजाद रहता है। उसकी ताकत ऐसी है। कि कोई भी कर्म उसे बांध नहीं सकता। कैसा भी कर्म हो, बुद्ध उसे बदल

देता है। स्वर्ग और नरक उसके लिए कुछ नहीं, लेकिन आम इंसान की समझ बुद्ध के मुकाबले बहुत कमजोर है। बुद्ध हर चीज़ बाहर भीतर सब जानता है। अगर तुम्हें खुद पर भरोसा नहीं है तो कोई काम मत करो, एक बार काम कर दिया, तो जनम ऋतु में भटकते रहोगे और पछताओगे कि कोई सहारा नहीं मिला। गरीबी और मुश्किलें बस गलत सोच से आती हैं। इस मन को समझने के लिए बिना कुछ किए ऐसे काम करना है जैसे कुछ किया ही नहीं। तभी तो चीजों को तथागत की नजर से देख पाओगे। जब तुम रास्ते की शुरुआत करते हो तो तुम्हारी जागरूकता ये जगह नहीं

टिकते। अजीब भजीब सपना जैसी चीजें देख सकती हैं, लेकिन शक मत करो की ये सब तुम्हारे अपने मन से ही है, कहीं और से नहीं। अगर किसी सपने में सूरज से भी तेज रौशनी दिखे तो तुम्हारे बचे हुए बंधन अचानक खत्म हो जाएंगे और असली सच खुल जाएगा। ऐसा अनुभव ज्ञान की शुरुआत है। लेकिन ये बात बस तुम ही जानते हो, किसी और को बता नहीं सकते या फिर जब तुम चल रहे हो, खड़े हो बैठे हो या चुपचाप लेटे हो, अगर कोई रौशनी दिखे, चाहे तेज हो या हल्की। तो किसी को मत बताओ और उस पर ध्यान भी मत दो।

ये तुम्हारी असली पहचान की रौशनी है। ये जब रात में सब शांत और अंधेरा है फिर भी सब कुछ दिन की तरह साफ दिखे तो डरना मत, ये तुम्हारा खुद का मन है। जो अब सामने आने वाला है या जब सपने में चाँद तारें बिलकुल साफ दिखे तो समझो तुम्हारे मन की हलचल खत्म होने वाली है पर किसी को बताना मत अगर सपने साफ नहीं है। ऐसा लगे जैसे अंधेरे में चल रहे हो तो समझो मन पर चिंता छाई है। ये भी बस तुम ही जान सकते हो। अगर तुम अपनी असली पहचान देख लो तो ना तो सूत्र पढ़ने की जरूरत

है, ना बुद्ध को बुलवाने की। बहुत पढ़ाई और ज्ञान भी बेकार है बल्कि ये तुम्हारी जागरूकता तुम्हारी अवेयरनेस को और ढक देता है। सारे नियम बस मन की ओर इशारा करते हैं। जब अपना मन देख लिया तो नियम की तरफ ध्यान देने की। जरूरत नहीं, हम इंसान से बुद्ध बनने के लिए कर्म खत्म करो, जागरूकता को संभालो और जो भी जीवन दे, उसे स्वीकार करो। अगर हमेशा गुस्सा करते रहोगे। तो अपनी पहचान को गलत राह पर मुड़ लोगे?

खुद को धोखा देने का कोई फायदा नहीं। बुद्ध आजादी से जनमृत्यु में आते जाते हैं, जब चाहे दिखते हैं जब चाहे छुप जाते हैं। उन्हें ना कर्म रोक सकता है, ना राक्षस हरा सकते हैं। जब आम लोग अपनी पहचान देख लेते हैं तो सारे बंधन खत्म हो जाते हैं। जागरूकता छुपी नहीं रहती लेकिन ये सिर्फ अभी ही मिलती है। अगर सच में रास्ता पाना है तो किसी भी चीज़ को मत पकड़ो। जब कर्म खत्म कर दोगे और जागरूकता बढ़ा लोगे तो बाकी बसे बंधन भी अपने आप छूट जाएंगे। समझ अपने आप आएगी।

कोई मेहनत करने की जरूरत नहीं, लेकिन कट्टर लोग फ़ोनेटिक बुद्ध की बात नहीं समझते। जितना ज्यादा कोशिश करते हैं उतना ही असली मतलब से दूर हो जाते हैं। दिनभर बुद्ध को बुलाते हैं। सूत्र पढ़ते रहते हैं, लेकिन अपनी असली पहचान से अंधे ही रहते हैं और जनम ऋतु से नहीं निकलते। बुद्ध एक फुर्सत वाला इंसान है, वो कभी दौड़ धूप के पीछे नहीं भागता। आखिर में इन चीजों का क्या फायदा जो लोग अपनी पहचान नहीं देखते और सोचते हैं कि सूत्र पढ़ना बुद्ध को बुलाना, बहुत पढ़ाई करना, दिन

रात अभ्यास करना, कभी न सोना? ये ज्ञान इकट्ठा करना है, धर्म है तो वो धर्म का अपमान करते हैं। बीते और आने वाले बुद्ध बस यही बताते हैं कि अपनी पहचान को देखो, सारी साधना बदलती रहती है। अगर अपनी पहचान नहीं देखी। तो जो लोग कहते हैं कि उन्हें सबसे बड़ा ज्ञान मिला है, वह झूठ बोलते हैं। शाकिब उन्हीं के 10 सबसे बड़े शिष्यों में आनंद सबसे ज्यादा पढ़े लिखे थे, लेकिन उन्हें बुद्ध की असली पहचान नहीं थी। वह बस। पढ़ाई और याद ही करते रहे। अरहंत बुद्ध को नहीं जानते, वो बस ज्ञान पाने के तरीके जानते हैं और

कारण नतीजे कॉज और इफेक्ट में फंस जाते हैं यही। हम इंसान का कर्म है। जन्म मृत्यु से बचना नामुमकिन है। ऐसे लोग जो करना नहीं चाहते थे उसे उल्टा करके बुद्ध का अपमान करते हैं। ऐसे लोगों को मारना भी गलत नहीं। सूत्र में लिखा है, जिन्हें यकीन नहीं होता उन्हें मारना भी गलत नहीं है और जो मान लेते हैं वो बुद्ध की स्थिति तक पहुंचते हैं। जब तक अपनी पहचान नहीं देखी तब तक दूसरों की अच्छाई की आलोचना मत करो। खुद को धोखा देने से कोई फायदा नहीं, अच्छा, बुरा साफ है कारण नतीजा कॉज और इफेक्ट भी साफ है।

स्वर्ग और नरक। तुम्हारे सामने ही है, लेकिन मूर्ख विश्वास नहीं करते और बिना जाने सीधे अंधेरे वाले नरक में गिर जाते हैं, जो उन्हें विश्वास नहीं करने देता वो उनका भारी कर्म है। वो अंधे लोगों जैसे हैं। जिन्हें रौशनी का कोई यकीन नहीं समझाने पर भी नहीं मानते, क्योंकि वो अंधे हैं तो वो रौशनी को कैसे पहचाने?

ऐसे ही मूर्ख जो नीचे के जन्म में या गरीब और। तिरस्कृत बन जाते हैं। वो ना तो जी पाते हैं, ना मर पाते हैं और इतना सब झेलने के बाद भी अगर उनसे पूछो तो कहते हैं, हम तो देवताओं जीतने खुश हैं हरम इंसान। चाहे खुद को कितना भी ऊंचा समझे, असल में कुछ नहीं जानता। कर्म का बोझ इतना भारी होता है की ऐसे मूर्ख ना तो यकीन कर पाते हैं, ना ही आजाद हो पाते हैं। जो लोग समझ लेते हैं की उनका मन ही बुद्ध है। उन्हें सिर मुंडवाने की जरूरत नहीं है। घर परिवार वाले भी बुद्ध हो सकते हैं।

अगर पहचान नहीं देखी तो सिर मुंडवाने वाले बस अंधभक्त हैं फेनेटिक हैं। पर शादीशुदा लोग तो सेक्स नहीं छोड़ते तो वह बुद्ध कैसे बन सकते हैं? मैं सिर्फ अपनी असली पहचान देखने की बात करता हूँ। मैं सेक्स की बात इसलिए नहीं करता क्योंकि तुमने अपनी पहचान नहीं देखी। एक बार पहचान देख ली तो सेक्स अपने आप बेकार हो जाता है। इसमें जो भी खुशी थी वो खत्म हो जाती है। अगर कुछ आदतें बस भी गईं तो भी वो तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकती क्योंकि तुम्हारी असली पहचान।

शुरू से ही शुद्ध है, चाहे चार तत्वों वाले शरीर में रहो, तुम्हारी पहचान तो शुद्ध ही है। उसे कोई खराब नहीं कर सकता। तुम्हारा असली शरीर शुद्ध ही है। उससे कोई खराब नहीं कर सकता। इस असली शरीर को कोई महसूस नहीं होता, ना भूख, प्यास, ना गर्मी, ठंड, ना बिमारी, ना प्यार या लगाव, ना सुख, दुख, ना छ बुरा, ना छोटा लंबा। ना कमजोरी ताकत असल में यहाँ कुछ भी नहीं है। ये सब इसलिए लगता है क्योंकि तुम इस शरीर से चिपके रहते हो, जब शरीर से चिपकना छोड़ दोगे और

चीजों को वैसे ही रहने दोगे तो आजाद हो जाओगे। यहाँ तक कि जनम मृत्यु से भी आजाद हर चीज़ बदल सकोगे। ऐसी आध्यात्मिक ताकतें ऐसी स्पिरिचुअल पावर आ जाएंगी, जिन्हें कोई रोक नहीं सकता। जहाँ भी रहोगे मन में शांति रहेंगी। अगर शक किया तो कभी कुछ समझ नहीं पाओगे। बेहतर है कुछ ना करो। एक बार कुछ कर दिया तो जन्म मृत्यु के चक्कर से बच नहीं सकते, लेकिन जब अपनी पहचान देख लोगे। तो कसाई का काम करने पर भी बुद्ध ही रहोगे लेकिन कसाई तो जानवर मारते हैं, उनका तो बुरा कर्म है,

वो बुद्ध कैसे हो सकते हैं? मैं सिर्फ पहचान देखने की बात करता हूँ, कर्म कि नहीं? हम जो भी करते हैं हमारा कर्म हम पर असर नहीं करता। न जाने कितने जन्मो से लोग बस इसलिए नरक में फंसते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी पहचान नहीं देखी। जब तक कोई कर्म करता रहेगा, वो जनम मृत्यु में फंसा रहेगा। लेकिन जब किसी ने अपनी असली पहचान देख ली तो करम अपने आप रुक जाता है। अगर पहचान नहीं देखी तो बुद्ध को बुलवाने से भी कुछ नहीं होगा, चाहे कसाई हो या कोई और, लेकिन

जैसे ही पहचान देख ली। तो सारे शक खत्म हो जाते हैं। कसाई का कर्म भी उस इंसान पर असर नहीं करता। भारत में 27 गुरुओं ने सिर्फ मन का तरीका आगे बढ़ाया और मैं चीन सिर्फ इसलिए आया हूँ कि। महायान की सीधी शिक्षा दो यही मन ही बुद्ध है। मन ही पूजा यह कठिन साधना की बात नहीं करता, जैसे पानी, आग में कूदना, चाकू के पहिए पर चलना, दिन में एक बार खाना। यह कभी न लेटना। ये सब अंधभक्ति और अस्थायी बातें हैं। जब तुम अपनी चलती फिरती चमत्कारी जागरूकता को पहचान लेते हो तो

तुम्हारा मन सभी बुद्ध का मन बन जाता है। बीते और आने वाले बुद्ध बस इसी मन को आगे बढ़ाते हैं और कुछ नहीं सिखाते। अगर कोई इस बात को समझ गया तो पढ़ा लिखा ना भी हो, फिर भी बुद्ध है अगर अपनी चमत्कारी जागरूकता नहीं देखी। तो चाहे शरीर को टुकड़े टुकड़े कर दो बुध नहीं मिलेगा। बुध तुम्हारा असली शरीर और असली मन है। इस मन का कोई रूप या पहचान नहीं, ना कोई कारण नतीजा, ना नास हड्डियों। ये जगह जैसा है इसे पकड़ नहीं सकते। ये भौतिकवादी, ये मटेरियलिस्ट ये सब कुछ नकारने वाला नई लिस्ट

लोगों का मन नहीं है। सिर्फ तथागत को छोड़कर कोई और नाम इंसान। ना भ्रमित इंसान, ना मोर टल ना डिलूटेड इसे समझ नहीं सकता लेकिन ये मन शरीर के बाहर कहीं नहीं है। अगर ये मन ना हो तो हम हिल भी नहीं सकते। शरीर में जागरूकता नहीं होती। वो पौधे या पत्थर जैसा है, शरीर में कोई पहचान नहीं तो ये कैसे चलता है?

मन ही सब चलाता है, भाषा और बर्ताव देखना और सोचना ये सब चलने वाले मन के काम हैं। हर हरकत मन की ही हरकत है, हरकत ही उसका काम है, हरकत के बिना मन नहीं और मन के बिना हरकत नहीं, लेकिन हरकत मन नहीं है और मन हरकत नहीं है। हरकत असल में बिना मन के है। और मन असल में बिना हरकत के है, लेकिन हरकत मन के बिना नहीं होती और मन भी हरकत के बिना नहीं होता। ना कोई अलग मन है जिसमें हरकत हो सके, ना कोई अलग हरकत है जिसमें मन हो सके। हरकत मन का काम है और उसका काम ही

उसकी हरकत है। फिर भी मन न तो चलता है न ही कोई काम करता है क्योंकि उसके काम की असली पहचान खालीपन है। और खालीपन असल में बिल्कुल शांत है। हरकत और मन दोनों एक जैसे हैं और मन असल में शांत ही है। इसीलिए सूत्र में लिखा है चलो, लेकिन बिना चले। घूमो लेकिन बिना घूमे देखो लेकिन बिना देखे हंसो, लेकिन बिना हसे सुनो, लेकिन बिना सुने जानो लेकिन बिना जाने खुश रहो, लेकिन बिना खुशी के। चलो, लेकिन बिना चलने के खड़े रहो, लेकिन बिना खड़े हुए सूत्र में लिखा है भाषा से आगे निकलो,

सोच से आगे बढ़ो, असल में देखना, सुनना जानना। ये सब एकदम खाली है। तुम्हारा गुस्सा, खुशी या दर्द भी कठपुतली जैसा ही है, ढूंढ़ो तो कुछ मिलेगा ही नहीं। सूत्र के हिसाब से बुरे काम से मुश्किलें आती हैं। और अच्छे काम से सुख मिलता है, गुस्से वाले लोग नरक में जाते हैं और खुश लोग स्वर्ग में जाते हैं। लेकिन जब समझ लेते हो कि गुस्से और खुशी की असली पहचान खालीपन है और इन्हें छोड़ देते हो। तो कर्म से आजाद हो जाते हो। अगर अपनी पहचान नहीं देखी तो

सूत्र बोलना भी कोई फायदा नहीं करता। मैं और भी बता सकता था, लेकिन ये छोटी सी सीख ये सेरमान। यही खत्म करता हूँ।

Transcript supplied by the publisher with the episode.

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